सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ११८ § ४७ ] प्रथमोऽध्यायः २३
§ ४६. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारका मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः
श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः ।
स चासंख्येयभागः असंख्येया योजनकोटीकोटयः । सर्वासु पृथिवीषु सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्-
मिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां १ मध्ये
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभाग- ५
प्रमिताः । मनुष्यगतौ मनुष्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः । स चासंख्येयभागः असंख्येया
योजनकोटीकोटयः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः संख्येयाः । प्रमत्तादीनां सामा-
न्योक्ता संख्या । देवगतौ देवा मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः ।
§ ४७. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रिया मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रियाश्चतुरि- १०
न्द्रिया असंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः
प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
हुए उक्त जीव संख्यात हैं। सयोगकेवली जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक, दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे
एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव लाखपृथक्त्व हैं।
§ ४६. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें पहली पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि १५
नारकी असंख्यात जगच्छ्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। दूसरी
पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकी जगश्रेणीके असंख्यातवें
भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यात कोटि योजनप्रमाण है। सब पृथिवियोंमें
सासादनसम्यग्दृष्टि, और सम्यग्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण
हैं। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंच अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक २०
प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंच पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। मनुष्यगतिमें मिथ्यादृष्टि मनुष्य-
जग श्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यातकोटि योजन
प्रमाण है। ६ सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्य संख्यात हैं।
प्रमत्तसंयत आदि मनुष्योंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं। देवगतिमें मिथ्यादृष्टि देव
असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण ७ हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। सासादन- २५
सम्यग्दृष्टि सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि इनमेंसे प्रत्येक गुणस्थानवाले देव पल्यके
असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।
§ ४७. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। दोइन्द्रिय
तीनइन्द्रिय और चार इन्द्रिय जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्या-
तवें भागप्रमाण हैं। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां ३०
१. तिरञ्चा मिथ्या-मु० । २. सात राजु लम्बी और एक प्रदेशप्रमाण चौड़ी आकाश प्रदेश-पंक्तिको जगश्रेणि
कहते हैं। ऐसी जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण जगश्रेणियोंमें जितने प्रदेश होते हैं उतने प्रथम नरकके
मिथ्यादृष्टि नारकी हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। ३. जगश्रेणिके वर्गको जगप्रतर कहते हैं। ४. जगश्रेणिमें
ऐसे असंख्यातका भाग दो जिससे असंख्यात योजन कोटि प्रमाण आकाश प्रदेश प्राप्त हों, इतनी दूसरे आदि
प्रत्येक नरकके नारकियोंकी संख्या है। यह संख्या उत्तरोत्तर हीन है। ५. इसमें संमूर्च्छिम मनुष्योंकी संख्या ३५
सम्मिलित है। ६. सासादनसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवाले मनुष्योंकी संख्या जीवस्थान द्रव्यप्रमाणानुगमकी
धवला टीकामें विस्तारसे बतलायी है। ७. मिथ्यादृष्टि देवोंकी संख्याका खुलासा प्रथम नरकके मिथ्यादृष्टि
नारकियोंके खुलासाके समान जानना चाहिए। आगे भी इसी प्रकार यथायोग्य सुस्पष्ट कर लेना चाहिए।
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