सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । लोभकषायाणामुक्त एव क्रमः । अयं तु
विशेषः सूक्ष्मसांपरायसंयताः सामान्योक्तसंख्याः । अकषाया उपशान्तकषायादयोऽयोगकेवल्यन्ताः
सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५२. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिनः श्रुताज्ञानिनश्च मिथ्यादृष्टिससादनसम्यग्दृष्टयः सामा- ५
न्योक्तसंख्याः । विभङ्गज्ञानिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेण्यः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
सम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । मतिश्रुतज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । अवधिज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः२ सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्त-
संयतादयः क्षीणकषायान्ताः संख्येयाः । मनःपर्ययज्ञानिनः प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः
संख्येयाः । केवलज्ञानिनः सयोगा अयोगाश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५३. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः १०
सामान्योक्तसंख्याः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च संख्येयाः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धि-
संयता यथाख्यातविहारशुद्धिसंयताः संयतासंयता असंयताश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले जीवोंकी वही संख्या है जो ३सामान्यसे कही है। प्रमत्त-
संयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक उक्त कषायवाले जीव संख्यात हैं। यही क्रम लोभकषायवाले
जीवोंका जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि सूक्ष्मसाम्परायिक संयत जीवोंकी वही १५
संख्या है जो सामान्यसे कही गयी है। उपशान्त कषायसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
कषाय रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है।
§ ५२. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है। विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण
हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि विभंगज्ञानी जीव २०
पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक मतिज्ञानी
और श्रुतज्ञानी जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ६ है । असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत अवधिज्ञानी
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ७ है। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानमें
अवधिज्ञानी जीव संख्यात हैं। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानमें मनःपर्यय-
ज्ञानी जीव संख्यात हैं। सयोगी और अयोगी केवलज्ञानियोंकी संख्या सामान्यवत् ८ है। २५
§ ५३. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक सामायिकसंयत
और छेदोपस्थापनासंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् है । प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें परि-
हार-विशुद्धि संयत जीव संख्यात हैं । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयता-
संयत और असंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १० है ।
१. -दृष्टयः सासा- ता० । २. -यतान्ताः सामा- -मु०, दि० १, दि० २, आ० । ३. यों तो जिस ३०
गुणस्थानवालोंकी संख्या बतलायी है वह क्रोध आदि चार भागोंमें बँट जाती है फिर भी सामान्यसे
उस संख्याका अतिक्रम नहीं होता इसलिए क्रोध, मान, माया और लोभ कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवालोंकी संख्या ओघके समान बतलायी है। आगे भी जहाँ इस प्रकार
संख्या बतलायी हो वहाँ यही क्रम जान लेना चाहिए। ४. संख्यात । ५. अनन्तानन्त । ६. जिस गुणस्थान-
वालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या है। ७. पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ८. संख्यात । ९. ३५
संख्यात । १०. सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत और यथाख्यात विहारशुद्धिसंयत जीव संख्यात हैं। तथा संयतासंयत
जीव पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं और असंयत जीव अनन्तानन्त हैं।