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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 558 में से

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पृष्ठ 144

३२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ७४ -
संयतसम्यग्दृष्ट्ययोगकेवलिनां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येया¹ भागः सर्व-
लोको वा । क्षेत्रनिर्णयः कृतः ।
मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और अयोगकेवली अनाहारक जीवोंका
सामान्योक्त क्षेत्र है। तथा सयोगकेवली अनाहारकोंका लोकका असंख्यात बहुभाग और सब
५ लोक क्षेत्र है ।
विशेषार्थ—क्षेत्रप्ररूपणामें केवल वर्तमान कालीन आवासका विचार किया जाता है।
मिथ्यादृष्टि जीव सब लोकमें पाये जाते हैं इसलिए उनका सब लोक क्षेत्र बतलाया है। अन्य
गुणस्थानवाले जीव केवल लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में ही पाये जाते हैं इसलिए
इनका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र बतलाया है। केवल सयोगिकेवली इसके
१० अपवाद हैं। यों तो स्वस्थानगत सयोगिकेवलियोंका क्षेत्र भी लोकके असंख्यातवें भाग
प्रमाण ही है फिर भी जो सयोगिकेवली समुद्घात करते हैं उनका क्षेत्र तीन प्रकारका प्राप्त होता
है। दण्ड और कपाटरूप समुद्घातके समय लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, प्रतररूप समुद्घातके
समय लोकका असंख्यात बहुभाग और लोकपूरक समुद्घातके समय सब लोक क्षेत्र प्राप्त होता है
इसलिए इनके क्षेत्रका निर्देश तीन प्रकारसे किया जाता है। गति आदि मार्गणाओंके क्षेत्रका
१५ विचार करते समय इसी दृष्टिको सामने रखकर विचार करना चाहिए । साधारणतया कहाँ
कितना क्षेत्र है इसका विवेक इन बातोंसे किया जा सकता है—१. मिथ्यादृष्टियोंमें एकेन्द्रियोंका
ही सब लोक क्षेत्र प्राप्त होता है। शेषका नहीं । इनके कुछ ऐसे अवान्तर भेद हैं जिनका सब लोक
क्षेत्र नहीं प्राप्त होता पर वे यहाँ विवक्षित नहीं । इस हिसाबसे जो-जो मार्गणा एकेन्द्रियोंके सम्भव
हो उन सबके सब लोक क्षेत्र जानना चाहिए । उदाहरणार्थ—गति मार्गणामें तिर्यंचगति मार्गणा,
२० इन्द्रिय मार्गणामें एकेन्द्रिय मार्गणा, काय-मार्गणामें पृथिवी आदि पाँच स्थावर काय मार्गणा,
योग मार्गणामें काययोग मार्गणा, वेदमार्गणामें नपुंसक वेदमार्गणा, कषाय मार्गणामें क्रोध, मान,
माया और लोभ कषाय मार्गणा, ज्ञान मार्गणामें मत्यज्ञान और श्रुताज्ञान मार्गणा, संयम मार्गणा-
में असंयत संयम मार्गणा, दर्शनमार्गणामें अचक्षुदर्शन मार्गणा, लेश्या मार्गणामें कृष्ण, नील और
कापोत लेश्या मार्गणा, भव्य मार्गणामें भव्य और अभव्य मार्गणा, सम्यक्त्व मार्गणामें मिथ्यादृष्टि
२५ सम्यक्त्व मार्गणा, संज्ञा मार्गणामें संज्ञी असंज्ञी मार्गणा, तथा आहार मार्गणामें आहार और
अनाहार मार्गणा इनका सब लोक क्षेत्र है। २. सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान
तकके जीवोंका और अयोगकेवलियोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही है । ३. दोइन्द्रिय,
तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रियोंमें असंज्ञियोंका क्षेत्र भी लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण
है । ४. संज्ञियोंमें समुद्घातगत सयोगिकेवलियोंके सिवा शेष सबका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग-
३० प्रमाण है । इन नियमोंके अनुसार जो मार्गणाएँ सयोगिकेवलीके समुद्घातके समय सम्भव हैं उनमें
भी सब लोक क्षेत्र बन जाता है। शेषके लोकका असंख्यातवाँ भाग प्रमाण ही क्षेत्र जानना
चाहिए । सयोगिकेवलीके लोकपूरण समुद्घातके समय मनुष्य गति, पंचेन्द्रिय जाति, त्रस काय,
काययोग, अपगतवेद, अकषाय, केवलज्ञान, यथाख्यात संयम, केवल दर्शन, शुक्ल लेश्या, भव्यत्व,
क्षायिक सम्यक्त्व, न संज्ञी न असंज्ञी और अनाहार ये मार्गणाएँ पायी जाती हैं इसलिए लोकपूरण
समुद्घातके समय इन मार्गणाओंका क्षेत्र भी सब लोक जानना चाहिए । केवलीके प्रतर समुद्घात-
३५ के समय लोकका असंख्यात बहुभाग प्रमाण क्षेत्र पाया जाता है। इसलिए इस समय जो मार्गणाएँ
सम्भव हों उनका क्षेत्र भी लोकका असंख्यात बहुभाग प्रमाण बन जाता है। उदाहरणके लिए
१. -स्यासंख्येयभागः मु०, दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri