सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
है। डॉ० भांडारकर का कथन है कि The Mohamedans were often
called Turkas i e Turkas by the Hindus in the early times ' परंतु
तुर्कों ने यह मूर्ति भंजन दक्षिण में ही किया ऐसा नामदेव ने नहीं कहा है। संभव है कि शके
१२१२ में नामदेव ने ज्ञानेश्वर के साथ जो तीर्थयात्रा की उस समय की उत्तर भारत की
परिस्थिति की ओर उन्होंने संकेत किया हो। दक्षिण में रहते हुए भी उत्तर में मुसलमानों
के आक्रमणों का इस अभंग में वर्णन करने की संभावना है।
कुछ अंग्रेज ग्रंथकारो जैसे डा० निकाल मैकिनकाल १ आदि ने डॉ० भांडार-
कर द्वारा निर्धारित नामदेव के जन्म काल को ही ग्राह्य माना है अत उनके मत के
परीक्षण की आवश्यकता नहीं।
डॉ० जे० एन० फ़र्कुहर २ ने नामदेव का काल ई० स० १४३० के आस पास
निर्धारित कर उसके आधार पर रामानंद का काल निश्चित किया है।
डा० मोहनसिंह का मत
डा० मोहनसिंह 'दीवाना ३ ने नामदेव का काल सन् १३६० और १४५० ई०
के बीच माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद४
माना है, जिसके नामदेव रचित होने में डॉ० राजनारायण मौर्य को संदेह है। ५
डॉ० मोहनसिंह ने फीरोजशाह बह्मनी को ही वह सुलतान माना है जिस ने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फीरोज सुलतान फीरोजशाह खिलजी
( राज्यकाल सन् १२८२ ई० से १२६६ तक ) के साथ नामदेव के काल का
मेल नहीं बैठता और फिरोजशाह तुगलक ( राज्यकाल सन् १३५१ ई० से १३८८ ई०
तक ) के साथ स्थान का मेल नहीं बैठता क्योंकि फीरोजशाह न तो दक्षिण में आया
था और न संत नामदेव दिल्ली ही गये थे। इसी आधार पर डा० मोहनसिंह ने नाम-
1 Psalms of Maratha Saints ( 1919 )
2 Historical Position of Ramanand
—J R A S of Great Britain & Ireland April 1920
३ भक्त शिरोमणि नामदेव की नई जीवनी नई पदावली, पृ० ३
४ सुलतानु पूछै सुनु वे नामा। देखऊ राम तुम्हारे कामा ॥
—गुरु ग्रंथसाहब नामदेव के हिंदी पद, ४७ वाँ
५ हिंदुस्तानी ( जनवरी-मार्च १६६२ ) पृ० ११२
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७१
देव का काल खींचकर आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है
संत नामदेव का रामानंद का शिष्य होना । वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और
३० ई० के बीच तथा कबीर का सन् १४५० और ६० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नही है। इसका तो कही
उल्लेख भी नही है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। मराठी और हिंदी साहित्य में भी
यह प्रचलित है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता के गुरु रामानन्द थे । किन्तु श्री भावे¹ के
मत से उनके गुरु श्रीपाद स्वामी थे । रामानन्द का काल आज भी निश्चित नही है पर
इतना अवश्य निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे संत नामदेव के गुरु नही हो
सकते ।
आचार्य विनयमोहन शर्मा को इस घटना के घटित होने में ही संदेह है। यदि
इस पर विश्वास करें तो यह पद प्रक्षिप्त मानना पड़ेगा । उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपना
मत इस प्रकार व्यक्त किया है— 'यदि किसी सुलतान के दरबार में यह घटना घटी
होती तो वह अवश्य ही लेखबद्ध हुई होती । हो सकता है यह घटनावाला 'पद' भग-
वान विठ्ठल के नाम का चमत्कार प्रदर्शित करने के लिए रचा गया हो । उपर्युक्त
कारणों से नामदेव का फीरोजशाह वहमनी के समय रहना सिद्ध नही होता ।'²
इस घटना के आधार पर नामदेव के काल को सौ वर्ष आगे ले जाना किसी
तरह तर्क-संगत नही कहा जा सकता ।
मेकालिफ का मत
मेकालिफ ने नामदेव के असंग 'मार्के जन्मपत्र बाबाजी ब्राह्मणों' का आधार
लेकर शके ११९२ (तदनुसार स० १२७० ई०) को नामदेव का जन्म-शक माना है—
‘Namdeo was born on Sunday, the 11th day of the light half of
the month of Kartik in the Shaka year 1192 i, e. 1270 A. D.’³
जनम साखी
सं० १८६८ ई० में बाबा पूरणदास की लिखी 'जनम साखी श्री स्वामी नाम-
देव जी की, में वामदेव की बाल विधवा कन्या लक्षावती की कथा आई है। इस कथा में
कहा गया है कि अपनी १२ वर्ष की अवस्था में ही पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से उसके
पेट से जो बालक पैदा हुआ वही नामदेव है । इस बालक का जन्म रविवार फाल्गुन
१. महाराष्ट्र सारस्वतः वि० ल० भावे, पृ० १३३ ।
२. हिंदी को मराठी संतों की देन पृ० ३०
3. Sikh Religion Vol. VI : Mcauliffe
बद्य पंचमी संवत् १४२० (सं० १३६३ ई०) को हुआ—
बद्य पंचमी संवत् १४२० (सं० १३६३ ई०) को हुआ— संमत चौदा से अरु बीस। चरत कीआ एह धी जगदीस।
फाग मास आगमन करतूती। रितु राज अनूप सुहाई। तिय पंचमी पाई बडाई।
रव दिन एक महुरत आईआ। बामकुमारी बालक पाईआ। बाबा पूरणदास की 'जनम साखी' के इस उद्धरण से फाल्गुन, वसंत पंचमी,
रविवार संवत् १४२० को नामदेव का जन्मकाल निश्चित किया गया है। स्व० म० गो० आटवले ने१ इसे त्याज्य ठहराया है क्योंकि पिले जन्त्री के अनुसार उस दिन
रविवार न आकर गुरुवार आता है। अंग्रेजी तारीख फरवरी १३६४ आती है। और शके १२८५।
'रितु रितुराज अनूप सुहाई। तिय पंचमी' के अनुसार बहुतों ने 'पंचमी' को अपनी सुविधा के अनुरूप 'वसंत पंचमी' गृहीत कर चर्चा करने का प्रयत्न किया है।२
`[L13
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएं ७३
है। इसमें भारद्वाज और भिंगारकर के विवाद का उल्लेख कर कहा गया है—'अखां तां
नामदेव दे जनम मरणादि तारीखों तो जो मरहठी कताव विच दिती आ हन । उपरला
सिटा कढिभासी असे ओह सानु । ठीक वी मलूम देंदा है ।'
स्व० बारटक्के के अनुसार पंजाब युनिवर्सिटी के प्राध्यापक तथा लाहौर की
गुरुद्वारा कमिटी के सभासद ज्ञानी खजानसिंह ने कुछ घटनाओं को छोड़कर इसी मत
का अनुमोदन किया है ।
दरबार कमिटी घुमान द्वारा प्रकाशित बाबा भगतराम चरित 'श्री स्वामी नाम-
देव ' शीर्षक जीवनी में बाबा भगतराय ने सं० १३७० ई० को नामदेव का जन्मकाल
माना है ।
पं० बलदेव प्रसाद ने 'संत बानी संग्रह' में नाभादास के 'भक्तमाल' के आधार
पर नामदेव का जन्मकाल ई० स० १४२३ अर्थात् शके १३४५ के आस पास निश्चित
किया है ।
पं० वंशीधर शास्त्री ने बाबा पूरनदास-चरित 'जनम साखी' में गृहीत नामदेव
का जन्मकाल शक संवत् १४२० (शके १२८५) स० १३६३ ई० को ही प्रामाणिक
माना है ।
पंजाबी परंपरा द्वारा अनुमोदित नामदेव के काल का कोई आधार प्रस्तुत नहीं
किया गया है ।
महाराष्ट्रीय विद्वानों के मत :
सुप्रसिद्ध दार्शनिक डॉ० रा० द० रानडे लिखते हैं कि नामदेव ही के एक अभंग
के अनुसार उनका जन्म शके ११६२ में हुआ :—
"From an Abhang written by Namdeva himself, it seems thaI
Namdeva was born in 1270 A. D. (Sake 1192), that is a few years
before Dnanadeva. Namdeva tells us that a certain Brahmin Baba-
ji by name had cast his horoscope, toretelling that Namdeva would
compose a hundred crores of Abhangs '’¹
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ० शं० गो० तुलपुले बिना किसी तर्क के शके ११६२
