सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- १।७ § २७ ] प्रथमोऽध्यायः १७
मौपशमिकमस्ति । क्षायिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तापर्याप्तानाम् । तिरश्चीनां क्षायिकं नास्ति¹ ।
औपशमिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मनुष्यगतौ मनुष्याणां पर्याप्ता-
पर्याप्तानां क्षायिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । औपशमिकं पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मानु-
षीणां त्रितयमप्यस्ति पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम्² । देवगतौ³ देवानां पर्याप्तापर्याप्तानां त्रितय-
मप्यस्ति । औपशमिकमपर्याप्तिकानां कथमिति चेच्चारित्रमोहोपशमेन सह मृतान्प्रति⁴ । भवनवासि- ५
व्यन्तरज्योतिष्काणां देवानां देवीनां च सौधर्मैशानकल्पवासिनीनां च क्षायिकं नास्ति । तेषां
पर्याप्तिकानामोपशमिकं क्षायोपशमिकं चास्ति ।
§ २७. इन्द्रियानुवादेन पञ्चेन्द्रियाणां संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । कायानुवादेन
त्रसकायिकानां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । योगानुवादेन त्रयाणां योगानां त्रितयमप्यस्ति । अयोगिनां
क्षायिकमेव । वेदानुवादेन त्रिवेदीनां त्रितयमप्यस्ति । अपगतवेदानामोपशमिकं क्षायिकं चास्ति । १०
कषायानुवादेन चतुष्कषायाणां त्रितयमप्यस्ति । अकषायाणामौपशमिकं क्षायिकं चास्ति । ज्ञाना-
नुवादेन आभिनिबोधिकश्रुतावधिकमनःपर्ययज्ञानिनां त्रितयमप्यस्ति । केवलज्ञानिनां क्षायिकमेव ।
संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनासंयतानां त्रितयमप्यस्ति । परिहारविशुद्धिसंयतानामौप-
पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों प्रकारके तिर्यंचोंके होता है । तिर्यंचनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं
होता । औपशमिक और क्षायोपशमिक पर्याप्तिक तिर्यंचनीके ही होता है अपर्याप्तिक तिर्यंचनीके १५
नहीं । मनुष्य गतिमें क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकार-
के मनुष्योंके होता है । औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक मनुष्यके ही होता है अपर्याप्तिक मनुष्यके
नहीं । मनुष्यनियोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु ये पर्याप्तिक मनुष्यनीके ही होते हैं अपर्याप्तिक
मनुष्यनीके नहीं । देवगतिमें पर्याप्तक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकारके देवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन
होते हैं । शंका—अपर्याप्तिक देवोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन कैसे होता है ? समाधान—जो मनुष्य २०
चारित्रमोहनीयका उपशम करके या करते हुए उपशमश्रेणीमें मरकर देव होते हैं उन देवोंके
अपर्याप्तिक अवस्थामें औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके,
इन तोनोंकी देवांगनाओंके, तथा सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्पन्न हुई देवांगनाओंके क्षायिक
सम्यग्दर्शन नहीं होता शेष दो होते हैं सो वे भी पर्याप्तक अवस्थामें ही होते हैं ।
§ २७. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । २५
अन्य जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । कायमार्गणाके अनुवादसे त्रसकायिक जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन होते हैं । अन्य कायवाले जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । योगमार्गणाके
अनुवादसे तीनों योगवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु अयोगी जीवोंके एक क्षायिक
सम्यग्दर्शन ही होता है । वेदमार्गणाके अनुवादसे तीनों वेदवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते
हैं किन्तु अयोगी जीवोंके औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । कषायमार्गणाके ३०
अनुवादसे चारों कषायवाले जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु कषायरहित जीवोंके
औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे आभिनिबोधिक ज्ञानी,
श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मनःपर्ययज्ञानी जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु केवलज्ञानी
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । संयममार्गणाके अनुवादसे सामायिक और छेदोप-
१. नास्ति । कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणाप्रारम्भको भवति । क्षपणाप्रारम्भकालात्पूर्वं ३५
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्कृष्टभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु द्रव्यदेवस्त्रीणां तासां क्षायिकासंभवात् ।
एवं तिरश्चामप्यपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तिकानाम् । औप-मु० । २. -कानाम् । क्षायिकं पुनर्भावि-
वेदेनैव । देव- मु० । ३. -गतौ सामान्येन देवा-मु० । ४. प्रति । विशेषेण भवन-मु० ।
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