सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । नपुंसक-
वेदेषु मिथ्यादृष्टीनां सासादनसम्यग्दृष्टीनां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् । १सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः । असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
देशोनाः । प्रमत्ताद्यनिवृत्तिबादरान्तानामपगतवेदानां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८१. कषायानुवादेन चतुष्कषायाणामकषायाणां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८२. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिनां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं
स्पर्शनम् । विभङ्गज्ञानिनां मिथ्यादृष्टीनां लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः
सर्वलोको वा । सासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिमनःपर्यय-
केवलज्ञानिनां स.मान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८३. संयमानुवादेन संयतानां सर्वेषां संयतासंयतानामसंयतानां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर अनिवृत्ति बादर गुणस्थान तकके जीवोंका स्पर्श ओघके समान है ।
नपुंसकवेदियोंमें मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श २ओघके समान है । सम्यग्मिथ्या-
दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भागका स्पर्श किया है । असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतोंने लोक-
के असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३छह भाग क्षेत्रका स्पर्श
किया है । तथा प्रमत्तसंयतोंने लेकर अनिवृत्ति बादर गुणस्थान तकके जोवोंका स्पर्श ओघके
समान है ।
§ ८१. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोधादि चारों कषायवाले और कषायरहित जीवोंका
स्पर्श ओघके समान है ।
§ ८२. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्श ओघके समान है । विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टियांका स्पर्श लोकका
असंख्यातवाँ भाग, लोकनाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम आठ४ भाग और सर्व लोक५ है ।
सासादनसम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श ओघके समान है । आभिनिबोधिक ज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी,
मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीवोंका स्पर्श ओघके समान है ।
§ ८३. संयम मार्गणाके अनुवादसे सब संयतोंका, संयतासयतोंका और असंयतोंका स्पर्श
ओघके समान है ।
१. सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः स्पृष्टः । सासादनसम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ नव
चतुर्दश भागा वा देशोनाः । सम्यग्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । असंयतसम्य-
मु० । २. यहाँ नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शन ओघके समान बतलाया है ।
सो यह सामान्य निर्देश है । विशेषकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि नपुंसकवेदियोंने वैक्रियिक पदकी अपेक्षा पाँच
घनराजु क्षेत्रका स्पर्श किया है, क्योंकि वायुकायिक जीव इतने क्षेत्रमें विक्रिया करते हुए पाये जाते हैं ।
नपुंसकवेदी सासादन सम्यग्दृष्टियोंने स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकपदकी
अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उपपादपदकी अपेक्षा कुछ कम ग्यारह बटे चौदह
भाग त्रसनालीका स्पर्श किया है । मारणान्तिक पदकी अपेक्षा कुछ कम बारह बटे चौदह भाग त्रसनालीका
स्पर्श किया है । शेष कथन ओघके समान है । ३. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है ।
४. यह स्पर्श विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है, क्योंकि नीचे दो
राजु और ऊपर छह राजु क्षेत्रमें गमनागमन देखा जाता है । ५. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त
होता है, क्योंकि ये