ही को नामदेव का जन्मकाल मानते हैं—'संप्रति नीचे उद्धृत किये गये अभंग को
आधार मानकर स्वर्गीय भिंगारकर ने नामदेव का जो काल निश्चित किया है, वह
समीचीन प्रतीत होता है ।'²
१. Mysticism in Maharashtra p. 185.
२. पाँच संत कवि,—पृ० १३७ ।
प्रथम भाग: साखी एवं पद संग्रह (नाम-सुमिरन व गुरु-महिमा)
७४ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव-विरचित निम्नलिखित अभंग¹ को आधार मानकर श्री ल० ग०
पांगारकर नामदेव का जन्मकाल शके ११६२ मानते हैं—'शके ११६२, प्रभव संवत्सर,
कार्तिक शुक्ल ११, रविवार को सूर्योदय के समय गोणाई प्रसूत होकर उसको जो पुत्र
हुआ, उसका नाम नामदेव रखा गया ।' श्री० पांगारकर नामदेव को अयोनिज
मानते हैं ।²
हिन्दी के विद्वानों के मत
आचार्य विनयमोहन शर्मा डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' के मत का खण्डन करते
हुए नामदेव के जन्मकाल के सम्बन्ध में अपना मत इस प्रकार व्यक्त करते हैं—'ज्ञानदेव
का समय उन्हों की कृति ज्ञानेश्वरी से प्राय: निर्णीत ही है । और वह है—सं० १२७५-
१२६६ ई० । नामदेव, ज्ञानदेव की समाधि के लगभग ५० वर्ष बाद समाधिस्थ हुए
अर्थात् १३५० ई० में उनका निर्वाण हुआ । उनका जन्म ई० सं० १२७० में हुआ ।
फीरोज बहमनी का काल १३६७-१४२२ ई० है जिसे नामदेव का काल नही माना जा
सकता ।'³
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी महाराष्ट्र में प्रचलित नामदेव के जन्म शक ही का
अनुमोदन करते हैं—
'सन्त नामदेव के जन्म का समय कार्तिक सुदी ११ शके ११६२ ( तदनुसार
सन् १२७० ई० अथवा सं० १३२६ ) कहा जाता है और इस विषय में अधिक मतभेद
नही दिखलाई पड़ता ।'⁴
डॉ० बड़थ्वाल लिखते हैं—'मराठी के उनके एक अभंग से पता चलता है कि
उनका जन्म संवत् १३२७ ( सन् १२७० ई० ) में हुआ था ।'⁵ इस विषय में वे डॉ०
रानडे के मत से सहमत है ।
डॉ० रामकुमार वर्मा नामदेव द्वारा दी गई तिथि को ही प्रामाणिक मानते
हैं—'ये दामा शेट नामक दर्जी के पुत्र थे और इनका जन्म संवत् १३२७ ( सन् १२७०
ई० ) में हुआ था ।'⁶
१. माझे जन्मपत्र बाबाजी ब्राह्मणे । सकल संत गाथा, अभंग १२५४
२. मराठी वाङ्मयाचा इतिहास ( खंड पहला )—पृ० १५५
३. हिन्दी को मराठी सन्तों की देन—पृ० १०६
४. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा—पृ० ११०
५. हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय—पृ० ६६
६. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २१७
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७५
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नामदेव का जन्मकाल शके ११८६ है ।
'महाराष्ट्र देश में नामदेव का जन्मकाल शक संवत् ११८६ और मृत्यु काल शक संवत्
१२७२ प्रसिद्ध है ।'¹
संभाव्य जन्म शक
ज्ञानदेवकालीन नामदेव का जन्मकाल निम्नलिखित तीन शको के आधार पर
निश्चित करना होगा—
(१) शके ११८५
(२) शके ११८६
(३) शके ११९२
श्री शं० पु० जोशी ने शके ११८५ को नामदेव का जन्मकाल माना है ।²
श्री आजगांवकर ने अपने नामदेव चरित्र में इसी का अनुमोदन किया है ।³
श्री भारद्वाज⁴ ने शके ११८६ को न्याय्य ठहराया है । यह शक अभंग के
साथ विसंगत होने के कारण उसको नामदेव का जन्म शक नही माना जा सकता ।
ग्राह्य शक और अभंग की चिकित्सा
शके ११९२ को नामदेव का जन्मकाल स्वीकार करने से इस समस्या के हल
होने की सम्भावना है । परन्तु इसमें एक बात खटकती है । शके ११९२ में 'प्रभव'
नही बल्कि 'प्रमोद' संवत्सर आता है । इस विवाद विषय को छोड़ दिया जाय तो
तिथि, वार तथा मास सब मेल खाते हैं । दोनों संवत्सरो के नाम का प्रारम्भ 'प्र' से
होने के कारण लेखन-प्रमाद की भी सम्भावना है ।
निष्कर्ष
'माझें जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणें' शीर्षक अभंग में नामदेव के जन्म के शक,
मास, तिथि तथा वार आदि सम्बन्धी सत्य पर आधारित जानकारी पाई जाती है ।
इसमें विसंगतियां कम और सुसंगतियां अधिक मात्रा में पाई जाती हैं । ज्ञानदेवकालीन
नामदेव के साथ इनका मेल बैठने से शक संवत् ११९२ को ही नामदेव का जन्म काल
मानना उचित होगा ।
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास ( सं० २०२२ का संस्करण ) पृ० ६८ ।
२. पंजाबातील नामदेव, — पृ० १५
३. संत शिरोमणि नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत ।
४. श्री भारद्वाज के लेख: 'सुधारक' १८६८ ।
७६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव का समाधि शक विकृत नाम संवत्सर शके १२७२, आषाढ वद्य १३,
शनिवार निश्चित किया गया है। अतः शके ११९२ को नामदेव का जन्म काल तथा
शके १२७२ को उनका समाधि काल मानना ‘ऐंशी वर्षे आयुष्य पत्रिका प्रमाण’ इस
चरण के साथ पूर्णतया सुसंगत है।
जन्म स्थान
सबसे जटिल तथा महत्त्वपूर्ण प्रश्न नामदेव के जन्म स्थान का है। जन्मकाल
की ही तरह उनके जन्म स्थान के सम्बन्ध में भी अनेक मत प्रचलित हैं। इस विषय
में अभी तक कोई एक निश्चित धारणा नहीं बनाई जा सकी है।
नामदेव के जन्म स्थान के सम्बन्ध में दो मत प्रस्तुत किये जाते हैं—
(१) नामदेव का जन्म स्थान पंढरपुर है।
(२) नामदेव का मूल गाँव नरसी है और वहीं उनका जन्म हुआ।
नामदेव का जन्म पंढरपुर में होने के पक्ष में निम्नलिखित प्रमाण उपलब्ध हैं—
जनाबाई अपने एक अभंग में कहती है—‘नामदेव के जन्म के पूर्व उसके माता-
पिता पंढरपुर में रहते थे। गोणाई ने पुत्र प्राप्ति के लिए मनौती की। उसको जो बेटा
हुआ वही नामदेव है।’¹
सन्त एकनाथ ने नामदेव-जन्म की इसी कथा को दुहराया है।²
हिन्दी में नामदेव का सर्वप्रथम चरित्र लिखने वाले परिचयीकार अनन्तदास
हैं। उन्होंने ‘नामदेव की परचै’ में नामदेव का जन्मस्थान पंढरपुर बताया है।³
डॉ० भागीरथ मिश्र स्पष्टतः लिखते हैं कि ‘नामदेव का जन्म कराड के नरसी
१. गोणाईने नवस केला । देवा पुत्र देई भला ॥
शुद्ध देखोनिया भाव । पोटी आले नामदेव ।
—आपटे प्रत, अभंग १३६
२ द्वारकेहुनि विठु पंढरीये आला । नामयाचा पूर्वज दामाशेट्टी वहिला ।
—आपटे प्रत, अभंग १५५७
३ पंढरपुर जहाँ नगर सहन भोग कराही ।
नामदेव को पिता बसे बैरोजा माही ॥
जाको पुत्र पुनीत नामदेव सब विधि पूरो ।
सकल सिरोमनि सन्त विप्र सूर निभे सूरो ॥
—नामदेव की परिचयी ( हस्तलिखित प्रति )
जयकर ग्रन्थालय, पूना विश्वविद्यालय, पूना।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७७
बामनी गाँव में हुआ था, और कुछ ही दिन पश्चात् उनके माँ-बाप पंढरपुर जाकर
रहने लगे थे ।'¹
डॉ० भगीरथ मिश्र इस सम्बन्ध में डॉ० भाडारकर, माधवराव अप्पाजी मुले,
पाडुरंग शर्मा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य विनयमोहन शर्मा, आचार्य परशुराम
चतुर्वेदी और मेकालिफ के मत का ही अनुसरण करते हैं । वे डॉ० शं० गो० तुलपुले,
श्री० पांगारकर, धो भावे, श्री केशवराव कोरटकर तथा डॉ० ईनामदार की इस
स्थापना को अस्वीकार करते हैं कि नामदेव का जन्म परभणी जिले के नरसी बामनी
गाँव में हुआ था ।
इस सन्दर्भ में डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित का मत दृष्टव्य है—'डॉ० भगीरथ
मिश्र के विचारों में विभिन्न मतों के बीच समन्वय खोज निकालने की भावना ही
प्रबल है । क्योंकि नामदेव द्वारा अपने पिता के सम्बन्ध में यह कहा जाना कि वह
नरसी बमनी के निवासी थे यह सिद्ध नहीं करता कि नामदेव का जन्म भी यही हुआ
था । और यह नरसी बमनी कराड के अन्तर्गत वाली ही है । नरसो बमनी उनके कुल
का मूलस्थान हो सकती है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस
अभंग में दामा शेट को नरसी बमनी का शिंपी बताया गया है उसे अनेक विद्वानों ने
प्रक्षिप्त बताया है । अत. उसके आधार पर कुछ भी कहना सम्भव नही है ।'²
सारा विवाद इस बात को लेकर चला है कि नरसी ब्राह्मणी कहाँ स्थित है ?
सातारा जिले के कराड के पास अथवा मराठवाडा के परभणी जिले में ? इस विषय
में विद्वानों में मतैक्य नहीं है । नरसी की स्थिति के सम्बन्ध में तीन मत प्रस्तुत किये
जाते हैं :—
(१) कराड के पास कृष्णा-तट पर
(२) सोलापुर जिले की बार्सी के पास
(३) मराठवाड़ा के परभणी जिले में
अब हम क्रमशः एक-एक मत पर विचार करेंगे—
(१) कराड के पास कृष्णा तट पर .—डॉ० भाडारकर नरसी ब्राह्मणी गाँव
को कराड के समीप सातारा जिले में स्थित बताते हैं जो अब बहे नरसिंगपूर अथवा
कोले नरसिंगपूर कहलाता है ।³
१. सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली—पृ० ३२
२. नामदेव का कृतित्व . डॉ० आनंदप्रकाश दीक्षित—पृ० ११२
'राष्ट्रवाणी'—सन्त नामदेव विशेषांक,
—अक्तूबर-नवंबर, १६७०
३. वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड अदर मायनर रिलीजस सिस्टम्स—पृ० ८१
'श्री नामदेव चरित्र' के लेखक श्री माधव अप्पाजी मुले के अनुसार—'श्री
नामदेव महाराज के वंश का मूल पुरुष यदुशेट था। यह जाति का 'शिंपी' (दर्जी)
था और उसका उपनाम रेलेकर था। यह कराड के निकट कृष्णा-तट पर नरसी
ब्राह्मणी नामक एक देहात का रहने वाला था। इसी देहात को बहे नरसिंगपूर अथवा
कोले नरसिंगपूर कहा जाता है।'१
बहे नरसिंगपूर अथवा कोले नरसिंगपूर को ही नामदेव की नरसी मानकर तथा
वहाँ के दैवत श्री नरसिंह का नामदेव के घराने के साथ सम्बन्ध दिखाते हुए स्व०
पाटसकर लिखते हैं—
'नामदेव के पूर्वजों का कुल दैवत श्री नरसिंह था। वहां की समाधि नामदेव
की न होकर उनके पूर्वजो की है जो नरसिंह के परम भक्त थे।'२
डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित भी नरसी को कराड के पास मानने के पक्ष में हैं।
वे स्पष्टतया लिखते हैं—'यों तो कराड के पास की नरसी बमनी में उनके पूर्वज की
समाधि भी है और इससे उनका मूलस्थान वह अधिक सिद्ध हो सकता है।'३
इस विषय में डॉ० बडथ्वाल,४ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,५ आचार्य विनयमोहन
शर्मा,६ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी,७ डॉ० रामकुमार वर्मा,८ डॉ० रामचन्द्र
१. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण, सन् १९५२), पृ० २७
२. बालभक्त श्री नामदेव महाराज दरोडेखोर होते काय ? पृ० १३
३. नामदेव का कृतित्व : 'राष्ट्रवाणी'
—अक्तूबर नवम्बर १९७०,—पृ० ११२
४. 'नामदेव का जन्म सातारा जिले के नरसी बमनी गाँव में एक शैव परिवार में
हुआ था।' —हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय, पृ० ६५।
५. 'ये दक्षिण के नरसी वमनी (सातार जिला) के दरजी थे।
—हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ६८।
६. 'नामदेव ने नरसी ब्राह्मणी गांव में जन्म धारण किया।'
—हिन्दी को मराठी संतों की देन, पृ० ६८।
७. 'इनका (नामदेव का) जन्म सातारा जिले के अन्तर्गत कन्हाड के निकटवर्ती किसी
नरसी बमनी गाँव में हुआ था।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०६।
८. 'क्योकि नामदेव का कुटुम्ब पहले नरसी बामणी गाँव (कन्हाड-सातारा) में ही
निवास करता था। बाद में वह पंढरपुर में आ बसा था, जहाँ नामदेव का जन्म
हुआ।' —हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० २३६।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७६
मिश्र¹ तथा मेकलिफ² भी यही मत रखते हैं।
(२) सोलापुर जिले की बार्शी के पास :—ऐसा भी एक मत प्रस्तुत किया
जाता है कि नरसी ब्राह्मणी सोलापुर जिले की बार्शी के पास है। गाथा में बार्शी का
उल्लेख दो बार आया है—
(१) बारसी भगवन्त तेरसी तिळया । विट्ठलु सोयरीया पांडुरंगा ॥
अभंग १७५३।
यह अभंग विष्णुदास नामा का है संत नामदेव का नही ।
(२) द्वादशीच्या गावी जाहला उपदेश । देवावीण ओस स्थल नाही ।
अभंग १३६१
इस अभंग से इतना ही पता चलता है कि बिसोबा खेचर ने नामदेव को बार्सी
के भगवंत के मंदिर मे उपदेश किया।
परन्तु सोलापुर जिले में नरसी अथवा नरसी ब्राह्मणी अथवा नरसी बामणी
नाम का गांव आज भी नही है और पहले होने का प्रमाण उपलब्ध नही होता ।
(३) मराठवाडा के परभणी जिले में :—कुछ वर्ष पहले तक अर्थात् सं०
१९२६ ई० तक नरसी ब्राह्मणी को जिला सातारा में माना जाता था। पर १९२६ में
पूना के भारत इतिहास संशोधक मंडल की त्रैमासिक पत्रिका मे श्री० केशवराव कोरटकर
का एक लेख छपा जिसमें बताया गया कि नरसी ब्राह्मणी गांव मराठवाडा के परभणी
जिले में है। तब से लगभग सभी विद्वान् परभणी जिले की नरसी ब्राह्मणी को नामदेव
का जन्मस्थान मानने लगे है। श्री पांगारकर, डॉ० शं० गो० तुलपुले, न्यायमूर्ति
केशवराव कोरटकर, डॉ० हे० वि० इनामदार आदि इसी मत के समर्थक है।
श्री पांगारकर के अनुसार 'नरसी बामणी मोगलाई में परभणी जिले मे है।'³
डॉ० शं० गो० तुलपुले भी इस विषय में श्री पांगारकर से सहमत है—'उनका
(नामदेव का) पिता दामा शेट शिंपी मूलतः परभणी प्रांत के नरसी बामणी गाँव का
रहने वाला था।'⁴
१. 'बम्बई अहाते के सातारा जिलान्तर्गत नरसी बमनी ग्राम में नामदेव का जन्म
हुआ।'
—संत नामदेव और हिन्दी पद साहित्य, पृ० ६० ।
2. 'Namdev was the son of Damasheti, a tailor who resided at
Narsi Bamani, a village near Karad'.
—Sikh Religion Vol. VI, p. 17.
३. मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहला) पृ० ५५५ ।
४. पाँच संत कवी, पृ० १३७ ।
८० नामदेव की हिन्दी कविता
न्यायमूर्ति केशवराव कोरटकर के अनुसार 'नरसी पुरानी हैदराबाद रियासत के
(आज के महाराष्ट्र राज्य के) परभणी जिले के हिंगोली तालुके में है। ब्राह्मणी नाम का
गाँव वहाँ नहीं है। अलबत्ता बामणी नामक एक गाँव है जो नरसी से दस कोस पर है।
यह भी इसी परभणी जिले में है। ये दोनों गाँव परस्पर कैसे संबद्ध हुए यह कहा नहीं
जा सकता। औंढ्या नागनाथ का मंदिर नरसी से पाँच कोस पर है। नामदेव-चरित्र में
ऐसा उल्लेख पाया जाता है कि नामदेव प्रतिदिन नागनाथ के दर्शन के लिए जाया करते
थे। नामदेव का नागनाथ के दर्शन के लिए प्रतिदिन नरसी से औंढ्या जाना सम्भव है
परन्तु नरसी को यदि हम बार्शी के पास मानें तो नामदेव का नित्य नागनाथ के दर्शन
के लिए जाना युक्ति-संगत नहीं लगता क्योंकि बार्शी से औंढ्या नागनाथ ४० कोस अथवा
उससे भी अधिक दूरी पर है। मेरा अपना गाँव कसबा कोरट है जो औंढा से तीन कोस
पर है। मेरे गाँव ही में नहीं तो हमारे इलाके में सभी इसी नरसी को नामदेव की नरसी
समझते हैं।'¹
डॉ० हे० वि० इनामदार² श्री० केशवराव कोरटकर के मत का समर्थन कर
नरसी को मराठवाड़ा के परभणी जिले में ही मानते हैं। वे निम्नलिखित तर्क उपस्थित
कर नरसी को वराड के पास मानने वालों के मत का खण्डन करते हैं--
(१) दामा शेट का विट्ठल का उपासक होने का गाथा में³ उल्लेख है परन्तु
उनके नरसिंह के भक्त होने का कहीं निर्देश नहीं पाया जाता। प्रस्तुत अभंग प्रक्षिप्त है।
उसी में नामदेव की डकैती का भी उल्लेख है।
(२) नरसिंह का मंदिर नरसिंगपूर में है और केशवराज की मूर्ति तांबवे में है।
(३) श्री पाटसकर के अनुसार नरसिंगपूर के पास नदी तट पर जो समाधि है
वह सिद्धेश्वर महाराज के बड़े बेटे की है। वह समाधि नामदेव के पूर्वजों की नहीं है।
नरसी का मराठवाड़े में होने का एक और प्रमाण
महाराष्ट्र शासन के प्रकाशन विभाग ने 'महाराष्ट्र के जिले · परभणी' नामक एक
पुस्तक बम्बई से प्रकाशित की है। इसमें औंढ्या नागनाथ, नरसी और बामणी इन तीन
गाँवों का स्वतन्त्र रीति से उल्लेख किया गया है।
१. 'नामदेवाची नरसी', पृ० १२०-१२१ ।
—भारत इतिहास संशोधक मंडल, त्रैमासिक पत्रिका, वर्ष ७ वाँ, अंक १-४ ।
२. संत नामदेव डॉ० हे० वि० इनामदार, पृ० ३० ।
३. नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिपी ।
केशीराज रूपी मग्न असे ।
—आवटे प्रत, अभंग १२४५ ।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८१
इन तथ्यों के परीक्षण पर डॉ० इनामदार इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'कराड
के निकट का, कृष्णातट पर का आज का बड़े नरसिंहपूर अथवा कोले नरसिंहपूर ही
नामदेव की नरसी ब्राह्मणी है, यह मत स्वीकार नही किया जा सकता ।'१ वे स्पष्ट
शब्दों में अपना निर्णय घोषित करते हैं कि परभणी जिले की नरसी बामणी ही नामदेव
की नरसी है ।
डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित के अनुसार नरसी के मराठवाड़ा के परभणी जिले
में होने के पक्ष में डॉ० इनामदार ने जो तर्क दिये हैं वे समाधानकारक नही हैं । वे
लिखते है—'डॉ० इनामदार के परभणी के पक्ष में दिये तर्क उतने सार्थक प्रतीत नहीं
होते । डॉ० इनामदार, बचपन में ५-७ वर्ष की आयु तक तो नामदेव को पंढरपुर में ही
मानते हैं और जिस अभङ्ग का सहारा लेकर परभणी के पक्ष का समर्थन करते है उसे
स्वयं अन्यत्र प्रक्षिप्त और अप्रामाणिक कह चुके हैं ।'··· न वे इस बात पर प्रकाश डालते
है कि बालपन की वह कौन-सी अवस्था थी जिसमें नामदेव पंढरपुर छोड़कर औंढ्या के
नागनाथ में अनुरक्त हो गये और नित्य पांच कोश उनका दर्शन करने जाने लगे । साथ
ही इस अप्रामाणिक अभङ्ग की प्रारम्भिक पंक्ति 'नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी ।
केशवराज रूपी माग असे ।' को अन्यत्र अस्वीकार करते हुए भी वे औंढ्या और केशव-
राज मंदिरो की स्थिति का परभणी के पक्ष में समर्थन करने लगते है । वस्तुतः उनके
कथन आत्मविरोधी हैं ।'२
डॉ० दीक्षित का विचार है कि औंढ्या नागनाथ और विसोबा खेचर सम्बन्धी
सारा कथानक नामदेव के बालपन का नही उनकी बड़ी आयु का है । केवल इसी आधार
पर वे नरसी बमनी को परभणी के अन्तर्गत मानने के लिए तैयार नहीं है ।
डॉ० इनामदार ने नरसी में नामदेव की समाधि होने का जो तर्क उपस्थित
किया है उसके सम्बन्ध में भी डॉ० आनन्दप्रकाश का मत दृष्टव्य है—'रहा यह कि वहाँ
नामदेव की समाधि भी है तो उसके सम्बन्ध में हमारा निवेदन है कि यों तो कराड के
पास की नरसी बमनी में उनके पूर्वज की समाधि भी है और इससे उनका मूलस्थान
वह अधिक सिद्ध हो सकता है । दूसरे, समाधिस्थान अनिवार्यतः किसी का जन्मस्थान या
या मूलस्थान नही होता । विशेषतः सन्तो की समाधि तो लोग कही भी बना लेते हैं ।
सन्त जन्मे कही और हो और मृत्यु का वरण कही और का हो । हो सकता है इसी
१. संत नामदेव. डॉ० ह० वि० इनामदार, पृ० २७ ।
२. नामदेव का कृतित्व : डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित, पृ० ११२ ।
'राष्ट्रवाणी' का संत नामदेव विशेषांक, अक्तूबर, १९७० ।
६
, then ०. That MUST be 1970! A magazine issue in "October 1970" (अक्तूबर १९७०)! And footnote 2: सन् १९५२(1952)! And line 27:(९) गोडाई! That digit IS ९! In this particular typeface, ९has that specific shape! It is the digit ९! So: Line 27 is(९) गोडाई : विठा की पत्नीLine 30 is—'राष्ट्रवाणी' का संत नामदेव विशेषांक, अक्तूबर १९७० ।Line 31 is२. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) सन् १९५२, पृ० २७ ।Wait, let's look at६in line 24 vs९in line 27: In line 24:(६) नारा- wait, how is ६ drawn? Look at line 24:(६)- it has a curl at the top-left, going down and looping at the bottom. Now look at९` in line 27, line 30, line 31:
Wait, they are identical glyphs! Why would 1970 and 1952 be written with that?
