सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंशमिकं नास्ति, इतरद् द्वितयमप्यस्ति । सूक्ष्मसांपराययथाख्यातसंयतानामौपशमिकं क्षायिकं
चास्ति । संयतासंयतानां असंयतानां १ च त्रितयमप्यस्ति । दर्शनानुवादेन चक्षुदर्शनाचक्षुदर्शनावधि-
दर्शिननां त्रितयमप्यस्ति । केवलदर्शिनां क्षायिकमेव । लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानां त्रितयमप्यस्ति ।
अलेश्यानां क्षायिकमेव । भव्यान्वादेन भव्यानां त्रितयॅमप्यस्ति नाभव्यानाम् । सम्यक्त्वानुवादेन
५ यत्र यत्सम्यग्दर्शनं तत्र तदेव ज्ञेयम् । संज्ञानुवादेन संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नासंज्ञिनाम् ।
तदुभयव्यपदेशरहितानां क्षायिकमेव आहारानुवादेन आहारकाणां त्रितयमप्यस्ति । अनाहारकाणां
छद्मस्थानां त्रितयमप्यस्ति केवलिनां समुद्घातगतानां क्षायिकमेव ।
स्थापना संयत जीवोंके तोनों सम्यग्दर्शन होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयतोंके औपशामिक सम्यग्दर्शन
नहीं होता शेष दो होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके औपशामिक और
१० क्षायिक सम्यग्दर्शन होते हैं । संयतासंयत और असंयत जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । दर्शन-
मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले और अवधिदर्शनवाले जीवोंके तीनों सम्य-
ग्दर्शन होते हैं किन्तु केवल दर्शनवाले जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु लेश्यारहित
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्य जीवोंके तीनों
१५ सम्यग्दर्शन होते हैं । अभव्योंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे
जहाँ जो सम्यग्दर्शन है वहाँ वही जानना । संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञी जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन हैं । असंज्ञियोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं है । तथा संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे
रहित जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । आहारकमार्गणाके अनुवादसे आहारकोंके
तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं। अनाहारक छद्मस्थोंके भी तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । किन्तु
२० समुद्घातगत केवली अनाहारकोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
विशेषार्थ—पदार्थोंके विवेचन करनेकी प्राचीन दो परम्पराएँ रही हैं—निर्देश आदि
छह अधिकारों द्वारा विवेचन करनेकी एक परम्परा और सदादि आठ अधिकारों द्वारा
विवेचन करनेकी दूसरी परम्परा । यहाँ तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छ आचार्यने ७वें और
८वें सूत्रों द्वारा इन्हीं दो परम्पराओंका निर्देश किया है। यहाँ टीकामें निर्देश आदिके स्वरूपका
२५ कथन करके उन द्वारा सम्यग्दर्शनका विचार किया गया है। उसमें भी स्वामित्वकी अपेक्षा जो
कथन किया है उसका भाव समझनेके लिए यहाँ मुख्य बातोंका उल्लेख कर देना आवश्यक प्रतीत
होता है । इन बातोंको ध्यानमें रखनेसे चारों गतियोंमें किस अवस्थामें कहाँ कौन सम्यग्दर्शन
होता है इसका निर्णय करनेमें सहायता मिलती है । वे बातें ये हैं—१. क्षायिक सम्यग्दर्शनका
प्रस्थापक कर्मभूमिका मनुष्य ही होता है । किन्तु ऐसा जीव कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि या क्षायिक
३० सम्यग्दृष्टि हो जानेके बाद मरकर चारों गतियोंमें जन्म ले सकता है । २. नरकमें उक्त जीव प्रथम
नरकमें ही जाता है । दूसरे आदि नरकोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता । ३.
तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें उक्त जीव उत्तम भोगभूमिके पुरुषवेदी तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें ही उत्पन्न हो
सकता है । ४. तिर्यंच, मनुष्य और देवगतिके स्त्रीवेदियोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं
उत्पन्न होता । ५. भवनत्रिकमें भी कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं उत्पन्न होता । ६. उपशम
३५ सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देवोंमें ही उत्पन्न होता है । उसमें भी उपशमश्रेणिमें स्थित उपशम
१. संयतासंयतानां च मु० । २. -तयमस्ति ता० ।