संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
सुन्दरदासजी ११५
॥ विश्वास ॥
(१)
धीरज धारि विचार निरंतर, ताहि रच्यो सोइ आपुहि ऐहै॥
जेतिक भूख लगी घट प्राणहिं, तेतिक तू अनयासहि पैहै॥
जो मन मैं तृस्ना करि धावत, तौ तिहुँ लोक न खात अघैहै॥
सुंदर तू मत सोच करै कछु, चोंच दई जिन चूनहु दैहै॥
(२)
जगत मैं आइ के, बिसायो है जगतपति ।
जगत कियो है सोई, जगत भरतु है ॥
तेरे निसि दिन चिंता, औरहि परी है आइ ।
उद्यम अनेक, भाँति भाँति के करतु है ॥
इत उत जाय के, कमाई करि लाऊँ कछु ।
नेक न अज्ञानी नर, धीरज धरतु है ॥
सुंदर कहत एक, प्रभु के विस्वास बिनु ।
बादहि कूँ वृथा सठ, पचि के मरतु है ॥
॥ ज्ञानी ॥
(१)
तमोगुण बुद्धि सो तौ, तवा के समान जैसे ।
ता के मध्य सूरज की, रंचहू न जोत है ॥
रजोगुण बुद्धि जैसे, आरसी की औंधी ओर ।
ता के मध्य सूरज की, कछुक उद्योत१ है ॥
सत्त्वगुण बुद्धि जैसे, आरसी की सूधी ओर ।
ता के मध्य प्रतिबिंब, सूरज को पोत२ है ॥
त्रिगुण अतीत३ जैसे, प्रतिबिंब मिटि जात ।
सुंदर कहत एक, सूरजही होत है ॥
(१) चमक । (२) गुण । (३) तीनों गुण से रहित ।
११६ शब्द संग्रह
(२)
बिधि न निषेध कछु, भेद न अभेद पुनि ।
क्रिया सो करत दीसै, यूँही नितप्रति है ॥
काहू कूँ निकट राखै, काहू कूँ तौ दूर भाखै ।
काहू सूँ नेरे न दूर, ऐसी जा की मति है ॥
रागहू न द्वेष कोऊ, सोक न उछाह दोऊ ।
ऐसी बिधि रहै कहूँ, रति न घिरति१ है ॥
बाहिर ब्योहार ठानै, मन मैं सुपन जानै ।
सुंदर ज्ञानी की कछु, अद्भुत गति है ॥
(३)
ज्ञानी कर्म करै नाना बिधि, अहंकार या तन को खोवै ॥
कर्मन को फल कछू न जोवै, अँतःकरण वासना धोवै ॥
ज्यूँ कोऊ खेती कूँ जोतत, लेकरि बीज भूनि के बोवै ॥
सुंदर कहै सुनो दृष्टांतहि, नाँगि२ नहाई कहा निचोवै ॥
॥ सांख्य ज्ञान ॥
(१)
छीर नीर मिले दोऊ, एकठेही होइ रहे ।
नीर जैसे छाड़ि हंस, छीर कूँ गहतु है ॥
कंचन मैं और धातु, मिलि करि बनि पर्यो ।
सुद्ध करि कंचन, सुनार ज्यूँ लहतु है ॥
पावकहूँ दारु३ मध्य, दारूहू सौं होइ रह्यो ।
मथि करि काढै वह, दारु कूँ दहतु है ॥
तैसेही सुंदर मिल्यो, आतमा अनात्मा जु ।
भिन्न भिन्न करै सो तौ, सांख्यही कहतु है ॥
(१) न कहीं आसक्त और न बिरक्त । (२) नंगी । (३) काठ
सुंदरदासजी ११७
(२)
देह के सँजोगही तैं, सीत लगै घाम लगै ।
देह के सँजोगही तैं, क्षुधा तृषा पौन कूँ ॥
देह के सँजोगही तैं, कटुक¹ मधुर स्वाद ।
देह के सँजोग कहै, खाटो खारो लैन कूँ ॥
देह के सँजोग कहै, मुख तैं अनेक बात ।
देह के सँजोगही, पकरि रहै मौन कूँ ॥
