संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
शब्द संग्रह ८७
ज्यौँ गच काँच विलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की ॥४
टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की ॥५१
कहँ लग कहौं कुचाल कृपा-निधि, जानत हौ गति जन की ६
तुलसिदास प्रभु हरौ दुसह दुख, लाज करो निज पन की ॥७
(१५)
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्रीरघुनाथ कृपालु कृपा तैं, सन्त सुभाव गहौंगो ॥ १ ॥
जथा लाभ सन्तोष सदा, काहू सौं कछु न चहौंगो ।
परहित परत निरन्तर मन, क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥२॥
परुष२ बचन अति दुसह३ श्रवन सुनि, तेहि पावक न दहौंगो।
विगत४ मान सम सीतल मन, परगुन नहिँ दोष कहौंगो ३
परिहरि देह-जनित५ चिन्ता दुख, सुख सम बुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि के, अविचल भक्ति लहौंगो ॥४
॥ उपदेश ॥
(१)
जा के प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ॥१॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरथ महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज बनिता, भये जग मंगलकारी ॥२॥
नाते नेह राम के मनियत, सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥३॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित, पूज्य प्रान तैं प्यारो ।
जा सौं होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारो ॥४॥
(१) जैसे शीशा की गच में अज्ञान बाज़ चिड़िया (श्येन) अपने शरीर की
छाया देख कर दूसरी चिड़िया का भ्रम कर के अपने मुँह (आनन) में घाव
(छति) लगने का डर छोड़ कर भूख बस टूट पड़ता है। (२) कट्टु, कड़ा ।
(३) असह, सहने योग्य नहीं । (४) मृत, बीता हुआ । (५) देह से उत्पन्न हुई ।
८८ गुसाईँ तुलसीदासजी
(२)
राम राम राम जीह१, जौ लौं तू न जपिहै ।
तौ लौं तू कहूँ जाय तिहूँ ताप तपिहै ॥ १ ॥
सुरसरि२ तीर बिनु नीर दुख पाइहै ।
सुरतरु३ तर तोहिँ दुख दारिद सताइहै ॥ २ ॥
जागत बागत४ सुख सपने न सोइहै ।
जनम जनम जुग जुग जग रोइहै ॥ ३ ॥
छूटिबे के जतन बिसेष बाँध्यो जायगो ।
ह्वैहै बिष भोजन जो सुधा५ सानि खायगो ॥ ४ ॥
तुलसी बिलोक तिहूँ काल तो सैं दीन को ।
राम नाम ही की गति जैसे जल मीन को ॥ ५ ॥
(३)
स्त्री रघुबीर की यह बानि६ ।
नीच हूँ सौँ करत नेह सो, प्रीति मन अनुमानि ॥१॥
परम अधम निषाद पामर, कौन ता की कानि ।
लियो सो उर लाय सुत ज्योँ, प्रेम को पहिचानि ॥२॥
गोध कौन दयालु जो, बिधि रच्यो हिंसा सानि ।
जनक ज्योँ रघुनाथ ता को, दियो जल निज पानि७ ॥३॥
प्रकृति मलिन कुजाति सबरी, सकल अवगुन खानि ।
खात ता के दिये फल, अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥
रजनिचर अरु रिपु बिभीषन, सरन आयो जानि ।
भरत ज्योँ उठि ताहि भेंटत, देह दसा भुलानि ॥५॥
कौन सौम्य८ सुसील बानर६, जिनहिँ सुमिरत हानि ।
किये ते सब सखा पूजे, भवन अपने आनि ॥६॥
(१) जीभ । (२) गंगा । (३) कल्प वृक्ष । (४) चलते । (५) अमृत । (६) सुभाव ।
(७) जैसे कोई पिता को अपने हाथ से तिलांजुली देता है। (८) रुचिर, दिल-
पसंद । (६) बन्दर ।
शब्द संग्रह ८६
राम सहज कृपाल कोमल, दीन-हित दिन-दानि ।
भजहि ऐसे प्रभुहिं तुलसी, कुटिल कपट न ठानि ॥७॥
(४)
जागु जागु जीव जड़ जोहे जग जामिनी ।
देह गेह नेह जानि जैसे घन दामिनी ॥१॥१
