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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 558 में से

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पृष्ठ 128

१६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।७ § २५ -
§ २५. एवं प्रमाणनयैरधिगतानां जीवादीनां पुनरप्यधिगमोपायान्तरप्रदर्शनार्थमाह—
निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥
§ २६. निर्देशः स्वरूपाभिधानम् । स्वामित्वमाधिपत्यम् । साधनमुत्पत्तिनिमित्तम् । अधि-
करणमधिष्ठानम् । स्थितिः कालपरिच्छेदः । विधानं प्रकारः । तत्र सम्यग्दर्शनं किमिति प्रश्ने
तत्त्वार्थश्रद्धानमिति निर्देशो नामादिर्वा¹ कस्येत्युक्ते सामान्येन जीवस्य । विशेषेण गत्यनुवादेन
नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकाणां पर्याप्तिकानामौपशमिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । प्रथमायां
पृथिव्यां पर्याप्तापर्याप्तिकानां क्षायिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । तिर्यग्गतौ तिर्यञ्चां पर्याप्तकाना-
• आशय यह है कि जो पदार्थ प्रमाणके विषय हो गये हैं उन्हींमें नयकी प्रवृत्ति व्यवहारका कारण
माना गया है अन्यमें नहीं, अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । दूसरा हेतु यह दिया है कि सकलादेश प्रमाणके
अधीन है और विकलादेश नयके अधीन है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । सो इसका यह आशय है कि
प्रमाण समुदायको विषय करता है और नय अवयवको विषय करता है अतः प्रमाण श्रेष्ठ है । जो
वचन कालादिककी अपेक्षा अभेदवृत्तिकी प्रधानतासे या अभेदोपचारसे प्रमाणके द्वारा स्वीकृत
अनन्त धर्मात्मक वस्तुका एक साथ कथन करता है उसे सकलादेश कहते हैं । और जो वचन
कालादिककी अपेक्षा भेदवृत्तिकी प्रधानतासे या भेदोपचारसे नयके द्वारा स्वीकृत वस्तु धर्मका
क्रमसे कथन करता है उसे विकलादेश कहते हैं । इनमें-से प्रमाण सकलादेशी होता है और नय
विकलादेशी, अतः प्रमाण श्रेष्ठ माना गया है यह उक्त कथन का तात्पर्य है । तीसरी बातको स्पष्ट
करते हुए नयके द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ऐसे दो भेद करके जो नामादि तीन निक्षेपोंको द्रव्या-
र्थिक नयका और भाव निक्षेपको पर्यायार्थिक नयका विषय बतलाया है सो इसका यह अभिप्राय है
कि नाम, स्थापना और द्रव्य ये तीनों निक्षेप सामान्य रूप हैं अतः इन्हें द्रव्यार्थिक नयका विषय
बतलाया है और भावनिक्षेप पर्याय रूप है अतः इसे पर्यायार्थिक नयका विषय बतलाया
है । यहाँ इतना विशेष जानना कि नामको सादृश्य सामान्यात्मक माने बिना शब्दव्यवहारकी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती है इसलिए नाम निक्षेप द्रव्यार्थिक नयका विषय है और जिसकी जिसमें
स्थापना की जाती है उनमें एकत्वका अध्यवसाय किये बिना स्थापना नहीं बन सकती है, इसलिए
स्थापना द्रव्यार्थिक नयका विषय है । शेष कथन सुगम है ।
§ २५. इस प्रकार प्रमाण और नयके द्वारा जाने गये जीवादि पदार्थोंके जाननेके दूसरे
उपाय बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधानसे सम्यग्दर्शन आदि विषयोंका
ज्ञान होता है ॥७॥
§ २६. किसी वस्तुके स्वरूपका कथन करना निर्देश है । स्वामित्वका अर्थ आधिपत्य है ।
जिस निमित्तसे वस्तु उत्पन्न होती है वह साधन है । अधिष्ठान या आधार अधिकरण है । जितने
काल तक वस्तु रहती है वह स्थिति है और विधानका अर्थ प्रकार या भेद है । 'सम्यग्दर्शन क्या
है । यह प्रश्न हुआ इस पर 'जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है' ऐसा कथन करना
निर्देश है या नामादिकके द्वारा सम्यग्दर्शनका कथन करना निर्देश है । सम्यग्दर्शन किसके होता
है ? सामान्यसे जीवके होता है और विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब
पृथिवियोंमें पर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । पहली
पृथिवीमें पर्याप्तक और अपर्याप्तक नारकियोंके औपशमिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता
है । तिर्यंचगतिमें पर्याप्तक तिर्यंचोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । क्षायिक और क्षायोपशमिक
१. -दिर्वा । सम्यग्दर्शनं क-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri