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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 558 में से

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पृष्ठ 124

१२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।४ § २० –
§ २०. तत्त्वशब्दो भाववाचीत्युक्तः । स कथं जीवादिभिर्द्रव्यवचनैः सामानाधिकरण्यं
प्रतिपद्यते । अव्यतिरेकात्तद्भावाध्यारोपाच्च सामानाधिकरण्यं भवति । यथा 'उपयोग एवात्मा'
इति । यद्येवं तत्तल्लिङ्गसंख्यानुवृत्तिः प्राप्नोति । "विशेषणविशेष्यसंबन्धे सत्यपि शब्दशक्ति-
व्यपेक्षया उपात्तलिङ्गसंख्याव्यतिक्रमो न भवति ।' अयं क्रम आदिसूत्रेऽपि योज्यः ।
§ २१. एवमेषामुद्दिष्टानां सम्यग्दर्शनादीनां जीवादीनां च संव्यवहारविशेषव्यभिचारनिवृ-
त्त्यर्थमाह—
जाता है। जैसे क्षत्रिय आये हैं और शूरवर्मा भी, यहाँ यद्यपि शूरवर्माका क्षत्रियोंमें अन्तर्भाव हो जाता
है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया है। इसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।
§ २०. शंका—तत्त्व शब्द भाववाची है यह पहले कह आये हैं इसलिए उसका द्रव्यवाची
जीवादि शब्दोंके साथ समानाधिकरण कैसे हो सकता है ? समाधान—एक तो भाव द्रव्यसे अलग
नहीं पाया जाता दूसरे भावमें द्रव्यका अध्यारोप कर लिया जाता है इसलिए समानाधिकरण बन
जाता है। जैसे, 'उपयोग ही आत्मा है' इस वचनमें गुणवाची उपयोग शब्दके साथ द्रव्यवाची
आत्मा शब्दका समानाधिकरण है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए। शंका—यदि ऐसा है तो
विशेष्यका जो लिंग और संख्या है वही विशेषणको भी प्राप्त होते हैं ? समाधान—व्याकरणका ऐसा
नियम है कि 'विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और
संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन नहीं होता ।' अतः यहाँ विशेष्य और विशेषणके लिंग और
संख्याके अलग-अलग रहने पर भी कोई दोष नहीं है। यह क्रम प्रथम सूत्रमें भी लगा लेना चाहिए ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें सात तत्त्वोंका निर्देश किया गया है। इसकी व्याख्या करते हुए,
मुख्यतया पाँच बातोंपर प्रकाश डाला गया है। जो इस प्रकार हैं—(१) जीवादि सात तत्त्वोंका
स्वरूप-निर्देश। (२) सूत्रमें जीव, अजीव इस क्रमसे सात तत्त्वोंके निर्देश करनेकी सार्थकता ।
(३) पुण्य और पापको पृथक् तत्त्व नहीं माननेका कारण । (४) भाववाची शब्दोंका द्रव्यवाची
शब्दोंके साथ कैसे सामानाधिकरण्य बनता है इसकी सिद्धि । (५) विशेषण और विशेष्यमें
समान लिंग और समान संख्या क्यों आवश्यक नहीं इसका निर्देश । तीसरी बातको स्पष्ट करते
हुए जो लिखा है उसका आशय यह है कि जीवकी शुभाशुभ प्रवृत्तिके आधारसे बँधनेवाले कर्मोंमें
अनुभागके अनुसार पुण्य-पापका विभाग होता है इसलिए आस्रव और बन्धमें इनका अन्तर्भाव
किया गया है। पाँचवीं बातको स्पष्ट करते हुए जो यह लिखा है कि विशेषण-विशेष्य सम्बन्धके
रहते हुए भी शब्द शक्तिकी अपेक्षा जिसने जो लिंग और संख्या प्राप्त कर ली है उसका उल्लंघन
नहीं होता । सो इसका यह आशय है कि एक तो जिस शब्दका जो लिंग है वह नहीं बदलता ।
उदाहरणार्थ 'ज्ञानं आत्मा' इस प्रयोगमें ज्ञान शब्द नपुंसक लिंग और आत्मा शब्द पुँल्लिंग रहते
हुए भी इनमें बदल नहीं होता । इन दोनों शब्दोंका विशेषण विशेष्य रूपसे जब भी प्रयोग किया
जायेगा तब वह इसी प्रकार ही किया जायेगा। दूसरे प्रयोगके समय जिस शब्दने जो संख्या प्राप्त
कर ली है उसमें भी बदल नहीं होता। जैसे 'साधोः कार्यं तपःश्रुते' इस प्रयोगमें विशेषण विशेष्य
सम्बन्धके रहते हुए भी 'कार्यम्' एकवचन है और 'तपःश्रुते' द्विवचन है। इसी प्रकार प्रकृतमें
जानना चाहिए । शेष कथन सुगम है।
§ २१. इस प्रकार पहले जो सम्यग्दर्शन आदि और जीवादि पदार्थ कहे हैं उनका शब्द
प्रयोग करते समय जो गड़बड़ो होती है उसको दूर करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. 'आविष्टलिङ्गा जातिर्यल्लिङ्गमुपादाय प्रवर्तते उत्पत्तिप्रभृत्या विनाशान्न तल्लिङ्गं जहाति ।' पा० १।२।२५३।
अन्येऽपि वै गुणवचना नावश्यं द्रव्यस्य लिङ्गसंख्ये अनुवर्तन्ते ।-पा० म० भा० ५।१।१।५९ ।