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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 558 में से

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पृष्ठ 140

२८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ५४ -
§ ५४. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । अचक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । उभये च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीण-
कषायान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् केवलदर्शनिनः केवलज्ञानिवत् ।
§ ५५. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः सामा-
न्योक्तसंख्याः । तेजःपद्मलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः स्त्रीवेदवत् । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः
संख्येयाः । शुक्ललेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्ता-
प्रमत्तसंयताः संख्येयाः । अपूर्वकरणादयः सयोगकेवल्यन्ता अलेश्याश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अभव्या
अनन्ताः ।
§ ५७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । संयतासंयतादय उपशान्तकषायान्ताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपकाः सयोगकेवलिनोऽयोग-
केवलिनश्च सामान्योक्तसंख्याः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादयोऽप्रमत्तान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार औपशमिकाः सामान्योक्तसंख्याः । सासादनसम्य-
ग्दृष्टयः सम्यङ्मिथ्यादृष्टयो मिथ्यादृष्टयश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५४. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणी
प्रमाण हैं जो श्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । अचक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव
अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उक्त दोनों दर्शनवाले
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १ है । अवधिदर्शनवाले जीवोंकी संख्या अवधिज्ञानियोंके समान है ।
केवलदर्शनवाले जीवोंकी संख्या केवलज्ञानियों के समान है ।
§ ५५. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक कृष्ण, नील
और कापोत लेश्यावाले जीवोंकी संख्या २सामान्यवत् है । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक पीत
और पद्मलेश्यावाले जीवोंकी संख्या ३स्त्रीवेदके समान है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थानवाले पीत और पद्मलेश्यावाले जीव संख्यात हैं । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक शुक्ल
लेश्यावाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं ।
अपूर्वकरणसे लेकर सयोगकेवली तक जीव सामान्यवत् ४ हैं । लेश्यारहित जीव सामान्यवत् हैं ।
§ ५६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक जीव
सामान्यवत् ५ हैं । अभव्य अनन्त हैं ।
§ ५७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि जीव पल्यके
असंख्यातवें भाग हैं । संयतासंयतसे लेकर उपशान्तकषाय तक जीव संख्यात हैं । चारों क्षपक,
सयोगकेवली और अयोगकेवली सामान्यवत् हैं । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयत सम्यग्दृष्टि-
से लेकर अप्रमत्तसंयत तक सामान्यवत् हैं । औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि और
संयतासंयत जीव पल्यके असंख्यातवें भाग हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं । चारों
उपशमक सामान्यवत् हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवोंकी
संख्या सामान्यवत् है ।
१. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या उस गुणस्थानमें चक्षु और अचक्षु दर्शन-
वालोंकी है । २. मिथ्यात्वमें अनन्तानन्त और शेष गुणस्थानोंमें पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ३. असंख्यात
जगश्रेणिप्रमाण । ४. जिस गुणस्थानवालों की जितनी संख्या है उतनी है । ५. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी
संख्या है उतनी है । केवल मिथ्यात्वमें अभव्योंकी संख्या कम हो जाती है ।