सोवत सपने सहै संसृति सन्ताप रे ।
बूभयो मृग-वारि खायो जेवरि को साँप रे२ ॥ २॥
कहे बेद बुध३ तू तो बूझ मन माहिँ रे ।
दोष दुख सपने के जागे ही पै जाहिँ रे ॥ ३ ॥
तुलसी जागेँ तैं जाय ताप तिहुँ ताय रे ।
राम नाम सुचि४ रुचि५ सहज सुभाय रे ॥४॥
(५)
सवैया
अपराध अगाध भये जन तैं, अपने उर आनत नाहिँन जू ॥
गनिका गज गोध अजामिल के, गनि पातक पुंज सराहिन जू
लिये बारक६ नाम सुधाम दियो, जेहि धाम महा मुनि जाहिँ न जू॥
तुलसी भजु दीनदयालहिँ रे, रघुनाथ अनाथ हिँ दाहिन७जू
(६)
सवैया
सो जननी सो पिता सोइ भ्रात, सो भामिनि सो सुत सो हित मेरो ॥
सोई सगा सो सखा सोइ सेवक, सो गुरु सो सुर साहिब चेरो ॥
सो तुलसी प्रिय प्रान समान, कहाँ लौं बनाय कहौँ बहुतेरो ॥
जो तजि देह को गेह को नेह, सनेह सौँ राम को होय सबेरो ॥
(१) हे जीव जो घोर निद्रा में सोय रहा है जाग कर रात्रि रूप जग को देख
जहाँ देह और घर की प्रीत बादल में बिजली के समान छिन-भंगी है। (२) नींद
की दशा में तू संसार सम्बन्धी कष्ट भोगता है जो मृग-जल और रस्सी के साँप
की नाईँ केवल भ्रम रूप है। (३) पंडित । (४) पवित्र । (५) प्रिय लगे । (६) एक
बार । (७) दाहिने = सहायक ।
१७
६० दादू दयाल
॥ मिश्रित ॥
ममता तू न गई मेरे मन तैं ॥ टेक ॥
पाके केस जन्म के साथी, लाज गई लोकन तैं ।
तन थोके कर करूपन लागे, जोति गई नैनन तैं ॥ १ ॥
सरवन वचन न सुनत काहु के, बल गये सब इंद्रिन तैं ।
टूटे दसन बचन नहिं आवत, सोभा गई मुखन तैं ॥२॥
कफ पित बात कंठ पर बैठे, सुत हिँ बुलावत कर तैँ ।
भाइ बन्धु सब परम पियारे, नारि निकारत घर तैं ॥३॥
जैसे ससि मंडल बिच स्याही, छुटे न कोटि जतन तैं ।
तुलसिदास बलि जाउँ चरन के, लोभ पराये धन तैं ॥४॥
दादू दयाल
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो पृष्ठ ७६ संतवानी संग्रह भाग १ ]
॥ सर्व समरथ ॥
जिनि सत छाड़ै बावरे, पूरिक है पूरा ।
सिरजे की सब चिंत है,१ देवे कौँ सूरा ॥ टेक ॥
गर्भ बास जिन राखिया, पावक थैं न्यारा ।
जुगति जतन करि सीँचिया, दे प्राण अधारा ॥ १ ॥
कुंज कहाँ घरि संचरै,२ तहँ को रखवारा ।
हेम हरत जिन राखिया,३ सो खसम हमारा ॥ २ ॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सब कौँ पूरै ।
संपट सिला मैं देत है, काहे नर झूरै४ ॥ ३ ॥
(१) उसे सारी रचना की चिंता है। (२) अंडे को सेवै—कहते हैं कि कुंज
चिड़िया दूर रह कर सुरत से अंडे को सेती है। (३) श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को हिमालय
पर्वत पर बर्फ़ में गलने से बचा लिया था। (४) मालिक दो पत्थरों की संधि
मे बंद जीव जंतु की ख़बर लेता है तो हे नर तू क्यों सोच करता है।
शब्द संग्रह ६१
जिन यहु भार उठाइया, निरवाहै सोई ।
दादू छिन न बिसारिये, ता थैं जीवन होई ॥ ४ ॥
॥ नाम और सुमिरन ॥
(१)
नाँउ रे नाँउ रे, सकल सिरोमणि नाँउ रे,
मैं बलिहारी जाऊँ रे ॥ टेक ॥
दूतर तारै पारि उतारै, नरक निवारै नाँउ रे ॥ १ ॥
तारणहारा भौजल पारा, निर्मल सारा नाँउ रे ॥ २ ॥
नूर दिखावै तेज मिलावै, जोति जगावै नाँउ रे ॥ ३ ॥
सब सुख दाता अमृत राता, दादू माता नाँउ रे ॥ ४ ॥
(२)
मनाँ भजि राम नाम लीजे ।
साध संगति सुमिरि सुमिरि, रसना रस पीजे ॥ टेक ॥
साधू जन सुमिरण करि, केते जपि जागे ।
अगम निगम अमर किये, काल कोइ न लागे ॥ १ ॥
नीच ऊँच चिंतन करि, सरणागति लीये ।
भगति मुकति अपणी गति, ऐसैं जन कीये ॥ २ ॥
केते तिरि तीर लागे, बंधन भव छूटे ।
कलिमल विष जुग जुग के, राम नाम खूटे¹ ॥ ३ ॥
भरम करम सब निवारि, जीवन जपि सोई ।
दादू दुख दूर-करण, दूजा नहिं कोई ॥ ४ ॥
॥ चितावनी ॥
(१)
मन रे राम बिना तन छीजै ।
जब यहु जाइ मिलै माटी मैं, तब कहु कैसैं कीजै ॥टेक॥
पारस परसि कंचन करिलीजै, सहज सुरति सुखदाई ।
माया बेलि बिषै फल लागे, ता परि भूलिन भाई ॥१॥
(१) दूर किये, खतम किये ।
६२ दादू दयाल
जब लग प्राण प्यंड है नीका, तब लग ताहि जिनि भूलै ।
यहु संसार सैंबल१ कै सुख ज्यूँ, ता पर तूँ जिनि फूलै ॥२॥
औसर येह जानि जग जीवन, समझि देखि सचु पावै ।
अंग अनेक आन मति भूलै, दादू जिनि दहकावै२ ॥३॥
(२)
सजनी रजनी घटती जाइ ।
पल पल छीजै अवधि दिन आवै, अपनौँ लाल मनाइ ॥टेक
अति गति नींद कहा सुख सोवै, यहु औसर चलि जाइ ।
यहु तन बिछुरैं बहुरि कहँ पावै, पीछैं ही पछिताइ ॥१॥
प्राणपति जागै सुंदरि क्यौं सोवै, उठि आतुर गहि पाँइ ।
कोमल बचन करुणा करि आगैँ, नख सिख रहु लपटाइ ॥२॥
सखी सुहाग सेज सुख पावै, प्रीतम प्रेम बढ़ाइ ।
दादू भाग बड़े पिव पावै, सकल सिरोमणि राइ ॥ ३ ॥
(३)
कागा रे करंक परि बोलै ।
खाइ माँस अरु लगहीं३ डोलै ॥ टेक ॥
जा तन कौँ रचि अधिक सँवारा ।
सो तन ले माटी मैं डारा ॥ १ ॥
जा तन देखि अधिक नर फूले ।
सो तन छाड़ि चल्या रे भूले ॥ २ ॥
जा तन देखि मन मैं गरबाना ।
मिलि गया माटी तजि अभिमाना ॥ ३ ॥
(१) सेमर एक वृक्ष होता है जिस के बड़े सुंदर लाल फूल देख कर सुवा
मगन होता है पर फल पर चोंच मारने से केवल रुई उसके भीतर से निकलती है।
(२) ठगावै । (३) निकट ।
शब्द संग्रह ६३
दादू तन की कहा बड़ाई ।
निमख माहिँ माटी मिलि जाई ॥ ४ ॥
॥ विरह ॥
(१)
कौण विधि पाइये रे, मीत हमारा सोइ ॥ टेक ॥
पास पीव परदेस है रे, जब लग प्रगटै नाहिं ।
बिन देखे दुख पाइये, यहु सालै मन माहिँ ॥ १ ॥
जब लग नैन न देखिये, परगट मिलै न आइ ।
एक सेज संगहि रहै, यहु दुख सह्या न जाइ ॥ २ ॥
तब लग नेड़े दूरि है, जब लग मिलै न मोहिँ ।
नैन निकट नहिँ देखिये, संगि रहे क्या होइ ॥ ३ ॥
कहा करौँ कैसे मिलै रे, तलफै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी, कारण अपने पीव ॥ ४ ॥
(२)
अजहुँ न निकसै प्राण कठोर ॥ टेक ॥
दरसन बिना बहुत दिन बीते, सुंदर प्रीतम मोर ॥ १ ॥
चारि पहर चारौँ जुग बीते, रैनि गँवाई भोर ॥ २ ॥
अवधि गई अजहूँ नहिँ आये, कतहूँ रहे चित चोर ॥३॥
कबहूँ नैन निरखि नहिँ देखे, मारग चितवत तोर ॥४॥
दादू ऐसे आतुर विरहणि, जैसे चंद चकोर ॥ ५ ॥
(३)
कतहूँ रहे हो बिदेस, हरि नहिँ आये हो ।
जनम सिरानी जाइ, पिव नहिँ पाये हो ॥ टेक ॥
बिपति हमारी जाइ, हरि सौँ को कहै हो ।
तुम्ह बिन नाथ अनाथ, बिरहनि क्यूँ रहै हो ॥ १ ॥
६४ दादू दयाल
पिव के बिरह बियोग, तन की सुधि नहिँ हो ।
तलफि तलफि जिव जाइ, मिरतक ह्वै रही हो ॥ २ ॥
दुखित ' भई हम नारि, कब हरि आवैँ हो ।
तुम्ह बिन प्राण-अधार, जिव दुख पावै हो ॥ ३ ॥
प्रगटहु दीनदयाल, बिलम न कीजै हो ।
दादू दुखी बेहाल, दरसन दीजै हो ॥ ४ ॥
(४)
आवौ राम दया करि मेरे, बार बार बलिहारी तेरे ॥टेक॥
बिरहनि आतुर पंथ निहारै, राम राम कहि पीव पुकारै ॥१
पंथी बूझै मारग जोवै, नैन नीर जल भरि भरि रोवै ॥२॥
निस दिन तलफै रहै उदास, आतम राम तुम्हारे पास ॥३॥
बप१ बिसरै तन की सुधि नाहीं, दादू बिरहनि मिरतक माहीं२॥४
॥ प्रेम ॥
(१)
बाला सेज हमारी रे, तूँ आव हौँ वारी रे,
हौँ दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥
तेरा पंथ निहारूँ रे, सुन्दर सेज सँवारूँ रे,
जियरा तुम पर वारूँ रे ॥ १ ॥
तेरा अँगना पेखौँ रे, तेरा मुखड़ा देखौँ रे,
तब जीवन लेखौँ रे ॥ २ ॥
मिलि सुखड़ा दीजै रे, यह लाहड़ा३ लीजै रे,
तुम देखैँ जीजै रे ॥ ३ ॥
तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रगड़े राती रे,
दादू वारणै जाती रे ॥ ४ ॥
(१) शरीर । (२) मन की तरंगें मर गई हैं । (३) लाभ ।
शब्द संग्रह ४५
(२)
अरे मेरा अमर उपावणहार रे, खालिक आसिक तेरा॥टेक
तुम सौँ राता तुम सौँ माता, तुम सौँ लागा रंग रे खालिक॥१
तुम सौँ खेला तुम सौँ मेला, तुम सौँ प्रेस सनेह रे खालिक॥२
तुम सौँ लेणा तुम सौँ देणा, तुम्हीं सौँ रत होइ रे खालिक ३
खालिक मेरा आसिक तेरा, दादू अनत न जाइ रे खालिक॥४
(३)
हरि रस माते मगन भये।
सुमिरि सुमिरि भये मतवाले, जामण मरण सब भूलि गये॥टेक
निर्मल भगति प्रेम रस पीवैँ, आन न दूजा भाव धरैँ।
सहजैँ सदा राम रंगि राते, मुकति बैकुंठै कहा करैँ ॥१॥
गाड गाइ रस लीन भये हैं, कछू न माँगैँ संत जनाँ।
और अनेक देहु दत आगैँ, आन न भावै राम बिनाँ ॥२॥
इकटग ध्यान रहैँ ल्यौ लागे, छाकि परे हरि रस पीवैँ।
दादू मगन रहैँ रसिमाते, ऐसैँ हरि के जन जीवैँ ॥ ३ ॥
(४)
तेरे नाँउ की बलि जाऊँ, जहाँ रहैँ जिस ठाऊँ ॥ टेक ॥
तेरे बैनौं की बलिहारी, तेरे नैनहुँ ऊपरि वारी।
तेरी मूरति की बलि कीती, वारि वारि हौं दीती ॥१॥
सोभित नूर तुम्हारा, सुंदर जोति उजारा।
मीठा प्राण-पियारा, तूँ है पीव हमारा ॥ २ ॥
तेज तुम्हारा कहिये, निर्मल काहे न लहिये।
दादू बलि बलि तेरे, आव पिया तूँ मेरे ॥ ३ ॥
६६ दादू दयाल
॥ विनय ॥
(१)
पार नहिँ पाइये रे राम बिना को निरबाहणहार ॥टेक॥
तुम बिन तारण को नहीं, दूभर¹ यहु संसार ।
पैरत थाके केसवा, सूझै वार न पार ॥ १ ॥
बिखम भयानक भौजला, तुम बिन भारी होइ ।
तूँ हरि तारण केसवा, दूजा नाहीं कोइ ॥ २ ॥
तुम बिन खेवट को नहीं, अतिर² तिखो नहिँ जाइ ।
औघट भेरा³ डूबिहै, नाहीं आन उपाइ ॥ ३ ॥
यहु घट औघट बिखम है, डूबत माहिँ सरीर ।
दादू काइर राम बिन, मन नहिँ बाँधै धीर ॥ ४ ॥
(२)
हमारे तुम्हौँ हौ रखपाल ।
तुम बिन और नहीं कोइ मेरे, भौ दुख मेटणहार ॥टेक॥
बैरी पंच निमष नहिँ न्यारे, रोकि रहे जम काल ।
हा जगदीस दास दुख पावै, स्वामी करो सँभाल ॥ १ ॥
तुम बिन राम दहैँ ये दुंदर, दसौँ दिसा सब साल ।
देखत दीन दुखी क्यौँ कीजे, तुम हौ दीनदयाल ॥ २ ॥
निर्भय नाँव हेत हरि दीजे, दरसन परसन लाल ।
दादू दीन लीन करि लीजे, मेटहु सबै जँजाल ॥ ३ ॥
(३)
क्यौँ बिसरै मेरा पीव पियारा ।
जीव की जीवन प्राण हमारा ॥ टेक ॥
क्यौँकर जीवै मीन जल बिछुरैँ, तुम बिन प्राण सनेही ।
च्यंतामणि जब कर थैँ छूटै, तब दुख पावै देही ॥ १ ॥
(१) कठिन । (२) तैरने के योग्य नहीं । (३) बेड़ा ।
शब्द संग्रह ९७
बाला बालक दूध न देवै, सो कैसैं करि पीवै ।
निर्धन का धन अनत भुलाना, सो कैस करि जीवै ॥२॥
बरखहु राम सदा सुख अमृत, नीझर निर्मल धारा ।
प्रेम पियाला भरि भरि दीजै, दादू दास तुम्हारा ॥३॥
(२)
तौ निबहै जन सेवक तेरा, ऐसैं दया करि साहिब मेरा॥टेक
ज्यूँ हम तोरैं त्यूँ तूँ जोरे, हम तोरैं पै तूँ नहिं तोरै ॥१॥
हम बिसरैं त्यूँ तूँ न बिसारै, हम बिगरैं पै तूँ न बिगारै ॥२॥
हम भूलैं तूँ आनि मिलावै, हम बिछुरैं तूँ अंगि लगावै ॥३॥
तुम साधै सो हम पै नाहीं, दादू दरसन देहु गुसाईं ॥४॥
॥ साध ॥
सोई साध सिरोमणी, गोबिंद गुण गावै ।
राम भजै बिखिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक ॥
मिथ्या मुखि बोलै नहीं, पर-निंदा नाहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद आहीं ॥ १ ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समिता गहै, आपा नहिं आनै ॥ २ ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लैलीन बिचारा ॥ ३ ॥
निर्ले भजि न्यारा रहै, काहू लिपत न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ ४ ॥
॥ घट मठ ॥
(१)
भाई रे घर ही मैं घर पाया ।
सहजि समाइ रह्यौ ता माहीं, सतगुर खोज बताया ॥टेक
ता घर काज सबै फिरि आया, आपै आप लखाया ।
खोलि कपाट महल के दीन्हे, थिर असथान दिखाया ॥१॥
१३
६८ दादू दयाल
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
प्यंड परे जहाँ जिव जावै, ता मैं सहज समाया ॥ २ ॥
निहचल सदा चलै नहिं कबहूँ, देख्या सब में सोई ।
ताही सूँ मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥ ३ ॥
आदि अन्त सोई घर पाया, इब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, ता मैं रह्या समाई ॥ ४ ॥
(२)
आप आपण मैं खोजी रे भाई ।
बस्तु अगोचर गुरू लखाई ॥ टेक ॥
ज्यूँ मही बिलोयैँ माखण आवै ।
त्यूँ मन मथियाँ तैं तत पावै ॥ १ ॥
काठ हुतासन१ रह्या समाइ ।
त्यूँ मन माहिं निरंजन राइ ॥ २ ॥
ज्यूँ अवनी२ में नीर समाना ।
त्यूँ मन माहिँ साच सयाना ॥ ३ ॥
ज्यूँ दर्पन के नहिं लागै काई ।
त्यूँ मूरति माहिँ निरखि लखाई ॥ ४ ॥
सहजैं मन मथियाँ ते तत पाया ।
दादू उन तै आप लखाया ॥ ५ ॥
॥ सेवक ॥
तूँ साहिब मैं सेवग तेरा, भावै सिर दे सूली मेरा ॥ टेक ॥
भावै करवत सिर पर सारि, भावै लेकर गरदन मारि ॥ १ ॥
भावै चहुँ दिसि अगिन लगाइ, भावै काल दसौ दिसि खाइ २
भावै गिरवर गगन गिराइ, भावै दरिया माहिँ बहाइ ॥ ३ ॥
भावै कनक कसौटी देहु, दादू सेवग कसि कसि लेहु ॥ ४ ॥
(१) आग । (२) पृथ्वी ।
राग सारंग ६६
॥ उपदेश ॥
(१)
जिंदरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तजि बिकार ॥टेक॥
तूँ जिनि भूले मन गँवार, सिर भार न लीजै मानि हार ॥१॥
सुणि समझायौ बारवार, अजहूँ न चेतै हो हुसियार ॥२॥
करि तैसैं भव तिरिये पार, दादू इव थैं यहि बिचार ॥३॥
(२)
डरिये रे डरिये, परमेसुर थैं डरिये रे ।
लेखा लेवै भरि भरि देवै, ता थैं बुरा न करिये रे ॥टेक॥
साचा लीजी साचा दीजी, साचा सौदा कीजो रे ।
साचा राखी झूठा नाखी, विष ना पीजो रे ॥ १ ॥
निर्मल गहिये निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ २ ॥
साह पठाया वनिज न आया, जिनि डहकावै रे ।
झूठ न भावै फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला होइ सुहेला, सो कुछ कीजो रे ॥ ४ ॥
॥ मन ॥
(१)
मन चंचल मेरो कह्यौ न मानै, दसौँ दिसा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहिं लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥टेक॥
बेर बेर वरजत या मन कौँ, किंचित सीख न मानै रे ।
ऐसैं निकसि जात या तन थैं, जैसैं जीव न जानै रे ॥१॥
कोटिक जतन करत या मन कौँ, निहचल निमिष न होई रे ।
चंचल चपल चहूँ दिसि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥२॥
सदा सोच रहत घट भीतरि, मन थिर कैसैं कीजै रे ।
सहजैँ सहज साध की संगति, दादू हरि भजि लीजै रे ॥३॥
१०० दादू दयाल
(२)
मेरे तुम्हौं राखणहार, दूजा को नहीं ।
ये चंचल चहुँ दिसि जाइ, काल तहाँ तहाँ ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाइ, निहचल ना रहै ।
जहाँ बरजौं तहँ जाइ, मदमाता बहै ॥ १ ॥
जहाँ जाणै तहँ जाइ, तुम थैं ना डरै ।
ता स्यूँ कहा बसाइ, भावै त्यूँ करै ॥ २ ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुर अंकुस मानै नाहिं, निरभै ह्वै रह्या ॥ ३ ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूं राखै राखणहार, दादू तौ रहै ॥ ४ ॥
॥ जगत-मिथ्या ॥
मन रे तूँ देखै सो नाहीं, है सो अगम अगोचर माहीं ॥टेक
निस अँधियारी कछू न सूझै, संसै सरप दिखावा ।
ऐसैं अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी¹ खावा ॥ १ ॥
मृग-जल देखि तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आसा ।
जहँ जहँ जाइ तहाँ जल नाहीं, निहचै मरै पियासा ॥२॥
भरम बिलास बहुत बिधि कीन्हा, ज्यौं सुपिनैं सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाहीं, फिरि पीछैं पछितावै ॥३॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भरम बिलाना ।
दादू अंति इहाँ कुछ नाहीं, है सो सोधि सयाना ॥ ४ ॥
॥ करम धरम ॥
मूल सींचि बघै² ज्यूँ बेला । सो तत तरवर रहै अकेला ॥टेक॥
देवी देखत फिरैं ज्यूँ भूले । खाइ हलाहल बिख कौँ फूले ।
सुख कौँ चाहै पड़ै गल पासी³। देखत हीरा हाथ थैं जासी ॥१॥
(१) रस्सी । (२) बढ़ै । (३) फाँसी ।
केहू पूजा रचि ध्यान लगावैं । देवल देखैं खबरि न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी । इहि भ्रमि रहे भूलि अभिमानी ॥२
तीरथ बरत न पूजै१ आसा । बनखंडि जाहीं रहैं उदासा ।
यूँ तप करि करि देह जलावैं । भरमत डोलैं जनम गँवावैं ॥३
सतगुर मिलैं न संसा जाई । ये बंधन सब देइँ छुड़ाई ।
तब दादू परम गति पावै । सो निज मूरति माहिं लखावै ॥४
॥ कपट भक्ति ॥
हम पाया हम पाया रे भाई ।
भेष बनाइ ऐसी बनि आई ॥ टेक ॥
भीतर का यहु भेद न जानै ।
कहै सुहागनि ज्यूँ मन मानै ॥ १ ॥
अंतर पीव सौं परचा नाहीं ।
भई सुहागनि लोगन माहीं ॥ २ ॥
साँई सुपिनै कबहूँ न आवै ।
कहिया ऐसैं महल बुलावै ॥ ३ ॥
इन बातन मोहिं अचिरज आवै ।
पटम२ कियैं पिव कैसैं पावै ॥ ४ ॥
दादू सुहागनि ऐसैं कोई ।
आपा मेटि राम रत होई ॥ ५ ॥
॥ निंदक ॥
न्यंदक बाबा बीर हमारा । बिनहीं कौड़ै बहै विचारा३॥टेक
कर्म कोटि के कुसमल काटै । काज सँवारै बिनहीं साटै४ ॥१
आपण डूबै और कौं तारै । ऐसा प्रीतम पार उतारै ॥२॥
जुगि जुगि जीवौ न्यंदक मोरा । राम देव तुम करौ निहोरा ३
न्यंदक बपुरा पर-उपगारी। दादू न्यंद्या करै हमारी ॥४॥
(१) पूरन होय । (२) पाखंड । (३) बेचारा बिना पैसे [कौड़े] के काम करता
रहता है [बहै] । (४) बदला, मुआवज़ा ।
बाबा मलूकदास
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[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ६६]
॥ गुरुदेव ॥
हमरा सतगुरु बिरले जाने ।
सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै ॥ १ ॥
की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता ।
की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता ॥ २ ॥
हमरे गुरु की अदभुत लीला, ना कछु खाय न पीवै ।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै ॥ ३ ॥
बिन तरवर फल फूल लगावै, सो तो वा का चेला ।
छिन मैं रूप अनेक धरत है, छिन मैं रहै अकेला ॥ ४ ॥
बिन दीपक उँजियारा देखै, ऐँड़ी समुँद थहावै ।
चींटी के पग कुंजर बाँधै, जा को गुरु लखावै ॥ ५ ॥
बिन पंखन उड़ि जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवै ।
सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै ॥ ६ ॥
बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई ।
कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई ॥७॥
॥ नाम ॥
नाम तुम्हारा निरमला, निरमोलक हीरा ।
तू साहिब समरथ्थ, हम मल मुत्र कै कीरा ॥ १ ॥
पाप न राखै देह मैं, जब सुमिरन करिये ।
एक अच्छर के कहत ही, भौसागर तरिये ॥ २ ॥
अधम-उधारन सब कहैं, प्रभु बिरद तुम्हारा ।
सुनि सरनागत आइया, तब पार उतारा ॥ ३ ॥
बाबा मलूकदास १०३
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा मैं बड़ई समाई ।
जरत उवारे पांडवा, ताती बाव न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहिँ न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
तेरा मैं दोदार दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहिब रहमाना ॥१॥
हुआ अलमस्त खबर नहिँ तन की, पीया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥२॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यौँ घर का बंदाजादा¹ ।
नेकी की कुलाह² सिर दीये, गले पैरहन³ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर⁴ तबही से बिसरी, जब से यह दिल खोजा ॥४
कहैँ मलूक अब कजा⁵ न करिहौँ, दिलही सौँ दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये मैं देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥५॥
(२)
दर्द-दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा⁶ लै रहे, ऐसे मन धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर योँ झूमते, ज्योँ माता हाथी ॥ २ ॥
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
(१) गुलाम बच्चा । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई
नमाज़ पढ़ना । (६) प्रतीत ।
१०४ शब्द संग्रह
साहिब मिल साहिब भये, कछु रहि न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहाँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
(१)
अब तेरी सरन आयो राम ॥ १ ॥
जबै सुनिया साध के मुख, पतित-पावन नाम ॥ २ ॥
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम ॥ ३ ॥
विषय सेती भयों आजिज, कह मलूक गुलाम ॥ ४ ॥
(२)
दीन-बंधु दीना-नाथ, मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहिं बंधु नाहिं, कुटुम परिवार नाहिं ।
ऐसा कोई मित्र नाहिं, जाके ढिंग जाइये ॥ १ ॥
सोने की सलैया नाहिं, रूपे का रुपैया नाहिं ।
कौड़ी पैसा गाँठि नाहिं, जा से कछु लीजिये ॥ २ ॥
खेती नाहिं बारी नाहिं, बनिज व्यौपार नाहिं ।
ऐसा कोई साहु नाहिं, जा सौँ कछु माँगिये ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास, छोड़ दे पराई आस ।
राम धनी पाय के, अब का की सरन जाइये ॥ ४ ॥
(३)
सवैया
