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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 558 में से

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पृष्ठ 132

§ २९. अधिकरणं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं स्वस्वामिसम्बन्धार्ह एव आत्मा;
विवक्षातः कारकप्रवृत्तेः । बाह्यं लोकनाडी । सा कियती । एकरज्जुविष्कम्भा चतुर्दशरज्ज्वायामा ।
§ ३०. स्थितिरौपशमिकस्य जघन्योत्कृष्टा चान्तर्मुहूर्तकी । क्षायिकस्य संसारिणो जघन्या-
न्तर्मुहूर्तकी । उत्कृष्टा त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सान्तर्मुहूर्ताष्टवर्षहीनपूर्वकोटिद्वयाधिकानि । मुक्तस्य
सादिरपर्यवसाना । क्षायोपशमिकस्य जघन्यान्तर्मुहूर्तकी उत्कृष्टा षट्षष्ट्रिसागरोपमाणि ।
§ ३१. विधानं सामान्यादेकं सम्यग्दर्शनम् । द्वितयं निसर्गजाधिगमजभेदात् १। त्रितयं
औपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकभेदात् । एवं संख्यैया विकल्पाः शब्दतः । असंख्येया अनन्ताश्च
भवन्ति श्रद्धातृश्रद्धातव्यभेदात् । एवमयं निर्देशादिविधिर्ज्ञानचारित्रयोर्जीवाजीवादिषु चागमानु-
सारेण योजयितव्यः ।
§ २९. अधिकरण दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । अभ्यन्तर अधिकरण—जिस
सम्यग्दर्शनका जो स्वामी है वही उसका अभ्यन्तर अधिकरण है । यद्यपि सम्बन्धमें षष्ठी और
अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है फिर भी विवक्षाके अनुसार कारककी प्रवृत्ति होती है, अतः
षष्ठी विभक्ति द्वारा पहले जो स्वामित्वका कथन किया है उसके स्थानमें सप्तमी विभक्ति करनेसे
अधिकरणका कथन हो जाता है । बाह्य अधिकरण लोकनाडी है । शंका—वह कितनी बड़ी है ?
समाधान—एक राजु चौड़ी और चौदह राजु लम्बी है ।
§ ३०. औपशमिक सम्यग्दर्शनकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त है । क्षायिक
सम्यग्दर्शनकी संसारी जीवके जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष और
अन्तर्मुहूर्तकम दो पूर्वकोटि अधिक तेतीस २सागर है । मुक्त जीवके सादि—अनन्त है । क्षायोपश-
मिक३ सम्यग्दर्शनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति छयासठ सागर है ।
§ ३१. भेदकी अपेक्षा सम्यग्दर्शन सामान्यसे एक है । निसर्गज और अधिगमजके भेदसे दो
प्रकारका है । औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिकके भेदसे तीन प्रकारका है । शब्दोंकी अपेक्षा
संख्यात प्रकारका है तथा श्रद्धान करनेवालोंकी अपेक्षा असंख्यात प्रकारका और श्रद्धान करने
१. -गमजभेदात् । एवं मु० । २. क्षायिक सम्यग्दृष्टि उसी भवमें, तीसरे भवमें या चौथे भवमें मोक्ष जाता है ।
जो चौथे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले भोगभूमिमें उसके बाद देव पर्यायमें जन्म लेकर और अन्तमें मनुष्य
होकर मोक्ष जाता है । जो तीसरे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले नरकमें या देवपर्यायमें जन्म लेकर और
अन्तमें मनुष्य होकर मोक्ष जाता है। यहाँ तीन और चार भवोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेके भवका
भी ग्रहण कर लिया है । संसारी जीवके क्षायिक सम्यग्दर्शनकी यह उत्कृष्ट स्थिति तीन भवकी अपेक्षा बत-
लायी है । प्रथम और अन्तके दो भव मनुष्य पर्यायके लिये गये हैं और दूसरा भव देव पर्यायका लिया गया
है। इन तीनों भवोंकी उत्कृष्ट स्थिति दो पूर्व कोटि अधिक तेतीस सागर होती है । किन्तु क्षायिक सम्यग्दर्शन
की प्राप्ति आठ वर्ष और अन्तर्मुहूर्तके पहले नहीं हो सकती इसलिए उक्त कालमें से इतना काल कम करके
क्षायिक सम्यग्दर्शनकी उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त कम दो पूर्व कोटि वर्ष अधिक तेतीस सागर बतलायी
है । ३. खुद्दाबन्धमें क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर इस प्रकार घटित करके बतलाया
है—एक जीव उपशम सम्यक्त्वसे वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त होकर शेष भुज्यमान आयुसे कम बीस सागरकी
आयु वाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्योंमें उत्पन्न होकर पुनः मनुष्यायुसे कम बाईस सागरकी आयुवाले
देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्यगतिमं जाकर भुज्यमान मनुष्यायुसे तथा दर्शनमोहकी क्षपणा पर्यन्त आगे
भोगी जानेवाली मनुष्यायुसे कम चौबीस सागरकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । वहाँसे फिर मनुष्य गतिमें
आकर वहाँ वेदक सम्यक्त्वके कालमें अन्तर्मुहूर्त रह जाने पर दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ करके कृतकृत्य
वेदक सम्यग्दृष्टि हो गया । यह जीव जब कृतकृत्यवेदकके अन्तिम समयमें स्थित होता है तब क्षायोपशमिक
सम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर प्राप्त होता है ।