सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- १५ § २२ ] प्रथमोऽध्यायः १३
नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ॥५॥
§ २२. अतद्गुणे वस्तुनि संव्यवहारार्थं 'पुरुषकारात्रियुज्यमानं संज्ञाकर्म नाम । काष्ठपुस्तकचित्र-
कर्माक्षनिक्षेपादिषु सोऽयमिति स्थाप्यमाना स्थापना । गुणैर्गुणान्वा द्रुतं गतं गुणैर्द्रोष्यते गुणान्द्रोष्य-
तीति वा द्रव्यम् । वर्तमानतत्पर्यायोपलक्षितं द्रव्यं भावः । तद्यथा, नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो ५
भावजीव इति चतुर्धा जीवशब्दार्थो न्यस्यते । जीवनगुणमनपेक्ष्य यस्य कस्यचिन्नाम क्रियमाणं नाम
जीवः । अक्षनिक्षेपादिषु जीव इति वा मनुष्यजीव इति वा व्यवस्थाप्यमानः स्थापनाजीवः । द्रव्य-
जीवो द्विविधः आगमद्रव्यजीवो नोआगमद्रव्यजीवश्चेति । तत्र जीवप्राभृतज्ञायी मनुष्यजीवप्राभृत-
ज्ञायी वा अनुपयुक्त आत्मा आगमद्रव्यजीवः । नोआगमद्रव्यजीवस्त्रेधा व्यवतिष्ठते ज्ञायकशरीर-
भावि-तद्व्यतिरिक्तभेदात् । तत्र ज्ञातुर्यच्छरीरं त्रिकालगोचरं तज् ज्ञायकशरीरम् । सामान्यापेक्षया १०
नोआगमभाविजीवो नास्ति, जीवनसामान्यस्य सदापि विद्यमानत्वात् । विशेषापेक्षया त्वस्ति ।
गत्यन्तरे जीवो व्यवस्थितो मनुष्यभव२प्राप्तिं प्रत्यभिमुखो मनुष्यभाविजीवः । तद्व्यतिरिक्तः
कर्मनोकर्मविकल्पः । भावजीवो द्विविधः आगमभावजीवो नोआगमभावजीवश्चेति । तत्र जीवप्राभृत-
विषयोपयोगाविष्टो मनुष्यजीवप्राभृतविषयोपयोगयुक्तो वा आत्मा आगमभावजीवः । जीवनपर्यायेण
मनुष्यजीवत्वपर्यायेण वा समाविष्ट आत्मा नोआगमभावजीवः । एवमितरेषामपि पदार्थानां३
नामादिनिक्षेपविधिर्नियोज्यः । स किमर्थः । अप्रकृतनिराकरणाय प्रकृतनिरूपणाय च । निक्षेप- १५
नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव रूपसे उनका अर्थात् सम्यग्दर्शन आदि और जीव आदिका
न्यास अर्थात् निक्षेप होता है ॥५॥
§ २२. संज्ञाके अनुसार गुणरहित वस्तुमें व्यवहारके लिए अपनी इच्छासे की गयी संज्ञाको
नाम कहते हैं। काष्ठ कर्म, पुस्तककर्म, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेप आदिमें 'यह वह है' इस प्रकार
स्थापित करनेको स्थापना कहते हैं। जो गुणोंके द्वारा प्राप्त हुआ था या गुणोंको प्राप्त हुआ था २०
अथवा जो गुणोंके द्वारा प्राप्त किया जायेगा या गुणोंको प्राप्त होगा उसे द्रव्य कहते हैं । वर्तमान
पर्यायसे युक्त द्रव्यको भाव कहते हैं । विशेष इस प्रकार है—नाम जीव, स्थापना जीव, द्रव्य जीव,
और भाव जीव इस प्रकार जीव पदार्थका न्यास चार प्रकारसे किया जाता है। जीवन गुणकी
अपेक्षा न करके जिस किसीका 'जीव' ऐसा नाम रखना नाम जीव है। अक्षनिक्षेप आदिमें यह
‘जीव है' या 'मनुष्य जीव है' ऐसा स्थापित करना स्थापना जीव है । द्रव्य जीवके दो भेद हैं— २५
आगम द्रव्य जीव और नोआगम द्रव्य जीव । इनमें-से जो जीवविषयक या मनुष्य जीवविषयक
शास्त्रको जानता है किन्तु वर्तमानमें उसके उपयोगसे रहित है वह आगम द्रव्य जीव है। नोआगम
द्रव्य जीवके तीन भेद हैं—ज्ञायक शरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त । ज्ञाताके शरीरको ज्ञायक
शरीर कहते हैं। जीवन सामान्यकी अपेक्षा 'नोआगम भावी जीव' यह भेद नहीं बनता, क्योंकि
जीवमें जीवत्व सदा पाया जाता है। हाँ पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा 'नोआगम भावी जीव' यह भेद ३०
बन जाता है क्योंकि जो जीव दूसरी गतिमें विद्यमान है वह जब मनुष्य भवको प्राप्त करनेके लिए
सम्मुख होता है तब वह मनुष्य भावि जीव कहलाता है। तद्व्यतिरिक्तके दो भेद हैं कर्म और
नोकर्म । भाव जीवके दो भेद हैं—आगम भाव जीव और नोआगम भाव जीव । इनमें-से जो
आत्मा जीवविषयक शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है अथवा मनुष्य जीवविषयक
शास्त्रको जानता है और उसके उपयोगसे युक्त है वह आगम भाव जीव कहलाता है । तथा ३५
जीवन पर्याय या मनुष्य जीवन पर्यायसे युक्त आत्मा नोआगम भाव जीव कहलाता है । इसी
प्रकार अजीवादि अन्य पदार्थोंकी भी नामादि निक्षेप विधि लगा लेना चाहिए । शंका—निक्षेप
१. पुरुषाका-मु० । २. -ष्यभाव-आ०, दि० २ । ३. -र्थनामजीवानां नामा-मु० ।