संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ शब्द संग्रह
धरनी गति नहिँ आनि, करहु जस जानहु हो ।
मिलहु प्रगट पट१ खोलि, भरम जनि मानहु हो ॥६॥
(३)
हरि जन हरि के हाथ बिकाने ।
भावै कहो जग धिग जीवन है, भावै कहो बौराने ॥१॥
जाति गँवाय अजाति कहाये, साधु सँगति ठहराने ।
मेटो दुख दारिद्र परानो२, जूठन खाय अघाने ॥२॥
पाँच जने परबल परपंची, उलटि परे बंदिखाने ।
छुटी मजूरी भये हजूरी, साहिब के मन माने ॥३॥
निरममता निरबैर सभन तैं, निरसंका निरबाने ।
धरनी काम राम अपने तैं, चरन कमल लपटाने ॥ ४ ॥
॥ बिनय ॥
(१)
प्रभुजी अब जिनि मोहिँ बिसारो ।
असरन-सरन अधम-जन-तारन, जुग जुग बिरद तिहारो ॥१॥
जहँ जहँ जनम करम बसि पायो, तहँ अरुझे रस खारो।
पाँचहुँ के परपंच भुलाना, घरेउ न ध्यान अधारो ॥२॥
अंध गर्भ दस मास निरंतर, नखसिख सुरति सँवारी ।
मज्जा३ मुत्र अग्नि मल कृम जहँ, सहजै तहँ प्रतिपारी ॥३॥
दीजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न बिचारो ।
धरनी भजि४ आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो५॥४॥
(२)
तुहि अवलंब हमारे हो ।
भावै पगु नाँगे करो, भावै तुरय६ सवारे हो ॥ १ ॥
(१) घूँघट। (२) भागा। (३) मज्जा = हड्डी का गूदा या सड़ा पंछा। (४) भाग
कर। (५) गाली। (६) घोड़ा।