सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- १।८ § ६२ ] प्रथमोऽध्यायः २९
§ ५८. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताश्चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनो
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । तदुभयव्यपदेशरहिताः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५९. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादयः सयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः सामान्योक्तसंख्याः । सयोगकेवलिनः
संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः । संख्या निर्णीता । ५
§ ६०. क्षेत्रमुच्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावन्-मिथ्यादृष्टीनां
सर्वलोकः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामयोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
लोकस्यासंख्येयभागोऽसंख्येया भागाः सर्वलोको वा १।
§ ६१. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकाणां चतुर्षु गुणस्थानेषु
लोकस्यासंख्येयभागः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । १०
मनुष्यगतौ मनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् । देवगतौ देवानां सर्वेषां चतुर्षु गुणस्थानेषु लोकस्यासंख्येयभागः ।
§ ६२. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां क्षेत्रं सर्वलोकः । विकलेन्द्रियाणां लोकस्यासंख्येयभागः ।
पञ्चेन्द्रियाणां मनुष्यवत् ।
§ ५८. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक जीवोंकी १५
संख्या चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान २ है । असंज्ञी मिथ्यादृष्टि अनन्तानन्त हैं । संज्ञी और असंज्ञी
संज्ञासे रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ३ है ।
§ ५९. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है । अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयत-
सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है । सयोगकेवली संख्यात हैं और अयोगकेवली जीवोंकी २०
संख्या सामान्यवत् ६ है । इस प्रकार संख्याका निर्णय किया ।
§ ६०. अब क्षेत्रका विचार करते हैं । सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो प्रकार का है ।
सामान्यसे मिथ्यादृष्टियोंका सब लोक क्षेत्र है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर अयोगकेवली तक
जीवोंका लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र है । सयोगकेवलियोंका लोकके असंख्यातवें भाग
प्रमाण, लोकके असंख्यात बहुभाग प्रमाण और सब लोक क्षेत्र है । २५
§ ६१. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियों-
का चार गुणस्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे
लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका क्षेत्र सामान्यवत् है । अर्थात् मिथ्यादृष्टि
तिर्यंचोंका सब लोक क्षेत्र है और शेष तिर्यंचोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है । मनुष्य-
गतिमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्योंका क्षेत्र लोकका ३०
असंख्यातवां भाग है। सयोगकेवलियोंका सामान्यवत् क्षेत्र है । देवगतिमें सब देवोंका चार गुण-
स्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है।
§ ६२. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंका सब लोक क्षेत्र है । विकलेन्द्रियोंका लोकका
असंख्यातवां भाग क्षेत्र है और पंचेन्द्रियोंका मनुष्योंके समान क्षेत्र है ।
१. -भागः । समुद्घातेऽसंख्येया वा भागाः सर्व-मु० न० । २. मिथ्यादृष्टि संज्ञी असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण ३५
हैं । सासादन आदि संज्ञियोंकी संख्या जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है उतनी है । ३. संख्यात ।
४. मिथ्यादृष्टि आहारक अनन्तानन्त हैं । सासादनसे लेकर संयतासंयत तकके आहारक पल्यके असंख्यातवें
भाग प्रमाण हैं । शेष संख्यात हैं । ५. मिथ्यादृष्टि अनाहारक अनन्तानन्त हैं । तथा सासादन सम्यग्दृष्टि और
असंयत सम्यग्दृष्टि अनाहारक पल्यके असंख्यातवें भाग हैं। ६. संख्यात ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri