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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 558 में से

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पृष्ठ 131
  • १७ § २८ ] प्रथमोऽध्यायः १९

§ २८. साधनं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो
वा । बाह्यं नारकाणां प्राक्चतुर्थ्याः सम्यग्दर्शनस्य साधनं केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं
केषांचिद्वेदनाभिभवः । चतुर्थीमारभ्य आ सप्तम्या नारकाणां जातिस्मरणं वेदनाभिभवश्च ।
तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनबिम्बदर्शनम् । मनुष्याणामपि तथैव ।
देवानां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनमहिमदर्शनं केषांचिद्देवर्द्धिदर्शनम् । ५
एवं प्रागानतात् । आनतप्राणतारणाच्युतदेवानां देवर्द्धिदर्शनं मुक्तान्यत्त्रितयमप्यस्ति । नवग्रैवेयक-
वासिनां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणम् । अनुदिशानुत्तरविमानवासिनामिदं कल्पना
न संभवति; प्रागेव गृहीतसम्यक्त्वानां तत्रोत्पत्तेः ।

सम्यग्दृष्टिका ही मरण सम्भव है अन्यका नहीं । ७. कृतकृत्यवेदक सम्यग्दर्शन क्षयोपशम सम्यग्-
दर्शनका एक भेद है। इसके सिवा दूसरे प्रकारके क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देव और १०
मनुष्यगतिमें ही जन्म लेते हैं नरक और तिर्यंचगतिमें नहीं । ऐसे जीव यदि तिर्यंचगति और
मनुष्यगतिके होते हैं तो देवोंमें उत्पन्न होते हैं। यदि नरकगति और देवगतिके होते हैं तो वे
मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं। ८. सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी
प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें ही उत्पन्न
होता है। मनुष्यगति और तिर्यंचगतिके नपुंसकवेदियोंमें नहीं उत्पन्न होता १। ये ऐसी बातें १५
हैं जिनको ध्यानमें रखनेसे किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है इसका पता
लग जाता है जिसका स्पष्ट उल्लेख मूल टीकामें किया ही है। एक बातका उल्लेख कर देना
और आवश्यक प्रतीत होता है वह यह कि गति मार्गणाके अवान्तर भेद यद्यपि भाववेदकी
प्रधानतासे किये गये हैं द्रव्य वेदकी प्रधानतासे नहीं, इसलिए यहाँ सर्वत्र भाववेदी स्त्रियोंका ही
ग्रहण किया गया है । तथापि द्रव्यस्त्रियोंमें सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता यह बात अन्य २०
प्रमाणोंसे जानी जाती है। इस प्रकार किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है
इसका विचार किया। शेष मार्गणाओंमें कहाँ कितने सम्यग्दर्शन हैं और कहाँ नहीं इसका विचार
सुगम है, इसलिए यहाँ हमने स्पष्ट नहीं किया ।
§ २८. साधन दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या
क्षयोपशम अभ्यन्तर साधन है । बाह्य साधन निम्न प्रकार है—नारकियोंके चौथे नरकसे पहले २५
तक अर्थात् तीसरे नरक तक किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण और किन्हींके वेदना-
भिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। चौथेसे लेकर सातवें तक किन्हींके जातिस्मरण और
किन्हींके वेदनाभिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। तिर्यंचोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके
धर्मश्रवण, और किन्हींके जिनबिम्बदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। मनुष्योंके भी इसी प्रकार
जानना चाहिए । देवोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण, किन्हींके जिनमहिमादर्शन, ३०
और किन्हींके देवऋद्धिदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । यह व्यवस्था आनत कल्पसे पूर्वतक
जानना चाहिए । आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देवोंके देवऋद्धिदर्शनको छोड़कर
शेष तीन साधन पाये जाते हैं। नौ ग्रैवेयकमें निवास करनेवाले देवोंके सम्यग्दर्शनका साधन
किन्हींके जातिस्मरण और किन्हींके धर्मश्रवण है। अनुदिश और अनुत्तरविमानोंमें रहनेवाले
देवोंके यह कल्पना नहीं है, क्योंकि वहाँ सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं। ३५

१. इस नियमके अनुसार जीवकाण्डकी 'हेट्ठिमछप्पुढवीणं' इत्यादि गाथामें 'सव्वइत्थीणं' के स्थानमें 'संडइत्थीणं'
पाठ समीचीन प्रतीत होता है ।