सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ११८ § ७४ ] प्रथमोऽध्यायः ३१
§ ६९. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । अचक्षुर्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । अवधिदर्शनानाम-
वधिज्ञानिवत् । केवलदर्शनानां केवलज्ञानिवत् ।
§ ७०. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्यानां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्तानां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् । तेजःपद्मलेश्यानां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । शुक्ल- ५
लेश्यानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनामलेश्यानां च
सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ७१. भव्यानुवादेन भव्यानां चतुर्दशानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । अभव्यानां सर्वलोकः ।
§ ७२. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां क्षायो-
पशमिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानामौपशमिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्या- १०
द्युपशान्तकषायान्तानां सासादनसम्यग्दृष्टीनां सम्यङ्मथ्यादृष्टीनां मिथ्यादृष्टीनां च सामान्योक्तं
क्षेत्रम् ।
§ ७३. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनां सर्वलोकः । तदुभयव्यपदेशरहितानां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ७४. आहारानुवादेन आहारकाणां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं १५
क्षेत्रम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । अनाहारकाणां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्य-
§ ६९. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानमें
चक्षुदर्शनवाले जीवोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक
प्रत्येक गुणस्थानवाले अचक्षुदर्शनवाले जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। तथा अवधिदर्शनवालोंका
अवधिज्ञानियोंके समान और केवलदर्शनवालोंका केवलज्ञानियोंके समान क्षेत्र है। २०
§ ७०. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक प्रत्येक गुण-
स्थानवाले कृष्ण, नील और कपोत लेश्यावाले जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले पीत और पद्मलेश्यावाले जीवोंके लोकका असंख्यातवां
भाग क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानवाले शुक्ललेश्यावाले जीवोंका
लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है तथा शुक्ललेश्यावाले सयोगकेवलियोंका और लेश्या रहित २५
जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
§ ७१. भव्य मार्गणाके अनुवादसे चौदह गुणस्थानवाले भव्य जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
अभव्योंका सब लोक क्षेत्र है।
§ ७२. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे असयत सम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंका, असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक ३०
गुणस्थानवाले क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंका, असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर उपशान्तकषाय गुणस्थान-
तक प्रत्येक गुणस्थानवाले औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंका तथा सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि
और मिथ्यादृष्टियोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
§ ७३. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंका चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान, असंज्ञियोंका
सब लोक और संज्ञी-असंज्ञी इस संज्ञासे रहित जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। ३५
§ ७४. आहार मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले आहारकोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। सयोगकेवलियोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri