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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

विषयानुक्रमणिका ९९
वर्तना शब्दका अर्थ २१६ गुणवैषम्यमें सदृशोंका भी बन्ध होता है यह
काल द्रव्य क्रियावान् नहीं है इसका समर्थन २१६ बतलानेके लिए सूत्रमें सदृश पदका
कालके अस्तित्वकी सिद्धि २१६ ग्रहण किया २२८
परिणाम पदका अर्थ २१६ दो अधिक गुणवालोंका बन्ध होता है २२८
क्रिया पदका अर्थ २१७ बन्धके प्रकारोंका विशेष विवेचन २२८
परत्व और अपरत्वका विचार २१७ बन्ध होने पर अधिक गुणवाले पारिणामिक
वर्तनासे पृथक् परिणामादिके ग्रहण करनेका होते हैं २२९
प्रयोजन २१७ द्रव्यका लक्षण २३१
पुद्गलका लक्षण २१८ एक द्रव्यके दूसरे द्रव्यसे भिन्न होनेके कारणकी
स्पर्श आदि पदोंका अर्थ व उनके भेद २१८ सयुक्तिक सिद्धि २३१
'रूपिणः पुद्गलाः' सूत्रके रहते हुए भी इस काल भी द्रव्य है २३२
सूत्रके कहनेका कारण २१८ कालमें द्रव्यपने की सिद्धि २३३
पुद्गलकी व्यञ्जन पर्यायोंका निर्देश २१९ कालद्रव्यको अलग कहनेका कारण २३३
शब्दके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ विशेषार्थ द्वारा कालका विचार २३४
बन्धके दो भेद व उनका विशेष विचार २१९ कालकी पर्याय अनन्त समय रूप हैं इसकी
सौक्ष्म्यके दो भेद व उनका विचार २१९ सिद्धि २३५
स्थौल्यके दो भेद व उनका विचार २१९ गुणका लक्षण २३६
संस्थानका अपने भेदोंके साथ विचार २१९ गुणका लक्षण पर्यायोंमें न जाय इसकी
भेदके छह भेद व उनका विचार २२० व्यवस्था २३६
तम आदि शेषका स्वरूप निर्देश २२० परिणामका स्वरूप २३७
पुद्गलके भेद २२० परिणामके दो भेद और उनकी सिद्धि २३७
अणु शब्दका अर्थ २२०
स्कन्ध शब्दका अर्थ २२१ छठाँ अध्याय
स्कन्धोंकी उत्पत्तिका हेतु २२१
भेद और संघात पदका अर्थ २२१ योगका स्वरूप २३८
बहुवचन निर्देशकी सार्थकता २२१ कर्म शब्दका अर्थ २३८
अणुकी उत्पत्तिका हेतु २२२ योगके भेद २३८
'भेदसंघातेभ्यः' इस सूत्रमें भेद पदके ग्रहण काय, वचन और मनोयोगका स्वरूप २३८
करनेका प्रयोजन २२२ आस्रवका स्वरूप २३९
अचाक्षुष चाक्षुष कैसे होता है इसका विचार २२२ पुण्यास्रव और पापास्रव २३९
द्रव्यका लक्षण २२३ ये कायादि तीनों योग शुभ और अशुभ इन
सत्की व्याख्या २२३ दो भागोंमें विभक्त हैं २३९
उत्पाद आदि पदोंका अर्थ २२३ शुभयोगका स्वरूप २३९
युक्त पद किस अर्थमें ग्रहण किया है अशुभ योगका स्वरूप २३९
इसका विचार २२३ पुण्य और पाप पदकी व्याख्या २३९
नित्य पदकी व्याख्या २२५ साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव कितने
मुख्यता और गौणतासे अनेकान्तकी सिद्धि २२५ होते हैं २४०
पुद्गलोंके बन्धका कारण २२६ आस्रवके स्वामीके दो भेद २४०
जघन्य गुणवालोंका बन्ध नहीं होता २२७ कषाय शब्दका अर्थ २४०
गुणसाम्यमें सदृशोंका बन्ध नहीं होता २२८ संप्राय शब्दका अर्थ २४०
ईर्या शब्दका अर्थ २४०
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१०० सर्वार्थसिद्धि
साम्परायिक आस्रवके भेद २४० तिर्यंचायुके आस्रव २५०
पचीस क्रियाओंका विशेष विवेचन २४० तिर्यंचायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५०
किन कारणोंसे आस्रवमें विशेषता होती है मनुष्यायुके आस्रव २५१
इसका निर्देश २४२ मनुष्यायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५१
तीव्र, मन्द आदि पदोंकी व्याख्या २४२ मनुष्यायुके अन्य आस्रव २५१
अधिकरणके दो भेद २४३ चारों आयुओंके आस्रव २५१
‘जीवाजीवाः’ ऐसा बहुवचन रखनेका कारण २४३ ‘च’ पदकी सार्थकता २५१
जीवाधिकरणके भेद २४३ देवायुके आस्रव २५२
संरम्भ आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५२
जीवाधिकरणके १०८ भेदोंका नामोल्लेख २४४ देवायुका अन्य आस्रव २५२
‘च’ पदकी सार्थकता २४४ ‘सम्यक्त्वं च’ पृथक् सूत्र बनानेका प्रयोजन २५२
अजीवाधिकरणके भेद २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रव २५३
निसर्ग आदि पदोंका अर्थ २४४ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५३
‘पर’ पदकी सार्थकता २४४ अशुभ नामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
निर्वर्तना आदिके उत्तर भेदोंकी व्याख्या २४४ शुभनामकर्मके आस्रव २५३
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव २४५ ‘च’ पदकी सार्थकता २५३
प्रदोष आदि प्रत्येक पदका अर्थ २४५ शुभनामकर्मके आस्रवोंका विस्तारसे कथन २५३
आसादन और उपघातमें अन्तर २४५ तीर्थंकर प्रकृतिके आस्रव २५४
‘तत्’ पदसे ज्ञान और दर्शनका ग्रहण कैसे होता सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५४
है इसका विचार २४५ नीचगोत्रके आस्रव २५५
प्रदोषादि ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंके सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्यां २५५
आस्रवके हेतु कैसे हैं इसका विचार २४६ उच्चगोत्रके आस्रव २५५
असातावेदनीयके आस्रव २४६ सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २५५
दुःख आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २४६ अन्तराय कर्मके आस्रव २५६
शोकादिक दुःखके प्रकार होकर भी उनके अलग तत्प्रदोष आदि प्रतिनियत कर्मोंके आस्रवोंका
से ग्रहण करनेका कारण २४६ कथन करनेसे आनेवाले दोषका परिहार २५६
यदि दुःखादिक असाता वेदनीयके आस्रव हैं तो
केशोत्पाटन आदि क्यों करते हैं इसका सातवाँ अध्याय
सयुक्तिक विचार २४७ व्रतकी व्याख्या २५७
सातावेदनीयके आस्रव २४७ हिंसादि परिणामविशेष अध्रुव हैं उनसे दूर
सूत्रगत प्रत्येक पदकी व्याख्या २४७ होना कैसे सम्भव है इस शंकाका परिहार २५७
‘इति’ पदकी सार्थकता २४८ हिंसा आदि पदोंको क्रमसे रखनेका प्रयोजन २५८
दर्शनमोहके आस्रव २४८ रात्रिभोजन विरमण व्रत अलगसे नहीं कहने
केवली आदि पदोंकी व्याख्या २४८ का कारण २५८
सोदाहरण अवर्णवादका निरूपण २४८ व्रतके दो भेद २५८
चारित्रमोहके आस्रव २४९ प्रत्येक पदकी व्याख्या २५८
कषाय आदि पदोंकी व्याख्या २४९ व्रतकी स्थिरताके लिए पाँच-पाँच भावनाओंका
चारित्रमोहके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २४९ अधिकार सूत्र २५९
नरकायुके आस्रव २५० अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
नरकायुके आस्रवोंका विस्तारसे निरूपण २५० सत्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९
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विषयानुक्रमणिका १०१
अनुवीचीभाषण पदका अर्थ २५९ मूर्च्छाको परिग्रह मानने पर बाह्य पदार्थ परिग्रह
अचौर्यव्रतकी पाँच भावनाएँ २५९ कैसे हैं इस बातका विचार २६७
प्रत्येक पदकी व्याख्या २६० व्रतीका स्वरूप २६८
ब्रह्मचर्य व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्य पदकी व्याख्या व उसके भेद २६८
परिग्रहत्याग व्रतकी पाँच भावनाएँ २६० शल्यके तीनों भेदोंकी व्याख्या २६८
हिंसादिकमें अपाय और अवद्यदर्शनका उपदेश २६१ निःशल्यको व्रती कहनेका प्रयोजन २६८
हिंसादिक कैसे अपाय और अवद्य हैं इसका व्रतीके दो भेद २६९
विस्तारसे विवेचन २६१ अगार पदका अर्थ २६९
हिंसादिक दुःख ही हैं इस भावनाका उपदेश २६२ मुनिके शून्य अगार आदिमें रहने पर अगारी-
हिंसादिक दुःख कैसे हैं इसका विस्तारसे विवेचन २६२ पन प्राप्त होता है और गृहस्थके घर छोड़
लोक कल्याणकारी मैत्री आदि चार भावनाएँ २६२ देने पर अनगारीपन प्राप्त होता है इस शंकाका
मैत्री आदि पदकी व्याख्या २६३ परिहार २६९
संवेग और वैराग्यके लिए जगत् और कायके अगारीके पूरे व्रत नहीं होनेसे वह व्रती कैसे है
स्वभावका चिन्तन २६३ इस बातका विचार २६९
लोकका आकार २६३ अगारीकी व्याख्या २७०
जगत् और कायके स्वभावका किस प्रकार अगारीके व्रतोंको अणु कहनेका प्रयोजन २७०
विचार करे २६३ अगारी किस प्रकारकी हिंसाका त्यागी होता है २७०
हिंसाकी व्याख्या २६४ अहिंसा आदि पाँचों अणुव्रतोंकी व्याख्या २७०
प्रमत्तयोगपदकी सार्थकता २६४ अगारी अन्य किन गुणोंसे सम्पन्न होता है
प्राणोंका वियोग न होनेपर भी हिंसा होती है इसका विचार २७०
इस बातका उल्लेख २६४ दिग्विरतिव्रतकी व्याख्या २७०
अनृतकी व्याख्या २६५ देशविरति व्रतकी व्याख्या २७१
असत् और अनृत पदकी व्याख्या २६५ अनर्थदण्डका अर्थ २७१
हिंसाकर वचन ही अनृत है इस बातका अनर्थदण्डके पाँच भेद और उनकी व्याख्या २७१
खुलासा २६५ सामायिक की व्याख्या २७१
स्तेयकी व्याख्या २६५ प्रोषध व उपवास शब्दका अर्थ २७२
आदान पदका अर्थ २६५ प्रोषधोपवासकी व्याख्या २७२
कर्म और नोकर्मका ग्रहण स्तेय क्यों नहीं है उपभोगपरिभोगकी व्याख्या २७२
इसका विचार २६५ मधु आदिके सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
भिक्षुके भ्रमण करते समय रथ्याद्वारमें प्रवेश केतकी आदिके फूल व साधारण वनस्पतिके
करनेसे चोरी क्यों नहीं होती इसका विचार २६५ सप्रयोजन त्यागका उपदेश २७२
अब्रह्मकी व्याख्या २६६ यान वाहन आदिके परिमाण करनेका उपदेश २७२
मिथुन पदका अर्थ २६६ अतिथि पदकी व्याख्या २७३
सब कर्म मैथुन क्यों नहीं है इसका खुलासा २६६ अतिथिसंविभागके चार भेद २७३
ब्रह्म पदकी व्याख्या २६६ गृहस्थका सल्लेखना धर्म २७३
परिग्रहकी व्याख्या २६७ मरण पदकी व्याख्या २७३
मूर्च्छा पदका अर्थ २६७ सल्लेखना पदका अर्थ २७३
मूर्च्छा पदसे वातादि प्रकोपजन्य मूर्च्छाका ग्रहण सूत्रमें 'जोषिता' पद रखनेका कारण २७३
क्यों नहीं किया इस बातका खुलासा २६७ सल्लेखना आत्मवध नहीं है इस बातका समर्थन २७४
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१०२ सर्वार्थसिद्धि
सम्यग्दृष्टिके पाँच अतीचार २७५ आठवाँ अध्याय
प्रशंसा और संस्तवमें अन्तर २७५ बन्धके हेतु २८३
सम्यग्दर्शनके आठ अंग होने पर पाँच अती- प्रमाद पदकी व्याख्या २८३
चार ही क्यों कहे इसका कारण २७५ मिथ्यादर्शनके दो भेद और उनकी व्याख्या २८३
व्रतों और शीलोंमें पाँच-पाँच अतिचारोंको परोपदेशनिमित्त मिथ्यादर्शनके चार या पाँच
बतलानेवाला अधिकार सूत्र २७५ भेद व उनका खुलासा २८३
अहिंसाणुव्रतके पाँच अतिचार २७५ क्रियावादी आदिके अवान्तर भेद २८४
बन्ध आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ अविरतिके १२ भेद २८४
सत्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ कषायके २५ भेद २८४
मिथ्योपदेश आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ मनोयोग आदिके अवान्तर भेद २८४
अचौर्याणुव्रतके पाँच अतीचार २७६ प्रमादके अनेक भेद २८४
स्तेनप्रयोग आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७६ किस गुणस्थानमें कितने बन्धके हेतु हैं इसका
स्वदारसन्तोष व्रतके पाँच अतीचार २७७ विचार २८४
परविवाहकरण आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७७ बन्धकी व्याख्या २८५
परिग्रहपरिमाण व्रतके पाँच अतीचार २७७ 'सकषायत्वात्' पद देनेका प्रयोजन २८५
दिग्विरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ 'जीवः' पद देनेका प्रयोजन २८५
ऊर्ध्वव्यतिक्रम आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ 'कर्मणो योग्यान्' इस प्रकार निर्देश करनेका
देशविरमणव्रतके पाँच अतीचार २७८ प्रयोजन २८५
आनयन आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७८ दृष्टान्तपूर्वक कर्मरूप परिणमनका समर्थन २८६
अनर्थदण्डविरतिव्रतके पाँच अतीचार २७९ 'सः' पदकी सार्थकता २८६
कन्दर्प आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ बन्धके चार भेद २८६
सामायिकके पाँच अतीचार २७९ प्रकृति आदि प्रत्येक पदकी दृष्टान्तपूर्वक व्याख्या २८६
योगदुष्प्रणिधान आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ प्रकृति और प्रदेशबन्धका कारण योग है तथा
प्रोषधोपवासके पाँच अतीचार २७९ स्थितिबन्ध और अनुभागबन्धका कारण कषाय
अप्रत्यवेक्षित आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २७९ है इस बातका निर्देश २८७
भोगोपभोगपरिसंख्यानव्रतके पाँच अतीचार २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेद २८८
सचित्त आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० आवरण पदकी व्याख्या २८७
अतिथिसंविभाग शीलके पाँच अतीचार २८० वेदनीय आदि प्रत्येक पदकी व्युत्पत्ति २८८
सचित्तनिक्षेप आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८० प्रकृतिबन्धके आठ भेदोंके अवान्तर भेद २८९
सल्लेखनाके पाँच अतीचार २८१ ज्ञानावरणके पाँच भेद २८९
जीविताशंसा आदि प्रत्येक पदकी व्याख्या २८१ अभव्यके मनःपर्यय और केवलज्ञान शक्ति किस
दान पदकी व्याख्या २८१ अपेक्षासे है २८९
अनुग्रह पदका अर्थ २८१ भव्य और अभव्य विकल्पका कारण २८९
स्वोपकार क्या है और परोपकार क्या है इसका दर्शनावरणके नौ भेद २९०
खुलासा २८१ निद्रा आदि पाँचोंकी व्याख्या २९०
'स्व' शब्दका अर्थ २८१ वेदनीयके दो भेद २९१
दानमें विशेषता लानेके कारण २८१ सद्वेद्य और असद्वेद्यकी व्याख्या २९१
विधि व विशेष शब्दका अर्थ २८२ मोहनीयके २८ भेद २९१
विधिविशेष आदिका खुलासा २८२
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विषयानुक्रमणिका। १०३
दर्शनमोहनीयके तीन भेदोंका कारण व उनकी मूल प्रकृतियोंका स्वमुखसे अनुभव ३०३
व्याख्या २९२ कुछ कर्मोंको छोड़कर उत्तर प्रकृतियोंका
चारित्रमोहनीयके सब भेदोंकी व्याख्या २९३ परमुखसे भी अनुभव होता है ३०३
आयुकर्मके चार भेद २९४ अपने कर्मके नामानुसार अनुभव होता है ३०३
आयुव्यपदेशका कारण व चारों आयुओंकी कर्मफलके बाद निर्जरा होती है ३०३
व्याख्या २९४ निर्जरा व उसके भेदोंकी व्याख्या ३०४
नामकर्मके अवान्तर भेद २९५ 'च' पदकी सार्थकता ३०४
गति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ विशेषार्थ द्वारा अनुभागबन्धका विशेष विवरण ३०४
जाति व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ प्रदेशबन्धकी व्याख्या ३०६
शरीर नामकर्म व उसके भेदोंकी व्याख्या २९५ पुण्य प्रकृतियाँ ३०७
अंगोपांग व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पुण्य प्रकृतियोंके नाम ३०७
निर्माण व उसके भेदोंकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियाँ ३०८
बन्धनकी व्याख्या २९६ पाप प्रकृतियोंके नाम ३०८
संघातकी व्याख्या २९६
संस्थान व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ नौवाँ अध्याय
संहनन व उसके छह भेदोंकी व्याख्या २९६ संवरका स्वरूप ३०९
स्पर्शादिक २०की व्याख्या २९६ संवरके दो भेद व उनके लक्षण ३०९
आनुपूर्व्य व उसके चार भेदोंकी व्याख्या २९७ किस गुणस्थानमें किस निमित्तसे कितनी
पूर्वोक्त भेदोंके सिवा अन्य भेदोंकी व्याख्या २९६ प्रकृतियोंका संवर होता है ३०९
गोत्र कर्मके दो भेद २९९ संवरके हेतु ३११
उच्च व नीच गोत्रकी व्याख्या २९९ गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषह-
अन्तराय कर्मके पाँच भेद २९९ जयका स्वरूप ३११
दानान्तराय आदिके कार्य ३०० सूत्रमें आये हुए 'सः' पदकी सार्थकता ३१२
आदिके तीन कर्म व अन्तराय कर्मका उत्कृष्ट संवर और निर्जराके हेतुभूत तपका निर्देश ३१२
स्थितिबन्ध ३०० तपका धर्ममें अन्तर्भाव होता है फिर भी
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०० उसके अलगसे कहनेका कारण ३१२
मोहनीय कर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ तप अभ्युदय स्वर्गादिका कारण होकर भी
मोहनीयके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ निर्जराका कारण कैसे है इस शंकाका
नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ समाधान ३१२
इन कर्मोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ गुप्तिका स्वरूप ३१३
आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३०१ निग्रह पदकी व्याख्या ३१३
आयुकर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका स्वामी ३०१ सम्यक् पदकी सार्थकता ३१३
वेदनीय कर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ गुप्ति संवरका कारण कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
नाम और गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समितिके पाँच भेद ३१३
शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध ३०२ समिति संवरका हेतु कैसे है इस बातका निर्देश ३१३
अनुभागबन्धकी व्याख्या ३०२ धर्मके दस भेद ३१३
विपाकपदकी व्याख्या ३०२ गुप्ति, समिति और धर्मको संवरका हेतु
अनुभवके दो भेद ३०३ कहनेका प्रयोजन ३१३
अनुभवकी दो प्रकारसे प्रवृत्ति ३०३ क्षमादि दस धर्मोंका स्वरूप ३१३

१०४ सर्वार्थसिद्धि
सत्य और भाषासमितिमें अन्तरका कथन ३१४ ज्ञानावरणके उदयमें प्रज्ञा परीषह कैसे होता
ये दस धर्म संवरके कारण कैसे हैं इसका विचार ३१५ है इसका विचार ३३०
अनुप्रेक्षाके बारह भेद ३१५ दर्शनमोह और अन्तरायके उदयमें जो परीषह
अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाओंके चिन्तन होते हैं उनका निर्देश ३३१
करनेकी प्रक्रिया ३१५ चारित्रमोहके उदयमें जो परीषह होते हैं
निर्जराके दो भेद व उनकी व्याख्या ३१८ उनका निर्देश ३३१
ये अनुप्रेक्षाएँ संवरका कारण कैसे हैं निष्पद्यपरीषह चारित्रमोहके उदयमें कैसे
इसका विचार ३२० होता है इसका विचार ३३२
अनुप्रेक्षाको संवरके हेतुओंके मध्यमें रखनेका वेदनीयके उदयमें जो परीषह होते हैं
प्रयोजन ३२० इसका विचार ३३२
परीषहकी निरुक्ति व प्रयोजन ३२० एक जीवके एक साथ कितने परीषह होते
परीषहजय संवर और निर्जराका कारण कैसे हैं इसका विचार ३३२
है इसका विचार ३२० एक जीव के एक साथ उन्नीस परीषह क्यों
परीषहोंके नाम ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
क्षुधादि बाईस परीषहोंको किस प्रकार जीतना प्रज्ञा और अज्ञान परीषह एक साथ कैसे
चाहिए इसका पृथक्-पृथक् विचार ३२० होते हैं इसका विचार ३३३
पूर्वोक्त विधिसे परीषहोंको सहन करनेसे संवर चारित्रके पाँच भेद ३३३
होता है इसका निर्देश ३२७ चारित्रको अलगसे ग्रहण करनेका प्रयोजन ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थ वीतराग के सामायिकचारित्रके दो भेद और उनकी
चौदह परीषह होते हैं इस बातका निर्देश ३२७ व्याख्या ३३३
सूक्ष्मसाम्पराय जीवके मोहोदयनिमित्तक परीषह छेदोपस्थापनाचारित्रका स्वरूप ३३३
क्यों नहीं होते इस शंकाका परिहार ३२७ परिहारविशुद्धि चारित्रका स्वरूप ३३४
पूर्वोक्त जीवोंके ये चौदह परीषह किस सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रका स्वरूप ३३४
अपेक्षासे होते हैं इस बातका विचार ३२७ अथाख्यातचारित्रका स्वरूप व अथ शब्दकी
जिनके ग्यारह परीषह होते हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ अथाख्यातका दूसरा नाम यथाख्यात है इस
जिनके ग्यारह परीषह किंनिमित्तक होते हैं बातका सयुक्तिक निर्देश ३३४
इस बातका निर्देश ३२८ 'इति' शब्द की सार्थकता ३३४
जिनके मोहनीयका उदय न होनेपर भी सामायिक आदिके आनुपूर्वी कथनकी
ग्यारह परीषह क्यों कहे हैं इस बातका सार्थकता ३३४
निर्देश ३२८ बाह्य तपके छह भेद ३३५
‘न सन्ति’ पदके अध्याहारकी सूचना ३२८ अनशन आदि की व्याख्या व उसके कथनका
बादरसाम्पराय के सब परीषह होते हैं इस प्रयोजन ३३५
वातका निर्देश ३२९ परीषह और कायक्लेश में क्या अन्तर है
बादरसाम्परायशब्दका अर्थ ३२९ इस बातका निर्देश ३३६
किन चारित्रोंमें सब परीषह सम्भव हैं इस बाह्य तप कहनेका प्रयोजन ३३६
बात का निर्देश ३३० अन्तरंग तपके छह भेद ३३६
ज्ञानावरणके उदयमें जो दो परीषह होते हैं प्रायश्चित्त आदि की व्याख्या ३३६
उनका निर्देश ३३० ध्यानको छोड़कर शेष पाँच अन्तरंग तपोंके
अवान्तर भेद ३३६
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विषयानुक्रमणिका १०५
प्रायश्चित्तके नौ भेद ३३६ रौद्रध्यानके चार भेद व स्वामी ३४३
आलोचन आदि नौ भेदोंकी व्याख्या ३३७ देशसंयतके रौद्रध्यान कैसे होता है इस
विनय तपके चार भेद ३३८ बातका विचार ३४३
ज्ञानविनय आदि चार भेदोंकी व्याख्या ३३८ संयतके रौद्रध्यान न होने का कारण ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेद ३३८ धर्म्यध्यानके चार भेद ३४४
वैयावृत्त्य तपके दस भेदोंका कारण ३३८ विचय पदकी निरुक्ति ३४४
आचार्य आदि पदोंकी व्याख्या ३३८ आज्ञाविचय आदि चारोंकी व्याख्या ३४४
स्वाध्याय तपके पाँच भेद ३३९ धर्म्यध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४४
वाचना आदि पदोंकी व्याख्या व प्रयोजन ३३९ विशेषार्थ द्वारा कर्मोंके उदय व उदीरणाका
व्युत्सर्ग तपके दो भेद ३३९ विशेष विवेचन ३४५
व्युत्सर्ग पदकी निरुक्ति व भेदनिर्देश ३३९ आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ३४७
बाह्य उपधिके प्रकार ३३९ पूर्वविद् पदका अर्थ ३४७
अन्तरंग उपधिके प्रकार ३३९ श्रेणी आरोहणके पूर्व धर्म्यध्यान होता है
व्युत्सर्ग तपका प्रयोजन ३३९ और बादमें शुक्लध्यान होता है इस
ध्यानका प्रयोक्ता, स्वरूप व काल परिमाण ३४० बातका निर्देश ३४७
आदिके तीन संहनन उत्तम हैं इस बातका निर्देश ३४० अन्तके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ३४७
ध्यानके साधन ये तीनों हैं पर मोक्षका साधन शुक्लध्यानके चार भेदोंके नाम ३४८
प्रथम संहनन ही है इस बातका निर्देश ३४० शुक्लध्यानके चारों भेदोंके स्वामी ३४८
एकाग्रचिन्तानिरोध पदकी व्याख्या ३४० आदिके दो शुक्लध्यानोंमें विशेषताका कथन ३४८
चिन्तानिरोधको ध्यान कहनेसे आनेवाले एकाश्रय पदका तात्पर्य ३४८
दोषका परिहार ३४१ दूसरा शुक्लध्यान अविचार है इस बातका
ध्यानके चार भेद ३४१ निर्देश ३४९
आर्त आदि पदोंकी व्याख्या ३४१ वितर्क शब्दका अर्थ ३४९
चारों प्रकारके ध्यानोंमेंसे प्रत्येकके दो दो वीचार पदकी व्याख्या ३४९
भेद क्यों हैं इस बातका निर्देश ३४१ अर्थ, व्यंजन, योग और संक्रान्ति पदकी
अन्तके दो ध्यान मोक्षके हेतु हैं ३४१ व्याख्या ३४९
पर शब्दसे अन्तके दो ध्यानोंका ग्रहण कैसे अर्थसंक्रान्तिका उदाहरण ३४९
होता है इस बातका निर्देश ३४१ व्यंजनसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
आर्तध्यानके प्रथम भेदका लक्षण ३४२ योगसंक्रान्तिका प्रकार ३४९
अमनोज्ञ पदकी व्याख्या ३४२ मुनि पृथक्त्ववितर्क वीचारका ध्यान किस लिए
आर्तध्यान द्वितीय भेदका लक्षण ३४२ और कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
वेदना नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि एकत्ववितर्कका ध्यान किस लिए और
वेदना पदकी व्याख्या ३४२ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
निदान नामक आर्तध्यानका लक्षण ३४२ मुनि सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान किस लिए और
चारों प्रकारके आर्तध्यानके स्वामी ३४३ कब करता है इस बातका निर्देश ३५०
अविरत आदि पदोंकी व्याख्या ३४३ मुनि व्युच्छिन्नक्रियानिवर्ति ध्यान किस लिए और
अविरत आदि तीनोंके आदिके तीन ध्यान कब करता है इस बातका निर्देश ३५१
होते हैं किन्तु निदान प्रमत्तसंयतके नहीं साक्षात् मोक्षका कारण क्या है इस बातका
होता इस बातका निर्देश ३४३ निर्देश ३५१
१४

१०६ सर्वार्थसिद्धि
साक्षात् मोक्षका कारण मिलने पर मुनि मुक्त यत्नसाध्य अभाव किस क्रमसे होता है इस
होता है इस बातका निर्देश ३५१ इस बातका निर्देश ३५७
दोनों प्रकारका तप संवरके साथ निर्जराका भी अन्य किन भावोंके अभावसे मोक्ष होता है
कारण है इस बातका समर्थन ३५१ इस बातका निर्देश ३५९
किसके कितनी निर्जरा होती है ३५१ भव्यत्व पदको ग्रहण करनेका कारण ३५९
अधिकारी भेदसे उत्तरोत्तर असंख्यातगुणी मोक्षमें किन भावोंका अभाव नहीं होता इस
निर्जराका विशेष खुलासा ३५१ बातका निर्देश ३५९
निर्ग्रन्थोंके पाँच भेद ३५३ मोक्षमें अनन्त वीर्य आदिका सद्भावख्यापन ३५९
पुलाक आदि पदोंकी व्याख्या ३५३ मुक्त जीवोंके आकारका शंका-समाधानपूर्वक
ये पुलाकादि पाँचों किस अपेक्षासे निर्ग्रन्थ प्रतिपादन ३६०
कहलाते हैं इसका कारण ३५३ मुक्त जीव लोकाकाश प्रमाण क्यों नहीं होता
निर्ग्रन्थोंमें संयम आदिकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ इस बातका निर्देश ३६०
संयमकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ मुक्त जीवके ऊपर लोकान्त गमनका निर्देश ३६०
श्रुतकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ ऊपर लोकान्त गमनमें हेतुओंका निर्देश ३६०
प्रतिसेवनाकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ दृष्टान्तों द्वारा हेतुओंका समर्थन ३६१
तीर्थकी अपेक्षा भेद कथन ३५४ हेतुपूर्वक दृष्टान्तोंका विशेष स्पष्टीकरण ३६१
लिंगकी अपेक्षा अभेद कथन ३५४ ऊपर लोकान्तसे आगे गमन न करनेका कारण ३६१
लेश्याकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ मुक्त जीवोंमें क्षेत्र आदिकी अपेक्षा भेद कथन ३६२
उपपादकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ भेद कथनमें दो नयोंका अवलम्बन ३६२
स्थानकी अपेक्षा भेद कथन ३५५ क्षेत्रकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
कालकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
दसवाँ अध्याय गतिकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
केवलज्ञानकी उत्पत्तिके हेतु और कर्मक्षयका लिंगकी अपेक्षा भेदकथन ३६२
क्रमनिर्देश ३५६ तीर्थकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
मोहक्षयात् पदको अलग रखनेका कारण ३५६ चारित्रकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
मोहका क्षय पहले क्यों और किस क्रमसे होता प्रत्येक बुद्धबोधितकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
है इस बातका निर्देश ३५६ ज्ञानकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
क्षीणकषाय जीवके शेष ज्ञानावरणादि कर्मोंका अवगाहनकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
क्षय कब और किस क्रमसे होता है इस अन्तरकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
बातका निर्देश ३५७ संख्याकी अपेक्षा भेदकथन ३६३
कारणपूर्वक मोक्षका स्वरूप ३५७ क्षेत्रादिकी अपेक्षा अल्पबहुत्व ३६३
कर्मके अभावके दो भेद ३५७ सर्वार्थसिद्धि इस नामकी सार्थकता और
किन कर्मोंका अयत्नसाध्य अभाव होता है इस महत्त्वप्रख्यापन ३६४
बातका निर्देश ३५७ वीर जिनकी स्तुति ३६४

अध्याय २-४: जीव-तत्त्व, संसारी-मुक्त भेद, नरक-स्वर्ग एवं देव-लोक रचना

टिप्पणियोंमें उल्लिखित ग्रन्थोंकी संकेत सूची
संकेत ग्रन्थनाम संकेत ग्रन्थनाम
अने० ना० अनेकान्त नाममाला प्र० वार्तिकाल० प्रमाणवार्तिकालंकार
अ० अन्य प्रति प्रवचन० क्षे० प्रवचनसार क्षेत्र
आ० नि० आचारांग नियुक्ति प्रश० व्यो० प्रशस्तपादभाष्य व्योमवती टीका
आ० आरा प्रति बा० अणु० बारह अणुपेक्खा
गो० क० गोम्मटसार कर्मकाण्ड बा० भा० बार्हस्पत्य भाष्य
गो० जी० गोम्मटसार जीवकाण्ड मु० मुद्रित प्रति ( सर्वार्थसिद्धि )
जैनेन्द्र० जैनेन्द्र व्याकरण $\left.\begin{matrix} मूला०
मूलाचा० \end{matrix}\right}$ मूलाचार
त० ताडपत्रीय प्रति १
तत्त्वा० तत्त्वार्थवार्तिक युक्त्यनु० युक्त्यनुशासन
दि० १ दिल्ली प्रति १ यो०भा० योगभाष्य
दि० २ दिल्ली प्रति २ योगसू० योगसूत्र
धव० प्र० अ० धवला प्रति अमरावती रत्न० रत्नकरण्डक
ना० ताड़पत्रीय प्रति २ वि० भा० विशेषावश्यक भाष्य
न्या० भा० न्यायभाष्य वि० म० विशुद्धिमग्ग
न्यायबिन्दुटी० न्यायबिन्दु टीका सन्मति० सन्मतितर्क
न्या० सू० न्यायसूत्र स० प्रा० समयप्राभृत
परि० शे० परिभाषेन्दुशेखर $\left.\begin{matrix} स०
सर्वा० \end{matrix}\right}$ सर्वार्थसिद्धि
प० मु० परीक्षामुख
$\left.\begin{matrix} पा०
पा० म० भा० \end{matrix}\right}$ पातञ्जल महाभाष्य सिद्धद्वा० सिद्धद्वात्रिंशत्का
सौन्दर० सौन्दरानन्द
पा० यो० सू० पातञ्जल योगसूत्र
पंच० पंचसंग्रह ( श्वे० ) सां० कौ० सांख्यकौमुदी
अ० अध्याय
प० पत्र
पृ० पृष्ठ
श्लो० श्लोक
सू० सूत्र
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अथ चक्रं द्वितीये हस्तिक्षेत्रे विंशोपकादि
नामपद लब्धि नामपद लब्धि
मस्तकाच्छादनम् ० । ८ । ७ । १ । ० । २ ललाट फलकम् ० । ६ ० । ४
गल आच्छादनम् ० । ६ ० । ११ । १२ नेत्र दल ० । ८
कण्ठ विस्तीर्ण आच्छादनम् ० । १० ० । १५ कनीनी मण्डल ० । १ ० । ५
तालुपीठ पृष्ठ ० । १२ ० । १४ नेत्र रोम ० । १४
गलात् कण्ठतः ० । ५ ० । ६ दृक्कोण मध्यभाग ० । ८ ० । ६
(डोम्बिकैः) नेत्र मध्य ० । ६ दृक्कोण मध्यभाग ० । १० ० । १०
गण्डस्थल { ० । ८ / ० । ४ । १२ दृक्पात भूमि ० । ४ । ६
१ नेत्र विस्तीर्ण ० । ८
विष्कम्भतः ० । ११ । १२ कनीनामण्डल ० । ३ । १२
गण्डगर्भः ० । १८ । ० १ नेत्र विस्तीर्ण १ ० । ३
दन्तपीठ ० । ५ । १२ २ नेत्र विस्तीर्ण ८ ० । ३
आस्फालनम् ० । १४ विष्कम्भ नेत्र विस्ती ० । ४ ० । २ ० । ३
पृष्ठ आच्छादनम् ० । ५ ० । ३ ४ नेत्र परिणाह ० । १४
दन्तदण्डौ ० । ६ ० । ३ घोषमण्डल ० । ५ ० । ५
केसरोत्पत्ति ० । १४ । ६ अधि कर्णस्थल ० । २ । १२ । १७ । ०
पुच्छदण्ड ० । ५ ० । ६ दन्तपीठ ० । ३ ० । १०
दन्तोत्पत्ति { ० । ३ / ० । १२ गण्डकुम्भोपरि ० । ६ ० । १७
नासाविस्तीर्ण ० । ४ । ८ । १ कुम्भपीठ { ० । ६ ० । २ / ० । ७
मस्तकाच्छादन { ० । ५ ० । ५ ० । २
दन्तगर्भः ० । २ । ८ । १ कुम्भ मस्तकाच्छादन ० । ६ ० । ६ ० । ५
द्विनखान्तराले ० । ६ ० । ४ ( ० । ८ ) हस्तदण्ड ० । ५
विष्कम्भ ० । ६
दल ० । २
दल ० । १
कर्णक ० । ६ । २
दल ० । ३

श्रीपूज्यपादाचार्यविरचिता
सर्वार्थसिद्धिः
प्रथमोऽध्यायः
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् । ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥१॥
§ १. कश्चिद्भव्यः प्रत्यासन्ननिष्ठः प्रज्ञावान् स्वहितमुपलिप्सुर्विविक्ते परमरम्ये भव्य-
सत्त्वविश्रामास्पदे क्वचिदाश्रमपदे मुनिपरिषदन्मध्ये संनिषण्णं मूर्त्तमिव मोक्षमार्गमवाग्विसर्गं वपुषा
निरूपयन्तं युक्त्यागमकुशलं परहितप्रतिपादनैककार्यमार्यनिषेव्यं निर्ग्रन्थाचार्यवर्यमुपसद्य सविनयं
परिपृच्छति स्म । भगवन्, किं¹ नु खलु आत्मने हितं स्यादिति । स आह मोक्ष इति । स एव पुनः ५
प्रत्याह किंस্বরূপोऽसौ मोक्षः कश्चास्य प्राप्त्युपाय इति । आचार्य आह-निरवशेषनिराकृतकर्ममल-
कलङ्कस्याशरीरस्यात्मनोऽचिन्त्यस्वाभाविकज्ञानादिगुणमव्याबाधसुखमात्यन्तिकमवस्थान्तरं मोक्षं²
इति ।
§ २. तस्यात्यन्तपरोक्षत्वाच्छद्मस्थाः प्रवादिनस्तीर्थंकरंमन्यास्तस्य स्वरूपमस्पृशन्तीभि-
र्वाग्भिर्युक्त्याभासनिबन्धनाभिरन्यथैव परिकल्पयन्ति "चैतन्यं³ पुरुषस्य स्वरूपम्⁴, तच्च ज्ञेया- १०

जो मोक्षमार्गके नेता हैं, कर्मरूपी पर्वतोंके भेदनेवाले हैं और विश्वतत्त्वोंके ज्ञाता हैं, उनकी
मैं उनके समान गुणोंकी प्राप्तिके लिए वन्दना करता हूँ ॥१॥
§ १. अपने हितको चाहनेवाला कोई एक बुद्धिमान् निकट भव्य था । वह अत्यन्त रमणीय
भव्य जीवोंके विश्रामके योग्य किसी एकान्त आश्रममें गया । वहाँ उसने मुनियोंकी सभामें बैठे हुए
वचन बोले बिना ही मात्र अपने शरीरकी आकृतिसे मानो मूर्तिमान् मोक्षमार्गका निरूपण करनेवाले, १५
युक्ति तथा आगममें कुशल, दूसरे जीवोंके हितका मुख्यरूपसे प्रतिपादन करनेवाले और आर्य
पुरुषोंके द्वारा सेवनीय प्रधान निर्ग्रन्थ आचार्यके पास जाकर विनयके साथ पूछा- 'भगवन् !
आत्माका हित क्या है ?' आचार्यने उत्तर दिया- 'आत्माका हित मोक्ष है।' भव्यने फिर पूछा-
'मोक्षका क्या स्वरूप है और उसकी प्राप्तिका उपाय क्या है ?' आचार्यने कहा कि- 'जब आत्मा
कर्ममल, कलंक और शरीरको अपनेसे सर्वथा जुदा कर देता है तब उसके जो अचिन्त्य स्वाभाविक २०
ज्ञानादि गुणरूप और अव्याबाध सुखरूप सर्वथा विलक्षण अवस्था उत्पन्न होती है उसे मोक्ष
कहते हैं।'
§ २. चूंकि ऐसा मोक्ष अत्यन्त परोक्ष है, अतः अपनेको तीर्थंकर माननेवाले अल्पज्ञानी
प्रवादी लोग मोक्षके स्वरूपको स्पर्श नहीं करनेवाले और असत्य युक्तिरूप वचनोंके द्वारा उसका
स्वरूप सर्वथा अन्य प्रकारसे बतलाते हैं। यथा-( १. सांख्य ) पुरुषका स्वरूप चैतन्य है जो २५

