सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ४८ -
§ ४८. कायानुवादेन पृथिवीकायिका अप्कायिकास्तेजःकायिका वायुकायिका असंख्येया
लोकाः । वनस्पतिकायिकाः अनन्तानन्ताः । त्रसकायिकसंख्या पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ४९. योगानुवादेन मनोयोगिनो वाग्योगिनश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरा-
संख्येयभागप्रमिताः । काययोगिनो¹ मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः² । त्रयाणामपि योगिनां सासादन-
सम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयतादयः सयोगकेवल्यन्ताः
संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५०. वेदानुवादेन स्त्रीवेदाः पुंवेदाश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । नपुंसकवेदा मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । स्त्रीवेदा नपुंसकवेदाश्च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । पुंवेदाः
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयो³ऽनिवृत्तिबादरान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अपगतवेदा अनिवृत्तिबादरादयो-
ऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५१. कषायानुवादेन क्रोधमानमायासु मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः सामान्योक्त-
जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
प्रत्येक गुणस्थानवाले पंचेन्द्रियोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ४८. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु-
कायिक जीवोंकी संख्या असंख्यात लोकप्रमाण है । वनस्पतिकायिक जीव अनन्तानन्त हैं । और
त्रसकायिक जीवोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंके⁴ समान है ।
§ ४९. योग मार्गणाके अनुवादसे मनोयोगी और वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । काययोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । तीनों योगवालोंमें सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्तसंयतसे लेकर सयोगकेवली गुणस्थान
तकके तीनों योगवाले जीव प्रत्येक गुणस्थानमें संख्यात हैं । अयोगकेवलियोंकी वही संख्या है जो
सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ५०. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदवाले और पुरुषवेदवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । नपुंसकवेदवाले मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि से लेकर संयतासंयत तक स्त्रीवेदवाले और नपुं-
सकवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर
तक स्त्रीवेदवाले और नपुंसक वेदवाले जीव संख्यात हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत
तक पुरुषवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति-
बादर तक पुरुषवेदवालोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । अनिवृत्तिबादरसे लेकर अयोग-
केवली गुणस्थान तक अपगतवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है ।
§ ५१. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान और माया कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
१. योगिषु मिथ्या-मु० । -योगेषु मिथ्या-दि० २ । २. -नन्ताः । त्रियोगिनां सासा-मु० । ३. -दयो
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्ति-मु०, आ०, दि० १ दि० २ । ४. वैसे तो
त्रस कायिकोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंकी संख्यासे अधिक है । पर असंख्यात सामान्यकी अपेक्षा यहाँ त्रसकायिकों
की संख्याको पंचेन्द्रियोंकी संख्याके समान बतलाया है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri