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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 558 में से

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पृष्ठ 136

२४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६४२ -
§ ४२. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अयोगकेवल्यन्तानि
सन्ति । क्षायोपशमिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अप्रमत्तान्तानि । औपशमिकसम्यक्त्वे
असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि उपशान्तकषायान्तानि । सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टिमिथ्या-
दृष्टिश्च स्वे स्वे स्थाने ।
५ § ४३. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु द्वादश गुणस्थानानि क्षीणकषायान्तानि । असंज्ञिषु एकमेव
मिथ्यादृष्टिस्थानम् । तदुभयव्यपदेशरहितः सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
§ ४४. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादीनि केवल्यन्तानि । अनाहारकेषु विग्रह-
गत्यापन्नेषु त्रीणि गुणस्थानानि मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिरसंयतसम्यग्दृष्टिश्च । समुद्घात-
गतः सयोगकेवली अयोगकेवली च । सिद्धाः परमेष्ठिनः अतीतगुणस्थानाः । उक्ता सत्प्ररूपणा ।
§ ४५. संख्याप्ररूपणोच्यते । सा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद् जीवा
१० मिथ्यादृष्टयोनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयः संयता-
संयताश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयताः कोटीपृथक्त्वसंख्याः । पृथक्त्वमित्यागमसंज्ञा
तिसृणां कोटीनामुपरि नवानामधः । अप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार उपशमकाः प्रवेशेन एको
वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेण चतुःपञ्चाशत् । स्वकालेन समुदिताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपका
अयोगकेवलिनश्च प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः । स्वकालेन
१५ समुदिताः संख्येयाः । सयोगकेवलिनः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः ।
स्वकालेन समुदिताः शतसहस्रपृथक्त्वसंख्याः ।
§ ४२. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोग-
केवली तक ग्यारह गुणस्थान हैं। क्षायोपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
तक चार गुणस्थान हैं। औपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर उपशान्तकषाय तक
२० आठ गुणस्थान हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि अपने-अपने गुणस्थान
में होते हैं ।
§ ४३. संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें क्षोणकषाय तक बारह गुणस्थान हैं। असंज्ञियोंमें
एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे रहित जीव सयोगकेवली और
अयोगकेवली इन दो गुणस्थानवाले होते हैं।
२५ § ४४. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर सयोगकेवली
तक तेरह गुणस्थान होते हैं। विग्रहगतिको प्राप्त अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और
असंयतसम्यग्दृष्टि ये तीन गुणस्थान होते हैं। तथा समुद्घातगत सयोगकेवलो और अयोगकेवलो
जीव भी अनाहारक होते हैं। सिद्ध परमेष्ठी गुणस्थानातीत हैं। इस प्रकार सत्प्ररूपणाका कथन
समाप्त हुआ।
३० § ४५. अब संख्या प्ररूपणाका कथन करते हैं। सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो
प्रकारको है। सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत इनमें-से प्रत्येक गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें
भागप्रमाण हैं। प्रमत्तसंयतोंकी संख्या कोटिपृथक्त्व है। पृथक्त्व यह आगमिक संज्ञा है। इससे
तीन से ऊपर और नौके नीचे मध्यकी किसी संख्याका बोध होता है। अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात
३५ हैं। चारों उपशमक गुणस्थानवाले जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक-दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे चौवन
हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव संख्यात हैं। चारों क्षपक और अयोगकेवली
प्रवेशकी अपेक्षा एक दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित
१. द्विविधा । सामान्येन तावत्-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri