सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- १।४ § १९ ] प्रथमोऽध्यायः ११
जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥४॥
§ १८. तत्र चेतनालक्षणो जीवः । सा^१ च ज्ञानादिभेदादनेकधा भिद्यते । तद्विपर्ययलक्षणो-
ऽजीवः । शुभाशुभकर्मागमद्वाररूप आस्रवः । आत्मकर्मणोरन्योऽन्यप्रदेशानुप्रवेशात्मको बन्धः ।
आस्रवनिरोधलक्षणः संवरः । एकदेशकर्मसंक्षयलक्षणा निर्जरा । कृत्स्नकर्मवियोगलक्षणो मोक्षः ।
एषां प्रपञ्च उत्तरत्र वक्ष्यते । सर्वस्य फलस्यात्माधीनत्वाददौ जीवग्रहणम् । तदुपकारार्थत्वात्तद- ५
नन्तरमजीवाभिधानम् । तदुभयविषयत्वात्तदनन्तरमास्रवग्रहणम् । तत्पूर्वकत्वात्तदनन्तरं बन्धाभि-
धानम् । संवृतस्य बन्धाभावात्तत्प्रत्यनीकप्रतिपत्त्यर्थं^३ तदनन्तरं संवरवचनम् । संवरे सति निर्जरो-
पपत्तेस्तदन्तिके निर्जरावचनम् । अन्ते प्राप्यत्वान्मोक्षस्यान्ते वचनम् ।
§ १९. इह पुण्यपापग्रहणं^४ कर्त्तव्यम् । 'नव पदार्थाः' ^५इत्यन्यैरप्युक्तत्वात् । न कर्त्तव्यम्,
आस्रवे बन्धे चान्तर्भावात् । यद्येवमास्रवादिविग्रहणमनर्थकं, जीवाजीवयोरन्तर्भावात् । नानर्थकम् । १०
इह मोक्षः प्रकृतः । सोऽवश्यं निर्देष्टव्यः । स च संसारपूर्वकः । संसारस्य प्रधानहेतुरास्रवो बन्धश्च ।
मोक्षस्य प्रधानहेतुः संवरो निर्जरा च । अतः प्रधानहेतुहेतुमत्फलनिदर्शनार्थत्वात्पृथगुपदेशः कृतः ।
दृश्यते हि सामान्येऽन्तर्भूतस्यापि विशेषस्य^७ पृथगुपादानं प्रयोजनार्थम् । 'क्षत्रिया आयाताः शूरवर्मा-
ऽपि' इति ।
जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्व हैं ॥४॥ १५
§ १८. इनमें-से जीवका लक्षण चेतना है जो ज्ञानादिकके भेदसे अनेक प्रकारकी है । जीवसे
विपरीत लक्षणवाला अजीव है । शुभ और अशुभ कर्मोंके आनेके द्वार रूप आस्रव है । आत्मा और
कर्मके प्रदेशोंका परस्पर मिल जाना बन्ध है । आस्रवका रोकना संवर है । कर्मोंका एकदेश अलग
होना निर्जरा है और सब कर्मोंका आत्मासे अलग हो जाना मोक्ष है । इनका विस्तारसे वर्णन आगे
करेंगे । सब फल जीवको मिलता है अतः सूत्रके प्रारम्भमें जीवका ग्रहण किया है । अजीव जीव- २०
का उपकारी है यह दिखलाने के लिए जीवके बाद अजीवका कथन किया है । आस्रव जीव और
अजीव दोनोंको विषय करता है अतः इन दोनोंके बाद आस्रवका ग्रहण किया है । बन्ध आस्रव
पूर्वक होता है इसलिए आस्रवके बाद बन्धका कथन किया है । संवृत जीवके बन्ध नहीं होता,
अतः संवर बन्धका उलटा हुआ । इस बातका ज्ञान करानेके लिए बन्धके बाद संवरका कथन किया
है । संवरके होनेपर निर्जरा होती है इसलिए संवरके पास निर्जरा कही है । मोक्ष अन्तमें प्राप्त २५
होता है इसलिए उसका अन्तमें कथन किया है ।
§ १९. शंका—सूत्रमें पुण्य और पापका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पदार्थ नौ हैं ऐसा
दूसरे आचार्योंने भी कथन किया है । समाधान—पुण्य और पापका ग्रहण नहीं करना चाहिए,
क्योंकि उनका आस्रव और बन्धमें अन्तर्भाव हो जाता है । शंका—यदि ऐसा है तो सूत्रमें अलगसे
आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि उनका जीव और अजीवमें अन्तर्भाव हो जाता ३०
है । समाधान—आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक नहीं है । क्योंकि यहां मोक्षका प्रकरण है
इसलिए उसका कथन करना आवश्यक है । वह संसारपूर्वक होता है और संसारके प्रधान कारण
आस्रव और बन्ध हैं तथा मोक्षके प्रधान कारण संवर और निर्जरा हैं अतः प्रधान हेतु, हेतुवाले
और उनके फलके दिखलानेके लिए अलग-अलग उपदेश किया है । देखा भी जाता है कि किसी
विशेषका सामान्यमें अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया ३५
१. जीवः । स च-आ० दि० २ । २. विप्रयोग-मु० । ३. -त्त्यर्थं संवर-आ०, दि० १, दि० २ अ० ।
४. -हणं च कर्त-मु० । ५. कुन्दकुन्दाद्यैः । ६. -ष्यं तयोरास्र- मु० । ७. -षस्य यथोपयोगं पृथ-मु० ।
१२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।४ § २० –
§ २०. तत्त्वशब्दो भाववाचीत्युक्तः । स कथं जीवादिभिर्द्रव्यवचनैः सामानाधिकरण्यं
प्रतिपद्यते । अव्यतिरेकात्तद्भावाध्यारोपाच्च सामानाधिकरण्यं भवति । यथा 'उपयोग एवात्मा'
इति । यद्येवं तत्तल्लिङ्गसंख्यानुवृत्तिः प्राप्नोति । "विशेषणविशेष्यसंबन्धे सत्यपि शब्दशक्ति-
व्यपेक्षया उपात्तलिङ्गसंख्याव्यतिक्रमो न भवति ।' अयं क्रम आदिसूत्रेऽपि योज्यः ।
§ २१. एवमेषामुद्दिष्टानां सम्यग्दर्शनादीनां जीवादीनां च संव्यवहारविशेषव्यभिचारनिवृ-
त्त्यर्थमाह—
जाता है। जैसे क्षत्रिय आये हैं और शूरवर्मा भी, यहाँ यद्यपि शूरवर्माका क्षत्रियोंमें अन्तर्भाव हो जाता
है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया है। इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।
§ २०. शंका—तत्त्व शब्द भाववाची है यह पहले कह आये हैं इसलिए उसका द्रव्यवाची
जीवादि शब्दोंके साथ समानाधिकरण कैसे हो सकता है ? समाधान—एक तो भाव द्रव्यसे अलग
नहीं पाया जाता दूसरे भावमें द्रव्यका अध्यारोप कर लिया जाता है इसलिए समानाधिकरण बन
जाता है। जैसे, 'उपयोग ही आत्मा है' इस वचनमें गुणवाची उपयोग शब्दके साथ द्रव्यवाची
आत्मा शब्दका समानाधिकरण है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। शंका—यदि ऐसा है तो
विशेष्यका जो लिंग और संख्या है वही विशेषणको भी प्राप्त होते हैं ? समाधान—व्याकरणका ऐसा
नियम है कि 'विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और
संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन नहीं होता ।' अतः यहाँ विशेष्य और विशेषणके लिंग और
संख्याके अलग-अलग रहने पर भी कोई दोष नहीं है। यह क्रम प्रथम सूत्रमें भी लगा लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें सात तत्त्वोंका निर्देश किया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए,
मुख्यतया पाँच बातोंपर प्रकाश डाला गया है। जो इस प्रकार हैं—(१) जीवादि सात तत्त्वोंका
स्वरूप-निर्देश। (२) सूत्रमें जीव, अजीव इस क्रमसे सात तत्त्वोंके निर्देश करनेकी सार्थकता ।
(३) पुण्य और पापको पृथक् तत्त्व नहीं माननेका कारण । (४) भाववाची शब्दोंका द्रव्यवाची
शब्दोंके साथ कैसे सामानाधिकरण्य बनता है इसकी सिद्धि । (५) विशेषण और विशेष्यमें
समान लिंग और समान संख्या क्यों आवश्यक नहीं इसका निर्देश । तीसरी बातको स्पष्ट करते
हुए जो लिखा है उसका आशय यह है कि जीवकी शुभाशुभ प्रवृत्तिके आधारसे बँधनेवाले कर्मोंमें
अनुभागके अनुसार पुण्य-पापका विभाग होता है इसलिए आस्रव और बन्धमें इनका अन्तर्भाव
किया गया है। पाँचवीं बातको स्पष्ट करते हुए जो यह लिखा है कि विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके
रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन
नहीं होता । सो इसका यह आशय है कि एक तो जिस शब्दका जो लिंग है वह नहीं बदलता ।
उदाहरणार्थ 'ज्ञानं आत्मा' इस प्रयोगमें ज्ञान शब्द नपुंसक लिंग और आत्मा शब्द पुँल्लिंग रहते
हुए भी इनमें बदल नहीं होता । इन दोनों शब्दोंका विशेषण विशेष्य रूपसे जब भी प्रयोग किया
जायेगा तब वह इसी प्रकार ही किया जायेगा। दूसरे प्रयोगके समय जिस शब्दने जो संख्या प्राप्त
कर ली है उसमें भी बदल नहीं होता। जैसे 'साधोः कार्यं तपःश्रुते' इस प्रयोगमें विशेषण विशेष्य
सम्बन्धके रहते हुए भी 'कार्यम्' एकवचन है और 'तपःश्रुते' द्विवचन है। इसी प्रकार प्रकृतमें
जानना चाहिए । शेष कथन सुगम है।
§ २१. इस प्रकार पहले जो सम्यग्दर्शन आदि और जीवादि पदार्थ कहे हैं उनका शब्द
प्रयोग करते समय जो गड़बड़ो होती है उसको दूर करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. 'आविष्टलिङ्गा जातिर्यल्लिङ्गमुपादाय प्रवर्तते उत्पत्तिप्रभृत्या विनाशान्न तल्लिङ्गं जहाति ।' पा० १।२।२५३।
अन्येऽपि वै गुणवचना नावश्यं द्रव्यस्य लिङ्गसंख्ये अनुवर्तन्ते ।-पा० म० भा० ५।१।१।५९ ।
- १५ § २२ ] प्रथमोऽध्यायः १३
नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ॥५॥
§ २२. अतद्गुणे वस्तुनि संव्यवहारार्थं 'पुरुषकारात्रियुज्यमानं संज्ञाकर्म नाम । काष्ठपुस्तकचित्र-
कर्माक्षनिक्षेपादिषु सोऽयमिति स्थाप्यमाना स्थापना । गुणैर्गुणान्वा द्रुतं गतं गुणैर्द्रोष्यते गुणान्द्रोष्य-
तीति वा द्रव्यम् । वर्तमानतत्पर्यायोपलक्षितं द्रव्यं भावः । तद्यथा, नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो ५
भावजीव इति चतुर्धा जीवशब्दार्थो न्यस्यते । जीवनगुणमनपेक्ष्य यस्य कस्यचिन्नाम क्रियमाणं नाम
जीवः । अक्षनिक्षेपादिषु जीव इति वा मनुष्यजीव इति वा व्यवस्थाप्यमानः स्थापनाजीवः । द्रव्य-
जीवो द्विविधः आगमद्रव्यजीवो नोआगमद्रव्यजीवश्चेति । तत्र जीवप्राभृतज्ञायी मनुष्यजीवप्राभृत-
ज्ञायी वा अनुपयुक्त आत्मा आगमद्रव्यजीवः । नोआगमद्रव्यजीवस्त्रेधा व्यवतिष्ठते ज्ञायकशरीर-
भावि-तद्व्यतिरिक्तभेदात् । तत्र ज्ञातुर्यच्छरीरं त्रिकालगोचरं तज् ज्ञायकशरीरम् । सामान्यापेक्षया १०
नोआगमभाविजीवो नास्ति, जीवनसामान्यस्य सदापि विद्यमानत्वात् । विशेषापेक्षया त्वस्ति ।
गत्यन्तरे जीवो व्यवस्थितो मनुष्यभव२प्राप्तिं प्रत्यभिमुखो मनुष्यभाविजीवः । तद्व्यतिरिक्तः
कर्मनोकर्मविकल्पः । भावजीवो द्विविधः आगमभावजीवो नोआगमभावजीवश्चेति । तत्र जीवप्राभृत-
विषयोपयोगाविष्टो मनुष्यजीवप्राभृतविषयोपयोगयुक्तो वा आत्मा आगमभावजीवः । जीवनपर्यायेण
मनुष्यजीवत्वपर्यायेण वा समाविष्ट आत्मा नोआगमभावजीवः । एवमितरेषामपि पदार्थानां३
नामादिनिक्षेपविधिर्नियोज्यः । स किमर्थः । अप्रकृतनिराकरणाय प्रकृतनिरूपणाय च । निक्षेप- १५
नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव रूपसे उनका अर्थात् सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदिका
न्यास अर्थात् निक्षेप होता है ॥५॥
§ २२. संज्ञाके अनुसार गुणरहित वस्तुमें व्यवहारके लिए अपनी इच्छासे की गयी संज्ञाको
नाम कहते हैं। काष्ठ कर्म, पुस्तककर्म, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेप आदिमें 'यह वह है' इस प्रकार
स्थापित करनेको स्थापना कहते हैं। जो गुणोंके द्वारा प्राप्त हुआ था या गुणोंको प्राप्त हुआ था २०
अथवा जो गुणोंके द्वारा प्राप्त किया जायेगा या गुणोंको प्राप्त होगा उसे द्रव्य कहते हैं । वर्तमान
पर्यायसे युक्त द्रव्यको भाव कहते हैं । विशेष इस प्रकार है—नाम जीव, स्थापना जीव, द्रव्य जीव,
और भाव जीव इस प्रकार जीव पदार्थका न्यास चार प्रकारसे किया जाता है। जीवन गुणकी
अपेक्षा न करके जिस किसीका 'जीव' ऐसा नाम रखना नाम जीव है। अक्षनिक्षेप आदिमें यह
‘जीव है' या 'मनुष्य जीव है' ऐसा स्थापित करना स्थापना जीव है । द्रव्य जीवके दो भेद हैं— २५
आगम द्रव्य जीव और नोआगम द्रव्य जीव । इनमें-से जो जीवविषयक या मनुष्य जीवविषयक
शास्त्रको जानता है किन्तु वर्तमानमें उसके उपयोगसे रहित है वह आगम द्रव्य जीव है। नोआगम
द्रव्य जीवके तीन भेद हैं—ज्ञायक शरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त । ज्ञाताके शरीरको ज्ञायक
शरीर कहते हैं। जीवन सामान्यकी अपेक्षा 'नोआगम भावी जीव' यह भेद नहीं बनता, क्योंकि
जीवमें जीवत्व सदा पाया जाता है। हाँ पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा 'नोआगम भावी जीव' यह भेद ३०
बन जाता है क्योंकि जो जीव दूसरी गतिमें विद्यमान है वह जब मनुष्य भवको प्राप्त करनेके लिए
सम्मुख होता है तब वह मनुष्य भावि जीव कहलाता है। तद्व्यतिरिक्तके दो भेद हैं कर्म और
नोकर्म । भाव जीवके दो भेद हैं—आगम भाव जीव और नोआगम भाव जीव । इनमें-से जो
आत्मा जीवविषयक शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है अथवा मनुष्य जीवविषयक
शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है वह आगम भाव जीव कहलाता है । तथा ३५
जीवन पर्याय या मनुष्य जीवन पर्यायसे युक्त आत्मा नोआगम भाव जीव कहलाता है । इसी
प्रकार अजीवादि अन्य पदार्थोंकी भी नामादि निक्षेप विधि लगा लेना चाहिए । शंका—निक्षेप
१. पुरुषाका-मु० । २. -ष्यभाव-आ०, दि० २ । ३. -र्थनामजीवानां नामा-मु० ।
विधिना१ शब्दार्थः प्रस्तीर्यते । तच्छब्दग्रहणं किमर्थम् । सर्वसंग्रहार्थम् । असति हि तच्छब्दे
सम्यग्दर्शनादीनां प्रधानानामेव न्यासेनाभिसंबन्धः स्यात्, तद्विषयभावेनोपगृहीतानां जीवादीनां
अप्रधानानां न स्यात् । तच्छब्दग्रहणे पुनः क्रियमाणे सति सामर्थ्यात्प्रधानानामप्रधानानां च ग्रहणं
सिद्धं भवति ।
§ २३. एवं नामादिभिः प्रस्तीर्णानामधिकृतानां तत्त्वाधिगमः कुतः । इत्यत इदमुच्यते—
प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥
§ २४. नामादिनिक्षेपविधिनोपक्षिप्तानां जीवादीनां २तत्त्वं प्रमाणाभ्यां नयैश्चाधिगम्यते ।
प्रमाणनया वक्ष्यमाणलक्षणविकल्पाः । तत्र प्रमाणं द्विविधं स्वार्थं परार्थं च । तत्र स्वार्थं प्रमाणं
विधिका कथन किस लिए किया जाता है ? समाधान—अप्रकृतका निराकरण करने के लिए और
प्रकृतका निरूपण करनेके लिए इसका कथन किया जाता है । तात्पर्य यह है कि किस शब्दका
क्या अर्थ है यह निक्षेप विधिके द्वारा विस्तारसे बतलाया जाता है । शंका—सूत्रमें 'तत्' शब्दका
ग्रहण किस लिए किया है ? समाधान—सबका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' शब्दका ग्रहण
किया है । यदि सूत्रमें 'तत्' शब्द न रखा जाय तो प्रधानभूत सम्यग्दर्शनादिकका ही न्यासके साथ
सम्बन्ध होता । सम्यग्दर्शनादिकके विषय रूपसे ग्रहण किये गये अप्रधानभूत जीवादिकका न्यासके
साथ सम्बन्ध न होता । परन्तु सूत्रमें 'तत्' शब्दके ग्रहण कर लेनेपर सामर्थ्यसे प्रधान और
अप्रधान सबका ग्रहण बन जाता है ।
विशेषार्थ—नि उपसर्ग पूर्वक क्षिप् धातुसे निक्षेप शब्द बना है । निक्षेपका अर्थ 'रखना' है ।
न्यास शब्दका भी यही अर्थ है । आशय यह है कि एक-एक शब्दका लोकमें और शास्त्रमें अनेक
अर्थोंमें प्रयोग किया जाता है । यह प्रयोग कहाँ किस अर्थमें किया गया है इस बातको बतलाना
ही निक्षेप विधिका काम है । यों तो आवश्यकतानुसार निक्षेपके अनेक भेद किये जा सकते हैं ।
शास्त्रोंमें भी ऐसे विविध भेदोंका उल्लेख देखनेमें आता है । किन्तु मुख्यतया यहाँ इसके चार
भेद किये गये हैं—नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव । इनका लक्षण और दृष्टान्त-द्वारा कथन टीका-
में किया ही है । आशय यह है कि जैसे टीकामें एक जीव शब्दका नाम निक्षेपकी अपेक्षा भिन्न
अर्थ बतलाया है, स्थापना निक्षेपकी अपेक्षा भिन्न अर्थ बतलाया है, द्रव्य निक्षेपकी अपेक्षा भिन्न
अर्थ बतलाया है और भाव निक्षेपकी अपेक्षा भिन्न अर्थ बतलाया है, उसी प्रकार प्रत्येक शब्दका
नामादि निक्षेप विधिके अनुसार पृथक्-पृथक् अर्थ होता है । इससे अप्रकृत अर्थका निराकरण
होकर प्रकृत अर्थका ग्रहण हो जाता है जिससे व्यवहार करनेमें किसी प्रकारकी गड़बड़ी नहीं होती ।
इससे वक्ता और श्रोता दोनों ही एक दूसरेके आशयको भली प्रकार समझ जाते हैं । ग्रन्थका हार्द
समझनेके लिए भी इस विधिका ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है । जैन परम्परामें इसका बड़ा भारी
महत्त्व माना गया है । इसी बातको ध्यानमें रखकर यहाँ निक्षेप विधिका निर्देश किया गया है ।
§ २३. इस प्रकार नामादिकके द्वारा विस्तारको प्राप्त हुए और अधिकृत जीवादिक व
सम्यग्दर्शनादिकके स्वरूपका ज्ञान किसके द्वारा होता है इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
प्रमाण और नयोंसे पदार्थोंका ज्ञान होता है । ॥६॥
§ २४. जिन जीवादि पदार्थोंका नाम आदि निक्षेप विधिके द्वारा विस्तारसे कथन किया है
उनका स्वरूप प्रमाण और नयोंके द्वारा जाना जाता है । प्रमाण और नयोंके लक्षण और भेद आगे
१. -धिना नामशब्दा- मु० आ० । २. तत्त्वं प्रमाणेभ्यो नयै-मु० । ३. -श्चाभिग-आ०, दि १, दि० २ ।
- ११६ § २४ ] प्रथमोऽध्यायः १५
श्रुतवेर्जम् । श्रुतं पुनः स्वार्थं भवति परार्थं च । ज्ञानात्मकं स्वार्थं वचनात्मकं परार्थम् । तद्विकल्पा
नयाः२ । अत्राह - नयशब्दस्य अल्पाच्तरत्वात्पूर्वनिपातः प्राप्नोति । नैष दोषः । अभ्यर्हितत्वात्प्रमा-
णस्यै पूर्वनिपातः । अभ्यर्हितत्वं च सर्वतो बलीयः । कुतोऽभ्यर्हितत्वम् । नयप्ररूपणप्रभवयोनित्वात् ।
एवं ह्युक्तं "प्रगृह्य प्रमाणतः परिणतिविशेषादर्थावधारणं नयः" इति । सकलविषयत्वाच्च
प्रमाणस्य । तथा चोक्तं - "सकलादेशः प्रमाणाधीनो विकलादेशो नयाधीनः" इति । नयो द्विविधो ५
द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च । पर्यायार्थिकनयेनँ भावतत्त्वमधिगन्तव्यम् । इतरेषां त्रैयाणां द्रव्यार्थिक-
नयेन, सामान्यात्मकत्वात् । द्रव्यमर्थः प्रयोजनमस्येत्यसौ द्रव्यार्थिकः । पर्यायोऽर्थः प्रयोजनमस्येत्यसौ
पर्यायार्थिकः । तत्सर्वं समुदितं प्रमाणेनाधिगन्तव्यम् ।
कहेंगे । प्रमाणके दो भेद हैं- स्वार्थ और परार्थ । श्रुतज्ञानको छोड़कर शेष सब ज्ञान स्वार्थ प्रमाण
हैं। परन्तु श्रुतज्ञान स्वार्थ और परार्थ दोनों प्रकारका है। ज्ञानात्मक प्रमाणको स्वार्थ प्रमाण १०
कहते हैं और वचनात्मक प्रमाण परार्थ प्रमाण कहलाता है। इनके भेद नय हैं। शंका-नय
शब्दमें थोड़े अक्षर हैं इसलिए सूत्रमें उसे पहले रखना चाहिए ? समाधान - यह कोई दोष नहीं,
क्योंकि प्रमाण श्रेष्ठ है अतः उसे पहले रखा है। 'श्रेष्ठता सबसे बलवती होती है' ऐसा नियम है।
शंका- प्रमाण श्रेष्ठ क्यों है ? समाधान - क्योंकि प्रमाणसे ही नयप्ररूपणाकी उत्पत्ति हुई है, अतः
प्रमाण श्रेष्ठ है। आगममें ऐसा कहा है कि वस्तुको प्रमाणसे जानकर अनन्तर किसी एक अवस्था- १५
द्वारा पदार्थका निश्चय करना नय है । दूसरे प्रमाण समग्रको विषय करता है। आगममें भी इस
प्रकार कहा है कि 'सकलादेश प्रमाणका विषय है और विकलादेश नयका विषय है।' इसलिए भी
प्रमाण श्रेष्ठ है।
नयके दो भेद हैं- द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । पर्यायार्थिक नयका विषय भावनिक्षेप है
और शेष तीनको द्रव्यार्थिक नय ग्रहण करता है, क्योंकि द्रव्यार्थिक नय सामान्यरूप है। द्रव्य २०
जिसका प्रयोजन है वह द्रव्यार्थिकनय है और पर्याय जिसका प्रयोजन है वह पर्यायार्थिक नय है।
तथा द्रव्य और पर्याय ये सब मिल कर प्रमाणके विषय हैं।
विशेषार्थ- इस सूत्रमें ज्ञानके प्रमाण और नय ऐसे भेद करके उनके द्वारा जीवादि
पदार्थोंका ज्ञान होता है यह बतलाया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए टीकामें मुख्यतया
चार बातों पर प्रकाश डाला गया है- (१) ज्ञानके पाँच भेदोंमें-से किस ज्ञानका प्रमाण और २५
नय इनमें-से किसमें अन्तर्भाव होता है। (२) नय शब्दमें अल्प अक्षर होनेपर भी सूत्रमें
प्रमाण शब्द पहले रखने का कारण । (३) नयके भेद करके चार निक्षेपोंमें-से कौन निक्षेप
किस नयका विषय है इसका विचार । (४) प्रमाणके विषयकी चर्चा । प्रथम बातको स्पष्ट
करते हुए जो कुछ लिखा है उसका आशय यह है कि ज्ञानके पाँच भेदोंमें-से श्रुतज्ञानके सिवा
चार ज्ञान केवलज्ञानरूप तो माने ही गये हैं। साथ ही वे वितर्क रहित हैं इसलिए उनका ३०
अन्तर्भाव प्रमाण ज्ञानमें ही होता है। किन्तु श्रुतज्ञान ज्ञान और वचन उभय रूप माना
गया है। साथ ही वह सवितर्क है इसलिए इसके प्रमाणज्ञान और नयज्ञान ऐसे दो भेद हो
जाते हैं। यहाँ यह शंका की जा सकती है कि श्रुतज्ञान यह शेष ज्ञानोंके समान ज्ञानका ही एक
भेद है तो फिर इसे ज्ञान और वचन उभय रूप क्यों बतलाया है ? सो इसका यह समाधान है कि
आगम द्रव्य श्रुतका अन्तर्भाव श्रुतमें किया जाता है इसलिए द्रव्य श्रुतको भी उपचारसे श्रुतज्ञान ३५
कह दिया गया है। दूसरी बातको स्पष्ट करते हुए प्रमाणकी श्रेष्ठतामें दो हेतु दिये हैं। प्रथम हेतु
तो यह दिया है कि नय प्ररूपणाकी उत्पत्ति प्रमाणज्ञानसे होती है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है। इसका
१. वर्ज्यम् । श्रु-मु० । २. 'जावइया वयणवहा तावइया चेव होंति णयवाया।' -सन्मति० १।४७ ।
३. -णस्य तत्पूर्व- मु० । ४. -येन पर्यायत- मु० । ५. -रेषां नामस्थापनाद्रव्याणां द्रव्या-मु० ।
१६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।७ § २५ -
§ २५. एवं प्रमाणनयैरधिगतानां जीवादीनां पुनरप्यधिगमोपायान्तरप्रदर्शनार्थमाह—
निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥
§ २६. निर्देशः स्वरूपाभिधानम् । स्वामित्वमाधिपत्यम् । साधनमुत्पत्तिनिमित्तम् । अधि-
करणमधिष्ठानम् । स्थितिः कालपरिच्छेदः । विधानं प्रकारः । तत्र सम्यग्दर्शनं किमिति प्रश्ने
तत्त्वार्थश्रद्धानमिति निर्देशो नामादिर्वा¹ कस्येत्युक्ते सामान्येन जीवस्य । विशेषेण गत्यनुवादेन
नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकाणां पर्याप्तिकानामौपशमिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । प्रथमायां
पृथिव्यां पर्याप्तापर्याप्तिकानां क्षायिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । तिर्यग्गतौ तिर्यञ्चां पर्याप्तकाना-
• आशय यह है कि जो पदार्थ प्रमाणके विषय हो गये हैं उन्हींमें नयकी प्रवृत्ति व्यवहारका कारण
माना गया है अन्यमें नहीं, अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । दूसरा हेतु यह दिया है कि सकलादेश प्रमाणके
अधीन है और विकलादेश नयके अधीन है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । सो इसका यह आशय है कि
प्रमाण समुदायको विषय करता है और नय अवयवको विषय करता है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । जो
वचन कालादिककी अपेक्षा अभेदवृत्तिकी प्रधानतासे या अभेदोपचारसे प्रमाणके द्वारा स्वीकृत
अनन्त धर्मात्मक वस्तुका एक साथ कथन करता है उसे सकलादेश कहते हैं । और जो वचन
कालादिककी अपेक्षा भेदवृत्तिकी प्रधानतासे या भेदोपचारसे नयके द्वारा स्वीकृत वस्तु धर्मका
क्रमसे कथन करता है उसे विकलादेश कहते हैं । इनमें-से प्रमाण सकलादेशी होता है और नय
विकलादेशी, अतः प्रमाण श्रेष्ठ माना गया है यह उक्त कथन का तात्पर्य है । तीसरी बातको स्पष्ट
करते हुए नयके द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ऐसे दो भेद करके जो नामादि तीन निक्षेपोंको द्रव्या-
र्थिक नयका और भाव निक्षेपको पर्यायार्थिक नयका विषय बतलाया है सो इसका यह अभिप्राय है
कि नाम, स्थापना और द्रव्य ये तीनों निक्षेप सामान्य रूप हैं अतः इन्हें द्रव्यार्थिक नयका विषय
बतलाया है और भावनिक्षेप पर्याय रूप है अतः इसे पर्यायार्थिक नयका विषय बतलाया
है । यहाँ इतना विशेष जानना कि नामको सादृश्य सामान्यात्मक माने बिना शब्दव्यवहारकी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती है इसलिए नाम निक्षेप द्रव्यार्थिक नयका विषय है और जिसकी जिसमें
स्थापना की जाती है उनमें एकत्वका अध्यवसाय किये बिना स्थापना नहीं बन सकती है, इसलिए
स्थापना द्रव्यार्थिक नयका विषय है । शेष कथन सुगम है ।
§ २५. इस प्रकार प्रमाण और नयके द्वारा जाने गये जीवादि पदार्थोंके जाननेके दूसरे
उपाय बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधानसे सम्यग्दर्शन आदि विषयोंका
ज्ञान होता है ॥७॥
§ २६. किसी वस्तुके स्वरूपका कथन करना निर्देश है । स्वामित्वका अर्थ आधिपत्य है ।
जिस निमित्तसे वस्तु उत्पन्न होती है वह साधन है । अधिष्ठान या आधार अधिकरण है । जितने
काल तक वस्तु रहती है वह स्थिति है और विधानका अर्थ प्रकार या भेद है । 'सम्यग्दर्शन क्या
है । यह प्रश्न हुआ इस पर 'जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है' ऐसा कथन करना
निर्देश है या नामादिकके द्वारा सम्यग्दर्शनका कथन करना निर्देश है । सम्यग्दर्शन किसके होता
है ? सामान्यसे जीवके होता है और विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब
पृथिवियोंमें पर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । पहली
पृथिवीमें पर्याप्तक और अपर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता
है । तिर्यंचगतिमें पर्याप्तक तिर्यंचोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । क्षायिक और क्षायोपशमिक
१. -दिर्वा । सम्यग्दर्शनं क-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- १।७ § २७ ] प्रथमोऽध्यायः १७
मौपशमिकमस्ति । क्षायिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तापर्याप्तानाम् । तिरश्चीनां क्षायिकं नास्ति¹ ।
औपशमिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मनुष्यगतौ मनुष्याणां पर्याप्ता-
पर्याप्तानां क्षायिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । औपशमिकं पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मानु-
षीणां त्रितयमप्यस्ति पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम्² । देवगतौ³ देवानां पर्याप्तापर्याप्तानां त्रितय-
मप्यस्ति । औपशमिकमपर्याप्तिकानां कथमिति चेच्चारित्रमोहोपशमेन सह मृतान्प्रति⁴ । भवनवासि- ५
व्यन्तरज्योतिष्काणां देवानां देवीनां च सौधर्मैशानकल्पवासिनीनां च क्षायिकं नास्ति । तेषां
पर्याप्तिकानामोपशमिकं क्षायोपशमिकं चास्ति ।
§ २७. इन्द्रियानुवादेन पञ्चेन्द्रियाणां संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । कायानुवादेन
त्रसकायिकानां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । योगानुवादेन त्रयाणां योगानां त्रितयमप्यस्ति । अयोगिनां
क्षायिकमेव । वेदानुवादेन त्रिवेदीनां त्रितयमप्यस्ति । अपगतवेदानामोपशमिकं क्षायिकं चास्ति । १०
कषायानुवादेन चतुष्कषायाणां त्रितयमप्यस्ति । अकषायाणामौपशमिकं क्षायिकं चास्ति । ज्ञाना-
नुवादेन आभिनिबोधिकश्रुतावधिकमनःपर्ययज्ञानिनां त्रितयमप्यस्ति । केवलज्ञानिनां क्षायिकमेव ।
संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनासंयतानां त्रितयमप्यस्ति । परिहारविशुद्धिसंयतानामौप-
पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों प्रकारके तिर्यंचोंके होता है । तिर्यंचनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं
होता । औपशमिक और क्षायोपशमिक पर्याप्तिक तिर्यंचनीके ही होता है अपर्याप्तिक तिर्यंचनीके १५
नहीं । मनुष्य गतिमें क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकार-
के मनुष्योंके होता है । औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक मनुष्यके ही होता है अपर्याप्तिक मनुष्यके
नहीं । मनुष्यनियोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु ये पर्याप्तिक मनुष्यनीके ही होते हैं अपर्याप्तिक
मनुष्यनीके नहीं । देवगतिमें पर्याप्तक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकारके देवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन
होते हैं । शंका—अपर्याप्तिक देवोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन कैसे होता है ? समाधान—जो मनुष्य २०
चारित्रमोहनीयका उपशम करके या करते हुए उपशमश्रेणीमें मरकर देव होते हैं उन देवोंके
अपर्याप्तिक अवस्थामें औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके,
इन तोनोंकी देवांगनाओंके, तथा सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्पन्न हुई देवांगनाओंके क्षायिक
सम्यग्दर्शन नहीं होता शेष दो होते हैं सो वे भी पर्याप्तक अवस्थामें ही होते हैं ।
§ २७. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । २५
अन्य जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । कायमार्गणाके अनुवादसे त्रसकायिक जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन होते हैं । अन्य कायवाले जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । योगमार्गणाके
अनुवादसे तीनों योगवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु अयोगी जीवोंके एक क्षायिक
सम्यग्दर्शन ही होता है । वेदमार्गणाके अनुवादसे तीनों वेदवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते
हैं किन्तु अयोगी जीवोंके औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । कषायमार्गणाके ३०
अनुवादसे चारों कषायवाले जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु कषायरहित जीवोंके
औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे आभिनिबोधिक ज्ञानी,
श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मनःपर्ययज्ञानी जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु केवलज्ञानी
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । संयममार्गणाके अनुवादसे सामायिक और छेदोप-
१. नास्ति । कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणाप्रारम्भको भवति । क्षपणाप्रारम्भकालात्पूर्वं ३५
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्कृष्टभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु द्रव्यदेवस्त्रीणां तासां क्षायिकासंभवात् ।
एवं तिरश्चामप्यपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तिकानाम् । औप-मु० । २. -कानाम् । क्षायिकं पुनर्भावि-
वेदेनैव । देव- मु० । ३. -गतौ सामान्येन देवा-मु० । ४. प्रति । विशेषेण भवन-मु० ।
३
शमिकं नास्ति, इतरद् द्वितयमप्यस्ति । सूक्ष्मसांपराययथाख्यातसंयतानामौपशमिकं क्षायिकं
चास्ति । संयतासंयतानां असंयतानां १ च त्रितयमप्यस्ति । दर्शनानुवादेन चक्षुदर्शनाचक्षुदर्शनावधि-
दर्शिननां त्रितयमप्यस्ति । केवलदर्शिनां क्षायिकमेव । लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानां त्रितयमप्यस्ति ।
अलेश्यानां क्षायिकमेव । भव्यान्वादेन भव्यानां त्रितयॅमप्यस्ति नाभव्यानाम् । सम्यक्त्वानुवादेन
५ यत्र यत्सम्यग्दर्शनं तत्र तदेव ज्ञेयम् । संज्ञानुवादेन संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नासंज्ञिनाम् ।
तदुभयव्यपदेशरहितानां क्षायिकमेव आहारानुवादेन आहारकाणां त्रितयमप्यस्ति । अनाहारकाणां
छद्मस्थानां त्रितयमप्यस्ति केवलिनां समुद्घातगतानां क्षायिकमेव ।
स्थापना संयत जीवोंके तोनों सम्यग्दर्शन होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयतोंके औपशामिक सम्यग्दर्शन
नहीं होता शेष दो होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके औपशामिक और
१० क्षायिक सम्यग्दर्शन होते हैं । संयतासंयत और असंयत जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । दर्शन-
मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले और अवधिदर्शनवाले जीवोंके तीनों सम्य-
ग्दर्शन होते हैं किन्तु केवल दर्शनवाले जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु लेश्यारहित
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्य जीवोंके तीनों
१५ सम्यग्दर्शन होते हैं । अभव्योंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे
जहाँ जो सम्यग्दर्शन है वहाँ वही जानना । संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञी जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन हैं । असंज्ञियोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं है । तथा संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे
रहित जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । आहारकमार्गणाके अनुवादसे आहारकोंके
तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं। अनाहारक छद्मस्थोंके भी तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । किन्तु
२० समुद्घातगत केवली अनाहारकोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
विशेषार्थ—पदार्थोंके विवेचन करनेकी प्राचीन दो परम्पराएँ रही हैं—निर्देश आदि
छह अधिकारों द्वारा विवेचन करनेकी एक परम्परा और सदादि आठ अधिकारों द्वारा
विवेचन करनेकी दूसरी परम्परा । यहाँ तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छ आचार्यने ७वें और
८वें सूत्रों द्वारा इन्हीं दो परम्पराओंका निर्देश किया है। यहाँ टीकामें निर्देश आदिके स्वरूपका
२५ कथन करके उन द्वारा सम्यग्दर्शनका विचार किया गया है। उसमें भी स्वामित्वकी अपेक्षा जो
कथन किया है उसका भाव समझनेके लिए यहाँ मुख्य बातोंका उल्लेख कर देना आवश्यक प्रतीत
होता है । इन बातोंको ध्यानमें रखनेसे चारों गतियोंमें किस अवस्थामें कहाँ कौन सम्यग्दर्शन
होता है इसका निर्णय करनेमें सहायता मिलती है । वे बातें ये हैं—१. क्षायिक सम्यग्दर्शनका
प्रस्थापक कर्मभूमिका मनुष्य ही होता है । किन्तु ऐसा जीव कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि या क्षायिक
३० सम्यग्दृष्टि हो जानेके बाद मरकर चारों गतियोंमें जन्म ले सकता है । २. नरकमें उक्त जीव प्रथम
नरकमें ही जाता है । दूसरे आदि नरकोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता । ३.
तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें उक्त जीव उत्तम भोगभूमिके पुरुषवेदी तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें ही उत्पन्न हो
सकता है । ४. तिर्यंच, मनुष्य और देवगतिके स्त्रीवेदियोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं
उत्पन्न होता । ५. भवनत्रिकमें भी कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं उत्पन्न होता । ६. उपशम
३५ सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देवोंमें ही उत्पन्न होता है । उसमें भी उपशमश्रेणिमें स्थित उपशम
१. संयतासंयतानां च मु० । २. -तयमस्ति ता० ।
- १७ § २८ ] प्रथमोऽध्यायः १९
§ २८. साधनं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो
वा । बाह्यं नारकाणां प्राक्चतुर्थ्याः सम्यग्दर्शनस्य साधनं केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं
केषांचिद्वेदनाभिभवः । चतुर्थीमारभ्य आ सप्तम्या नारकाणां जातिस्मरणं वेदनाभिभवश्च ।
तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनबिम्बदर्शनम् । मनुष्याणामपि तथैव ।
देवानां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनमहिमदर्शनं केषांचिद्देवर्द्धिदर्शनम् । ५
एवं प्रागानतात् । आनतप्राणतारणाच्युतदेवानां देवर्द्धिदर्शनं मुक्तान्यत्त्रितयमप्यस्ति । नवग्रैवेयक-
वासिनां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणम् । अनुदिशानुत्तरविमानवासिनामिदं कल्पना
न संभवति; प्रागेव गृहीतसम्यक्त्वानां तत्रोत्पत्तेः ।
सम्यग्दृष्टिका ही मरण सम्भव है अन्यका नहीं । ७. कृतकृत्यवेदक सम्यग्दर्शन क्षयोपशम सम्यग्-
दर्शनका एक भेद है। इसके सिवा दूसरे प्रकारके क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देव और १०
मनुष्यगतिमें ही जन्म लेते हैं नरक और तिर्यंचगतिमें नहीं । ऐसे जीव यदि तिर्यंचगति और
मनुष्यगतिके होते हैं तो देवोंमें उत्पन्न होते हैं। यदि नरकगति और देवगतिके होते हैं तो वे
मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं। ८. सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी
प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें ही उत्पन्न
होता है। मनुष्यगति और तिर्यंचगतिके नपुंसकवेदियोंमें नहीं उत्पन्न होता १। ये ऐसी बातें १५
हैं जिनको ध्यानमें रखनेसे किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है इसका पता
लग जाता है जिसका स्पष्ट उल्लेख मूल टीकामें किया ही है। एक बातका उल्लेख कर देना
और आवश्यक प्रतीत होता है वह यह कि गति मार्गणाके अवान्तर भेद यद्यपि भाववेदकी
प्रधानतासे किये गये हैं द्रव्य वेदकी प्रधानतासे नहीं, इसलिए यहाँ सर्वत्र भाववेदी स्त्रियोंका ही
ग्रहण किया गया है । तथापि द्रव्यस्त्रियोंमें सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता यह बात अन्य २०
प्रमाणोंसे जानी जाती है। इस प्रकार किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है
इसका विचार किया। शेष मार्गणाओंमें कहाँ कितने सम्यग्दर्शन हैं और कहाँ नहीं इसका विचार
सुगम है, इसलिए यहाँ हमने स्पष्ट नहीं किया ।
§ २८. साधन दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या
क्षयोपशम अभ्यन्तर साधन है । बाह्य साधन निम्न प्रकार है—नारकियोंके चौथे नरकसे पहले २५
तक अर्थात् तीसरे नरक तक किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण और किन्हींके वेदना-
भिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। चौथेसे लेकर सातवें तक किन्हींके जातिस्मरण और
किन्हींके वेदनाभिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। तिर्यंचोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके
धर्मश्रवण, और किन्हींके जिनबिम्बदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। मनुष्योंके भी इसी प्रकार
जानना चाहिए । देवोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण, किन्हींके जिनमहिमादर्शन, ३०
और किन्हींके देवऋद्धिदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । यह व्यवस्था आनत कल्पसे पूर्वतक
जानना चाहिए । आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देवोंके देवऋद्धिदर्शनको छोड़कर
शेष तीन साधन पाये जाते हैं। नौ ग्रैवेयकमें निवास करनेवाले देवोंके सम्यग्दर्शनका साधन
किन्हींके जातिस्मरण और किन्हींके धर्मश्रवण है। अनुदिश और अनुत्तरविमानोंमें रहनेवाले
देवोंके यह कल्पना नहीं है, क्योंकि वहाँ सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं। ३५
१. इस नियमके अनुसार जीवकाण्डकी 'हेट्ठिमछप्पुढवीणं' इत्यादि गाथामें 'सव्वइत्थीणं' के स्थानमें 'संडइत्थीणं'
पाठ समीचीन प्रतीत होता है ।
§ २९. अधिकरणं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं स्वस्वामिसम्बन्धार्ह एव आत्मा;
विवक्षातः कारकप्रवृत्तेः । बाह्यं लोकनाडी । सा कियती । एकरज्जुविष्कम्भा चतुर्दशरज्ज्वायामा ।
§ ३०. स्थितिरौपशमिकस्य जघन्योत्कृष्टा चान्तर्मुहूर्तकी । क्षायिकस्य संसारिणो जघन्या-
न्तर्मुहूर्तकी । उत्कृष्टा त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सान्तर्मुहूर्ताष्टवर्षहीनपूर्वकोटिद्वयाधिकानि । मुक्तस्य
सादिरपर्यवसाना । क्षायोपशमिकस्य जघन्यान्तर्मुहूर्तकी उत्कृष्टा षट्षष्ट्रिसागरोपमाणि ।
§ ३१. विधानं सामान्यादेकं सम्यग्दर्शनम् । द्वितयं निसर्गजाधिगमजभेदात् १। त्रितयं
औपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकभेदात् । एवं संख्यैया विकल्पाः शब्दतः । असंख्येया अनन्ताश्च
भवन्ति श्रद्धातृश्रद्धातव्यभेदात् । एवमयं निर्देशादिविधिर्ज्ञानचारित्रयोर्जीवाजीवादिषु चागमानु-
सारेण योजयितव्यः ।
§ २९. अधिकरण दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । अभ्यन्तर अधिकरण—जिस
सम्यग्दर्शनका जो स्वामी है वही उसका अभ्यन्तर अधिकरण है । यद्यपि सम्बन्धमें षष्ठी और
अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है फिर भी विवक्षाके अनुसार कारककी प्रवृत्ति होती है, अतः
षष्ठी विभक्ति द्वारा पहले जो स्वामित्वका कथन किया है उसके स्थानमें सप्तमी विभक्ति करनेसे
अधिकरणका कथन हो जाता है । बाह्य अधिकरण लोकनाडी है । शंका—वह कितनी बड़ी है ?
समाधान—एक राजु चौड़ी और चौदह राजु लम्बी है ।
§ ३०. औपशमिक सम्यग्दर्शनकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त है । क्षायिक
सम्यग्दर्शनकी संसारी जीवके जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष और
अन्तर्मुहूर्तकम दो पूर्वकोटि अधिक तेतीस २सागर है । मुक्त जीवके सादि—अनन्त है । क्षायोपश-
मिक३ सम्यग्दर्शनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति छयासठ सागर है ।
§ ३१. भेदकी अपेक्षा सम्यग्दर्शन सामान्यसे एक है । निसर्गज और अधिगमजके भेदसे दो
प्रकारका है । औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिकके भेदसे तीन प्रकारका है । शब्दोंकी अपेक्षा
संख्यात प्रकारका है तथा श्रद्धान करनेवालोंकी अपेक्षा असंख्यात प्रकारका और श्रद्धान करने
१. -गमजभेदात् । एवं मु० । २. क्षायिक सम्यग्दृष्टि उसी भवमें, तीसरे भवमें या चौथे भवमें मोक्ष जाता है ।
जो चौथे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले भोगभूमिमें उसके बाद देव पर्यायमें जन्म लेकर और अन्तमें मनुष्य
होकर मोक्ष जाता है । जो तीसरे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले नरकमें या देवपर्यायमें जन्म लेकर और
अन्तमें मनुष्य होकर मोक्ष जाता है। यहाँ तीन और चार भवोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेके भवका
भी ग्रहण कर लिया है । संसारी जीवके क्षायिक सम्यग्दर्शनकी यह उत्कृष्ट स्थिति तीन भवकी अपेक्षा बत-
लायी है । प्रथम और अन्तके दो भव मनुष्य पर्यायके लिये गये हैं और दूसरा भव देव पर्यायका लिया गया
है। इन तीनों भवोंकी उत्कृष्ट स्थिति दो पूर्व कोटि अधिक तेतीस सागर होती है । किन्तु क्षायिक सम्यग्दर्शन
की प्राप्ति आठ वर्ष और अन्तर्मुहूर्तके पहले नहीं हो सकती इसलिए उक्त कालमें से इतना काल कम करके
क्षायिक सम्यग्दर्शनकी उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त कम दो पूर्व कोटि वर्ष अधिक तेतीस सागर बतलायी
है । ३. खुद्दाबन्धमें क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर इस प्रकार घटित करके बतलाया
है—एक जीव उपशम सम्यक्त्वसे वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त होकर शेष भुज्यमान आयुसे कम बीस सागरकी
आयु वाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्योंमें उत्पन्न होकर पुनः मनुष्यायुसे कम बाईस सागरकी आयुवाले
देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्यगतिमं जाकर भुज्यमान मनुष्यायुसे तथा दर्शनमोहकी क्षपणा पर्यन्त आगे
भोगी जानेवाली मनुष्यायुसे कम चौबीस सागरकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । वहाँसे फिर मनुष्य गतिमें
आकर वहाँ वेदक सम्यक्त्वके कालमें अन्तर्मुहूर्त रह जाने पर दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ करके कृतकृत्य
वेदक सम्यग्दृष्टि हो गया । यह जीव जब कृतकृत्यवेदकके अन्तिम समयमें स्थित होता है तब क्षायोपशमिक
सम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर प्राप्त होता है ।
- १।८ § ३३ ] प्रथमोऽध्यायः २१
§ ३२. किमेतैरेव जीवादीनामधिगमो भवति उत अन्योऽप्यधिगमोपायोऽस्तीति परि-
पृष्टोऽस्तीत्याह—
सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥
§ ३३. सदित्यस्तित्वनिर्देशः १। स प्रशंसादिषु वर्तमानो नेह गृह्यते । संख्या भेदगणना ।
क्षेत्रं निवासो वर्तमानकालविषयः । तदेव स्पर्शनं त्रिकालगोचरम् । कालो द्विविधः मुख्यो व्याव- ५
हारिकश्च । तयोरुत्तरत्र निर्णयो वक्ष्यते । अन्तरं विरहकालः । भावः औपशमिकादिलक्षणः । अल्प-
बहुत्वमन्योऽन्यापेक्षया विशेषप्रतिपत्तिः । एतैश्च सम्यग्दर्शनादीनां जीवादीनां चाधिगमो वेदितव्यः ।
ननु च निर्देशादेव सद्ग्रहणं सिद्धम् । विधानग्रहणात्संख्यागतिः । अधिकरणग्रहणात्क्षेत्रस्पर्शनाव-
बोधः । स्थितिग्रहणात्कालसंग्रहः । भावो नामादिषु संगृहीत एव । पुनरेषां किमर्थं ग्रहणं २ मिति ।
सत्यं, सिद्धम् । विनेयाशयवशात्तत्त्वदेशनाविकल्पः । केचित्संक्षेपरुचयः ३ केचित् विस्ताररुचयः । अपरे १०
नातिसंक्षेपेण नातिविस्तरेण प्रतिपाद्याः । सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति अधिगमाभ्युपाय-
भेदोद्देशः कृतः । इतरथा हि "प्रमाणनयैरधिगमः" इत्यनेनैव सिद्धत्वादितरेषां ग्रहणमनर्थकं स्यात् ।
योग्य पदार्थोंकी अपेक्षा अनन्त प्रकारका है। इसी प्रकार यह निर्देश आदि विधि ज्ञान और
चारित्रमें तथा जीव और अजीव आदि पदार्थोंमें आगमके अनुसार लगा लेना चाहिए ।
§ ३२. क्या इन उपर्युक्त कारणोंसे ही जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है या और दूसरे भी १५
ज्ञानके उपाय हैं इस प्रकार ऐसा प्रश्न करनेपर दूसरे उपाय हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्वसे भी सम्यग्दर्शन आदि
विषयोंका ज्ञान होता है ॥८॥
§ ३३. 'सत्' अस्तित्वका सूचक है । वह प्रशंसा आदि अनेक अर्थोंमें रहता है पर उनका २०
यहाँ ग्रहण नहीं किया है । संख्यासे भेदोंकी गणना ली है । वर्तमानकालविषयक निवासको क्षेत्र
कहते हैं । त्रिकालविषयक निवासको स्पर्शन कहते हैं । काल दो प्रकारका है—मुख्य और व्याव-
हारिक । इनका निर्णय आगे करेंगे । विरहकालको अन्तर कहते हैं । भावसे औपशमिक आदि
भावोंका ग्रहण किया गया है और एक दूसरेकी अपेक्षा न्यूनाधिकका ज्ञान करनेको अल्पबहुत्व
कहते हैं । इन सत् आदिके द्वारा सम्यग्दर्शनादिक और जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ २५
जानना चाहिए । शंका—निर्देशसे ही 'सत्'का ग्रहण हो जाता है । विधानके ग्रहण करनेसे संख्या-
का ज्ञान हो जाता है । अधिकरणके ग्रहण करनेसे क्षेत्र और स्पर्शनका ज्ञान हो जाता है । स्थिति-
के ग्रहण करनेसे कालका संग्रह हो जाता है । भावका नामादिकमें संग्रह हो ही गया है फिर इनका
अलगसे किस लिए ग्रहण किया है ? समाधान—यह बात सही है कि निर्देश आदिके द्वारा 'सत्'
आदिकी सिद्धि हो जाती है तो भी शिष्योंके अभिप्रायनुसार तत्त्वदेशनामें भेद पाया जाता है । ३०
कितने ही शिष्य संक्षेपरुचिवाले होते हैं । कितने ही शिष्य विस्ताररुचिवाले होते हैं और
दूसरे शिष्य न तो अतिसंक्षेप कथन करनेसे समझते हैं और न अति विस्तृत कथन करनेसे समझते
हैं । किन्तु सज्जनोंका प्रयास सब जीवोंका उपकार करना है इसलिए यहाँ अलगसे ज्ञानके उपायके
भेदोंका निर्देश किया है । अन्यथा 'प्रमाणनयैरधिगमः' इतनेसे ही काम चल जाता, उपायोंका
ग्रहण करना निष्फल होता । ३५
१. -र्देशः । प्रशंसा-मु० ता० न० । २. ग्रहणमुच्यते ? सत्यं ता० न० । ३. संक्षेपरुचयः । अपरे
नाति-मु० ।
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§ ३४. तत्र जीवद्रव्यमधिकृत्य सदाद्यनुयोगद्वारनिरूपणं क्रियते । जीवाश्चतुर्दशसु गुण-
स्थानेषु व्यवस्थिताः । मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यङ्मिथ्यादृष्टिः असंयतसम्यग्दृष्टिः संयता-
संयतः प्रमत्तसंयतः अप्रमत्तसंयतः अपूर्वकरणस्थाने उपशमकः क्षपकः अनिवृत्तिबादरसांपराय-
स्थाने उपशमकः क्षपकः सूक्ष्मसांपरायस्थाने उपशमकः क्षपकः उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थः
५ क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थः सयोगकेवली अयोगकेवली चेति । एतेषामेव जीवसमासानां निरूप-
णार्थं चतुर्दश मार्गणास्थानानि ज्ञेयानि । गतीन्द्रियकाययोगवेदकषायज्ञानसंयमदर्शनलेश्या-
भव्यसम्यक्त्वसंज्ञाहारका इति ।
§ ३५. तत्र सत्प्ररूपणा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन अस्ति मिथ्यादृष्टिः
सासादनसम्यग्दृष्टिरित्येवमादि । विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु आद्यानि चत्वारि
१० गुणस्थानानि सन्ति । तिर्यग्गतौ तान्येव संयतासंयतस्थानाधिकानि सन्ति । मनुष्यगतौ चतुर्दशापि
सन्ति । देवगतौ नारकवत् । इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियादिषु चतुरिन्द्रियपर्यन्तेषु एकमेव मिथ्या-
दृष्टिस्थानम् । पञ्चेन्द्रियेषु चतुर्दशापि सन्ति । कायानुवादेन पृथिवीकायादिवनस्पतिकायन्तेषु
एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । त्रसकायेषु चतुर्दशापि सन्ति । योगानुवादेन त्रिषु योगेषु त्रयोदश
गुणस्थानानि भवन्ति । ततः परं अयोगकेवली । वेदानुवादेन त्रिषु वेदेषु मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबाद-
१५ रान्तानि सन्ति । अपगतवेदेषु अनिवृत्तिबादराद्ययोगकेवल्यन्तानि ।
§ ३६. कषायानुवादेन क्रोधमानमायासु मिथ्यादृष्ट्यादीनि अनिवृत्तिबादरस्थानान्तानि
सन्ति । लोभकषाये तान्येव सूक्ष्मसांपरायस्थानाधिकानि । अकषायः उपशान्तकषायः क्षीणकषायः
§ ३४. अब जीव द्रव्यकी अपेक्षा 'सत्' आदि अनुयोगद्वारोंका कथन करते हैं यथा—जीव
चौदह गुणस्थानोंमें स्थित हैं। मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत,
२० प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, अनिवृत्तिबादरसाम्पराय
गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, उप-
शान्तकषाय वीतराग छद्मस्थ, क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ, सयोगकेवली और अयोगकेवली ।
इन चौदह जीवसमासोंके निरूपण करनेके लिए चौदह मार्गणास्थान जानने चाहिए । यथा—
गति, इन्द्रिय, काय योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञा
२५ और आहारक ।
§ ३५. इनमें-से सामान्य और विशेषकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा दो प्रकारकी है । मिथ्यादृष्टि है,
सासादन सम्यग्दृष्टि है इत्यादिरूपसे कथन करना सामान्यकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा है । विशेषकी
अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें प्रारम्भके चार गुणस्थान हैं ।
तिर्यंचगतिमें वे ही चार गुणस्थान हैं किन्तु संयतासंयत एक गुणस्थान और है । मनुष्यगतिमें
३० चौदह ही गुणस्थान हैं और देवगतिमें नारकियोंके समान चार गुणस्थान हैं। इन्द्रिय मार्गणाके
अनुवादसे एकेन्द्रियोंसे लेकर चौइन्द्रिय तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है ।
पंचेन्द्रियोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। कायमार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायसे लेकर वनस्पति
तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। त्रसकायिकोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। योग
मार्गणाके अनुवादसे तीनों योगोंमें तेरह गुणस्थान हैं और इसके बाद अयोगकेवली गुणस्थान है ।
३५ वेदमार्गणाके अनुवादसे तीनों वेदोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक नौ गुणस्थान हैं ।
अपगतवेदियोंमें अनिवृत्तिबादरसे लेकर अयोगकेवली तक छह गुणस्थान हैं ।
§ ३६. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान और माया कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर तक नौ गुणस्थान हैं, लोभकषायमें वे ही नौ गुणस्थान हैं किन्तु सूक्ष्मसाम्पराय
१. कायादिषु वनस्प-मु० न० ।
- १।८ § ४१ ] प्रथमोऽध्यायः २३
सयोगकेवली अयोगकेवली १ चेति ।
§ ३७. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानेषु मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिश्चां-
स्ति । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानेषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । मनः-
पर्ययज्ञाने प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः सन्ति । केवलज्ञाने सयोगोऽयोगश्च ।
§ ३८. संयमानुवादेन संयताः प्रमत्तादयोऽयोगकेवल्यन्ताः । सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धि- ५
संयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिस्थानान्ताः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च । सूक्ष्मसांप-
रायशुद्धिसंयता एकस्मिन्नेव सूक्ष्मसांपरायस्थाने । यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता उपशान्तकषाया-
दयोऽयोगकेवल्यन्ताः । संयतासंयता एकस्मिन्नेव संयतासंयतस्थाने । असंयता आद्येषु चतुर्षु
गुणस्थानेषु ।
§ ३९. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनयोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । १०
केवलदर्शने सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
§ ४०. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकपोतलेश्यासु मिथ्यादृष्ट्यादीनि असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्तानि
सन्ति । तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि अप्रमत्तस्थानान्तानि । शुक्ललेश्यायां मिथ्यादृष्ट्यादीनि
सयोगकेवल्यन्तानि । अलेश्या अयोगकेवलिनः ।
§ ४१. भव्यानुवादेन भव्येषु चतुर्दशापि सन्ति । अभव्या आद्य एव स्थाने । १५
एक गुणस्थान और है । उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, सयोगो और अयोगो ये चार गुणस्थान
कषायरहित हैं ।
§ ३७. ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान और विभंगज्ञानमें मिथ्यादृष्टि और
सासादनसम्यग् दृष्टि ये दो गुणस्थान हैं । आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानमें असंयत-
सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ गुणस्थान हैं । मनःपर्ययज्ञानमें प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीण- २०
कषाय तक सात गुणस्थान हैं । केवलज्ञानमें सयोग और अयोग ये दो गुणस्थान हैं।
§ ३८. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक संयत
जीव होते हैं । सामायिक संयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति
गुणस्थान तक होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होते
हैं। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत जीव एक सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें होते हैं । यथाख्यात विहार- २५
शुद्धिसंयत जीव उपशान्तकषाय गुणस्थानसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं । संयतासंयत
जीव एक संयतासंयत गुणस्थानमें होते हैं । असंयत जीव प्रारम्भके चार गुणस्थानोंमें होते हैं ।
§ ३९. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीण-
कषाय तक बारह गुणस्थान हैं । अवधिदर्शनमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ
गुणस्थान हैं। केवलदर्शनमें सयोगकेवली और अयोगकेवली ये दो गुणस्थान हैं । ३०
§ ४०. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कपोत लेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
असंयत सम्यग्दृष्टि तक चार गुणस्थान हैं । पीत और पद्मलेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
तक सात गुणस्थान हैं । शुक्ललेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक तेरह गुणस्थान हैं ।
किन्तु अयोगकेवली जीव लेश्या रहित हैं ।
§ ४१. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंने चौदह ही गुणस्थान हैं। किन्तु अभव्य पहले ही ३५
गुणस्थान में पाये जाते हैं ।
१. -वली च । ज्ञाना-ता० न० । २. दृष्टिश्चास्ति । सम्यग्मिथ्यादृष्टेः टिप्पणकारकाभिप्रायेण ज्ञातव्यम् ।
आभिनि-न० ।
२४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६४२ -
§ ४२. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अयोगकेवल्यन्तानि
सन्ति । क्षायोपशमिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अप्रमत्तान्तानि । औपशमिकसम्यक्त्वे
असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि उपशान्तकषायान्तानि । सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टिमिथ्या-
दृष्टिश्च स्वे स्वे स्थाने ।
५ § ४३. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु द्वादश गुणस्थानानि क्षीणकषायान्तानि । असंज्ञिषु एकमेव
मिथ्यादृष्टिस्थानम् । तदुभयव्यपदेशरहितः सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
§ ४४. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादीनि केवल्यन्तानि । अनाहारकेषु विग्रह-
गत्यापन्नेषु त्रीणि गुणस्थानानि मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिरसंयतसम्यग्दृष्टिश्च । समुद्घात-
गतः सयोगकेवली अयोगकेवली च । सिद्धाः परमेष्ठिनः अतीतगुणस्थानाः । उक्ता सत्प्ररूपणा ।
§ ४५. संख्याप्ररूपणोच्यते । सा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद् जीवा
१० मिथ्यादृष्टयोनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयः संयता-
संयताश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयताः कोटीपृथक्त्वसंख्याः । पृथक्त्वमित्यागमसंज्ञा
तिसृणां कोटीनामुपरि नवानामधः । अप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार उपशमकाः प्रवेशेन एको
वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेण चतुःपञ्चाशत् । स्वकालेन समुदिताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपका
अयोगकेवलिनश्च प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः । स्वकालेन
१५ समुदिताः संख्येयाः । सयोगकेवलिनः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः ।
स्वकालेन समुदिताः शतसहस्रपृथक्त्वसंख्याः ।
§ ४२. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोग-
केवली तक ग्यारह गुणस्थान हैं। क्षायोपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
तक चार गुणस्थान हैं। औपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर उपशान्तकषाय तक
२० आठ गुणस्थान हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि अपने-अपने गुणस्थान
में होते हैं ।
§ ४३. संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें क्षोणकषाय तक बारह गुणस्थान हैं। असंज्ञियोंमें
एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे रहित जीव सयोगकेवली और
अयोगकेवली इन दो गुणस्थानवाले होते हैं।
२५ § ४४. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर सयोगकेवली
तक तेरह गुणस्थान होते हैं। विग्रहगतिको प्राप्त अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और
असंयतसम्यग्दृष्टि ये तीन गुणस्थान होते हैं। तथा समुद्घातगत सयोगकेवलो और अयोगकेवलो
जीव भी अनाहारक होते हैं। सिद्ध परमेष्ठी गुणस्थानातीत हैं। इस प्रकार सत्प्ररूपणाका कथन
समाप्त हुआ।
३० § ४५. अब संख्या प्ररूपणाका कथन करते हैं। सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो
प्रकारको है। सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत इनमें-से प्रत्येक गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें
भागप्रमाण हैं। प्रमत्तसंयतोंकी संख्या कोटिपृथक्त्व है। पृथक्त्व यह आगमिक संज्ञा है। इससे
तीन से ऊपर और नौके नीचे मध्यकी किसी संख्याका बोध होता है। अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात
३५ हैं। चारों उपशमक गुणस्थानवाले जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक-दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे चौवन
हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव संख्यात हैं। चारों क्षपक और अयोगकेवली
प्रवेशकी अपेक्षा एक दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित
१. द्विविधा । सामान्येन तावत्-मु० ।
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- ११८ § ४७ ] प्रथमोऽध्यायः २३
§ ४६. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारका मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः
श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः ।
स चासंख्येयभागः असंख्येया योजनकोटीकोटयः । सर्वासु पृथिवीषु सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्-
मिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां १ मध्ये
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभाग- ५
प्रमिताः । मनुष्यगतौ मनुष्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः । स चासंख्येयभागः असंख्येया
योजनकोटीकोटयः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः संख्येयाः । प्रमत्तादीनां सामा-
न्योक्ता संख्या । देवगतौ देवा मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः ।
§ ४७. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रिया मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रियाश्चतुरि- १०
न्द्रिया असंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः
प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
हुए उक्त जीव संख्यात हैं। सयोगकेवली जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक, दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे
एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव लाखपृथक्त्व हैं।
§ ४६. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें पहली पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि १५
नारकी असंख्यात जगच्छ्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। दूसरी
पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकी जगश्रेणीके असंख्यातवें
भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यात कोटि योजनप्रमाण है। सब पृथिवियोंमें
सासादनसम्यग्दृष्टि, और सम्यग्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण
हैं। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंच अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक २०
प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंच पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। मनुष्यगतिमें मिथ्यादृष्टि मनुष्य-
जग श्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यातकोटि योजन
प्रमाण है। ६ सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्य संख्यात हैं।
प्रमत्तसंयत आदि मनुष्योंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं। देवगतिमें मिथ्यादृष्टि देव
असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण ७ हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। सासादन- २५
सम्यग्दृष्टि सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि इनमेंसे प्रत्येक गुणस्थानवाले देव पल्यके
असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।
§ ४७. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। दोइन्द्रिय
तीनइन्द्रिय और चार इन्द्रिय जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्या-
तवें भागप्रमाण हैं। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां ३०
१. तिरञ्चा मिथ्या-मु० । २. सात राजु लम्बी और एक प्रदेशप्रमाण चौड़ी आकाश प्रदेश-पंक्तिको जगश्रेणि
कहते हैं। ऐसी जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण जगश्रेणियोंमें जितने प्रदेश होते हैं उतने प्रथम नरकके
मिथ्यादृष्टि नारकी हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। ३. जगश्रेणिके वर्गको जगप्रतर कहते हैं। ४. जगश्रेणिमें
ऐसे असंख्यातका भाग दो जिससे असंख्यात योजन कोटि प्रमाण आकाश प्रदेश प्राप्त हों, इतनी दूसरे आदि
प्रत्येक नरकके नारकियोंकी संख्या है। यह संख्या उत्तरोत्तर हीन है। ५. इसमें संमूर्च्छिम मनुष्योंकी संख्या ३५
सम्मिलित है। ६. सासादनसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवाले मनुष्योंकी संख्या जीवस्थान द्रव्यप्रमाणानुगमकी
धवला टीकामें विस्तारसे बतलायी है। ७. मिथ्यादृष्टि देवोंकी संख्याका खुलासा प्रथम नरकके मिथ्यादृष्टि
नारकियोंके खुलासाके समान जानना चाहिए। आगे भी इसी प्रकार यथायोग्य सुस्पष्ट कर लेना चाहिए।
४
२६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ४८ -
§ ४८. कायानुवादेन पृथिवीकायिका अप्कायिकास्तेजःकायिका वायुकायिका असंख्येया
लोकाः । वनस्पतिकायिकाः अनन्तानन्ताः । त्रसकायिकसंख्या पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ४९. योगानुवादेन मनोयोगिनो वाग्योगिनश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरा-
संख्येयभागप्रमिताः । काययोगिनो¹ मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः² । त्रयाणामपि योगिनां सासादन-
सम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयतादयः सयोगकेवल्यन्ताः
संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५०. वेदानुवादेन स्त्रीवेदाः पुंवेदाश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । नपुंसकवेदा मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । स्त्रीवेदा नपुंसकवेदाश्च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । पुंवेदाः
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयो³ऽनिवृत्तिबादरान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अपगतवेदा अनिवृत्तिबादरादयो-
ऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५१. कषायानुवादेन क्रोधमानमायासु मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः सामान्योक्त-
जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
प्रत्येक गुणस्थानवाले पंचेन्द्रियोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ४८. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु-
कायिक जीवोंकी संख्या असंख्यात लोकप्रमाण है । वनस्पतिकायिक जीव अनन्तानन्त हैं । और
त्रसकायिक जीवोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंके⁴ समान है ।
§ ४९. योग मार्गणाके अनुवादसे मनोयोगी और वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । काययोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । तीनों योगवालोंमें सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्तसंयतसे लेकर सयोगकेवली गुणस्थान
तकके तीनों योगवाले जीव प्रत्येक गुणस्थानमें संख्यात हैं । अयोगकेवलियोंकी वही संख्या है जो
सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ५०. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदवाले और पुरुषवेदवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । नपुंसकवेदवाले मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि से लेकर संयतासंयत तक स्त्रीवेदवाले और नपुं-
सकवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर
तक स्त्रीवेदवाले और नपुंसक वेदवाले जीव संख्यात हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत
तक पुरुषवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति-
बादर तक पुरुषवेदवालोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । अनिवृत्तिबादरसे लेकर अयोग-
केवली गुणस्थान तक अपगतवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है ।
§ ५१. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान और माया कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
१. योगिषु मिथ्या-मु० । -योगेषु मिथ्या-दि० २ । २. -नन्ताः । त्रियोगिनां सासा-मु० । ३. -दयो
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्ति-मु०, आ०, दि० १ दि० २ । ४. वैसे तो
त्रस कायिकोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंकी संख्यासे अधिक है । पर असंख्यात सामान्यकी अपेक्षा यहाँ त्रसकायिकों
की संख्याको पंचेन्द्रियोंकी संख्याके समान बतलाया है ।
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संख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । लोभकषायाणामुक्त एव क्रमः । अयं तु
विशेषः सूक्ष्मसांपरायसंयताः सामान्योक्तसंख्याः । अकषाया उपशान्तकषायादयोऽयोगकेवल्यन्ताः
सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५२. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिनः श्रुताज्ञानिनश्च मिथ्यादृष्टिससादनसम्यग्दृष्टयः सामा- ५
न्योक्तसंख्याः । विभङ्गज्ञानिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेण्यः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
सम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । मतिश्रुतज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । अवधिज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः२ सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्त-
संयतादयः क्षीणकषायान्ताः संख्येयाः । मनःपर्ययज्ञानिनः प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः
संख्येयाः । केवलज्ञानिनः सयोगा अयोगाश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५३. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः १०
सामान्योक्तसंख्याः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च संख्येयाः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धि-
संयता यथाख्यातविहारशुद्धिसंयताः संयतासंयता असंयताश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले जीवोंकी वही संख्या है जो ३सामान्यसे कही है। प्रमत्त-
संयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक उक्त कषायवाले जीव संख्यात हैं। यही क्रम लोभकषायवाले
जीवोंका जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि सूक्ष्मसाम्परायिक संयत जीवोंकी वही १५
संख्या है जो सामान्यसे कही गयी है। उपशान्त कषायसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
कषाय रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है।
§ ५२. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है। विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण
हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि विभंगज्ञानी जीव २०
पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक मतिज्ञानी
और श्रुतज्ञानी जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ६ है । असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत अवधिज्ञानी
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ७ है। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानमें
अवधिज्ञानी जीव संख्यात हैं। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानमें मनःपर्यय-
ज्ञानी जीव संख्यात हैं। सयोगी और अयोगी केवलज्ञानियोंकी संख्या सामान्यवत् ८ है। २५
§ ५३. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक सामायिकसंयत
और छेदोपस्थापनासंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् है । प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें परि-
हार-विशुद्धि संयत जीव संख्यात हैं । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयता-
संयत और असंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १० है ।
१. -दृष्टयः सासा- ता० । २. -यतान्ताः सामा- -मु०, दि० १, दि० २, आ० । ३. यों तो जिस ३०
गुणस्थानवालोंकी संख्या बतलायी है वह क्रोध आदि चार भागोंमें बँट जाती है फिर भी सामान्यसे
उस संख्याका अतिक्रम नहीं होता इसलिए क्रोध, मान, माया और लोभ कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवालोंकी संख्या ओघके समान बतलायी है। आगे भी जहाँ इस प्रकार
संख्या बतलायी हो वहाँ यही क्रम जान लेना चाहिए। ४. संख्यात । ५. अनन्तानन्त । ६. जिस गुणस्थान-
वालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या है। ७. पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ८. संख्यात । ९. ३५
संख्यात । १०. सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत और यथाख्यात विहारशुद्धिसंयत जीव संख्यात हैं। तथा संयतासंयत
जीव पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं और असंयत जीव अनन्तानन्त हैं।
२८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ५४ -
§ ५४. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । अचक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । उभये च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीण-
कषायान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् केवलदर्शनिनः केवलज्ञानिवत् ।
§ ५५. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः सामा-
न्योक्तसंख्याः । तेजःपद्मलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः स्त्रीवेदवत् । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः
संख्येयाः । शुक्ललेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्ता-
प्रमत्तसंयताः संख्येयाः । अपूर्वकरणादयः सयोगकेवल्यन्ता अलेश्याश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अभव्या
अनन्ताः ।
§ ५७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । संयतासंयतादय उपशान्तकषायान्ताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपकाः सयोगकेवलिनोऽयोग-
केवलिनश्च सामान्योक्तसंख्याः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादयोऽप्रमत्तान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार औपशमिकाः सामान्योक्तसंख्याः । सासादनसम्य-
ग्दृष्टयः सम्यङ्मिथ्यादृष्टयो मिथ्यादृष्टयश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५४. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणी
प्रमाण हैं जो श्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । अचक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव
अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उक्त दोनों दर्शनवाले
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १ है । अवधिदर्शनवाले जीवोंकी संख्या अवधिज्ञानियोंके समान है ।
केवलदर्शनवाले जीवोंकी संख्या केवलज्ञानियों के समान है ।
§ ५५. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक कृष्ण, नील
और कापोत लेश्यावाले जीवोंकी संख्या २सामान्यवत् है । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक पीत
और पद्मलेश्यावाले जीवोंकी संख्या ३स्त्रीवेदके समान है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थानवाले पीत और पद्मलेश्यावाले जीव संख्यात हैं । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक शुक्ल
लेश्यावाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं ।
अपूर्वकरणसे लेकर सयोगकेवली तक जीव सामान्यवत् ४ हैं । लेश्यारहित जीव सामान्यवत् हैं ।
§ ५६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक जीव
सामान्यवत् ५ हैं । अभव्य अनन्त हैं ।
§ ५७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि जीव पल्यके
असंख्यातवें भाग हैं । संयतासंयतसे लेकर उपशान्तकषाय तक जीव संख्यात हैं । चारों क्षपक,
सयोगकेवली और अयोगकेवली सामान्यवत् हैं । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयत सम्यग्दृष्टि-
से लेकर अप्रमत्तसंयत तक सामान्यवत् हैं । औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि और
संयतासंयत जीव पल्यके असंख्यातवें भाग हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं । चारों
उपशमक सामान्यवत् हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवोंकी
संख्या सामान्यवत् है ।
१. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या उस गुणस्थानमें चक्षु और अचक्षु दर्शन-
वालोंकी है । २. मिथ्यात्वमें अनन्तानन्त और शेष गुणस्थानोंमें पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ३. असंख्यात
जगश्रेणिप्रमाण । ४. जिस गुणस्थानवालों की जितनी संख्या है उतनी है । ५. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी
संख्या है उतनी है । केवल मिथ्यात्वमें अभव्योंकी संख्या कम हो जाती है ।
- १।८ § ६२ ] प्रथमोऽध्यायः २९
§ ५८. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताश्चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनो
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । तदुभयव्यपदेशरहिताः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५९. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादयः सयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः सामान्योक्तसंख्याः । सयोगकेवलिनः
संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः । संख्या निर्णीता । ५
§ ६०. क्षेत्रमुच्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावन्-मिथ्यादृष्टीनां
सर्वलोकः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामयोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
लोकस्यासंख्येयभागोऽसंख्येया भागाः सर्वलोको वा १।
§ ६१. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकाणां चतुर्षु गुणस्थानेषु
लोकस्यासंख्येयभागः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । १०
मनुष्यगतौ मनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् । देवगतौ देवानां सर्वेषां चतुर्षु गुणस्थानेषु लोकस्यासंख्येयभागः ।
§ ६२. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां क्षेत्रं सर्वलोकः । विकलेन्द्रियाणां लोकस्यासंख्येयभागः ।
पञ्चेन्द्रियाणां मनुष्यवत् ।
§ ५८. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक जीवोंकी १५
संख्या चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान २ है । असंज्ञी मिथ्यादृष्टि अनन्तानन्त हैं । संज्ञी और असंज्ञी
संज्ञासे रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ३ है ।
§ ५९. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है । अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयत-
सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है । सयोगकेवली संख्यात हैं और अयोगकेवली जीवोंकी २०
संख्या सामान्यवत् ६ है । इस प्रकार संख्याका निर्णय किया ।
§ ६०. अब क्षेत्रका विचार करते हैं । सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो प्रकार का है ।
सामान्यसे मिथ्यादृष्टियोंका सब लोक क्षेत्र है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर अयोगकेवली तक
जीवोंका लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र है । सयोगकेवलियोंका लोकके असंख्यातवें भाग
प्रमाण, लोकके असंख्यात बहुभाग प्रमाण और सब लोक क्षेत्र है । २५
§ ६१. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियों-
का चार गुणस्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे
लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका क्षेत्र सामान्यवत् है । अर्थात् मिथ्यादृष्टि
तिर्यंचोंका सब लोक क्षेत्र है और शेष तिर्यंचोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है । मनुष्य-
गतिमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्योंका क्षेत्र लोकका ३०
असंख्यातवां भाग है। सयोगकेवलियोंका सामान्यवत् क्षेत्र है । देवगतिमें सब देवोंका चार गुण-
स्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है।
§ ६२. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंका सब लोक क्षेत्र है । विकलेन्द्रियोंका लोकका
असंख्यातवां भाग क्षेत्र है और पंचेन्द्रियोंका मनुष्योंके समान क्षेत्र है ।
१. -भागः । समुद्घातेऽसंख्येया वा भागाः सर्व-मु० न० । २. मिथ्यादृष्टि संज्ञी असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण ३५
हैं । सासादन आदि संज्ञियोंकी संख्या जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है उतनी है । ३. संख्यात ।
४. मिथ्यादृष्टि आहारक अनन्तानन्त हैं । सासादनसे लेकर संयतासंयत तकके आहारक पल्यके असंख्यातवें
भाग प्रमाण हैं । शेष संख्यात हैं । ५. मिथ्यादृष्टि अनाहारक अनन्तानन्त हैं । तथा सासादन सम्यग्दृष्टि और
असंयत सम्यग्दृष्टि अनाहारक पल्यके असंख्यातवें भाग हैं। ६. संख्यात ।
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३० सर्वार्थसिद्धौ [ ११८ § ६३ -
§ ६३. कायानुवादेन पृथिवीकायादिवनस्पतिकाययान्तानां सर्वलोकः । त्रसकायिकानां
पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ६४. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । काययोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानामयोगकेवलिनां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
५ § ६५. वेदानुवादेन १स्त्रीपुंवेदानां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । नपुंसकवेदानां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानामपगतवेदानां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६६. कषायानुवादेन क्रोधमानमायाकषायाणां २लोभकषायाणां च मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्ति-
बादरान्तानां सूक्ष्मसांपरायाणामकषायाणां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६७. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिनां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं
१० क्षेत्रम् । विभङ्गज्ञानानां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां लोकस्यासंख्येयभागः । आभिनिबोधिक-
श्रुतावधिज्ञानिनामसंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनां ३क्षीणकषायान्तानां मनःपर्ययज्ञानिनां च प्रमत्तादीनां
क्षीणकषायान्तानां केवलज्ञानिनां सयोगानामयोगिनां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६८. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतानां चतुर्णां परिहारविशुद्धि-
संयतानां प्रमत्ताप्रमत्तानां सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतानां यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतानां चतुर्णां
१५ संयतासंयतानामसंयतानां च चतुर्णां सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६३. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायसे लेकर वनस्पतिकाय तकके जीवोंका सब
लोक क्षेत्र है । त्रसकायिकोंका पंचेन्द्रियोंके समान क्षेत्र है ।
§ ६४. योग मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले वचन योगी और मनोयोगी जीवोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । मिथ्यादृष्टिसे लेकर
२० सयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानवाले काययोगो जीवोंका और अयोगकेवली जीवोंका सामान्यवत्
क्षेत्र है ।
§ ६५. वेदमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्ति बादर तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । तथा मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येक गुणस्थानवाले नपुंसकवेदी जीवोंका और अपगतवेदियों का सामान्यवत्
२५ क्षेत्र है ।
§ ६६. कषायमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येक गुण-
स्थानवाले क्रोध, मान, माया व लोभ कषायवाले, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें लोभ कषायवाले और
कषाय रहित जीवोंका सामान्यवत् क्षेत्र है ।
§ ६७. ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवाले मत्य-
३० ज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है । मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि विभंग-
ज्ञानियोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले आभिनिबोधिक ज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंका, प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनःपर्ययज्ञानी जोवोंका तथा सयोग और अयोग गुणस्थान-
वाले केवलज्ञानी जीवोंका क्षेत्र सामान्योक्त है ।
३५ § ६८. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तादि चार गुणस्थानवाले सामायिक और छेदोप-
स्थापनासंयत जीवोंका, प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानवाले परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंका, सूक्ष्म-
साम्परायिक संयत जीवोंका, उपशान्त मोह आदि चार गुणस्थानवाले यथाख्यातसंयत जीवोंका
और संयतासंयत तथा चार गुणस्थानवाले असंयत जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है ।
१. स्त्रीपुंसवेदा-ता० । २. -मायालोभ-आ०, दि० २ । मायानां लोभ-दि० १ । ३. -दीनां मनःप-आ० ।
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