सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- १।४ § १९ ] प्रथमोऽध्यायः ११
जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥४॥
§ १८. तत्र चेतनालक्षणो जीवः । सा^१ च ज्ञानादिभेदादनेकधा भिद्यते । तद्विपर्ययलक्षणो-
ऽजीवः । शुभाशुभकर्मागमद्वाररूप आस्रवः । आत्मकर्मणोरन्योऽन्यप्रदेशानुप्रवेशात्मको बन्धः ।
आस्रवनिरोधलक्षणः संवरः । एकदेशकर्मसंक्षयलक्षणा निर्जरा । कृत्स्नकर्मवियोगलक्षणो मोक्षः ।
एषां प्रपञ्च उत्तरत्र वक्ष्यते । सर्वस्य फलस्यात्माधीनत्वाददौ जीवग्रहणम् । तदुपकारार्थत्वात्तद- ५
नन्तरमजीवाभिधानम् । तदुभयविषयत्वात्तदनन्तरमास्रवग्रहणम् । तत्पूर्वकत्वात्तदनन्तरं बन्धाभि-
धानम् । संवृतस्य बन्धाभावात्तत्प्रत्यनीकप्रतिपत्त्यर्थं^३ तदनन्तरं संवरवचनम् । संवरे सति निर्जरो-
पपत्तेस्तदन्तिके निर्जरावचनम् । अन्ते प्राप्यत्वान्मोक्षस्यान्ते वचनम् ।
§ १९. इह पुण्यपापग्रहणं^४ कर्त्तव्यम् । 'नव पदार्थाः' ^५इत्यन्यैरप्युक्तत्वात् । न कर्त्तव्यम्,
आस्रवे बन्धे चान्तर्भावात् । यद्येवमास्रवादिविग्रहणमनर्थकं, जीवाजीवयोरन्तर्भावात् । नानर्थकम् । १०
इह मोक्षः प्रकृतः । सोऽवश्यं निर्देष्टव्यः । स च संसारपूर्वकः । संसारस्य प्रधानहेतुरास्रवो बन्धश्च ।
मोक्षस्य प्रधानहेतुः संवरो निर्जरा च । अतः प्रधानहेतुहेतुमत्फलनिदर्शनार्थत्वात्पृथगुपदेशः कृतः ।
दृश्यते हि सामान्येऽन्तर्भूतस्यापि विशेषस्य^७ पृथगुपादानं प्रयोजनार्थम् । 'क्षत्रिया आयाताः शूरवर्मा-
ऽपि' इति ।
जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्व हैं ॥४॥ १५
§ १८. इनमें-से जीवका लक्षण चेतना है जो ज्ञानादिकके भेदसे अनेक प्रकारकी है । जीवसे
विपरीत लक्षणवाला अजीव है । शुभ और अशुभ कर्मोंके आनेके द्वार रूप आस्रव है । आत्मा और
कर्मके प्रदेशोंका परस्पर मिल जाना बन्ध है । आस्रवका रोकना संवर है । कर्मोंका एकदेश अलग
होना निर्जरा है और सब कर्मोंका आत्मासे अलग हो जाना मोक्ष है । इनका विस्तारसे वर्णन आगे
करेंगे । सब फल जीवको मिलता है अतः सूत्रके प्रारम्भमें जीवका ग्रहण किया है । अजीव जीव- २०
का उपकारी है यह दिखलाने के लिए जीवके बाद अजीवका कथन किया है । आस्रव जीव और
अजीव दोनोंको विषय करता है अतः इन दोनोंके बाद आस्रवका ग्रहण किया है । बन्ध आस्रव
पूर्वक होता है इसलिए आस्रवके बाद बन्धका कथन किया है । संवृत जीवके बन्ध नहीं होता,
अतः संवर बन्धका उलटा हुआ । इस बातका ज्ञान करानेके लिए बन्धके बाद संवरका कथन किया
है । संवरके होनेपर निर्जरा होती है इसलिए संवरके पास निर्जरा कही है । मोक्ष अन्तमें प्राप्त २५
होता है इसलिए उसका अन्तमें कथन किया है ।
§ १९. शंका—सूत्रमें पुण्य और पापका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पदार्थ नौ हैं ऐसा
दूसरे आचार्योंने भी कथन किया है । समाधान—पुण्य और पापका ग्रहण नहीं करना चाहिए,
क्योंकि उनका आस्रव और बन्धमें अन्तर्भाव हो जाता है । शंका—यदि ऐसा है तो सूत्रमें अलगसे
आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक है, क्योंकि उनका जीव और अजीवमें अन्तर्भाव हो जाता ३०
है । समाधान—आस्रव आदिका ग्रहण करना निरर्थक नहीं है । क्योंकि यहां मोक्षका प्रकरण है
इसलिए उसका कथन करना आवश्यक है । वह संसारपूर्वक होता है और संसारके प्रधान कारण
आस्रव और बन्ध हैं तथा मोक्षके प्रधान कारण संवर और निर्जरा हैं अतः प्रधान हेतु, हेतुवाले
और उनके फलके दिखलानेके लिए अलग-अलग उपदेश किया है । देखा भी जाता है कि किसी
विशेषका सामान्यमें अन्तर्भाव हो जाता है तो भी प्रयोजनके अनुसार उसका अलगसे ग्रहण किया ३५
१. जीवः । स च-आ० दि० २ । २. विप्रयोग-मु० । ३. -त्त्यर्थं संवर-आ०, दि० १, दि० २ अ० ।
४. -हणं च कर्त-मु० । ५. कुन्दकुन्दाद्यैः । ६. -ष्यं तयोरास्र- मु० । ७. -षस्य यथोपयोगं पृथ-मु० ।