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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 558 में से

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पृष्ठ 146

३४ सर्वार्थसिद्धौ [ ११८ § ७७ –
देशोनाः । शेषैस्त्रिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्टिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः ।
सासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सप्त चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः । असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
देशोनाः । मनुष्यगतौ मनुष्यैर्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सर्वलोको वा स्पृष्टः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सप्त चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यादीनाम-
योगकेवल्यन्तानां क्षेत्रवत्स्पर्शनम् । देवगतौ देवैर्मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येय-
भागः अष्टौ नव चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येय-
भागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः ।
§ ७७. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियैः सर्वलोकः स्पृष्टः । विकलेन्द्रियैर्लोकस्यासंख्येयभागः सर्व-
चौदह भागोंमें-से कुछ कम छह राजु क्षेत्रका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि आदि शेष तीन
गुणस्थानवाले उक्त नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । तिर्यंचगतिमं
मिथ्यादृष्टि तिर्यंचोंने सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंचोंने लोकके असंख्या-
तवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३सात भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
· है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंचोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । असंयतसम्यग्दृष्टि
और संयतासंयत तिर्यंचोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से
कुछ कम छह ४भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। मनुष्यगतिमं मिथ्यादृष्टि मनुष्यों ने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका और सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ५सात भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तकके मनुष्योंका स्पर्श क्षेत्रके समान है ।
देवगतिमं मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा
लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ६आठ भाग और कुछ कम नौ ७भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक
नाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ८आठ भागक्षेत्रका स्पर्श किया है ।
§ ७७. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंने सब लोकका स्पर्श किया है। विकलेन्द्रियोंने
१. –दृष्टिभिः संयता-मु० ता०, न० । २.-दृष्टिभिः सासा-ता० । ३. मेरु पर्वतके मूलसे ऊपर सात राजु ।
यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । यद्यपि तिर्यंच सासादन सम्यग्दृष्टि जीव मेरु
पर्वतके मूलसे नीचे भवन-वासियोंमें मारणान्तिक समुद्घात करते हुए पाये जाते हैं तथापि इतने मात्रसे
स्पर्शन क्षेत्र सात राजुसे अधिक न होकर कम ही रहता है। ऐसे जीव मेरुपर्वतके मूलसे नीचे
एकेन्द्रियोंमें व नारकियोंमें मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते. यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ४. ऊपर अच्युत
कल्प तक छह राजु । इसमें से चित्रा पृथिवीका एक हजार योजन व आरण अच्युत कल्पके उपरि म विमानोंके
ऊपरका भाग छोड़ देना चाहिए । यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ५. भवनवासी
लोकसे लेकर ऊपर लोकाग्र तक । इसमें-से अगम्यप्रदेश छूट जानेसे कुछ कम सात राजु स्पर्श रह जाता है ।
यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ६. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और
ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकपदकी अपेक्षा प्राप्त होता है ।
७. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा प्राप्त होता है । ८. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्व-
स्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता हैं ।