१. किं खलु आत्मने-आ०, अ० । किं खलु आत्मनो-दि० १, दि० २ । २. मोक्षः त-आ०, अ०, दि० १,
दि० २ । ३. 'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति' -योगभा० १।९ । 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' -योगसू० १।३ ।
४. स्वरूपमिति त-आ०, त० ।
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२ सर्वार्थसिद्धौ
कारपरिच्छेदपराङ्मुखम्'' इति । तत्सदप्यसदेव ²निराकारत्वादिति । "³बुद्ध्यादिवैशेषिकगुणोच्छेदः
पुरुषस्य मोक्षः" इति⁴ । तदपि परिकल्पनमसदेव विशेषलक्षणशून्यस्यावस्तुत्वात् । "प्रदीपनिर्वाण-
⁵कल्पमात्मनिर्वाणम्" इति च । तस्य ⁶खरविषाणकल्पना तैरेवाहृत्य निरूपिता । इत्येवमादि ।
तस्य स्वरूपमनवद्यमुत्तरत्र वक्ष्यामः ।
§ ३. तत्प्राप्त्युपायं प्रत्यपि ते विसंवदन्ते—"ज्ञानादेव चारित्रनिरपेक्षात्तत्प्राप्तिः, श्रद्धा-
नमात्रादेव वा, ज्ञाननिरपेक्षाच्चारित्रमात्रादेव" इति च । व्याध्यभिभूतस्य तद्विनिवृत्त्युपायभूतभेषज-
विषयव्यस्तज्ञानादिसाधनत्वाभाववद् ⁷व्यस्तं ज्ञानादिमोक्षप्राप्त्युपायो न भवति ।
ज्ञेयके ज्ञानसे रहित है । किन्तु ऐसा चैतन्य सत्स्वरूप होकर भी असत् ही है, क्योंकि ऐसा
मानने पर उसका कोई आकार अर्थात् स्वरूप नहीं प्राप्त होता । (२. वैशेषिक) बुद्धि आदि विशेष
गुणोंका अलग हो जाना ही आत्माका मोक्ष है । किन्तु यह कल्पना भी असमीचीन है, क्योंकि
विशेष लक्षणसे रहित वस्तु नहीं होती । (३. बौद्ध) जिस प्रकार दीपक बुझ जाता है उसी
प्रकार आत्माकी सन्तानका विच्छेद होना ही मोक्ष है । किन्तु जैसे गदहेके सींग केवल कल्पनाके
विषय होते हैं स्वरूपसत् नहीं वैसे ही इस प्रकारका मोक्ष भी केवल कल्पनाका विषय है स्वरूपसत्
नहीं । यह बात स्वयं उन्हींके कथनसे सिद्ध हो जाती है । इत्यादि । इस मोक्षका निर्दोष स्वरूप
आगे (दसवें अध्यायमें) कहेंगे ।
§ ३. इसी प्रकार वे प्रवादी लोग उसकी प्राप्तिके उपायोंके विषयमें भी विवाद करते हैं ।
कोई मानते हैं कि (१) चारित्रके बिना केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । दूसरे मानते हैं कि
(२) केवल श्रद्धानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । तथा अन्य मानते हैं कि (३) ज्ञानके बिना केवल
चारित्रसे मोक्षकी प्राप्ति होती है । परन्तु जिस प्रकार रोगके दूर करनेकी उपायभूत दवाईका
मात्र ज्ञान, श्रद्धान या आचरण रोगीके रोगके दूर करनेका उपाय नहीं है उसी प्रकार अलग-
अलग ज्ञान आदि मोक्षकी प्राप्तिके उपाय नहीं हैं ।
विशेषार्थ—अब तक जो कुछ बतलाया है यह तत्त्वार्थसूत्र और उसके प्रथम सूत्रकी उत्था-
निका मात्र है । इसमें सर्व प्रथम बतलाया है कि किस निमित्तसे इसकी रचना हुई । आशय यह
है कि कोई एक भव्य आत्माके हितकी खोजमें था । इसके लिए वह किसी एकान्त रम्य आश्रममें
गया और वहाँ मुनियोंकी सभामें बैठे हुए निर्ग्रन्थाचार्यसे प्रश्न किया । इसपरसे इस तत्त्वार्थसूत्र
की रचना हुई है । तत्त्वार्थराजवार्तिकके प्रारम्भमें जो उत्थानिका दी है उससे भी इसी बातकी
पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ प्रथम सूत्रका निर्देश करनेके बाद एक दूसरे मतका भी उल्लेख किया
है। वहाँ बतलाया है कि तत्त्वार्थसूत्रकी रचनाके सम्बन्धमें अन्य लोग इस प्रकारसे व्याख्यान करते
हैं कि 'इधर पुरुषोंकी शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण होती जा रही है, अतः सिद्धान्तकी प्रक्रियाको प्रकट
करनेके लिए मोक्षमार्गके निर्देशके सम्बन्धसे आनुपूर्वी क्रमसे शास्त्रकी रचनाका प्रारम्भ करते हुए
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” यह सूत्र कहा है । यहाँ शिष्य और आचार्यका सम्बन्ध
१. मुखम् । तत्-आ०, अ० । २. -त्वात् खरविषाणवत् । बुद्ध्या-मु० । ३. 'नवानामात्मविशेषगुणानामत्य-
न्तोच्छित्तिर्मोक्षः ।' -प्रश० व्यो० पृ० ६३८ । ४. इति च । तदपि दि० १, अ० । ५. 'यस्मिन् न जातिर्न
जरा न मृत्युर्न व्याधयो नाप्रियसंप्रयोगः । नेच्छाविपन्नप्रियविप्रयोगः क्षेमं पदं नैष्ठिकमच्युतं तत् ॥ दीपो यथा
निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न कांचिद्विदिशं न कांचित् स्नेहक्षयात् केवलमेति
शान्तिम् ॥' -सौन्दर० १६।२७-२९ । 'प्रदीपस्येव निर्वाणं विमोक्षस्तस्य चेतसः ।' -प्र० वार्तिकालं०
१।४५ । ६. -षाणवत्कल्पना -आ०, दि० १ दि० २. अ० मु० । ७. -वत् । एवं व्यस्तज्ञानादि -दि० १,
दि० २ मु० ।
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प्रथमोऽध्यायः ३

विवक्षित नहीं है। किन्तु आचार्यको इच्छा संसारसागरमें निमग्न प्राणियोंके उद्धार करनेको
हुई। परन्तु मोक्षमार्गके उपदेशके बिना उनके हितका उपदेश नहीं दिया जा सकता, अतः मोक्ष-
मार्गके व्याख्यानकी इच्छासे यह सूत्र कहा।' मालूम होता है कि इस उल्लेख-द्वारा राजवार्तिक-
कारने तत्त्वार्थाधिगमभाष्यकी उत्थानिकाका निर्देश किया है। तत्त्वार्थाधिगमभाष्यमें इसी आशयकी
उत्थानिका पायी जाती है। श्रुतसागरसूरिने भी अपनी श्रुतसागरीमें यही बतलाया है किसी ५
शिष्यके प्रश्नके अनुरोधसे आचार्यवर्यने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की। यहाँ शिष्यका नाम द्वैयाक
दिया है। इससे मालूम होता है कि सर्वार्थसिद्धिकी यह मान्यता मुख्य है कि शिष्यके प्रश्नके
निमित्तसे तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है। आगे उत्थानिकामें मोक्षकी चर्चा आ जाने से थोड़ेमें
मोक्षतत्त्वकी मीमांसा की गयी है। जैनमान्यता तो यह है कि कर्म और आत्माके संयोगसे संसार
होता है। अतः कर्म, भावकर्म और नोकर्मके आत्मासे अलग हो जाने पर जो आत्माकी अपने १०
ज्ञानादि गुणरूप स्वाभाविक अवस्था प्राप्त होती है उसे मोक्ष कहते हैं। किन्तु अन्य प्रवादी लोग
इस प्रकारसे मोक्षतत्त्वका विश्लेषण करनेमें असमर्थ रहे। पूज्यपाद स्वामीने तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता
गृद्धपिच्छ आचार्यके मुखसे ऐसे तीन उदाहरण उपस्थित कराये हैं जिनके द्वारा मोक्षतत्त्वका
गलत तरीकेसे स्वरूप उपस्थित किया गया है। इनकी मीमांसा करते हुए सर्व प्रथम सांख्यमतकी
मीमांसा की गयी है। यद्यपि सांख्योंने आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीन १५
प्रकारके दुःखोंका सदाके लिए दूर हो जाना मोक्ष माना है, तथापि वे आत्माके स्वरूपको चैतन्य
मानते हुए भी उसे ज्ञानरहित मानते हैं। उनकी मान्यता है कि ज्ञानधर्म प्रकृतिका है तो भी
संसर्गसे पुरुष अपनेको ज्ञानवान् अनुभव करता है और प्रकृति अपनेको चेतन अनुभव करती है।
इसीसे यहाँ सांख्योंके मोक्ष तत्त्वकी आलोचना न करके पुरुष तत्त्वकी आलोचना की गयी है और
उसे असत् बतलाया गया है। दूसरा मत वैशेषिकोंका है। वैशेषिकोंने ज्ञानादि विशेष गुणोंका २०
आधार यद्यपि आत्माको माना है तथापि वे आत्मासे उनके अलग हो जानेको उसकी मुक्ति मानते
हैं। उनके यहाँ बतलाया है कि बुद्धि आदि विशेष गुणोंकी उत्पत्ति आत्मा और मनके संयोग रूप
असमवायी कारणसे होती है। मोक्ष अवस्थामें चूंकि आत्मा और मनका संयोग नहीं रहता अतः
वहाँ विशेष गुणोंका सर्वथा अभाव हो जाता है। उनके यहाँ सभी व्यापक द्रव्योंके विशेष गुण
क्षणिक माने गये हैं, इसलिए वे मोक्षमें ज्ञानादि विशेष गुणोंका अभाव होनेमें आपत्ति नहीं २५
समझते। अब यदि राग-द्वेष आदिकी तरह मुक्तावस्थामें आत्माको ज्ञानादि गुणोंसे भी रहित मान
लिया जाय तो आत्मा स्वतन्त्र पदार्थ नहीं ठहरता क्योंकि जिसका किसी भी प्रकारका विशेष
लक्षण नहीं पाया जाता वह वस्तु ही नहीं। यही कारण है कि इनकी मान्यताको भी असत् बतलाया
गया है। तीसरा मत बौद्धोंका है। बौद्धोंके यहाँ सोपधिशेष और निरुपधिशेष ये दो प्रकारके
निर्वाण माने गये हैं। सोपधिशेष निर्वाणमें केवल अविद्या, तृष्णा आदि रूप आस्रवोंका ही नाश ३०
होता है, शुद्ध चित्सन्तति शेष रह जाती है। किन्तु निरुपधिशेष निर्वाणमें चित्सन्तति भी नष्ट
हो जाती है। यहाँ मोक्षके इस दूसरे भेदको ध्यानमें रखकर उसको मीमांसा की गयी है। इस
सम्बन्धमें बौद्धोंका कहना है कि दीपकके बुझ देनेपर जिस प्रकार वह ऊपर नीचे दायें बायें आगे
पीछे कहीं नहीं जाता किन्तु वहीं शान्त हो जाता है। उसी प्रकार आत्माकी सन्तानका अन्त हो
जाना ही उसका मोक्ष है। इसके बाद आत्माकी सन्तान नहीं चलती, वह वहीं शान्त हो जाता ३५
है। बौद्धोंके इस तत्त्वकी मीमांसा करते हुए आचार्यने बतलाया है कि उनकी यह कल्पना असत्
ही है। इस प्रकार थोड़ेमें मोक्ष तत्त्वकी मीमांसा करके आचार्यने अन्तमें उसके कारण तत्त्वकी
मीमांसा की है। इस सिलसिले में केवल इतना ही लिखना है कि अधिकतर विविध मतवाले लोग
ज्ञान, दर्शन और चारित्र इनमें से एक-एकके द्वारा ही मोक्षकी सिद्धि मानते हैं। क्या सांख्य, क्या

§ ४. किं तर्हि । तत् त्रितयं समुदितमित्याह ।
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥
§ ५. सम्यगित्युव्युत्पन्नः शब्दो व्युत्पन्नो वा । अञ्चतेः क्वौ समञ्चतीति सम्यगिति¹ ।
अस्यार्थः प्रशंसा । स प्रत्येकं परिसमाप्यते । सम्यग्दर्शनं सम्यग्ज्ञानं सम्यक्चारित्रमिति । एतेषां
स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः । उद्देशमात्रं त्विदमुच्यते²-भावानां
याथात्म्यप्रतिपत्तिविषयश्रद्धानसंग्रहार्थं दर्शनस्य सम्यग्विभाषणम्? नहीं, सम्यग्विभाषणम्? नहीं, सम्यग्विभाषणम्? no, सम्यग्विभाषणम्? wait,
याथात्म्यप्रतिपत्तिविषयश्रद्धानसंग्रहार्थं दर्शनस्य सम्यग्विभाषणम्? नहीं -> सम्यग्विभाषणम्?

Wait, let's strictly write:
सम्यग्विभाषणम्? NO: सम्यग्वि + शेषणम् = सम्यग्विभाषणम्?
Wait, look at:
स - म्य - ग्वि - शे - ष - ण - म्
= सम्य

  • १।१ § ८ ] प्रथमोऽध्यायः ५
    ज्ञानम् । चरति चर्यतेऽनेन चरणमात्रं वा चारित्रम् । नन्वेवं स एव कर्ता स एव करणमित्यायातम् ।
    तच्च विरुद्धम् । सत्यं, स्वपरिणामपरिणामिनोर्भेदविवक्षायां तथाभिधानात् । यथाग्निर्दहतीन्धनं
    दाहपरिणामेन । उक्तः कर्त्रादिसाधनभावः पर्यायपर्यायिणोरेकत्वानेकत्वं प्रत्यनेकान्तोपपत्तौ
    स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्यविवक्षोपपत्तेरेकस्मिन्नप्यर्थे न विरुध्यते । अग्नौ दहनादिक्रियायाः कर्त्रादिसाधन-
    भाववत् । ५
    § ७. ज्ञानग्रहणमादौ न्याय्यं, दर्शनस्य तत्पूर्वकत्वात् अल्पाच्तरत्वाच्च । नैतद्युक्तं, युग-
    पदुत्पत्तेः । यदास्य दर्शनमोहस्योपशमात्क्षयात्क्षयोपशमाद्वा आत्मा सम्यग्दर्शनपर्यायेणाविर्भवति
    तदैव तस्य मत्यज्ञानश्रुताज्ञाननिवृत्तिपूर्वकं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं चाविर्भवति घनपटलबिगमे सवितुः
    प्रतापप्रकाशाभिव्यक्तिवत् । अल्पाच्तरादभ्यर्हितं पूर्वं निपतति । कथमभ्यर्हितत्वम् । ज्ञानस्य
    सम्यग्व्यपदेशहेतुत्वात् । चारित्रात्पूर्वं ज्ञानं प्रयुक्तं, तत्पूर्वकत्वाच्चारित्रस्य । १०
    § ८. सर्वकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः । तत्प्राप्त्युपायो मार्गः । मार्ग इति चैकवचननिर्देशः
    ज्ञान शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—जानाति ज्ञायते अनेन ज्ञप्तिमात्रं वा ज्ञानम् = जो जानता है,
    जिसके द्वारा जाना जाय या जानना मात्र । चारित्र शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—चरति चर्यतेऽ-
    नेन चरणमात्रं वा चारित्रम् = जो आचरण करता है, जिसके द्वारा आचरण किया जाय या
    आचरण करना मात्र । शंका—दर्शन आदि शब्दोंकी इस प्रकार व्युत्पत्ति करने पर कर्त्ता और १५
    करण एक हो जाता है किन्तु यह बात विरुद्ध है ? समाधान—यद्यपि यह कहना सही है तथापि
    स्वपरिणाम और परिणामीमें भेदकी विवक्षा होनेपर उक्त प्रकारसे कथन किया गया है। जैसे
    'अग्नि दाह परिणामके द्वारा ईंधनको जलाती है, यह कथनभेद विवक्षाके होनेपर ही बनता है।
    यहाँ चूँकि पर्याय और पर्यायीमें एकत्व और अनेकत्वके प्रति अनेकान्त है, अतः स्वातन्त्र्य और
    पारतन्त्र्य विवक्षाके होनेसे एक ही पदार्थमें पूर्वोक्त कर्त्ता आदि साधनभाव विरोधको प्राप्त नहीं २०
    होता । जैसे कि अग्निमें दहन आदि क्रियाकी अपेक्षा कर्त्ता आदि साधनभाव बन जाता है, वैसे ही
    प्रकृतमें जानना चाहिए।
    § ७. शंका—सूत्रमें पहले ज्ञानका ग्रहण करना उचित है, क्योंकि एक तो दर्शन ज्ञानपूर्वक
    होता है और दूसरे ज्ञानमें दर्शन शब्दकी अपेक्षा कम अक्षर हैं ? समाधान—यह कहना युक्त नहीं
    कि दर्शन ज्ञानपूर्वक होता है इसलिए सूत्रमें ज्ञानको पहले ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि दर्शन २५
    और ज्ञान एक साथ उत्पन्न होते हैं। जैसे मेघ-पटलके दूर हो जाने पर सूर्यके प्रताप और
    प्रकाश एक साथ व्यक्त होते हैं, उसी प्रकार जिस समय दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय और
    क्षयोपशम होनेसे आत्माकी सम्यग्दर्शन पर्याय व्यक्त होती है उसी समय उसके मत्यज्ञान और
    श्रुताज्ञानका निराकरण होकर मतिज्ञान और श्रुतज्ञान प्रकट होते हैं। अब जो यह कहा गया
    है कि दर्शनकी अपेक्षा ज्ञानमें कम अक्षर हैं अतः उसे सूत्रमें सर्वप्रथम ग्रहण करना चाहिए ३०
    सो यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा नियम है कि सूत्रमें अल्प अक्षरवाले शब्दसे पूज्य
    शब्द पहले रखा जाता है, अतः पहले ज्ञान शब्दको न रखकर दर्शन शब्दको रखा है।
    शंका—सम्यग्दर्शन पूज्य क्यों है ? समाधान—क्योंकि सम्यग्दर्शनसे ज्ञानमें समीचीनता आती है ।
    चारित्रके पहले ज्ञानका प्रयोग किया है, क्योंकि चारित्र ज्ञानपूर्वक होता है।
    § ८. सब कर्मोंका जुदा होना मोक्ष है और उसकी प्राप्तिका उपाय मार्ग है। सूत्रमें 'मार्गः' ३५
    १. -रित्रम् । उक्तः कर्त्रा-आ०, ता० न० । २. कर्त्रादिभिः सा मु० । ३. 'अल्पाच्तरम् ।' -पा० २।२।३४ ।
    ४. -टलविरामे स-आ०, अ०, दि० १, दि० २ । ५. 'अभ्यर्हितं च पूर्वं निपततीति ।'-पा० म० सा०
    २।२।२।३४ ।

६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।२ § ९-
समस्तस्य¹ मार्गभावज्ञापनार्थः । तेन व्यस्तस्य मार्गत्वनिवृत्तिः कृता भवति । अतः सम्यग्दर्शनं
सम्यग्ज्ञानं सम्यक्चारित्रमित्येतत् त्रितयं समुदितं मोक्षस्य साक्षान्मार्गो वेदितव्यः ।
§ ९. तत्रादावुद्दिष्टस्य सम्यग्दर्शनस्य लक्षणनिर्देशार्थमिदमुच्यते—
तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥
५ § १०. तत्त्वशब्दो भावसामान्यवाची । कथम् । तदिति सर्वनामपदम् । सर्वनाम च सामान्ये
वर्तते । तस्य भावस्तत्त्वम् । तस्य कस्य । योऽर्थो यथावस्थितस्तथा तस्य भवनमित्यर्थः । अर्थत³
इस प्रकार जो एकवचन रूपसे निर्देश किया है वह, सब मिलकर मोक्षमार्ग है, इस बातके जतानेके
लिए किया है । इससे प्रत्येकमें मार्गपन है इस बातका निराकरण हो जाता है । अतः सम्यग्दर्शन,
सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्षका साक्षात् मार्ग है ऐसा जानना चाहिए ।
१० विशेषार्थ—पूर्व प्रतिज्ञानुसार इस सूत्रमें मोक्षमार्गका निर्देश किया गया है। सम्यग्दर्शन
सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्षका साक्षात् मार्ग है यह इस सूत्रका तात्पर्य
है। इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए सर्वार्थसिद्धिमें मुख्यतया पाँच विशेषताओं पर प्रकाश
डाला गया है जो इस प्रकार हैं—१. दर्शन आदिके पहले 'सम्यक्' विशेषण देनेका कारण ।
२. दर्शन आदि शब्दों का व्युत्पत्त्यर्थ । ३. एक ही पदार्थ अपेक्षाभेदसे कर्ता और करण कैसे
१५ होता है इसका निर्देश । ४. सूत्रमें सर्व प्रथम दर्शन, तदनन्तर ज्ञान और अन्तमें चारित्र
शब्द क्यों रखा है इसका कारण । ५. सूत्रमें 'मोक्षमार्गः' यह एकवचन रखने का कारण ।
तीसरी विशेषताको स्पष्ट करते हुए जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि जैन शासनमें
पर्याय पर्यायीमें सर्वथा भेद न मानकर कथंचित् भेद और कथंचित् अभेद माना गया है इसलिए
अभेद विवक्षाके होनेपर कर्ता साधन बन जाता है और भेद विवक्षाके होनेपर करण साधन
२० बन जाता है । आशय यह है कि जब अभेद विवक्षित होता है तब आत्मा स्वयं ज्ञानादि
रूप प्राप्त होता है और जब भेद विवक्षित होता है तब आत्मासे ज्ञान आदि भिन्न प्राप्त होते हैं ।
चौथी विशेषताको स्पष्ट करते हुए जो यह लिखा है कि जिस समय दर्शनमोहका उपशम, क्षय
और क्षयोपशम होकर आत्माकी सम्यग्दर्शन पर्याय व्यक्त होती है उसी समय उसके मत्यज्ञान और
श्रुताज्ञानका निराकरण होकर मतिज्ञान और श्रुतज्ञान प्रकट होते हैं । सो यह आपेक्षिक वचन
२५ हैं। वैसे तो दर्शनमोहनीयका क्षय सम्यग्दृष्टि ही करता है मिथ्यादृष्टि नहीं, अत दर्शन मोहनीयके
क्षयके समय मत्यज्ञान और श्रुताज्ञानके सद्भावका प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता, क्योंकि दर्शन-
मोहनीयकी क्षपणाके समय इस जीवके मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ही पाये जाते हैं । इसी प्रकार जो
सम्यग्दृष्टि जीव वेदकसम्यक्त्वको उत्पन्न करता है उसके भी यही क्रम जान लेना चाहिए । शेष
व्याख्यान सुगम है ।
३० § ९. अब आदिमें कहे गये सम्यग्दर्शनके लक्षणका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
अपने अपने स्वरूपके अनुसार पदार्थोंका जो श्रद्धान होता है वह सम्यग्दर्शन है ॥२॥
§ १०. तत्त्व शब्द भाव सामान्यका वाचक है, क्योंकि 'तत्' यह सर्वनाम पद है और
सर्वनाम सामान्य अर्थमें रहता है अतः उसका भाव तत्त्व कहलाया । यहाँ 'तत्' पदसे कोई भी
३५ पदार्थ लिया गया है। आशय यह है कि जो पदार्थ जिस रूपसे अवस्थित है उसका उस रूप होना
१. समस्तमार्ग-आ०, दि० १, दि० २ । २. किं पुनस्तत्त्वम् । तद्भावस्तत्त्वम् ।' पा० स० आ० पृ०५९ ।
३. अर्ध्यते आ० दि० २ ।

  • १२ § १२ ] प्रथमोऽध्यायः ७
    इत्यर्थो निश्चीयत इति यावत् । तत्त्वेनार्थस्तत्त्वार्थः । अथवा भावेन भाववतोऽभिधाम्, तदव्य-
    तिरेकात् । तत्त्वमेवार्थस्तत्त्वार्थः । तत्त्वार्थस्य श्रद्धानं तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं प्रत्येत्तव्यम् ।
    तत्त्वार्थश्च वक्ष्यमाणो जीवादिः ।
    § ११. दृशेरालोकार्थत्वात् श्रद्धानार्थगतिर्नोपपद्यते । धातूनामनेकार्थत्वाददोषः । प्रसिद्धार्थ- ५
    त्यागः कुत इति चेन्मोक्षमार्गप्रकरणात् । तत्त्वार्थश्रद्धानं ह्यात्मपरिणामो मोक्षसाधनं युज्यते,
    भव्यजीवविषयत्वात् । आलोकस्तु चक्षुरादिनिमित्तः सर्वसंसारिजीवसाधारणत्वान्न मोक्षमार्गो
    युक्तः ।
    § १२. अर्थश्रद्धानमिति चेत्सर्वार्थप्रसङ्गः । तत्त्वश्रद्धानमिति चेद्भावमात्रप्रसङ्गः । 'सत्ता-
    द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि तत्त्वम्' इति कैश्चित्कल्यत इति । तत्त्वमेकत्वमिति वा सर्वैक्यग्रहण-
    प्रसङ्गः । 'पुरुष एवेदं सर्वम्' इत्यादि कैश्चित्कल्यत इति । एवं सति दृष्टेष्टविरोधः । तस्माद्व्य- १०
    भिचारार्थमुभयोपादानम् । तद् द्विविधं, सरागवीतरागविषयभेदात् प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्य-
    भिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम् । आत्मविशुद्धिमात्रमितरत् ।
    यही यहाँ तत्त्व शब्दका अर्थ है । अर्थ शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है-अर्थते निश्चीयते इत्यर्थः =
    जो निश्चय किया जाता है । यहाँ तत्त्व और अर्थ इन दोनों शब्दोंके संयोगसे तत्त्वार्थ शब्द बना
    है जो 'तत्त्वेन अर्थस्तत्त्वार्थः' ऐसा समास करने पर प्राप्त होता है । अथवा भाव-द्वारा भाववाले १५
    पदार्थका कथन किया जाता है, क्योंकि भाव भाववाले से अलग नहीं पाया जाता । ऐसी हालतमें
    इसका समास होगा 'तत्त्वमेव अर्थः तत्त्वार्थः' ।
    § ११. शंका-दर्शन शब्द 'दृशि' धातुसे बना है जिसका अर्थ आलोक है, अतः इससे
    श्रद्धानरूप अर्थका ज्ञान नहीं हो सकता है ? समाधान-धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं, अतः 'दृशि'
    धातुका श्रद्धान रूप अर्थ करने में कोई दोष नहीं है । शंका-यहाँ 'दृशि' धातुका प्रसिद्ध अर्थ २०
    क्यों छोड़ दिया है ? समाधान-मोक्षमार्गका प्रकरण होने से । तत्त्वार्थोंका श्रद्धानरूप जो आत्मा-
    का परिणाम होता है वह तो मोक्षका साधन बन जाता है, क्योंकि वह भव्योंके ही पाया जाता
    है, किन्तु आलोक चक्षु आदिके निमित्तसे होता है जो साधारण रूपसे सब संसारी जीवोंके
    पाया जाता है अतः उसे मोक्षमार्ग मानना युक्त नहीं ।
    § १२. शंका-सूत्रमें 'तत्त्वार्थश्रद्धानम्' के स्थानमें 'अर्थश्रद्धानम्' इतना कहना पर्याप्त है ? २५
    समाधान-इससे अर्थ शब्दके धन, प्रयोजन और अभिधेय आदि जितने भी अर्थ हैं उन सबके
    ग्रहणका प्रसंग आता है जो युक्त नहीं है, अतः 'अर्थश्रद्धानम्' केवल इतना नहीं कहा है । शंका-
    तब 'तत्त्वश्रद्धानम्' इतना ही ग्रहण करना चाहिए ? समाधान - इससे केवल भाव मात्रके ग्रहणका
    प्रसंग प्राप्त होता है । कितने ही लोग ( वैशेषिक ) तत्त्व पदसे सत्ता, द्रव्यत्व, गुणत्व और कर्मत्व
    इत्यादिका ग्रहण करते हैं । अब यदि सूत्रमें 'तत्त्वश्रद्धानम्' इतना ही रहने दिया जाता है तो ३०
    इससे इन सबका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है जो युक्त नहीं है । अथवा तत्त्व शब्द
    एकत्ववाची है इसलिए सूत्रमें केवल तत्त्व पदके रखने से 'सब एक हैं' इस प्रकार स्वीकार करनेका
    प्रसंग प्राप्त होता है । 'यह सब दृश्य व अदृश्य जग पुरुषस्वरूप ही है' ऐसा किन्हींने माना भी है ।
    इस तरह इस प्रकार भी सूत्रमें केवल 'तत्त्वश्रद्धानम्' रखना युक्त प्रतीत नहीं होता । किन्तु ऐसा
    मानने पर प्रत्यक्ष और अनुमानसे विरोध आता है, अतः इन सब दोषोंके दूर करने के लिए सूत्रमें ३५
    'तत्त्व' और 'अर्थ' इन दोनों पदोंका ग्रहण किया है । सम्यग्दर्शन दो प्रकार का है-सराग
    सम्यग्दर्शन और वीतराग सम्यग्दर्शन । प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य आदि की
    अभिव्यक्ति लक्षणवाला सराग सम्यग्दर्शन है और आत्माकी विशुद्धिमात्र वीतराग सम्यग्दर्शन है ।
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विशेषार्थ—इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनके लक्षणका निर्देश करते हुए बतलाया है कि जीवादि
पदार्थोंके श्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते हैं। इस सूत्रकी व्याख्या करते हुए टीकामें मुख्यतया
चार बातोंको स्पष्ट किया है। वे चार बातें ये हैं—(१) तत्त्व और अर्थ शब्दके निरुक्त्यर्थका
निर्देश करके तत्त्वार्थ शब्द कैसे निष्पन्न हुआ है? (२) 'दृशि' धातुका अर्थ श्रद्धान करना
क्यों लिया गया है? (३) तत्त्व और अर्थ इन दोनों पदोंको स्वीकार करनेसे क्या लाभ है?
(४) सम्यग्दर्शनके कितने भेद हैं और उनका क्या स्वरूप है? प्रकृतमें यद्यपि 'तत्' सर्वनाम
पद है और 'त्व' प्रत्यय भाव अर्थमें होता है अतः 'तत्त्व' शब्द भाव सामान्यका वाचक है
और अर्थपद द्रव्यवाची है। तथापि अर्थ शब्दके धन, प्रयोजन, अभिधेय, निवृत्ति, विषय,
प्रकार और वस्तु आदि अनेक अर्थ पाये जाते हैं अतः इन सबका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन
न कहलावे, इसलिए तो सूत्रकारने सूत्रमें केवल अर्थपद नहीं रखा है। और इसी प्रकार
विभिन्न मतोंमें तत्त्व शब्दके भी अनेक अर्थ प्रसिद्ध हैं। वैशेषिक लोग 'तत्त्व' पदसे सत्ता,
द्रव्यत्व, गुणत्व और कर्मत्वका ग्रहण करते हैं। उनके यहाँ सामान्य और विशेष ये दोनों
स्वतन्त्र पदार्थ माने गये हैं। अब यदि सूत्रमें केवल 'तत्त्व' पद रखा जाता है तो सत्ता, द्रव्यत्व,
गुणत्व और कर्मत्व इनका श्रद्धान करना भी सम्यग्दर्शन समझा जा सकता है जो युक्त नहीं है
इसलिए सूत्रकारने सूत्रमें केवल तत्त्वपद नहीं रखा है। इसी प्रकार परमब्रह्मवादियोंने नाना
तत्त्वोंको न मानकर एक ही तत्त्व माना है। उनके मतसे यह जग एक पुरुषरूप ही है इसलिए इस
हिसाबसे विचार करनेपर 'तत्त्व' पद एक तत्त्ववाची प्राप्त होता है जो युक्त नहीं है, इसलिए भी
सूत्रकारने सूत्रमें केवल तत्त्वपद नहीं रखा है। यहाँ तत्त्वार्थसे जीवादिक वे सब पदार्थ लिये गये
हैं जिनका आगे चौथे सूत्रमें वर्णन किया है। इनका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है यह इस सूत्रका
तात्पर्य है। यद्यपि सम्यग्दर्शनमें दर्शन शब्द है जिसका अर्थ आलोक होता है तथापि यहाँ इसका
श्रद्धान अर्थ लिया गया है क्योंकि दर्शनका आलोक अर्थ लेनेपर चक्षु आदिके निमित्तसे होनेके
कारण वह साधारणतः सब संसारी जीवोंके पाया जाता है, अतः प्रकृतमें वह उपयोगी नहीं ठहरता ।
किन्तु तत्त्वार्थ विषयक श्रद्धान भव्योमें भी किसी-किसी आसन्नभव्यके ही पाया जाता है जो
प्रकृतमें उपयोगी है अतः यहाँ दर्शनका अर्थ आलोक न करके श्रद्धान किया है। आशय यह है
कि छद्मस्थ जीव आत्माका साक्षात्कार नहीं कर सकते, क्योंकि इन्द्रिय और मनको सहायतासे
होनेवाला जितना भी क्षायोपशमिक ज्ञान है सावरण होनेसे रूपी पदार्थोंको ही जान सकता है।
यतः आत्मा अरूपी है अतः उसका क्षायोपशमिक ज्ञानके द्वारा साक्षात्कार नहीं हो सकता। किन्तु
छद्मस्थ जीव आगमानुसार आत्माका श्रद्धान करते हैं। उनका अमूर्त पदार्थविषयक समस्त
अनुभव आगमाश्रित है प्रत्यक्ष ज्ञानाश्रित नहीं। यही कारण है कि प्रकृतमें दर्शनका अर्थ श्रद्धान
किया है। सम्यग्दर्शनके सराग और वीतराग ऐसे दो भेद हैं। ये भेद पात्रकी अपेक्षासे किये गये
हैं। सरागी जीवके जो सम्यग्दर्शन होता है वह सराग सम्यग्दर्शन कहलाता है और वीतरागी
जीवके जो सम्यग्दर्शन होता है वह वीतराग सम्यग्दर्शन कहलाता है। किन्तु इससे सम्यग्दर्शनको
सराग और वीतराग मानना उचित नहीं है। क्योंकि सम्यग्दर्शन स्वयं न तो सराग ही होता है
और न वीतराग ही। सरागता और वीतरागताका सम्बन्ध तो कषायके सद्भाव और असद्भावसे
है। तथापि जिसके राग और द्वेषरूप प्रवृत्ति पायी जाती है उसके सम्यग्दर्शनजन्य आत्मविशुद्धि
प्रकट तो हो जाती है पर वह स्पष्टतः लक्षित नहीं होती। बाह्य प्रवृत्तिमें रागांश या द्वेषांशको
प्रधानता बनी रहती है। अतः सरागी जीवके सम्यग्दर्शनको सराग सम्यग्दर्शन कहा है
और वीतरागी जीवके सम्यग्दर्शनको वीतराग सम्यग्दर्शन कहा है। उपशम आदिके भेदसे
सम्यग्दर्शनके तीन भेद बतलाये हैं। इनमें-से वेदक सम्यग्दर्शन तो सराग अवस्थामें ही पाया

  • १३ § १९ ] प्रथमोऽध्यायः ९
    § १३. अथैतत्सम्यग्दर्शनं जीवादिपदार्थविषयं१ कथमुत्पद्यत इत्यत आह—
    तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥
    § १४. निसर्गः स्वभाव इत्यर्थः । अधिगमोऽर्थावबोधः । तयोर्हेतुत्वेन निर्देशः । कस्याः ।
    क्रियायाः । का च क्रिया । उत्पद्यत इत्यध्याह्रियते, सोपस्कारत्वात् सूत्राणाम् । २तदेतत्सम्यग्दर्शनं
    निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति । ५
    § १५. अत्राह-निसर्गजे सम्यग्दर्शनेऽर्थाधिगमः स्याद्वा न वा । यद्यस्ति, तदपि अधिगमजमेव
    नार्थान्तरम् । अथ नास्ति, कथमनवबुद्धतत्त्वस्यार्थश्रद्धानमिति । नैष दोषः । उभयत्र सम्यग्दर्शने,
    अन्तरङ्गे हेतुस्तुल्यो दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा । तस्मिन्सति यद्बाह्योपदेशादृते
    प्रादुर्भवति तन्नैसर्गिकम् । यत्परोपदेशपूर्वकं जीवाद्यधिगमनिमित्तं३ तदुत्तरम् । इत्यनयोर्यं भेदः ।
    जाता है, किन्तु शेष दो सम्यग्दर्शन सराग और वीतराग दोनों अवस्थाओंमें पाये जाते हैं । १०
    राजवार्तिकमें एक क्षायिक सम्यग्दर्शनको ही वीतराग सम्यग्दर्शन बतलाया है । सो यह आपेक्षिक
    कथन है । चारित्र-मोहनीयके क्षयसे होनेवाली वीतरागता क्षायिक सम्यग्दर्शनके सद्भावमें
    ही होती है, अन्यत्र नहीं । यही कारण है कि राजवार्तिकमें क्षायिक सम्यग्दर्शनको ही वीतराग
    सम्यग्दर्शन लिखा है । किन्तु कषायोंकी उपशमजन्य वीतरागता उपशम सम्यग्दर्शनके सद्भावमें
    भी प्रकट होती हुई देखी जाती है । इससे अन्यत्र इसे भी वीतराग सम्यग्दर्शन बतलाया है । १५
    प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य ये चार ऐसे चिह्न हैं जो सरागताके रहते हुए भी
    सम्यग्दर्शनके सद्भावके ज्ञापक हैं, अतः यहाँ सराग सम्यग्दर्शनके लक्षणमें इन धर्मोंको प्रमुखता
    दी गयी है । किन्तु वीतराग सम्यग्दर्शनमें आत्माकी परिणतिमें निर्मलता पायी जाती है।
    वहाँ रागांशका सर्वथा अभाव हो जाता है, अतः यहाँ वीतराग सम्यग्दर्शनको आत्माकी विशुद्धि-
    रूपसे लक्षित किया गया है । रागादिको तीव्रताका न होना प्रशमभाव है । संसारसे भीतरूप २०
    परिणामका होना संवेगभाव है । सब जीवोंमें दयाभाव रखना अनुकम्पा है और 'जीवादि पदार्थ
    हैं' ऐसी बुद्धिका होना आस्तिक्य.है ।
    § १३. जीवादि पदार्थोंको विषय करनेवाला यह सम्यग्दर्शन किस प्रकार उत्पन्न होता
    है । अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    वह ( सम्यग्दर्शन ) निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है ॥३॥ २५
    § १४. निसर्गका अर्थ स्वभाव है और अधिगमका अर्थ पदार्थका ज्ञान है । सूत्रमें इन
    दोनोंका हेतुरूपसे निर्देश किया है। शंका-इन दोनोंका किसके हेतुरूपसे निर्देश किया है ?
    समाधान—क्रियाके । शंका-वह कौन सी क्रिया है ? समाधान—'उत्पन्न होता है' यह क्रिया
    है । यद्यपि इसका उल्लेख सूत्रमें नहीं किया है तथापि इसका अध्याहार कर लेना चाहिए, क्योंकि
    सूत्र उपस्कार सहित होते हैं। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे और अधिगमसे उत्पन्न होता है यह इस ३०
    सूत्रका तात्पर्य है।
    § १५. शंका-निसर्गज सम्यग्दर्शनमें पदार्थोंका ज्ञान होता है या नहीं। यदि होता है तो
    वह भी अधिगमज ही हुआ उससे भिन्न नहीं । यदि नहीं होता है तो जिसने पदार्थोंको नहीं जाना
    है उसे उनका श्रद्धान कैसे हो सकता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं, क्योंकि दोनों सम्य-
    ग्दर्शनोंमें दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है। इसके रहते ३५
    हुए जो बाह्य उपदेशके बिना होता है वह नैसर्गिक सम्यग्दर्शन है और जो बाह्य उपदेशपूर्वक
    १. -षयं तत् कथं-आ०, दि० १, दि० २ । २. तदेव सम्य-आ०, दि० १, दि० २, अ० । ३. -मित्तं
    स्यात् तदु-मु० ।
    २
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१० सर्वार्थसिद्धौ [ १।३ § १६ -
§ १६. तद्ग्रहणं किमर्थम् । अनन्तरनिर्देशार्थम् । अनन्तरं सम्यग्दर्शनं तदित्यनेन निर्दिश्यते ।
इतरथा मोक्षमार्गोऽपि प्रकृतस्तस्याभिसंबन्धः स्यात् । ननु च 'अनन्तरस्य¹ विधिर्वा भवति प्रतिषेधो
वा' इत्यनन्तरस्य सम्यग्दर्शनस्य ग्रहणं सिद्धमिति² चेन्न, 'प्रत्यासत्तेः प्रधानं बलीयः' इति मोक्षमार्ग
एव संबध्येत । तस्मात्तद्वचनं क्रियते ।
§ १७. तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । अथ किं तत्त्वमित्यत इदमाह—
जीवादि पदार्थोंके ज्ञानके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है। यही इन दोनोंमें भेद है।
§ १६. शंका—सूत्रमें 'तत्' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—इस सूत्रसे पूर्व
सूत्रमें जिसका ग्रहण किया है उसका निर्देश करनेके लिए यहाँ 'तत्' पदका ग्रहण किया है।
अनन्तरवर्ती सूत्रमें सम्यग्दर्शनका ही उल्लेख किया है जो यहाँ 'तत्' इस पद-द्वारा निर्दिष्ट किया
गया है। यदि 'तत्' पद न देते तो मोक्षमार्गका प्रकरण होनेसे उसका यहाँ ग्रहण हो जाता ।
शंका—'अगले सूत्रमें जो विधि-निषेध किया जाता है वह अव्यवहित पूर्वका ही समझा जाता है'
इस नियमके अनुसार अनन्तरवर्ती सूत्रमें कहे गये सम्यग्दर्शनका ग्रहण स्वतः सिद्ध है, अतः सूत्रमें
'तत्' पद देनेकी आवश्यकता नहीं है ? समाधान—नहीं, क्योंकि 'समीपवर्तीसे प्रधान बलवान्
होता है' इस नियमके अनुसार यहाँ मोक्षमार्गका ही ग्रहण होता । किन्तु यह बात इष्ट नहीं है
अतः सूत्रमें 'तत्' पद दिया है।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिके निमित्तोंपर विचार किया गया है।
आगममें पांच लब्धियोंमें एक देशना लब्धि बतलायी है। जिस जीवको वर्त्तमान पर्यायमें या
पूर्व पर्यायमें कभी भी जीवादि पदार्थविषयक उपदेश नहीं मिला है उसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति
नहीं हो सकती। किन्तु जिस जीवको इस प्रकारके उपदेशका निमित्त मिल गया है उसे तत्काल
या कालान्तरमें सम्यग्दर्शन प्राप्त हो सकता है। यहाँ इसी अपेक्षासे सम्यग्दर्शनके दो भेद किये
गये हैं। जो सम्यग्दर्शन उपदेशके निमित्तसे होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है और जो बिना
उपदेशके होता है वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है यह इस सूत्रका भाव है। यद्यपि अधिगम शब्दका
अर्थ ज्ञान है तथापि प्रकृतमें इसका अर्थ परोपदेशपूर्वक होनेवाला ज्ञान लेना चाहिए। इसीसे
निसर्ग शब्दका अर्थ परोपदेशके बिना फलित हो जाता है। यद्यपि इन दोनों सम्यग्दर्शनोंका
दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय और क्षयोपशमरूप अन्तरंग कारण समान है तथापि बाह्य उप-
देश और अनुपदेशकी अपेक्षा इन दोनोंमें भेद है। यहाँ यह शंका उत्पन्न होती है कि क्षायिक
सम्यग्दर्शन जब कि केवली और श्रुतकेवलीके पादमूलमें ही होता है तब उसमें सम्यग्दर्शनका
निसर्गज भेद न घटकर केवल अधिगमज यही भेद घट सकता है, फिर क्या कारण है कि
टीकामें अन्तरंग कारणोंका निर्देश करते समय उपशम और क्षयोपशमके साथ क्षयका भी
निर्देश किया है। सो इस शंकाका यह समाधान है कि दूसरे और तीसरे नरकसे आकर जो जीव
तीर्थंकर होते हैं उनके लिए क्षायिक सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें परोपदेशकी आवश्यकता नहीं होती,
किन्तु परोपदेशके बिना ही उनके क्षायिक सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती हुई देखी जाती है अतः क्षायिक
सम्यग्दर्शनमें भी निसर्गज और अधिगमज ये दो भेद घट जाते हैं। यही कारण है कि प्रकृतमें
तीनों प्रकारके सम्यग्दर्शनोंको निसर्गज और अधिगमजके भेदसे दो-दो प्रकारका बतलाया है।
§ १७. जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है यह पहले कह आये हैं। अब तत्त्व
कौन-कौन हैं इस बातके बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वेति ।'–पा० म० भा० पृ० ३३५। परि० शे० पृ० ३६० ।
२. सिद्धं प्रत्या-दि० १, दि० २, आ०, अ० ।