संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ शब्द संग्रह
रे नर बौरे तैँ कितान है, केहिँ गनती माँ है रे ।
जगजीवनदास गुमान करहु नहिँ, सत्त नाम गहि रहु रे ॥३
॥ बिरह ॥
(१)
सखी री करौँ मैं कौन उपाई ।
मैं तौ ब्याकुल निसि दिन डोलौँ, उनहिँ दरद नहिँ आई॥१
काह जानि कै सुधि बिसराई, कछु गति जानि न जाई ।
मैं तौ दासी कलपौँ पिय बिनु, घर आँगन न सुहाई ॥२॥
तलफित लफि जल बिना मीनज्यौँ, अस दुख मोहिँ अधिकाई ।
निर्गुन नाह¹ बाँह गहि सेजिया, सूतहि हियरा जुड़ाई ॥३॥
बिन सँग सूते सुख नहिँ कबहूँ, जैसे फूल कुम्हिलाई ।
ह्वै जोगिनि मैं भस्म लगायौँ, रहिउँ नयन टक लाई ॥४॥
पैयाँ परौँ मैं निरखि निरखि कै, धहिँ का देहु मिलाई ।
सुरति सुमति करि मिलहिँ एक ह्वै, गगन मंदिल चलिजाई ५
रहि यहि महल टहल महँ लागी, सत्त की सेज बिछाई ।
हम तुम उनके सूति रहहिँ सँग, मिटै सबै दुचित्ताई ॥६॥
जगजीवन सिव ब्रह्मा बिस्नू, मन नहिँ रहि ठहराई ।
रबि ससि करि कुरबान ताहि छबि, पीवौ दरस अघाई ॥७
(२)
उनहीँ सेँ कहियो मोरी जाय ॥ टेक ॥
ए सखि पैयाँ परि मैं बिनवौँ, काहे हमैँ डारिन बिसराय ॥१
मैं का करौँ मोर बस नाहीं, दीन्ह्यो अहै मोहिँ भटकाय ॥२
ए सखि साईँ मोहिँ मिलावहु, देखि दरस मोर नैन जुड़ाय ॥३
जगजीवन मन मगन होउँ मैं, रहौँ चरन कमल लपटाय ४
(१) पति ।