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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 558 में से

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पृष्ठ 127
  • ११६ § २४ ] प्रथमोऽध्यायः १५
    श्रुतवेर्जम् । श्रुतं पुनः स्वार्थं भवति परार्थं च । ज्ञानात्मकं स्वार्थं वचनात्मकं परार्थम् । तद्विकल्पा
    नयाः२ । अत्राह - नयशब्दस्य अल्पाच्तरत्वात्पूर्वनिपातः प्राप्नोति । नैष दोषः । अभ्यर्हितत्वात्प्रमा-
    णस्यै पूर्वनिपातः । अभ्यर्हितत्वं च सर्वतो बलीयः । कुतोऽभ्यर्हितत्वम् । नयप्ररूपणप्रभवयोनित्वात् ।
    एवं ह्युक्तं "प्रगृह्य प्रमाणतः परिणतिविशेषादर्थावधारणं नयः" इति । सकलविषयत्वाच्च
    प्रमाणस्य । तथा चोक्तं - "सकलादेशः प्रमाणाधीनो विकलादेशो नयाधीनः" इति । नयो द्विविधो ५
    द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च । पर्यायार्थिकनयेनँ भावतत्त्वमधिगन्तव्यम् । इतरेषां त्रैयाणां द्रव्यार्थिक-
    नयेन, सामान्यात्मकत्वात् । द्रव्यमर्थः प्रयोजनमस्येत्यसौ द्रव्यार्थिकः । पर्यायोऽर्थः प्रयोजनमस्येत्यसौ
    पर्यायार्थिकः । तत्सर्वं समुदितं प्रमाणेनाधिगन्तव्यम् ।
    कहेंगे । प्रमाणके दो भेद हैं- स्वार्थ और परार्थ । श्रुतज्ञानको छोड़कर शेष सब ज्ञान स्वार्थ प्रमाण
    हैं। परन्तु श्रुतज्ञान स्वार्थ और परार्थ दोनों प्रकारका है। ज्ञानात्मक प्रमाणको स्वार्थ प्रमाण १०
    कहते हैं और वचनात्मक प्रमाण परार्थ प्रमाण कहलाता है। इनके भेद नय हैं। शंका-नय
    शब्दमें थोड़े अक्षर हैं इसलिए सूत्रमें उसे पहले रखना चाहिए ? समाधान - यह कोई दोष नहीं,
    क्योंकि प्रमाण श्रेष्ठ है अतः उसे पहले रखा है। 'श्रेष्ठता सबसे बलवती होती है' ऐसा नियम है।
    शंका- प्रमाण श्रेष्ठ क्यों है ? समाधान - क्योंकि प्रमाणसे ही नयप्ररूपणाकी उत्पत्ति हुई है, अतः
    प्रमाण श्रेष्ठ है। आगममें ऐसा कहा है कि वस्तुको प्रमाणसे जानकर अनन्तर किसी एक अवस्था- १५
    द्वारा पदार्थका निश्चय करना नय है । दूसरे प्रमाण समग्रको विषय करता है। आगममें भी इस
    प्रकार कहा है कि 'सकलादेश प्रमाणका विषय है और विकलादेश नयका विषय है।' इसलिए भी
    प्रमाण श्रेष्ठ है।
    नयके दो भेद हैं- द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक । पर्यायार्थिक नयका विषय भावनिक्षेप है
    और शेष तीनको द्रव्यार्थिक नय ग्रहण करता है, क्योंकि द्रव्यार्थिक नय सामान्यरूप है। द्रव्य २०
    जिसका प्रयोजन है वह द्रव्यार्थिकनय है और पर्याय जिसका प्रयोजन है वह पर्यायार्थिक नय है।
    तथा द्रव्य और पर्याय ये सब मिल कर प्रमाणके विषय हैं।
    विशेषार्थ- इस सूत्रमें ज्ञानके प्रमाण और नय ऐसे भेद करके उनके द्वारा जीवादि
    पदार्थोंका ज्ञान होता है यह बतलाया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए टीकामें मुख्यतया
    चार बातों पर प्रकाश डाला गया है- (१) ज्ञानके पाँच भेदोंमें-से किस ज्ञानका प्रमाण और २५
    नय इनमें-से किसमें अन्तर्भाव होता है। (२) नय शब्दमें अल्प अक्षर होनेपर भी सूत्रमें
    प्रमाण शब्द पहले रखने का कारण । (३) नयके भेद करके चार निक्षेपोंमें-से कौन निक्षेप
    किस नयका विषय है इसका विचार । (४) प्रमाणके विषयकी चर्चा । प्रथम बातको स्पष्ट
    करते हुए जो कुछ लिखा है उसका आशय यह है कि ज्ञानके पाँच भेदोंमें-से श्रुतज्ञानके सिवा
    चार ज्ञान केवलज्ञानरूप तो माने ही गये हैं। साथ ही वे वितर्क रहित हैं इसलिए उनका ३०
    अन्तर्भाव प्रमाण ज्ञानमें ही होता है। किन्तु श्रुतज्ञान ज्ञान और वचन उभय रूप माना
    गया है। साथ ही वह सवितर्क है इसलिए इसके प्रमाणज्ञान और नयज्ञान ऐसे दो भेद हो
    जाते हैं। यहाँ यह शंका की जा सकती है कि श्रुतज्ञान यह शेष ज्ञानोंके समान ज्ञानका ही एक
    भेद है तो फिर इसे ज्ञान और वचन उभय रूप क्यों बतलाया है ? सो इसका यह समाधान है कि
    आगम द्रव्य श्रुतका अन्तर्भाव श्रुतमें किया जाता है इसलिए द्रव्य श्रुतको भी उपचारसे श्रुतज्ञान ३५
    कह दिया गया है। दूसरी बातको स्पष्ट करते हुए प्रमाणकी श्रेष्ठतामें दो हेतु दिये हैं। प्रथम हेतु
    तो यह दिया है कि नय प्ररूपणाकी उत्पत्ति प्रमाणज्ञानसे होती है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है। इसका
    १. वर्ज्यम् । श्रु-मु० । २. 'जावइया वयणवहा तावइया चेव होंति णयवाया।' -सन्मति० १।४७ ।
    ३. -णस्य तत्पूर्व- मु० । ४. -येन पर्यायत- मु० । ५. -रेषां नामस्थापनाद्रव्याणां द्रव्या-मु० ।