सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १।८ § ३३ ] प्रथमोऽध्यायः २१
§ ३२. किमेतैरेव जीवादीनामधिगमो भवति उत अन्योऽप्यधिगमोपायोऽस्तीति परि-
पृष्टोऽस्तीत्याह—
सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥
§ ३३. सदित्यस्तित्वनिर्देशः १। स प्रशंसादिषु वर्तमानो नेह गृह्यते । संख्या भेदगणना ।
क्षेत्रं निवासो वर्तमानकालविषयः । तदेव स्पर्शनं त्रिकालगोचरम् । कालो द्विविधः मुख्यो व्याव- ५
हारिकश्च । तयोरुत्तरत्र निर्णयो वक्ष्यते । अन्तरं विरहकालः । भावः औपशमिकादिलक्षणः । अल्प-
बहुत्वमन्योऽन्यापेक्षया विशेषप्रतिपत्तिः । एतैश्च सम्यग्दर्शनादीनां जीवादीनां चाधिगमो वेदितव्यः ।
ननु च निर्देशादेव सद्ग्रहणं सिद्धम् । विधानग्रहणात्संख्यागतिः । अधिकरणग्रहणात्क्षेत्रस्पर्शनाव-
बोधः । स्थितिग्रहणात्कालसंग्रहः । भावो नामादिषु संगृहीत एव । पुनरेषां किमर्थं ग्रहणं २ मिति ।
सत्यं, सिद्धम् । विनेयाशयवशात्तत्त्वदेशनाविकल्पः । केचित्संक्षेपरुचयः ३ केचित् विस्ताररुचयः । अपरे १०
नातिसंक्षेपेण नातिविस्तरेण प्रतिपाद्याः । सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति अधिगमाभ्युपाय-
भेदोद्देशः कृतः । इतरथा हि "प्रमाणनयैरधिगमः" इत्यनेनैव सिद्धत्वादितरेषां ग्रहणमनर्थकं स्यात् ।
योग्य पदार्थोंकी अपेक्षा अनन्त प्रकारका है। इसी प्रकार यह निर्देश आदि विधि ज्ञान और
चारित्रमें तथा जीव और अजीव आदि पदार्थोंमें आगमके अनुसार लगा लेना चाहिए ।
§ ३२. क्या इन उपर्युक्त कारणोंसे ही जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है या और दूसरे भी १५
ज्ञानके उपाय हैं इस प्रकार ऐसा प्रश्न करनेपर दूसरे उपाय हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्वसे भी सम्यग्दर्शन आदि
विषयोंका ज्ञान होता है ॥८॥
§ ३३. 'सत्' अस्तित्वका सूचक है । वह प्रशंसा आदि अनेक अर्थोंमें रहता है पर उनका २०
यहाँ ग्रहण नहीं किया है । संख्यासे भेदोंकी गणना ली है । वर्तमानकालविषयक निवासको क्षेत्र
कहते हैं । त्रिकालविषयक निवासको स्पर्शन कहते हैं । काल दो प्रकारका है—मुख्य और व्याव-
हारिक । इनका निर्णय आगे करेंगे । विरहकालको अन्तर कहते हैं । भावसे औपशमिक आदि
भावोंका ग्रहण किया गया है और एक दूसरेकी अपेक्षा न्यूनाधिकका ज्ञान करनेको अल्पबहुत्व
कहते हैं । इन सत् आदिके द्वारा सम्यग्दर्शनादिक और जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ २५
जानना चाहिए । शंका—निर्देशसे ही 'सत्'का ग्रहण हो जाता है । विधानके ग्रहण करनेसे संख्या-
का ज्ञान हो जाता है । अधिकरणके ग्रहण करनेसे क्षेत्र और स्पर्शनका ज्ञान हो जाता है । स्थिति-
के ग्रहण करनेसे कालका संग्रह हो जाता है । भावका नामादिकमें संग्रह हो ही गया है फिर इनका
अलगसे किस लिए ग्रहण किया है ? समाधान—यह बात सही है कि निर्देश आदिके द्वारा 'सत्'
आदिकी सिद्धि हो जाती है तो भी शिष्योंके अभिप्रायनुसार तत्त्वदेशनामें भेद पाया जाता है । ३०
कितने ही शिष्य संक्षेपरुचिवाले होते हैं । कितने ही शिष्य विस्ताररुचिवाले होते हैं और
दूसरे शिष्य न तो अतिसंक्षेप कथन करनेसे समझते हैं और न अति विस्तृत कथन करनेसे समझते
हैं । किन्तु सज्जनोंका प्रयास सब जीवोंका उपकार करना है इसलिए यहाँ अलगसे ज्ञानके उपायके
भेदोंका निर्देश किया है । अन्यथा 'प्रमाणनयैरधिगमः' इतनेसे ही काम चल जाता, उपायोंका
ग्रहण करना निष्फल होता । ३५
१. -र्देशः । प्रशंसा-मु० ता० न० । २. ग्रहणमुच्यते ? सत्यं ता० न० । ३. संक्षेपरुचयः । अपरे
नाति-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri