सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोको वा । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः सर्व-
लोको वा । शेषाणां सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ७८. कायानुवादेन स्थावरकायिकैः सर्वलोकः स्पृष्टः त्रसकायिनां पञ्चेन्द्रियवत् स्पर्शनम् ।
§ ७९. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दश-
भागा वा देशोनाः सर्वलोको वा। सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनां क्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं ५
स्पर्शनम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । काययोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादीनां सयोगकेवल्य-
न्तानामयोगकेवलिनां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८०. वेदानुवादेन ^१स्त्रीपुंवेदैर्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः स्पृष्टः ^२अष्टौ चतुर्दश-
भागा वा देशोनाः सर्वलोको^३ वा । सासादनसम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ नव चतु-
लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और ^४सब लोकका स्पर्श किया है। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टियोंने १०
लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^५आठ भाग क्षेत्रका
और ^६सत्र लोकका स्पर्श किया है। शेष गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका स्पर्श ओघके समान है ।
§ ७८. काय मार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिक जीवोंने सब लोकका स्पर्श किया है ।
त्रसकायिकोंका स्पर्श पंचेन्द्रियोंके समान है।
§ ७९. योग मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंने लोकके १५
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^७आठ भाग क्षेत्रका और
^८सब लोकका स्पर्श किया है। सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर क्षीणकषाय तकके गुणस्थानवालोंका
स्पर्श ओघके समान है। और सयोगकेवली जीवोंका स्पर्श लोकका^९ असंख्यातवां भाग है। तथा
मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तकके काययोगवालोंका और अयोगकेवली जीवोंका
स्पर्श ओघके समान है। २०
§ ८०. वेद मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंने लोकके
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^१०आठ भाग और सब लोक
क्षेत्रका स्पर्श किया है। सासादन सम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा लोक
नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^११आठ भाग और कुछ कम नौ ^१२भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है।
१. स्त्रीपुंसवे-ता० । २. अष्टौ नव चतु-मु० । ३. -लोको वा । नपुंसकवेदेषु मु० । ४. विकलेन्द्रियोंका सब २५
लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपाद पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ५. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु
और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त
होता है। ६. सब लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपादकी अपेक्षा प्राप्त होता है। ७. मेरुतलसे नीचे
कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी
अपेक्षा प्राप्त होता है । ८. सब लोक स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है। ९. समुद्घात- ३०
के कालमें मनोयोग और वचनयोग नहीं होता, इससे वचनयोगी और मनोयोगी सयोगी केवलियोंका
स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण बतलाया है । १०. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर
छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । सब
लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपाद पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ११. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु
और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त ३५
होता है । १२. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक पदकी
अपेक्षा प्राप्त होता है। यहाँ उपपाद पदकी अपेक्षा ग्यारह घनराजु स्पर्शन प्राप्त होता है । किन्तु उपपादपदकी
विवक्षा नहीं होनेसे उसका उल्लेख नहीं किया है। यह स्पर्शन मेरुतलसे नीचे कुछ कम पाँच राजु और
ऊपर छह राजु इस प्रकार प्राप्त होता है ।