सुंदर देह के सँजोग, दुख मानै सुख मानै ।
देह के सँजोग गये, दुख सुख कान कूँ ॥
॥ निःसंशय ज्ञानी ॥
भावै देह छूटि जाहु, कासी माहिं गंगा तट ।
भावै देह छूटि जाहु, क्षेत्र मगहर मैं ॥
भावै देह छूटि जाहु, विप्र के सदन² मध्य ।
भावै देह छूटि जाहु, श्वपच³ के घर मैं ॥
भावै देह छूटै देस, आरज अनारज⁴ मैं ।
भावै देह छूटि जाहु, वन मैं नगर मैं ॥
सुंदर ज्ञानी के कछु, संसय रहत नाहिं ।
सुरग नरक सब, भागि गयो भरमैं ॥
॥ प्रेम ज्ञानी ॥
द्वंद बिना विचरै बसुधा पर, जा घट आतमज्ञान अपारो ॥
काम न क्रोध न लोभ न मोह, न राग न द्वेष न म्हारु न थारो⁵॥
जोग न भोग न त्याग न संग्रह, देह दसा न ढँक्यो न उघारो॥
सुंदर कोउक जानि सकै यह, गोकुल गाँव को पैँडोहि न्यारो॥
(१) कडुवा । (२) घर । (३) डोम । (४) पवित्र चाहे अपवित्र देश मैं ।
(५) मेरा और तेरा ।
११८ शब्द संग्रह
॥ बाचक ज्ञान ॥
(१)
देह सूँ ममत्व पुनि, गेह सूँ समत्व ।
सुत दारा¹ सूँ ममत्व, मन माया मैं रहतु है ॥
थिरता न लहै जैसे, कंदुक² चौगान³ माहिँ ।
कर्मनि के बस भाख्यो, धक्का कूँ बहुतु है ॥
अंतःकरण सदा, जगत सूँ रचि रह्यो ।
मुख सूँ बनाय बात, ब्रह्म की कहतु है ॥
सुंदर अधिक मोहिँ, याहि तैँ अचंभो आहि ।
भूमि पर पर्यो कोऊ, चंद कूँ गहतु है ॥
(२)
ज्ञानी की सी बात कहै, मन तौ मलिन रहै ।
बासना अनेक भरि, नेक न निवारी है ॥
जैसे कोऊ आभूषण, अधिक बनाइ राखै ।
कलई ऊपर करि, भीतर भँगारी है ॥
ज्यूँही मन आवै त्यूँही, खेलत निसंक होइ ।
ज्ञान सुनि सीखि लियो, ग्रंथ⁴ न बिचारी है ॥
सुंदर कहत वा के, अटक न कोऊ आहि ।
जोई वा सूँ मिलै जाइ, ताही कूँ बिगारी है ॥
॥ आत्म अनुभव ॥
(१)
है दिल मैं दिलदार सही, अँखियाँ उलटी करि ताहि चित्तैये ॥
आब⁵ मैं खाक मैं बाद⁶ मैं आतस⁷, जान मैं सुंदर जानि जनैये ॥
नूर⁸ मैं नूर है तेज मैं तेजहि, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिलि जैये ॥
क्या कहिये कहते न बनै कछु, जो कहिये कहते हिलजैये ॥
(१) स्त्री । (२) गेंद । (३) गेंद का खेल । (४) जड़ चेतन की गाँठ ।
(५) पानी । (६) हवा । (७) आग । (८) प्रकाश ।
सुंदरदासजी ११६
(२)
न्याय सास्त्र कहत है, प्रगट ईसुरवाद ।
मीमांसाहि सास्त्र माहिँ, कर्मवाद कह्यो है ॥
वैसेषिक सास्त्र पुनि, कालवादी है प्रसिद्ध ।
पातंजलि सास्त्र माहिँ, योगवाद लह्यो है ॥
सांख्य सास्त्र माहिँ पुनि, प्रकृति पुरुष वाद ।
वेदांत जु सास्त्र तिन, ब्रह्मवाद गह्यो है ॥
सुंदर कहत षटसास्त्र, माहिँ भयो वाद ।
जा के अनुभव ज्ञान, वाद मैं न बह्यो है ॥
(३)
