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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 267 में से

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पृष्ठ 140

जगजीवन बानी १३१
(३)
हैं हैं जग त्यागि मन, चलिये सिर नाई ।
नाम जानि दीन हीन, करिये दीनताई ॥ १ ॥
अहंकार गर्व तैं, सब गये हैं बिलाई ।
रावन के सीस काटि, राम की दुहाई ॥ २ ॥
जिन जिन गुमान कीन्ह, मारि गर्दही मिलाई ।
साधि साधि बाँधि प्रीति, ताहि पर सहाई ॥ ३ ॥
परसहु गुरु सीस डारि, दुनिया बिसराई ।
जगजीवन आस एक, टेक रहिये लगाई ॥ ४ ॥
(४)
मन महँ नाहिं बूझत कोय ।
नहीं बसि कछु अहै आपन, करै करता होय ॥ १ ॥
कहत मैं तैं सूझि नाहीं, भर्म भूला सोय ।
पड़े धारा मोह की बसि, डारि सर्बस खोय ॥ २ ॥
करै निंदा साध की, परि पाप बूड़ै सोय ।
अंत फजिहत होहिँगे, पछिताय रहिहैं रोय ॥ ३ ॥
कहैं समुझि विचारि कै, गहि नाम दृढ़ घरु टोय ।
जगजीवन ह्वै रहहु निर्भय, चरन चित्त समाय ॥ ४ ॥
(५)
कहाँ गयो मुरली को बजइया, कहाँ गयो रे ॥ टेक ॥
एक समय जब मुरली बजायो, सब सुनि मोहि रह्यो रे ।
जिन के भाग भये पूर्बज१ के, ते वहि संग गह्यो रे ॥ १ ॥
खबरि न कोई केहुँ की पाई, को धौँ कहाँ गयो रे ।
ऐसे करता हरता यहि जग, तेऊ थिर न रह्यो रे ॥ २ ॥
(१) पूर्व जन्म ।