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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१०० नामदेव की हिन्दी कविता
(१) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (गुरुमुखी लिपि में) यह प्रति गुरुद्वारा प्रबन्धक
कमेटी अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई है। इसमें नामदेव के कुल ६१ पद है। इसमें आये
हुए पदो का पाठ अन्य प्राप्त हस्तलिखित प्रतियो से बहुत ही भिन्न है।
(२) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (नागरी लिपि में) यह प्रति सर्व हिन्द सिक्ख मिशन
अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई। यह गुरुमुखी सस्करण का नागरीकरण मात्र है। इसमें
भी नामदेव के ६१ पद हैं।
(३) (Sikh Religion) मेक्स आर्थर मेकालिफ़ द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में
सम्पूर्ण ग्रन्थ साहब का अंग्रेजी अनुवाद है। इसके छठे भाग मे 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१
पदो का भी अनुवाद है। यद्यपि मूल पद नही दिये गये है पर अनुवाद से पदा का परि-
चय मिल जाता है।
(४) 'पजाबातील नामदेव' डाक्टर पुरुषोत्तम जोशी।
श्री जोशी ने इस पुस्तक में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदो का मूल सहित
मराठी में अनुवाद दिया है। पदो का क्रम और पाठ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' जैसा ही है।
(५) 'हिंदी को मराठी संतो की देन' आचार्य विनयमोहन शर्मा।
इस शोध प्रबन्ध में हिन्दी मे रचना करने वाले सभी मराठी संतो की रचनाओं के साथ
नामदेव के ६६ पदों का संग्रह है। इनमें से ६१ पद तो 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ही है
तथा ८ और है।
(६) 'शिखांच्या आदि ग्रन्थांतील नामदेव'
लेखक अ० का० प्रियोलकर
इस पुस्तिका में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदों का मूल सहित श्री मेकालिफ
द्वारा किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद तथा उनका मराठी भाषांतर दिया गया है।
इनके अतिरिक्त श्री वियोगी हरि द्वारा संकलित 'सत सुधा सार' में वेलवेडियर
प्रेस द्वारा प्रकाशित 'सत बानी सग्रह' भाग २ में तथा आचार्य परशुराम चतुर्वेदी द्वारा
सगृहीत 'सत काव्य सग्रह' में भी नामदेव के पद मिलते है।
इन पदों के अतिरिक्त 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में नामदेव के नाम से निम्नलिखित
तीन साखियाँ मिलती है—
(१) नामा माइआ, कहे त्रिलोचन मीत।
काहे छोपहु छाइलह, राम न लावहु चीत ॥ २१२ ॥
(२) नामा कहे त्रिलोचना मुख ते रामु सम्हालि ।
हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥ २१३ ॥
(३) ढूँढत डोलई अंध गति अरु चोन्दत नाही सूझ ।
कहो नामा कयो पाइअह बिनु भगतहु भगवंत ॥ २१४ ॥

नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ १०१
अन्य सूत्रों से सामग्री प्राप्त होने के संकेत
'संत नामदेव की हिन्दी पदावली' के आशीर्वाद में म० म० दत्त वामन पोतदार
ने कहा है कि 'चालीस वर्ष पूर्व मुझे स्वयं राजवाड़ेजी ने एक हस्तलिखित बाड (ग्रन्थो
का संग्रह) दिया था उसमें नामदेवजू के कुछ पद लिखे मिलते है। बाड में वही पद है
जो गुरु ग्रंथ साहब मे है। यह हस्तलिखित ग्रन्थ 'भारत इतिहास संशोधक मंडल' में है
जिसे शायद इस ग्रन्थ के लेखको ने नही देखा ।'१
इसी प्रकार डॉ० रामचन्द्र मिश्र ने संकेत किया है कि 'पंजाब विश्वविद्यालय के
पाण्डुलिपि विभाग में नामदेव के पद प्राप्त है जो सम्पादको के विचार और विश्लेषण
की सीमा के भीतर नहीं आ सके है और न राजस्थान और पंजाब में अपने नाम के
आगे 'नामा' लगाने वाले नामदेव के अनुयायियो में परम्परा से प्राप्त पदो का आकलन
किया गया है । नामदेव की लोकप्रियता के कारण सम्भव है कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,
उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि के लोक जीवन में भी उनकी पदावली
प्राप्त हो । वस्तुतः नामदेव की पदावली की पूर्णता के लिए इंगित सामग्री का पर्यवेक्षण
भी अपेक्षित है।'२
इस आलोचना का महत्व स्वीकार करते हुए भी यह नही भूलना चाहिए कि
किसी ग्रन्थ के संपादन में इन सारे सूत्रों से सामग्री एकत्र करना बडा कठिन कार्य है,
विशेषतः परवर्ती लेखको-सम्पादकों को शनैः शनैः प्राप्त सामग्री का आरंभिक कार्य-
कर्ता को उपलब्ध हो जाना संभव नही होता ।
जिन सूत्रों की ओर संकेत किया गया है, पर्याप्त खोज करने पर भी 'संत नाम
देव की हिंदी पदावली' में संग्रहीत पदों के अतिरिक्त नामदेव के पद नहीं मिलने । यदि
और कुछ पद मिलते हैं तो वे मराठी अभंगों के रूपान्तर मात्र हैं। डॉ० रामचन्द्र मिश्र
की यह केवल कल्पना है, कहीं नामदेव के पदों का निर्देश नहीं है। यदि भविष्य में
ऐसे पद मिले तो उनका अध्ययन भी प्रस्तुत किया जायगा ।
हिंदी रचनाओं का विषयानुसार विभाजन
नामदेव की हिंदी रचनाओं को विषयानुसार नीचे लिखे वर्गों में विभाजित
किया जा सकता है :-
(१) ईश्वर के नाम स्मरण का आनंद
(२) ईश्वर की सर्वव्यापकता
१. संत नामदेव की हिन्दी पदावली : (आशीर्वचन), पृ० ८ ।
२. संत नामदेव और हिन्दी पद साहित्य, पृ० ६४ ।

१०२ नामदेव की हिन्दी कविता
(३) भक्ति से लाभ
(४) ईश्वर की विशुद्ध भक्ति
(५) स्वयं को तथा दूसरो को चेतावनी
(६) प्रार्थना और नम्रता
(७) संसार की नश्वरता
(८) गुरु और संतो का महत्व
(६) हठयोग
हिंदी पदो में संत नामदेव सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद दोनों के अनुसार विचार
रखते हुए जान पड़ते है और उनकी भक्ति का स्वरूप भी शुद्ध निर्गुण भक्ति का ज्ञान
होता है।

तृतीय अध्याय
नामदेव की हिन्दी रचना में निर्गुण काव्य धारा की प्रवृत्तियाँ
(१) निर्गुण संत काव्य—आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
(२) निर्गुण संप्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्त्व—
अद्वैतवाद, इस्लाम या सूफ़ी मत
सिद्ध सम्प्रदाय, नाथ पथ, वैष्णव धर्म
(३) निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियाँ और नामदेव का हिंदी काव्य
१. निर्गुण भावना
२. गुरु महिमा
३. मूर्ति पूजा तथा बाह्याडम्बर का खण्डन
४. एकेश्वरवाद का प्रतिपादन
५. कथनी तथा करनी में एक रूपता
६. भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता
७. सत्सङ्ग की प्रधानता
८. सहज अवस्था
६. हठयोग
१०. उलटवासियां

निर्गुण संत काव्य-आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
मध्ययुगीन धर्म साधना के क्रमिक विकास को देखते हुए यह तथ्य सहज ही
स्पष्ट हो जाता है कि उसकी अभिव्यक्ति पर उसके पूर्व प्रचलित अनेक विचार धाराओं
के प्रभाव हैं। साथ ही एक लोक सामान्य विद्रोही प्रवृत्ति के फल स्वरूप उस युग में
अनेक मौलिक उद्भावनाएँ भी हुई हैं । हिन्दी का निर्गुण संत काव्य इसका सबसे पुष्ट
प्रमाण है । डॉ० रामकुमार वर्मा का कथन है कि संत काव्य ने प्राचीन परंपराओं की
स्थूल रूप-रेखा ग्रहण कर उसमे जीवन-गत पवित्रता के आधार पर विश्व धर्म की
स्वाभाविक प्रेरणा का रंग भरा है ।१ यदि ऐसा कहा जाय कि संत काव्य ने जन
भाषा का आश्रय लेकर परवर्ती राम और कृष्ण की भक्ति के लिए काव्य का क्षेत्र
प्रशस्त किया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी ।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत है कि जहाँ तक उनकी उपासना-पद्धति,
विषय, भाव, भाषा, अलंकार, छंद, पद आदि का संबंध है ये संत सौ फीसदी भारतीय
परंपरा में पड़ते हैं । उनके पारिभाषिक शब्द, उनकी रूढ़ि विरोधिता, उनकी खण्डनात्मक
वृत्ति और उनकी अवखड़ता आदि उनके पूर्ववर्ती साधकों की देन है । परन्तु उनमें
आत्मा उनकी अपनी है । उसमें भक्ति का रस है और वेदांत का ज्ञान है ।२
निर्गुण संत काव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य है इसलिए उसमें अपने इस
मूल भाव के साथ ही लोक समन्वय और स्वदेशी-विदेशी के भेदभ व की प्रतिक्रिया अन्य
क्षेत्रों की तुलना में कम है । यद्यपि यह मुसलमानी प्रतिक्रिया नहीं है तथापि मानवता
के स्तर पर सूफियों की प्रेम पद्धति और एकेश्वर वाद की लोक सामान्य झलक उसमें
भी है किन्तु यह उसका मूल स्वर नहीं बन सका ।
वैष्णव मत के लोकव्यापी विस्तार से जिस समय संपूर्ण देश अभिभूत होकर
भगवान् की भक्ति में अपने आप को तिरोहित कर रहा था उस समय उत्तर भारत में
१. हिंदी साहित्य (द्वितीय खंड) 'संत काव्य', पृ० १८८ ।
२. हिंदी साहित्य की भूमिका ।
—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४२ ।

१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
नैतिक जीवन को लेकर साधनात्मक प्रयोगों का बोलबाला था। साधक को अपनी
शुद्धता के लिए गुरु गोरखनाथ का अलौकिक व्यक्तित्व एक देवत्व का पर्याय मात्र रह
गया था।
गुरु गोरख का नाथ संप्रदाय जन भाषा में अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन कर
चुका था किंतु उसकी भाषा में दो बातों की कमी थी। पहली यह कि वह भाषा केवल
सिद्धांत-सम्मत थी, उसमें काव्यात्मकता का अभाव था और दूसरी यह कि नाथ
संप्रदाय एक सीमित संप्रदाय होने के कारण अपनी भाषा को व्यापक नहीं बना सका
था। इस प्रकार निर्गुण संप्रदाय की प्रतिष्ठा करते हुए जन-जीवन की स्वाभाविक
अनुभूतियों में सामान्य भाषा के माध्यम से संत काव्य हिन्दी के भक्ति काव्य का एक
महत्त्वपूर्ण अंग बन सका।¹
यहाँ संक्षेप में उन परिस्थितियों तथा प्रेरणाओं पर विचार कर लेना आवश्यक
है जिनका निर्गुण संप्रदाय का रूप निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
निर्गुण संप्रदाय का दृष्टिकोण उस बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से मिलता जुलता है,
जो शताब्दियों तक वैदिक धर्म से संघर्ष करता रहा। बौद्ध धर्म से महायान
का विकास हुआ, महायान से मंत्रयान और मंत्रयान से वज्रयान का, जो तांत्रिक
बौद्ध धर्म में परिणत हुआ। इसी वज्रयान की प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय का विकास
हुआ और नाथ संप्रदाय के प्रेरणा-मूलक तत्वों को ग्रहण कर संत संप्रदाय अवतरित
हुआ। इस प्रकार बौद्धों के शून्यवाद से लेकर नाथ संप्रदाय की अवधूत भावना तक
संत काव्य में सभी विचार सरणियां पोषित होती रही।
बौद्ध धर्म से प्रेरित इस विचार धारा के विकास के कारण ही यह संभव हो
सका कि संत काव्य समस्त वैदिक परंपरा के कर्मकांडों का विरोध कर सका जो काला-
न्तर में वैष्णव धर्म में भक्ति के साधन थे। इसीलिए अवतार, मूर्ति, तीर्थ, व्रत, माला
आदि निर्गुण संप्रदाय के संतों को ग्राह्य नहीं हो सके जो कर्मकाण्ड के प्रतीक बने
हुए थे।
दूसरी ओर शून्य, काया-तीर्थ, सहज समाधि और योग जिसके अंतर्गत इड़ा,
पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ियां, षट् चक्र, सहस्र दल कमल, चंद्र और सूर्य तथा जीवन की
स्वाभाविक और अंतःकरण-जनित श्रद्धा और रागात्मिका वृत्ति की प्रधानता संत काव्य
में हो सकी। अतः यह स्पष्ट है कि संत काव्य अपने मौलिक विचारों की कोटि में
बौद्ध धर्म की परंपरा के अंतर्गत है तथा उसका सम्बन्ध बौद्ध धर्म के परवर्ती सम्प्रदायों
से होता हुआ प्रत्यक्ष रीति से नाथ संप्रदाय से है।
१. हिन्दी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १८८।
—'संत काव्य' शीर्षक डॉ० रामकुमार वर्मा का लेख।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०७
बौद्ध धर्म की विचार धारा से संत संप्रदाय का संबंध निरूपित हो जाने पर
यह देख लेना उचित होगा कि वैदिक साहित्य की परंपरा में वैष्णव धर्म का प्रभाव
संत काव्य पर कितनी मात्रा में अथवा किस रूप में पड़ा ।
विक्रम की चौदहवी और पन्द्रहवी शताब्दी में रामानंद का प्रभाव उत्तरी भारत
में व्यापक रूप से पड़ा । भक्ति का स्रोत जो दक्षिण में फूट पड़ा और उत्तर तक
प्रवाहित हुआ उसने समस्त उत्तरी भारत को आप्लावित कर धर्म के क्षेत्र में भक्ति की
ओर आकर्षित किया ।१ यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भक्ति का जन-व्यापी प्रभाव
दक्षिण के अलवार संतों से ही ईसा की छठवीं शताब्दी में आरंभ हो चुका था । इनके
गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए । सर्व साधारण जनता के लिए भी वेद-विहित याज्ञिक
अनुष्ठान की अपेक्षा भक्ति का यह रागात्मक रूप अधिक आकर्षक था ।
निर्गुण संप्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्व
निर्गुण संत मत के सिद्धांतों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि
इस पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों और आचार्यों की छाप पड़ी हुई है । संतों ने इन संप्रदायों
की मुख्य-मुख्य तथा उपयोगी बातों को ग्रहण किया । संत मत पर निम्नलिखित
सम्प्रदायों का प्रभाव पड़ा है ।
अद्वैतवाद
संत साहित्य के पीछे जो दार्शनिक प्रेरणा रही है उसके संबंध में विद्वानों ने
प्रायः वेदांत और उपनिषदों में प्रतिपादित निर्गुण ब्रह्मवादी विचार धारा की ओर
संकेत किया है । संत साधक और उनके अग्रणी कबीर को लोगों ने यही समझा है कि
वे जीव, आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति संबंधी अपनी मान्यताओं को स्थिर करने में मुख्य
रूप से प्राचीन हिन्दी ग्रन्थों और विशेष रूप से निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले
ग्रन्थों और महात्माओं से अनुप्राणित हुए थे । प्राचीन वैदिक और उपनिषद् काल की
परंपरा तो निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादन के साथ ही अद्वैतवाद का प्रतिपादन समझा जाता
है । शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन संबंधी कुछ विशेष वचन जिन्हें महावाक्य२ कहा जाता
१. भक्ति द्राविड़ी ऊपजी लाये रामानंद ।
परगट कियो कबीर सप्त द्वीप नव खंड ॥
२. प्रज्ञान ब्रह्म । (ऐ० उपनिषद्)
तत्वमसि । (छांदोग्य उपनिषद् ६।८।७)
अहं ब्रह्मास्मि । (बृहदारण्यक उपनिषद् १।४।१०)
अयमात्मा ब्रह्म । (छांदोग्य उपनिषद् २)

१०८ नामदेव की हिन्दी कविता
है स्पष्ट रूप से अद्वैतवाद और निर्गुण ब्रह्म के पर्याय को स्वीकार करते हैं। उपनिषदों
और वेदांत में स्पष्ट रूप से ब्रह्म की व्याख्या करते हुए उन लक्षणों का वर्णन किया
गया है जिन्हें हम निर्गुण ब्रह्म में मानते हैं।
संत कवियों ने शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित मायावाद, विवर्तवाद अथवा शुद्ध
ज्ञान वाद को नहीं ग्रहण किया वरन् उपनिषदों के स्वस्थ, यथार्थवादी और लोकरंजक
चिंतन को ग्रहण किया और प्रचारित किया जिसमें हृदय और बुद्धि, ज्ञान और कर्म का
समन्वय किया गया था।¹
इस्लाम या सूफी मत
सूफी संतों का आगमन तो ग्यारहवीं शताब्दी के आस पास से शुरू हो गया
था किंतु हिंदी साहित्य में सूफी मत का प्रतिपादन व्यापक रूप से संत साहित्य में ही
देखने को मिलता है। संतों पर सूफी मत का अधिक प्रभाव पड़ने का एक महत्वपूर्ण
कारण यह भी था कि इसमें बहुत से मुसलमान भी थे और यह स्वाभाविक ही है कि
उनका संपर्क और झुकाव सूफी मत की ओर अधिक हुआ हो। कबीर, दादू, बुल्लेशाह
यारी साहब आदि अनेक मुसलमानों ने संत परंपरा को ग्रहण किया और सूफी धर्म की
'प्रेम की पीर' से अपनी कविता को रस सिक्त और कोमल बनाया। संत साहित्य में
भाव पक्ष की जो कुछ भी सुन्दरता दीख पड़ती है उसका बहुत कुछ कारण सूफी संतों
का दर्द और प्रेम की मधुर और करुण व्यंजना है।
मुसलमान संतों के अतिरिक्त भी जो दूसरे संत थे, वे बहुधा जाति और परम्परा-
गत भाव के कारण धार्मिक और सांप्रदायिक रूढ़ियों से युक्त थे। उन पर भी सूफी धर्म
का रंग गहरा चढ़ा। मलूकदास भी इस प्रेम के रङ्ग में डूबे हुए कहते हैं कि वे गुलाम के
समान उस प्रियतम के दर्शन की लालसा में दरबार में खड़े हैं।²
संत साहित्य पर सूफी मत का प्रभाव तीन रूपों में देखने को मिलता है। प्रायः
सभी कवियों ने प्रेम की महत्ता पर बहुत विस्तार और उत्साह से प्रकाश डाला है।
उन्होंने बतलाया है कि प्रेम जप तप, तीर्थ और साधना सभी से बड़ा है। दूसरा रूप
१ इंडियन फिलासफी भाग २ डॉ० राधाकृष्णन, पृ० २२४-२५।
२ तेरा मैं दीदार दिवाना
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ तुम साहिब रहमाना।
हुआ अलमस्त खबर नहि तन की पिया प्रेम पियासा
ठाड़ होऊँ तो गिर गिर पड़ता तेरे रंग भरवासा॥
—मलूकदास की बानी (बेलवेडियर प्रेस) पृ० ७।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०६
है संयोग की आनंदावस्था का चित्रण और तीसरा है वियोग के करण विदग्ध रूप का
चित्रण ।
सिद्ध संप्रदाय
सिद्ध साहित्य की विचार धारा का संत साहित्य पर विचार और शैली दोनों
दोनों ही दृष्टियों से बड़ा प्रभाव है। भगवान् बुद्ध द्वारा अनुप्राणित तथा अशोक द्वारा
प्रचारित बौद्ध धर्म को आगे चलकर वज्रयान और मंत्रयान द्वारा कलंकित किया गया ।
ये वज्रयानी सिद्ध रहस्यात्मक उक्तियाँ कहा करते थे । इनका धर्म 'महासुखवाद' था ।
इनकी अटपटी वाणी - 'काया तरुवर पंच बिडाल', 'गंगा जमुना माँझि बहेरी एक
नाडी' आदि योग की ओर आध्यात्मिक ढंग से संकेत करती हैं। इन्हीं की चलाई प्रणाली
से संत साहित्य की सृष्टि हुई । इसी परंपरा का विकसित रूप गोरखनाथ के नाथ
संप्रदाय में तथा व्यापक एवं पुष्ट रूप ज्ञानाश्रयी निर्गुण भक्ति शाखा में पाया जाता है,
जहाँ संत काव्य अपनो पराकाष्ठा पर पहुँचा प्रतीत होता है ।
वज्रयान के सिद्धों और निर्गुणयों में यह समता है कि दोनों ही ने तत्कालीन
काव्य भाषा की उपेक्षा कर जन भाषा में ही अपनी रचनाएँ कीं । दोनों ने अन्तः
साधना पर जोर दिया और पण्डितों का तिरस्कार कर शास्त्रों को निरर्थक ठहराया ।१
शून्यवाद, सुरति, निरति, इडा, पिंगला, सुपुम्ना आदि को इंगला, पिंगला,
सुखमना आदि बनाकर कबीर ने इसी मत से ले लिया है। सिद्धों ने जिसे 'काया तरुवर
पंच विडाल' कहा केवल उन्हो पाँच विकारों को निर्गुण धारा के संतों ने भी लिया ।
शैली की दृष्टि से भी सिद्धों की 'संधा भाषा' में जो 'कूट' और प्रतीक हैं उन्हीं से
कबीर के रूपक और उलटवासियों का निर्माण हुआ है !
इस प्रकार वज्रयानी सिद्धों तथा वाममार्गियों ने नाथ पंथ का तथा नाथ पंथी
योगियों ने कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण सन्त मत के प्रचार के लिए पहले से ही रास्ता
तैयार कर दिया था ।
नाथ पंथ
भारतीय धर्म साधना में दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में जिन विभिन्न साधनाओं
का बोलबाला था उनमें नाथ पंथ की साधना पद्धति का स्वर अत्यन्त प्रभावशाली रहा
१. (अ) अवणा गमण ण तेन विखंडिअ ।
तो विणिलज्ज भणइ हउं पंडित ॥—सरहपा,
(आ) मै कहता हूँ आँखिन देखी । तू कहता है कागद लेखी । कबीर

११० नामदेव की हिन्दी कविता
जायेगा। नाथ पंथ की साधना को 'हठयोग' की साधना भी कहा गया है जो योग
दर्शन का ही एक प्रकार है।
सन्त सम्प्रदाय का सीधा सम्बन्ध नाथ सम्प्रदाय से है। सन्त सम्प्रदाय ने सिद्ध
सम्प्रदाय से आई हुई नाथ सम्प्रदाय की विचारधारा मूल रूप से ग्रहण की। नाथ
सम्प्रदाय की आचारनिष्ठा, विवेक-सम्पन्नता, अंध विश्वासों को तोड़ने की उग्रता एवं
परम्परागत कर्मकांडों की निरर्थकता सन्त सम्प्रदाय में सीधी चली आई। यहाँ तक कि
उलटबासियों की कुतूहलजनक शैली भी सन्तों को नाथ सम्प्रदाय से ही प्राप्त हुई।
डॉ० कोमलसिंह सोलंकी¹ के अनुसार नाथ पंथ की मूल प्रवृत्तियों को हम
संक्षेप में इस प्रकार रख सकते हैं—
(१) चारित्रिक उत्कर्ष और पवित्रता का आग्रह
(२) स्मार्त आचारों की अवहेलना
(३) निर्गुण भावना में विश्वास
(४) योग साधना का आध्यात्मिक स्वर
(५) ज्ञान और अक्खड़ता की प्रधानता
(६) लोक भाषा द्वारा अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत आदर्श की प्रतिष्ठा।
निर्गुण सन्त कवियों की वाणियों में जिन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है उनमें
जो रूढ़ि-विरोधिता, खण्डनात्मक वृत्ति और अक्खड़ता है वह सब नाथ पंथी योगियों
और सिद्धों की ही देन है। किन्तु हिन्दी का निर्गुण सन्त काव्य ठीक वही नहीं है जो
नाथ पंथी योगियों की रचनाओं में उपलब्ध है। निर्गुण सन्त कवि भक्ति के मर्मस्पर्शी
गायक हैं। योग और ज्ञानमूलक अभिव्यक्ति के साथ भक्ति भावना का अनुकूल वाता-
वरण पाकर निर्गुण सन्त काव्य लोक-जीवन में जिस व्यापक प्रभाव को लेकर अवतरित
हुआ, वह उसकी अपनी विशेषता ही मानी जायगी। फिर भी सन्त सम्प्रदाय के लिए
अनुकूल वातावरण प्रस्तुत करने में नाथ पंथ का महत्त्वपूर्ण योग है इसे कोई अस्वीकार
नहीं करेगा।
वैष्णव धर्म
मध्ययुग में वैष्णव धर्म का बहुत अधिक प्रचार था। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थ भागवत है। भागवत में विविध प्रकार के अवतारों की चर्चा मिलती है। अवतार-
वाद को सर्वाधिक मान्यता देते हुए भी भागवत् निर्गुण ब्रह्म के महत्त्व को नहीं भूली।
सन्तों को वैष्णव धर्म का अवतारवाद का यह सिद्धांत मान्य न था।
१. नाथ पंथ और निर्गुण सन्त काव्य, पृष्ठ १३०।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १११
वैष्णव धर्म में विष्णु और उनके भक्तों के नामों की बड़ी प्रतिष्ठा है । भगवान्
विष्णु के सहस्र नाम बतलाये गये हैं। सन्तों ने अपने निर्गुण ब्रह्म के लिए हरि, गोविंद,
गोपाल, माधो, राम आदि सैकड़ो वैष्णवी अभिधान प्रयुक्त किये हैं। इन समस्त अभि-
धानो में उन्हे राम, गोविंद और हरि विशेष प्रिय थे। सन्तों द्वारा भगवान् के इन
वैष्णवी नामो का प्रयोग उन पर वैष्णव धर्म के प्रभाव के परिणाम-स्वरूप ही है ।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता का सन्तो पर बहुत प्रभाव पड़ा । निर्मलता
तथा सात्विकता की अभिव्यक्ति उन्होंने विविध सद्गुणों के आचरण पर बल देकर की
है ।१ वास्तव में सन्त वैष्णव धर्म की सदाचरण-प्रियता और सात्विकता से बहुत अधिक
प्रभावित थे।
सन्तों ने वैष्णव धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनो की अपेक्षा सर्व-
श्रेष्ठ ठहराया है ।२ प्रेम भगति और भाव भगति का उपदेश तो उन्होंने अपनी रचनाओ
में सर्वत्र दिया है ।३ यहाँ पर हम केवल इसी बात पर बल देना चाहते है कि
वैष्णवो की सदाचरण-प्रियता और प्रेम भगति ने सन्तों को अत्यधिक प्रभावित किया है ।
नामदेव की हिन्दी कविता और निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियाँ
समस्त निर्गुण काव्य का अनुशीलन और अध्ययन करने पर कुछ सामान्य
विशेषताएं समान रूप से सभी सन्तो मे प्राप्त होती है जिन्हें हम निर्गुण काव्य की
प्रवृत्तियाँ कह सकते हैं। नामदेव की रचनाओ में ये सारी प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती
हैं। नीचे इन्ही का विवेचन संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है—
(१) निर्गुण भावना
यह निर्गुण भावना उपनिषद् काल से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करते हुए वे कहते है—
वह निर्गुण ब्रह्म अनेक और एक सब कुछ है। मैं जिधर देखता हूँ उधर वही
है । 'माइया मोहिया' बिरला ही इस बात को समझ सकता है । वह व्यापक राम शत
१. निर्मल तन मन आत्मा निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंच करि दादू लंघे पार ॥
—दादू बानी भाग, १ पृ० ४ ।
२. बिना भक्ति थोथे सभी जोग जुक्ति आचार ।
सहजोबाई की बानी, पृ० ३२ ।
३. भाव भगति सूँ हरि न अराधा । जनम मरन की मिटी न साधा ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० २४४ ।

११२ नामदेव की हिन्दी कविता
सहस्र मणियों में एक सूत्र की भाँति सब में ओत-प्रोत है।१ जिस प्रकार तरंग, फेन
और बुदबुद जल से भिन्न नहीं हैं उसी प्रकार संसार के नाना रूप भी उस एक ही के
रूप हैं जो सब में समाया हुआ है। यह संसार परमात्मा की लीला है। विचार करने
पर भी वह भिन्न सिद्ध नहीं होता। वस्तुतः सब कुछ गोविन्द-मय है। केवल वह एक
मुरारी घट-घट वासी है।२
सर्वत्र राम ही राम है। घट-घट में वही बोल रहा है। स्थावर, जंगम, कीट,
पतंग सब में वही समाया हुआ है। एक ही मिट्टी से हाथी, चींटी तथा नाना प्रकार की
वस्तुएँ बनती हैं। निष्काम की अथवा अनासक्त की दशा उपलब्ध होने पर साम्य भाव
आ जाता है और स्वामी-सेवक भाव जाता रहता है।३
नामदेव का गोविंद (विट्ठल) निराकार एवं सर्वव्यापी है। ब्रह्म ज्ञानी ही इस
बात को समझ सकता है। नामदेव के अनुसार हिन्दू अन्धा है और मुसलमान काना है
(दोनों में यथार्थ को देखने की क्षमता नहीं रह गई है)—इन दोनों में ज्ञानी चतुर है।
हिन्दू मन्दिर में भगवान् को पूजा करता है और तुर्क मसजिद में। नामदेव कहते हैं—
मैं तो ऐसे भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मन्दिर में है न मसजिद में।४
१. मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि-गणा इव। गीता ७, ७।
२. एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित, बिरला बूझै कोई॥१॥
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहि कोई।
सूतु एकु मणि सत सहस्र जैमे ओति पोति प्रभु सोई॥२॥
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न होई।
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला, विचरत आन न होई॥३॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५०।
३. सभै घट रामु बोले रामा बोलै। राम बिना को बोले रे॥१॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हे बहु नाना रे।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि-घटि रामु समाना रे॥२॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे॥३॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १२१।
४. हिन्दू अन्धा तुरकू काणा दोहाते गियानी सिआणा।
हिन्दू पूजे देहुरा मुसलमाणु मसीत॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पृ० २०८।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११३
ठाकुर को स्नान कराने के लिए मैं जल से भरा घड़ा लाया, उस जल में
बयालीस लाख जीव रहते हैं, जिनमें भगवान् का निवास है, फिर मैं उन्हें कैसे स्नान
कराऊँ ? मैं जिधर भी जाता हूँ उधर भगवान् है जो परमानन्द में लीन हो सदैव
लीलाएँ करता है। इधर भगवान् है, उधर भगवान् है, भगवान् के बिना संसार में कुछ
भी नहीं है। नामदेव कहते हैं—हे भगवन् ! पृथ्वी के जल-थल आदि सभी स्थानों में
तुम व्याप्त हो ।¹
ज्ञानी भक्त सब भक्तों में श्रेष्ठ होता है। अपना व्यक्तित्व अपने इष्टदेव के चरणों
पर समर्पित कर देने पर वह स्वयं ईश्वर हो जाता है। उसका अपना अलग अस्तित्व
नहीं रहता । इसीलिए कहा गया है कि 'जीवो भूत्वा शिवं यजेत्' अर्थात् स्वयं विट्ठल
होकर उसकी भक्ति करना ही पराकोटि की भक्ति है। 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' की अनु-
भूति होने पर नामदेव कहने लगे कि केवल मन्दिर ही में परमात्मा का वास नहीं है।
वह सारे संसार में व्याप्त है। अतः मैं फूलों तथा पत्तियों से उसकी पूजा न करूँगा।
हरि की शरण में जाने पर आवा-गोन के फेर से मेरी मुक्ति हुई।²
कबीर तथा अन्य सन्त कवियों की रचनाओं में भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है।
सन्त काव्य धारा की मूल भावना निर्गुण की उपासना है। सन्त कवियों ने भगवान् के
सगुण और निर्गुण इन दो रूपों में से निर्गुण रूप का निर्वाचन किया। उनका निर्गुण
बौद्ध साधकों के शून्य से पृथक् है। वह संसार के कण-कण में व्याप्त है, वही प्रत्येक
साँस में है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह केवल अनुभवगम्य ही है। उसी
को गूँगे का गुड़ कहा गया है। कबीर के अनुसार वह पुस्तकीय विद्या से प्राप्त नहीं हो
सकता, वह प्रेम से प्राप्त है।³
१. आनीले कुंभ भराईले उदक ठाकुर कउ इसनानु करउ ।
बइआलीस लख जी जल महि होते बीठलु भैला काई करउ ॥ १ ॥
जत्र जाउ तत बीठलु भैला । महा आनन्द करे सद केला ॥ २ ॥
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिओ तू सरब मही ॥ ३ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।
२. पातो तोडि पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि को सरना । पुनरपि जनम न होई ।
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६५ ।
३. अकथ कहानो प्रेम की कछु कहो न जाई ।
गूँगे केरी सरकरा बैठे मुसकाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १२० ।
८

११४ नामदेव की हिन्दी कविता
परम तत्त्व की अभिव्यक्ति एक दुर्गम कार्य है । सन्तों ने इस बात को स्वीकार
किया है कि वह जैसा कहा जाता है वैसा ही उसका पूर्ण रूप में भी होना सम्भव नहीं
है, वह जैसा है, वैसा ही है ।१
वास्तव में परम तत्त्व का कोई उपयुक्त विचार ही नही कर सकता । गुरु
नानक के अनुसार वह वाणी और बुद्धि दोना की सीमा से परे है ।२
दादू उस अव्यक्त ब्रह्म को बाहर और भीतर प्रत्येक दिशा में देखते हैं । उनके
अनुसार उसको छोड़कर दूसरा कुछ है ही नहीं ।३
सहजोबाई ने एक स्थान पर लिखा है कि उसका कोई नाम नहीं है फिर भी
सब नाम उसी के है । उसका कोई रूप नही है फिर भी सब रूप उसी के हैं ।४
दादू ने उस नूर-स्वरूपी (ज्योति स्वरूप) ब्रह्म का जिससे ये सब खेलत है,
सुंदर वर्णन किया है ।५
संत रज्जब ने भी घट में ही उस व्यापक ब्रह्म को देखा है ।६
यद्यपि उस पर ब्रह्म को यथार्थ रूप में कोई नही जान सकता तब भी संतों ने
१. जस कहिये तस होत नही, जस है तैसा सोई ।
कहत सुनत सुख उपजै, अस परमारथ होई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २३१
२. सोचे सोच न होवई, जे सोचे लखवार ।
—ग्रन्थ साहब, पृ० १
३. दादु देखौ दयाल को बाहिरि भीतरि सोई ।
सब दिसो देखौ पीव को दूसर नाही होई ॥
—दादू दयाल की बानी भाग १, पृ० २३ ।
४. नाम नही और नाम सब, रूप नही सब रूप ।
—सन्त सुधासार, पृ० १६१ ।
५. नूर सरीखा नूर है तेज सरीखा तेज ।
जोति सरीखी जोति है दादू खेले सेज ।
—दादू दयाल की बानो, भाग १ पृष्ठ ५६ ।
६. सब घट घटा समानि है, ब्रह्म बिज्जुली मांहि ।
रज्जब चमकै बौन में सो समझै कोई नाहिं ॥
—सत बान्य, पृष्ठ ३३६ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११५
उसे तत, परम तत, परम पद, अभै पद, सहज, अं त, सीव, ब्रह्म आदि कई नाम
दिये हैं।१
कबीर के अनुसार ब्रह्म देश, काल और अवस्था से परे अर्थात् सकल अतीत
है। उसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने अनेक प्रकार की चेष्टाएँ कीं किन्तु फिर भी
उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली।२
(२) गुरु महिमा—हृदय को शुद्ध रखने के लिए कुछ कार्य विधेय हैं और कुछ
वर्ज्य हैं। संत काव्य में बार-बार हृदय की पवित्रता के लिए विधि निषेध के अंतर्गत
गुण-ग्रहण और दोष परिहार पर उपदेश दिये गये हैं। विधि निषेध का वास्तविक ज्ञान
तब तक नहीं होता जब तक कि गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त न हो। निर्गुण संप्रदाय में
गुरु का स्थान सर्वोपरि है। नवीन साधकों के लिए तो गुरु परमेश्वर से भी बड़ा हुआ
करता है क्योंकि गुरु कृपा द्वारा ही शिष्य भगवत्कृपा की ओर उन्मुख होना सीख
पाता है।
जिस प्रकार संपूर्ण संत साहित्य में गुरु को सर्वश्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार
नामदेव ने भी गुरु का स्थान सर्वोपरि माना है। सत्य का अन्वेषण और ज्ञान की
प्राप्ति, बिना गुरु-कृपा के संभव नहीं है। नामदेव के लिए गुरु का शब्द बैकुंठ को सीढ़ी
के समान है।३ वे अपने मन को चेतावनी देते हुए दुःख का कारण भी स्पष्ट कर देते
हैं—तूने अनेक बार पशु होकर मानव देह धारण किया। चौरासी लाख योनी में भ्रमण
करता रहा परन्तु कही भी तुझे शांति नही मिली। सत् गुरु की शरण में जाकर तूने
राम नाम का उच्चार नही किया।४
१. कबीर साहित्य की परख—परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ ६१।
२. अलख निरंजन लखै न कोई। निरभै निराकार है सोई॥
सुंनि अस्थूल रूप नहीं रेखा, दिस्टि अद्रिस्टि छिप्यो नहीं पेखा॥
वरन अवरन कथ्यौ नहि जाई, सकल अतीत घट रह्यो समाई॥
आदि अंत ताहि नहीं मधे। कथ्यौ न जाई आहि अकथे।
अपरंपार उपजै नहीं बिनसै। जुगति न जानिये कहिये कैसे॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३०।
३. गुरू को शब्द बैकुंठ निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६।
४. अनेक बार पसु ह्वै अवतर्यो।
लष चोरासी भरमत फिरयो ॥ १ ॥
पायो नही कही विश्राम।
सत् गुरु सरनि कह्यो नही राम ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२४।

११६ नामदेव की हिन्दी कविता
यह निश्चित है कि बिना गुरु प्रसाद के कुछ प्राप्त नही होता ।¹
सद्गुरु की कृपा से ही नामदेव ने साधु का जीवन ग्रहण किया ।²
'गुरु कृपा से जीव के सभी संशय मिट जायेंगे, वह यम यातना से मुक्त हो
जायेगा। उसे निर्वाण पद प्राप्त होगा। गुरु को छोड़कर वह कहो अन्यत्र न जायेगा।
नामदेव कहते हैं कि में तो केवल गुरु ही की शरण में जाऊँगा जिससे सभी प्रकार का
हित संभव है।'³
ईश्वरोन्मुखता के कारण नामदेव का जीवन सफल हो गया जिससे दुख के
स्थान पर वह सुख की अनुभूति हुई है।⁴
अपने एक कूटामक पद में नामदेव कहते हैं कि सद्गुरु ने उनको निर्वाण पद
का मार्ग बताया ।⁵
अपने गुरु विसोबा खेचर का उन्होंने बड़ी श्रद्धा से स्मरण किया है। कहते हैं कि
उनके कृपा-प्रसाद ही से मैने तुलसी की माला पाई। उन्होंने सदगुर होकर मुझे परम
तत्त्व का साक्षात्कार कराया।⁶
१. प्रणवत नामदेव गुर प्रसादे। पाया तिनही सुहावा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. गुरु के मेहेर रो नामा भए साधु ।
देखत रौ लगे जन हे भोदु ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८५।
३. जउ गुरदेव त संसा टूटे।
जउ गुरदेउ त भउ जल तरे।
जउ गुरदेव न जनमि न मरे।
बिनु गुरु देउ अवर नही जाई।
नामदेउ गुरु की सरनाई।
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१६।
४. सफल जनमु मोकउ गुरु कीना।
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०४।
५. सत् गुरु कथीया पद निरवाना।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६।
६. खचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ।
नामा प्रणवे परम तव है सति गुर होइ लखाइआ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०६।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११०
निमिष मात्र में नर किस प्रकार नारायण हो जाता है यह बात मुझे सद्गुरु ने
बताई ।१
जिन पर सद्गुरु का अनुग्रह हुआ वे सब भव सागर पार हुए ।२
साधना का मार्ग रहस्यमय है । जब तक कोई ऐसा गुरु नहीं मिल जाता जो
साधना में सफलता प्राप्त कर चुका है तब तक कोई भी साधक अपनी साधना को
मर्यादित नहीं कर सकता । इसके अतिरिक्त गुरु के महत्त्व का एक कारण और भी
है । गुरु की आध्यात्मिक शक्ति शिष्य के लिए प्रबल प्रेरणा का कार्य करती है ।
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ से किया है । वे कहते हैं कि वे
लोग अंधे है जो गुरु के विषय में कुछ और कहा करते हैं । यदि परमेश्वर रुष्ट हो
जाय तो गुरु हमें बचा सकता है किंतु यदि स्वयं गुरु ही रुष्ट हो जाय तो फिर अपनी
रक्षा की कोई आशा नहीं रह जाती ।३
कबीर के लिए तो गुरु तथा गोविन्द दोनों में कोई भेद नहीं है । गुरु तो
गोविन्द का दूसरा रूप ही है । वे कहते हैं कि गुरु और गोविन्द दोनों मेरे समक्ष खडे
है मैं किसके चरण पकडूं ? मै तो अपने गुरु की ही बलिहारी जाऊँगा जिन्होंने मुझे
गोविन्द के दर्शन कराये ।४
गुरु को परमेश्वर-स्वरूप कहा जाता है । कबीर साहब ने कहा है कि गुरु और
गोविन्द में कोई अन्तर नहीं, केवल आकार मात्र से ही भिन्नता लक्षित होती है । अपने
अहं भाव का त्याग कर के जीते जी मर जाओ तभी तुम्हे वह परमेश्वर प्राप्त होगा ।५
१. नर ते सुर होई जात निमख में सतिगुर बुधि सिखलाई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०५ ।
२. जिह गुरु मिले तिह पारि उतारे ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१५ ।
३. कबीर ते नर अंध है गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठोर है गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३१ ।
४. गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागों पांव ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३० ।
५. गुरु गोविन्द तो एक है दूजा यहु आकार ।
आपा मेटि जोवित मरे, ता पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३ ।

११८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब कहते है कि गुरु-कृपा से ऐसी दृष्टि भास होती है जिससे शिष्य
प्रगट तथा गुप्त बात को पहचान सकता है जिसे न कोई देख सकता है न पहचान
सकता है ।¹
गुरु की महत्ता का वर्णन करते हुए नानक कहते हैं कि गुरु-कृपा से इंद्रादिक
देवता, सनक, सनंदन से तापस तथा तितने ही जन मुक्त हो गये ।²
शिष्य अपने गुरु की सेवा द्वारा मन को ज्ञान के अमृत में स्नान करा कर ६८
प्रधान तीर्थों का फल पा जाता है और उससे उपदेश रूपी रत्न भी पा लेता है ।³
सद्गुरु का मर कर जीने का रहस्य मुझे बहुत पसंद आया ।⁴
दादू दयाल गुरु की महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—मुझे सच्चा और
समर्थ गुरु मिल गया जिसने परम तत्त्व से मेरा परिचय करा दिया ।⁵
जो अपने आप जगत्-जाल में उलझ रहे हैं उनको सारा जगत् उलझा हुआ ही
दीखता है और जो स्वरूप दर्शन द्वारा सुलझ गया है उसे सब कुछ सुलझा हुआ दीखता
है । इस प्रकार का महाज्ञान अथवा महामन्त्र ही 'गुरु ज्ञान विचार' है ।⁶
दरिया साहब (मारवाड़ वाले) कहते हैं कि गुरु के उपदेश से सारा संशय
१. जन रज्जब गुर की दया दृष्टि परापति होय ।
परगट गुप्त पिछानिये जिनहि न दीखै दोय ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३१५ ।
२. गुरु के सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रह्मादि तरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते गुरु परसादि पारि परे ।
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
३. अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ।
गुरु उपदेसि जवाहर माणक, सेवे सिखु सो खोजि लहै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
४. सति गुरु मिले सुमरगु दिखाए । मरण रहण रंगु अंतरि भाए ।
गरबु निवारो गगन पुरु पाए ।
—संत काव्य, पृष्ठ २११ ।
५. साचा समरथ गुरु मिल्या, तिन तत दिया बताई ।
—सन्त काव्य, पृष्ठ २१६ ।
६. दादू आपा उरझै उरझिया दीसै सब संसार ।
आपा सुरझै सुरझिया, यहु गुर ग्यान विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृष्ठ २७५ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११६
मिट गया। गुरु ने हरिनाम की ओषधि देकर तन मन को निरोग किया।¹
मूर्ति पूजा तथा बाह्याडाम्बर का खंडन
कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया—हीन यान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी दो टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान। बुद्ध ने तो
मंत्र, तंत्र तथा जादू टोनों को 'मिथ्या जीव' कह कर तिरस्कृत ही किया किंतु आगे चल
कर उन्हीं के अनुयायियों ने इन्हें निर्वाण प्राप्ति का एक प्रमुख अंग मान लिया।
सिद्धों के वज्रयान की 'सहज साधना' ही नाथ संप्रदाय के रूप में पल्लवित
हुई। इन दोनों संप्रदायों को एक ही विचार-धारा की दो ऊर्मियाँ कह सकते हैं। सिद्ध
संप्रदाय दोनों ने बहिःसाधना के विपरीत अन्त साधना पर जोर दिया और 'घट' के
भीतर ही परम तत्त्व के उपलब्ध होने की बात कही। जिस प्रकार अन्तःसाधना पर इन
दोनों पंथों में जोर दिया गया उसी प्रकार बाह्य आडम्बरों के तीव्र विरोध पर भी
क्योंकि बाह्याडम्बर अन्त.साधना का प्रबल शत्रु है।
तीर्थ स्नान, देवार्चन आदि बाह्याचार का खण्डन करते हुए सिद्ध मत में कहा
गया है कि बोधिसत्वों को ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि की पूजा नही करनी चाहिये।
पत्थर आदि देवताओं को भी पूजा नहीं करनी चाहिए, न तीर्थ ही जाना चाहिए क्योंकि
बाह्य पूजा से मोक्ष नही मिलता।²
भिन्न-भिन्न तीर्थों में घूम कर अनेक देवताओं की पूजा वा आराधना को योगियों
के भी मूर्खता कहा है।³
१. सत गुरु सबदा मिट गया दरिया संसय सोग।
औषद दे हरिनाम का तन मन किया निरोग॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृ० ४२२।
२. ब्रह्म विष्नु महेसुर देवा। बोहिसत ना करहु सेवा॥
देव ने पूजहु तिरथ ण जाना। देव पूजा ही तिरथ ण जावा॥
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
में उद्धृत।
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३।
३. न्हाइये को तीरय न पूजिबे को देव।
भणंत गोरख अलख अभेद॥
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३, पृ० ३६६।

१२० नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदू और मुसलमान दोनो में तीर्थ व्रतादि पाखंडो की सिद्धो और नाथों
दोनो ने कटु आलोचना की है ।
मूर्ति पूजा आदि पूजा की विधिया और बाह्याडम्बरो का तिरस्कार सिद्धो तथा
हठयोगियो दोनो ने किया । इन्ही की परंपरा के कारण सत मत में बाह्य विधानों के
प्रति घोर उपेक्षा बुद्धि का पूर्ण प्रचार था । मुसलमानो के कारण संतो की इस प्रवृत्ति
को प्रोत्साहन मिला । इस प्रकार सत मत पर मुसलमानी प्रभाव मूर्ति पूजा के खडन के
रूप में मिलता है ।
यद्यपि प्रथमत नामदेव विट्ठल मूर्ति के उपासक थे परन्तु बाद में अपने दीक्षा
गुरु बिसोबा खेचर से निगुण निराकार ब्रह्म का उपदेश पाकर वे गदगद हुए । उनकी
भक्ति में जो अध भाव था वह दूर हो गया । अपने मराठी के एक अभग में वे कहते हैं
कि पत्थर की मूर्ति अपने भक्तो के साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने
वाले दोनो भी मूर्ख हैं । १
नामदेव के अनुसार भैरउ, भूत तथा शीतला की उपासना और पूजा व्यर्थ हैं ।
ये कहते हैं कि मै तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ । २
नामदेव ने बाह्याचारो और मिथ्याडम्बरो का घोर विरोध किया है । वे अपने
मन को सबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन । अश्वमेध यज्ञ, तुला दान, प्रयाग के
सगम में स्नान, गया म पिण्ड दान आदि सभी बाह्याचार एकनिष्ठ भक्ति के समक्ष हेय
है । हे मन ! तू सभी भेदो का त्याग कर और निरंतर गोविन्द का स्मरण कर । तू
निश्चय ही ससार सागर से तर जायेगा । इसमें सदेह नहीं । ३
भगवान् की पूजा के लिए जल, पुष्प माला, नैवेद्य, दूध आदि का प्रबंध आडम्बर
१ पाषाणाचा देव बोला भक्तांतें ।
सांगते एकने मूर्ख दोघे ।
—पाँच सत कवी, पृ० १५० ।
२ भैरऊ भूत सीतला धावै । खर वाहन ऊहु छार उड़ावै ॥
हऊ तउ एक रमईआ लेअऊ । आन देव बदलाबनि देहऊ ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०७ ।
३ असुमेध जगने । तुला पुरख दाने । प्राग इस्नाने ॥
तऊ न पूजहि हरि कीरति नामा ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आनसीआ ॥
सिमरि सिमिर गोविंद । भजु नामा तरसि भव सिंध ॥
—पजाबातील नामदेव, पृ० १०४ ।