काहू कूँ पूछत रंक, धन कैसे पाइयत ।
कान देके सुनत, स्रवण सोई जानिये ॥
उन कह्यो धन हम, देख्यो है फलानी ठौर ।
मनन करत भयो, कब घर आनिये ॥
फेरि जब कह्यो धन, गड़्यो तेरे घर माहिँ ।
खोदन लाग्यो है तब, निदिध्यास ठानिये ॥
धन निकस्यो है जब, दारिद गयो है तब ।
१२० शब्द संग्रह
बासना१ न कोई बा की, ऐसी मति सदा जा की।
सुंदर कहत ताहि, बंदना२ हमारी है ॥
॥ सतसंग ॥
(१)
प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्महि, और सबै कछु लागत फीको ॥
सुद्ध हृदय मन होइ सु निर्मल, द्वैत प्रभाव मिटै सब जी को ॥
गोष्टि रु ज्ञान अनंत चलै जहँ, सुंदर जैसे प्रबाह नदी को ॥
ताहितैं जानिकरै निसिवासर, साधुको संग सदा अतिनीको॥
(२)
जो कोइ जाइ मिलै उन सूं नर, होत पबित्र लगै हरि रंगा ।
दोष कलंक सबै मिटि जाइसु, नीचहु जाइ जु होत उतंगा ॥
ज्यौं जल और मलीन महा अति, गंग मिल्योहुइ जात हि गंगा॥
सुंदर सुद्ध करै ततकाल जु, है जग माहिँ बड़ो सतसंगा ॥
॥ दुष्ट ॥
(१)
अपने न दोष देखे, पर के औगुण पेखे,
दुष्ट को सुभाव, उठि निंदाही करतु है ।
जैसे कोई महल, सँवारि राख्यो नीके करि,
कीरी३ तहाँ जाय, छिद्र ढूँढत फिरतु है ॥
भोरही तैं साँझ लग, साँझही तैं भोर लग,
सुंदर कहत दिन, ऐसेही भरतु है।
पाँव के तरे की, नहीं सूझे आग मूरख कूँ,
और सूं कहत तेरे, सिर पै बरत है ॥
(२)
आपनु काज सँवारन के हित, और कुकाज बिगारत जाई।
आपनु कारज होउ न होउ, बुरो करि और कुँ डारत भाई ॥
(१) चाह । (२) प्रणाम । (३) चींटी ।
, first word):
'ज' + 'ो' = जो. Then 'इ': short vertical stroke, loop to left, loop to right, tail down!
Now look at the letter in question:
Short vertical stroke, loop to left, loop to right... wait, it's an 'इ' with a connector to a vertical bar!
YES! That is the letter 'झ'!
Because 'झ' = 'इ' + '्' + connector + 'ा'!
Look at line 21:
It is an 'इ' joined by a horizontal bar to a vertical stem!
Because the top of 'इ' has a small vertical stem coming from the shirorekha, then goes left, then turns right, and the connector comes out of the middle to the right stem!
That is 100% the classic Devanagari letter 'झ'!
And above the stem, there is an 'ो' matra and a candrabindu!
So it IS "झोंकिये" (or "झौंकिये" / "झोंकिये")!
Wait, look at the candrabindu: it's a candrabindu over 'ो' = "झोंकिये" (or "झाँकिये" / "झौंकिये")!
Wait, does it have an 'ो' or 'ौ'? One slant!
Wait, in "झोंकिये": it has a slant with a candrabindu, so it's "झोंक
१२२ शब्द संग्रह
सुंदर कहत प्रभु, कौन पाप लायो पेट ।
जबही जनम भयो, तबही को खातु है ॥
॥ कामिनी ॥
(१)
कामिनी को तनु मानु कहिये सघन बन,
वहाँ कोऊ जाय सो तौ भूलेही परतु है ।
कुंजर है गति कटि केहरी को भय जा मैं,
बेनी काली नागिनीऊ फन कूँ धरतु है ॥
कुच हैं पहार जहाँ काम चोर रहै तहाँ,
साधि के कटाच्छ बान प्रान कूँ हरतु है ।
सुंदर कहत एक और डर जा मैं अति,
राच्छसी बदन खाँउ खाँउ ही करतु है ॥
(२)
रसिक प्रिया रस मंजरी, और सिंगारहि जान ।
चतुराई करि बहुत बिधि, त्रिषय बनाई आन ॥
बिषय बनाई आन, लगत बिषयिन१ कूँ प्यारी ।
जागे मदन२ प्रचंड, सराह्रै नखसिख नारी ॥
ज्यूँ रोगी मिष्टान खाइ, रोगहि बिस्तारै ।
सुंदर ये गति होइ, रसिक जो रस प्रिया धारै ॥
॥ करम धरम ॥ ,
(१)
मेघ सहै सीत सहै, सीस पर घाम सहै ।
कठिन तपस्या करि, कंद मूल खात है ॥
जोग करै जज्ञ करै, तीरथ रु व्रत करै ।
पुन्य नाना बिधि करै, मन मैं सुहात है ॥
(१) कामी । (२) कामदेव ।
सुंदरदासजी १२३
और देवी देवता, उपासना अनेक करै ।
– आँवन की हौम कैसे, आक डाँड़े¹ जात है ॥
सुंदर कहत एक, रवि के प्रकास बिनु ।
जँगना² की जोति, कहा रजनी³ बिलात है ॥
(२)
गेह तज्यो पुनि नेह तज्यो, पुनि खेह लगाइ के देह सँवारी ॥
मेघ सहै सिर सीत सहै तन, धूप समय जु पंचागनि धारी ॥
भूख सहै रहि रूख तरे, पर सुंदरदास सहै दुख भारी ॥
डासन⁴ छाड़ि के कासन ऊपर, आसन मारि पै आस न मारी॥
॥ चितावनी ॥
(१)
तू कछु और विचारत है नर,
तेरो विचार धस्योहि रहैगो ।
कोटि उपाय करै धन के हित,
भाग लिख्यो तितनोहि लहैगो ॥
भोर कि साँझ घरी पल माँझ सु,
काल अचानक आइ गहैगो ।
राम भज्यो न कियो कछु सुकिरत,
सुंदर यूँ पछताइ रहैगो ॥
(२)
मातु पिता युवती⁵ सुत बांधव,
लागत है सब कूँ अति प्यारो ।
लोक कुटुंब खरो हित राखत,
होइ नहीं हम तैं कहुँ न्यारो ॥
(१) मदार का 'फल या डौंडी । (२) जुगनू । (३) रात । (४) बिछौना ।
(५) स्त्री ।
१२४ शब्द संग्रह
देह सनेह तहाँ लग जानहु,
बोलत है मुख सबद उचारो।
सुंदर चेतन सक्ति गई जब,
बेगि कहै घरबार निकारो॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कार उहै अबिकार¹ रहै नित, सार² उहै जु असारहिनाखै³॥
प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उर, नीति उहै जुअनीतिनभाखै॥
तंत⁴ उहै लगि अंत न टूटत, संत उहै अपनौ सत राखै॥
नाद⁵ उहै सुनि बाद⁶ तजै सब, स्वाद उहै रस सुंदर चाखै॥
(२)
सोवत सोवत सोइ गयो सठ, रोवत रोवत कै बेर रोयो॥
गोवत⁷ गोवत गोइ धरयो धन, खोवत खोवत तैँ सब खोयो॥
जोवत⁸ जोवतबीतिगये दिन, बोवत बोवत लै बिष बोयो॥
सुंदर सुंदर राम भज्यो नहिँ, ढोवत ढोवत बोझहिँ ढोयो॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
जा सरीर माहिँ तू अनेक सुख मानि रह्यो,
ताहि तू बिचार या मैं कौन बात भली है।
मेद मज्जा मांस रग रग मेँ रकत भरयो,
पेटहू पिटारी सी मैं ठौर ठौर मली है॥
हाड़न सूँ भरयो मुख हाड़न के नैन नाक,
हाथ पाँउ सोऊ सब हाड़न की नली है।
सुंदर कहत याहि देखि जनि भूलै कोई,
भीतर भँगार भरी ऊपर तै कली है॥
(१) बिकार रहित। (२) सत्य। (३) फेंक दे। (४) तत्व—यहाँ ध्यान से
अभिप्राय है। (५) शब्द। (६) झगड़ा। (७) छिपाना। (८) देखना।
धरनी दासजी १२५
(२)
प्रीति सी न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और ।
चित्त सौं न चंदन सनेह सौं न सेहरा ॥
हृदय सौं न आसन सहज सौं न सिंघासन ।
भाव सी न सेज और सून्य सौं न गेहरा ॥
सील सौं न स्नान अरु ध्यान सौं न धूप और ।
ज्ञान सौं न दीपक अज्ञान तम केहरा ॥
मन सी न माला कोऊ सोहं सो न जाप और ।
आतम सौं देव नाहिं देह सौं न देहरा ॥
धरनी दासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ११२ ]
॥ चितावनी ॥
पानी से पैदा कियो सुनु रे मन बौरे,
ऐसा खसम खुदाय कहाई रे ।
दाह¹ भयो दस मास को सुनु रे मन बौरे,
तर सिर ऊपर पाँई रे ॥ १ ॥
आँच लगी जब आग की सुनु रे मन बौरे,
आजिज ह्वै अकुलाई रे ।
कौल² कियो मुख आपने सुनु रे मन बौरे,
नाहक अंक लिखाई रे ॥ २ ॥
अब की करिहौं बंदगी सुनु रे मन बौरे,
जो पइहौं मुकलाई³ रे ।
(१) गर्भ की जलन। (२) प्रतिज्ञा। (३) मुकलना = भेजना, गर्भ में जब
बालक बहुत तकलीफ़ पाता है तो मालिक से प्रार्थना करता है कि अब की कष्ट
से छुड़ा दो तो बंदगी भक्ति करूँगा ।
१२६ शब्द संग्रह
जग आये जंगल परे सुनु रे मन बौरे,
भरम रहे अरुझाई रे ॥ ३ ॥
पर की पीर न जानिया सुनु रे मन बौरे,
नाहक छुरी चलाई रे ।
बाँधि जँजीरे जाइहौ सुनु रे मन बौरे,
बहुरि ऐसहौँ जाई रे ॥ ४ ॥
सतगुरू कै उपदेस ले सुनु रे मन बौरे,
दोजख दरद मिटाई रे ।
मानुष देह दुर्लभ अहै सुनु रे मन बौरे,
धरनी कह समुझाई रे ॥ ५ ॥
॥ बिरह ॥
अजहुँ मिलो मेरे प्रान-पियारे ।
दीनदयाल कृपाल कृपानिधि,
करहु छिमा अपराध हमारे ॥ १ ॥
कल न परत अति बिकल सकल तन,
नैन सकल जनु१ बहत पनारे ।
माँस पचो अरु रक्त रहित भे,
हाड़ दिनहुँ दिन होत उघारे ॥ २ ॥
नासा नैन
तृतीय भाग: सन्त तुलसी साहब हाथरस, पलटू साहिब एवं जगजीवन साहिब
धरनी दासजी १२७
धरनी जिव झिलमलित दीप ज्येाँ,
होत अँधार करै उँजियारे ॥ ४ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
इक पिय मोरे मन मान्यो, पतिव्रत ठानौँ हो ।
अवरो जो इन्द्र समान, तौ तृन करि जानौँ हो ॥१॥
जहँ प्रभु बैसि सिँहासन, आसन डासब हो ।
तहवाँ बेनियाँ डोलइबौँ, बड़ सुख पइबौँ हो ॥२॥
जहँ प्रभु करहिँ लवासन¹, पवढ़हिँ आसन हो ।
कर तैँ पग सुहरैबौँ, हृदय सुख पइबौँ हो ॥३॥
धरनी प्रभु चरनामृत, नितहिँ अछइबौँ हो ।
सन्मुख रहिबौँ मैं ठाढ़ि, अंते नहिँ जइबौँ हो ॥४॥
(२)
पिया मोर बसैँ गउरगढ़¹, मैं बसौँ प्राग² हो ।
सहजहिँ लागु सनेह, उपजु अनुराग हो ॥१॥
असन
१२८ शब्द संग्रह
धरनी गति नहिँ आनि, करहु जस जानहु हो ।
मिलहु प्रगट पट१ खोलि, भरम जनि मानहु हो ॥६॥
(३)
हरि जन हरि के हाथ बिकाने ।
भावै कहो जग धिग जीवन है, भावै कहो बौराने ॥१॥
जाति गँवाय अजाति कहाये, साधु सँगति ठहराने ।
मेटो दुख दारिद्र परानो२, जूठन खाय अघाने ॥२॥
पाँच जने परबल परपंची, उलटि परे बंदिखाने ।
छुटी मजूरी भये हजूरी, साहिब के मन माने ॥३॥
निरममता निरबैर सभन तैं, निरसंका निरबाने ।
धरनी काम राम अपने तैं, चरन कमल लपटाने ॥ ४ ॥
॥ बिनय ॥
(१)
प्रभुजी अब जिनि मोहिँ बिसारो ।
असरन-सरन अधम-जन-तारन, जुग जुग बिरद तिहारो ॥१॥
जहँ जहँ जनम करम बसि पायो, तहँ अरुझे रस खारो।
पाँचहुँ के परपंच भुलाना, घरेउ न ध्यान अधारो ॥२॥
अंध गर्भ दस मास निरंतर, नखसिख सुरति सँवारी ।
मज्जा३ मुत्र अग्नि मल कृम जहँ, सहजै तहँ प्रतिपारी ॥३॥
दीजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न बिचारो ।
धरनी भजि४ आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो५॥४॥
(२)
तुहि अवलंब हमारे हो ।
भावै पगु नाँगे करो, भावै तुरय६ सवारे हो ॥ १ ॥
(१) घूँघट। (२) भागा। (३) मज्जा = हड्डी का गूदा या सड़ा पंछा। (४) भाग
कर। (५) गाली। (६) घोड़ा।
धरनी दासजी १२४
जनम अनेकन बादि गे, निजु नाम विसारे हो।
अब सरनागत रावरी, जन करत पुकारे हो ॥ २ ॥
भवसागर बेरा¹ परो, जल माँझ मँझारे हो।
संतत² दीनदयाल ही, करि पार निकारे हो ॥ ३ ॥
धरनी मन बच कर्मना, तन मन धन वारे हो।
अपने बिरद निबाहिये, नहिं बनत बिचारे हो ॥ ४ ॥
(३)
मो सौँ प्रभु नाहिं दुखित, तुम सौँ सुखदाई ॥ टेक ॥
दीनबन्धु बान तेरो, आजु करु सहाई।
मो सौँ नहिँ दीन और, निरखो जग माँई ॥ १ ॥
पतित-पावन निगम कहत, रहत हौ कित गोई³।
मो सौँ नहिँ पतित और, देखो जग टोई ॥ २ ॥
अधम के उधारन तुम, चारो जुग ओई।
मो तैँ अब अधम आहि, कवन धौँ बड़ोई ॥ ३ ॥
धरनी मन मनिया, इक ताग मैं परोई।
आपन करि जानि लेहु, कर्म फंद छोई⁴ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
कबित्त-जीव की दया जेहि जीव व्यापै नहीं,
भूखे न अहार प्यासे न पानी।
साधु से संग नहिँ सबद से रंग नहिँ,
बोलि जानै न मुख मधुर बानी ॥
एक जगदीस को सीस अरपै नहीं,
पाँच पच्चीस बहु बात ठानी।
राम को नाम निज धाम बिस्राम नहिँ,
धरनी कह धरनि मौँ धिग सो प्रानी⁵ ॥
(१) बेड़ा, नाव। (२) निरंतर। (३) गुप्त। (४) छोड़ा कर, काट कर।
(५) पृथ्वी पर ऐसे जीव को धिक्कार है।
१७
जगजीवन साहिब
————
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ११७]
॥ चितावनी ॥
(१)
अरे मन देहु तजि मतवारि ।
जे जे आये जगत महँ इहि, गये ते ते हारि ॥ १ ॥
नाँहिँ सुमिर्यौ नाम काँ, सब गये काम बिगारि ।
आपु काँ जिन बड़ा जान्यो, काल खायो मारि ॥ २ ॥
जानि आपुहिँ छोट जग, रहि रहौ डोरि सँभारि ।
बैठि कै चौगान निरखहु, रूप छवि अनुहारि१ ॥ ३ ॥
रहौ थिर सतसंग बासी, देहु सकल बिसारि ।
जगजिवन सतगुरु कृपा करि, लेहिँ सबै सँवारि ॥ ४ ॥
(२)
अरे मन समुझि करु पहिचान ।
को तैँ अहसि कहाँ तैँ आयसि, काहे भर्म भुलान ॥१॥
सुधि सँभारु बिचार करिकै, बूझु पाछिल ज्ञान ।
नात यहि दुइ चारि दिन का, अचल नहिँ अस्थान ॥२॥
लोक गढ़ यहु कोट काया, कठिन माया बान ।
लाग सब के बचे कोउ नहिँ, हन्यो सब को ध्यान ॥३॥
खबरदार बेखबर हो नहिँ, ओट नाम निरबान ।
जगजिवन सतगुरु राखि लैहैँ, चरन रहु लपटान ॥४॥
——————————————
(१) सदृश।
जगजीवन बानी १३१
(३)
हैं हैं जग त्यागि मन, चलिये सिर नाई ।
नाम जानि दीन हीन, करिये दीनताई ॥ १ ॥
अहंकार गर्व तैं, सब गये हैं बिलाई ।
रावन के सीस काटि, राम की दुहाई ॥ २ ॥
जिन जिन गुमान कीन्ह, मारि गर्दही मिलाई ।
साधि साधि बाँधि प्रीति, ताहि पर सहाई ॥ ३ ॥
परसहु गुरु सीस डारि, दुनिया बिसराई ।
जगजीवन आस एक, टेक रहिये लगाई ॥ ४ ॥
(४)
मन महँ नाहिं बूझत कोय ।
नहीं बसि कछु अहै आपन, करै करता होय ॥ १ ॥
कहत मैं तैं सूझि नाहीं, भर्म भूला सोय ।
पड़े धारा मोह की बसि, डारि सर्बस खोय ॥ २ ॥
करै निंदा साध की, परि पाप बूड़ै सोय ।
अंत फजिहत होहिँगे, पछिताय रहिहैं रोय ॥ ३ ॥
कहैं समुझि विचारि कै, गहि नाम दृढ़ घरु टोय ।
जगजीवन ह्वै रहहु निर्भय, चरन चित्त समाय ॥ ४ ॥
(५)
कहाँ गयो मुरली को बजइया, कहाँ गयो रे ॥ टेक ॥
एक समय जब मुरली बजायो, सब सुनि मोहि रह्यो रे ।
जिन के भाग भये पूर्बज१ के, ते वहि संग गह्यो रे ॥ १ ॥
खबरि न कोई केहुँ की पाई, को धौँ कहाँ गयो रे ।
ऐसे करता हरता यहि जग, तेऊ थिर न रह्यो रे ॥ २ ॥
(१) पूर्व जन्म ।
१३२ शब्द संग्रह
रे नर बौरे तैँ कितान है, केहिँ गनती माँ है रे ।
जगजीवनदास गुमान करहु नहिँ, सत्त नाम गहि रहु रे ॥३
॥ बिरह ॥
(१)
सखी री करौँ मैं कौन उपाई ।
मैं तौ ब्याकुल निसि दिन डोलौँ, उनहिँ दरद नहिँ आई॥१
काह जानि कै सुधि बिसराई, कछु गति जानि न जाई ।
मैं तौ दासी कलपौँ पिय बिनु, घर आँगन न सुहाई ॥२॥
तलफित लफि जल बिना मीनज्यौँ, अस दुख मोहिँ अधिकाई ।
निर्गुन नाह¹ बाँह गहि सेजिया, सूतहि हियरा जुड़ाई ॥३॥
बिन सँग सूते सुख नहिँ कबहूँ, जैसे फूल कुम्हिलाई ।
ह्वै जोगिनि मैं भस्म लगायौँ, रहिउँ नयन टक लाई ॥४॥
पैयाँ परौँ मैं निरखि निरखि कै, धहिँ का देहु मिलाई ।
सुरति सुमति करि मिलहिँ एक ह्वै, गगन मंदिल चलिजाई ५
रहि यहि महल टहल महँ लागी, सत्त की सेज बिछाई ।
हम तुम उनके सूति रहहिँ सँग, मिटै सबै दुचित्ताई ॥६॥
जगजीवन सिव ब्रह्मा बिस्नू, मन नहिँ रहि ठहराई ।
रबि ससि करि कुरबान ताहि छबि, पीवौ दरस अघाई ॥७
(२)
उनहीँ सेँ कहियो मोरी जाय ॥ टेक ॥
ए सखि पैयाँ परि मैं बिनवौँ, काहे हमैँ डारिन बिसराय ॥१
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, दीन्ह्यो अहै मोहिँ भटकाय ॥२
ए सखि साईँ मोहिँ मिलावहु, देखि दरस मोर नैन जुड़ाय ॥३
जगजीवन मन मगन होउँ मैं, रहौँ चरन कमल लपटाय ४
(१) पति ।
Look at the letter: It has: Top horizontal line. A candrabinduँ` on top.
Then, under the horizontal line:
There is a vertical stroke down? No, it's a curve:
Wait, look at 'भ' in line 9: "भये".
The top of 'भ' has a little knob/loop!
In line 25: does it have a little knob?
Wait! Look at the left:
It goes down... wait, it DOES have a line at the top, but wait, look at 'स' in 'सुखित' (line 24):
The left stroke starts from the bar, goes down-left, then hooks in.
In line 25: it looks almost identical to 'स'. But wait, look at 'भँवरगुफा' vs 'सँवरगुफा':
Could a human transcriber read it as "भँवरगुफा"?
Wait, why would it be 'स'? If someone reads it as 'भँवरगुफा', they know the meaning is "भँवरगुफा". If someone reads it purely visually, could they see 'भँवरगुफा'?
Wait! Let me look at the top left of the letter:
Wait, is that a 'भ'?
Wait, look at the left side of the letter: it has a loop!
Wait, look at the space between the left part and the vertical stem:
It is quite
१३४ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
ऐसे साईँ की मैं बलिहरियाँ री ।
ए सखि संग रंग रस मातिउँ, देखि रहिउँ अनुहरियाँ री॥१
गगन भवन माँ मगन भइउँ मैं, बिनु दीपक उजियरियाँ री
झलकि चमकि तहँ रूप बिराजै, मिटी सकल अँधियरियाँ री२
काह कहौँ कहिबे की नाहीं, लागि जाहि मन मँहियाँ री ।
जगजीवन वह जोती निरमल, मोती हीरा वरियाँ१ री ॥३॥
(२)
साईँ तुम सों लागो मन मोर ॥ टेक ॥
मैं तौ भ्रमत फिरौँ निसुबासर,
चितवौ तनिक कृपा करि कोर ॥ १ ॥
नाहिं बिसरावहु नहिं तुम बिसरहु,
अब चित राखहु चरनन ठौर ॥ २ ॥
गुन ऐगुन मन आनहु नाहीं,
मैं तो आदि अंत को तोर ॥ ३ ॥
जगजीवन बिनती करि माँगै,
देहु भक्ति बर जानि कै