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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 267 में से

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पृष्ठ 138

धरनी दासजी १२४
जनम अनेकन बादि गे, निजु नाम विसारे हो।
अब सरनागत रावरी, जन करत पुकारे हो ॥ २ ॥
भवसागर बेरा¹ परो, जल माँझ मँझारे हो।
संतत² दीनदयाल ही, करि पार निकारे हो ॥ ३ ॥
धरनी मन बच कर्मना, तन मन धन वारे हो।
अपने बिरद निबाहिये, नहिं बनत बिचारे हो ॥ ४ ॥
(३)
मो सौँ प्रभु नाहिं दुखित, तुम सौँ सुखदाई ॥ टेक ॥
दीनबन्धु बान तेरो, आजु करु सहाई।
मो सौँ नहिँ दीन और, निरखो जग माँई ॥ १ ॥
पतित-पावन निगम कहत, रहत हौ कित गोई³।
मो सौँ नहिँ पतित और, देखो जग टोई ॥ २ ॥
अधम के उधारन तुम, चारो जुग ओई।
मो तैँ अब अधम आहि, कवन धौँ बड़ोई ॥ ३ ॥
धरनी मन मनिया, इक ताग मैं परोई।
आपन करि जानि लेहु, कर्म फंद छोई⁴ ॥ ४ ॥
॥ उपदेश ॥
कबित्त-जीव की दया जेहि जीव व्यापै नहीं,
भूखे न अहार प्यासे न पानी।
साधु से संग नहिँ सबद से रंग नहिँ,
बोलि जानै न मुख मधुर बानी ॥
एक जगदीस को सीस अरपै नहीं,
पाँच पच्चीस बहु बात ठानी।
राम को नाम निज धाम बिस्राम नहिँ,
धरनी कह धरनि मौँ धिग सो प्रानी⁵ ॥
(१) बेड़ा, नाव। (२) निरंतर। (३) गुप्त। (४) छोड़ा कर, काट कर।
(५) पृथ्वी पर ऐसे जीव को धिक्कार है।
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