सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- १।८ § ४१ ] प्रथमोऽध्यायः २३
सयोगकेवली अयोगकेवली १ चेति ।
§ ३७. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानेषु मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिश्चां-
स्ति । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानेषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । मनः-
पर्ययज्ञाने प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः सन्ति । केवलज्ञाने सयोगोऽयोगश्च ।
§ ३८. संयमानुवादेन संयताः प्रमत्तादयोऽयोगकेवल्यन्ताः । सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धि- ५
संयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिस्थानान्ताः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च । सूक्ष्मसांप-
रायशुद्धिसंयता एकस्मिन्नेव सूक्ष्मसांपरायस्थाने । यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता उपशान्तकषाया-
दयोऽयोगकेवल्यन्ताः । संयतासंयता एकस्मिन्नेव संयतासंयतस्थाने । असंयता आद्येषु चतुर्षु
गुणस्थानेषु ।
§ ३९. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनयोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । १०
केवलदर्शने सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
§ ४०. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकपोतलेश्यासु मिथ्यादृष्ट्यादीनि असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्तानि
सन्ति । तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि अप्रमत्तस्थानान्तानि । शुक्ललेश्यायां मिथ्यादृष्ट्यादीनि
सयोगकेवल्यन्तानि । अलेश्या अयोगकेवलिनः ।
§ ४१. भव्यानुवादेन भव्येषु चतुर्दशापि सन्ति । अभव्या आद्य एव स्थाने । १५
एक गुणस्थान और है । उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, सयोगो और अयोगो ये चार गुणस्थान
कषायरहित हैं ।
§ ३७. ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान और विभंगज्ञानमें मिथ्यादृष्टि और
सासादनसम्यग् दृष्टि ये दो गुणस्थान हैं । आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानमें असंयत-
सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ गुणस्थान हैं । मनःपर्ययज्ञानमें प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीण- २०
कषाय तक सात गुणस्थान हैं । केवलज्ञानमें सयोग और अयोग ये दो गुणस्थान हैं।
§ ३८. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक संयत
जीव होते हैं । सामायिक संयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति
गुणस्थान तक होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होते
हैं। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत जीव एक सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें होते हैं । यथाख्यात विहार- २५
शुद्धिसंयत जीव उपशान्तकषाय गुणस्थानसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं । संयतासंयत
जीव एक संयतासंयत गुणस्थानमें होते हैं । असंयत जीव प्रारम्भके चार गुणस्थानोंमें होते हैं ।
§ ३९. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीण-
कषाय तक बारह गुणस्थान हैं । अवधिदर्शनमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ
गुणस्थान हैं। केवलदर्शनमें सयोगकेवली और अयोगकेवली ये दो गुणस्थान हैं । ३०
§ ४०. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कपोत लेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
असंयत सम्यग्दृष्टि तक चार गुणस्थान हैं । पीत और पद्मलेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
तक सात गुणस्थान हैं । शुक्ललेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक तेरह गुणस्थान हैं ।
किन्तु अयोगकेवली जीव लेश्या रहित हैं ।
§ ४१. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंने चौदह ही गुणस्थान हैं। किन्तु अभव्य पहले ही ३५
गुणस्थान में पाये जाते हैं ।
१. -वली च । ज्ञाना-ता० न० । २. दृष्टिश्चास्ति । सम्यग्मिथ्यादृष्टेः टिप्पणकारकाभिप्रायेण ज्ञातव्यम् ।
आभिनि-न० ।