दीन दयाल सुने जब तैं तब तैं, मन मैं कछु ऐसी बसी है ॥१।
तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ, तुम्हरे हित की पट२ खाँचि कसी है
तेरोही आसरो एक मलूक, नहीं प्रभु सों कोउ दूजो जसी है३
ए हो मुरार पुकार कहौं अब, मेरी हँसी नहिं तेरी हँसी है४
(१) इच्छा, चाह। (२) पटका।
बाबा मलूकदास १०५
॥ उपदेश ॥
(१)
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती नेती, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर मैं रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥२॥
सहै कुसबद वाद हू त्यागै, छाड़ै गर्ब गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥३॥
(२)
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत विदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥१॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जैन कहैं असुरन की बिरिया, मूढ़ दई के मारे ॥२॥
आप भले तो सबहि भले हैं, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सौं भागे रहिये ॥३॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदे दया न आवै ॥४॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संक्रट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥५॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल मैं बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥६॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥७॥
॥ माया ॥
हम से जनि लागै तू माया ।
थोरे सें फिर बहुत होयगी, सुनि पैहैं रघुराया ॥१॥
(१) गिराया । (२) डरा ।
१४
१०६ शब्द संग्रह
अपने मैं है साहिब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहै, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै, चितै¹ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तैं तेरो जोर न लहिहै, रच्छपाल अबिनासी ॥३॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, ता तैं कछु न बसाई ॥४॥
नाभाजी
इन का जीवन समय सत्रहवाँ शतक था और इन का देहान्त होना
सं० १७०० मैं इन के शिष्य प्रियादास जी ने लिखा है जिन्हों ने अपने गुरू की
आज्ञानुसार उन के मुख्य ग्रंथ भक्तमाल छंदबंद की टीका उनके देहान्त होने के
पीछे बनाई, परंतु मिश्र-बंधु विनोद मैं सं० १७२० के लगभग इन का मृत्यु-काल
सिद्ध किया गया है। इन की जाति के विषय मैं झगड़ा है, प्रायः लोग डोम
बतलाते हैं। इन के शिष्य प्रियादासजी ने अपनी टीका में इन्हें हनुमान-वंशी
लिखा है और माड़वारी भाषा में डोम शब्द का प्रयोजन हनुमान है। दूसरे
टीकाकार ने ऐसा लिखा है कि वैष्णवों की जाति पाँति वक्तव्य नहीं है। नाभाजी
अग्रदास के शिष्य और गुसाईँ तुलसीदासजी के बड़े मित्र थे ।
॥ शब्द ॥
नाभा नभ खेला कँवल केल रस सैला ॥ टेक ॥
दरपन नैन सैन मन माँजा, लाजा अलख अकेला ॥१॥
पल पर दल दल ऊपर दामिनि, जोत मैं होत उजेला ॥२॥
झंडा पार सार लख सूरन, सुन्नी सुन्न सुहेला ॥ ३ ॥
चढ़ गइ धाय जाय गढ़ ऊपर, सबद सुरत भया मेला ॥४॥
यह सब खेल अलेख अमेला, सिंध नीर नद मेला ॥ ५ ॥
जल जलधार सार पद जैसे, नहीं गुरू नहिं चेला ॥ ६ ॥
नाभा नैन सैन अंदर के, खुल गये निरख निहाला ॥७॥
संत उचिष्ट वार मन झेला, दुर्लभ दीन दुहेला ॥ ८ ॥
(१) नीची निगाह कर देख ।