Because the typesetter's font has that glyph for ९, or the typesetter literally used the ६
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएं ८३
(११) येसाई : गोदा की पत्नी
(१२) महादा : नामदेव का चौथा बेटा
(१३) साखराई : महादा की पत्नी
(१४) लिंबाई : नामदेव की बेटी
(१५) जनाबाई : नामदेव के घर की दासी ।
जन्म
नामदेव के जन्म के सम्बन्ध में बहुत सी अलौकिक कथाएं महाराष्ट्र तथा उत्तर
भारत में प्रचलित हैं । महाराष्ट्रीय संतों के चरित्र-लेखक महीपति के अनुसार नामदेव
की उत्पत्ति सीप से हुई ।¹
प्रियादास के अनुसार नामदेव एक विधवा के गर्भ से उत्पन्न हुए ।²
नामदेव की गाथा का एक प्रसिद्ध अभङ्ग भी सत्य का विपर्यास करने वाला है ।
'परमात्मा ने शुक्ति (सीप) रूपी कमल दिया और कहा कि नौवां मास प्रारम्भ होने पर
वह विकसित होगा ।'³
क्या नामदेव अयोनिज थे ?
महीपति ने नामदेव को जो अयोनिज बताया है वह केवल उनकी महत्ता बढ़ाने
के लिए । प्रियादास का कथन तो आज के वैज्ञानिक युग में अवैज्ञानिक-सा लगता है ।
यह भी भक्त और भगवान् की महिमा दिखाने के लिए कहा गया है ।
वास्तव में नामदेव अयोनि-संभव नहीं थे । स्वाभाविक रीति से ही अपनी माता
के उदर से उनका जन्म हुआ । स्वयं वे कहते हैं—
'मेरी माता ने मुझे जन्म दिया ।'⁴
छीपे के घर मेरा जन्म हुआ ।'५
१. भक्त विजय (निर्णयसागर प्रति, १९५०) अध्याय चौथा ।
२. भक्तमाल (सटीक) : प्रियादास प्रणीत, पृ० ३२५ ।
३. देवाने दिधले शुक्ति का कमल । म्हणे उकनेल नववे मासी ॥ अ० १२४५ ।
४. प्रसवली माता मज मलमूत्री ।
—गाथा पंचक, अ० १२५४ ।
५. छीपे के घर जनमु दैला ।
—पंजाबातील नामदेव, पृ० ८६ ।
८४ नामदेव की हिन्दी कविता
गोणाई कहती है कि 'नव मास तक मैने गर्भ का बोझ ढोया ।'१
जाति तथा व्यवसाय
प्राचीन वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत हर एक व्यक्ति का व्यवसाय उसकी जाति पर
ही निर्भर होता था। अतः नामदेव अपना पैतृक व्यवसाय अर्थात् 'शिंपी काम' (दर्जी
का पेशा) करते थे। उनके जाति तथा व्यवसाय से 'शिंपी' (दर्जी) होने का उल्लेख
उनके गाथा के अभंगों मे पाया जाता है—
'दर्जी के कुल मे मेरा जन्म हुआ ।'२
गोणाई को आपत्ति है कि 'नामदेव अपने पैतृक व्यवसाय की ओर ध्यान
नही देता ।'३
'मेरा मन गज है और जिह्वा कैंची। दोनो की सहायता से मैं यम का बन्धन
काटता हूँ। मैं कपड़ा रंगने और सिलने का काम करता हूँ ।'४
बाल्य काल
नामदेव के बाल्यकाल के संबंध में कई चमत्कारपूर्ण तथा असाधारण आख्यायिकाएं
प्रचलित हैं। जनार्दन रामचंद्र५ उन्हें उद्धव का अवतार मानते हैं। गार्सा द तासी६
उनको विष्णु का तथा नरहरि मालू७ सनत्कुमार का अवतार मानते हैं। एक अलौकिक
घटना नामदेव के चरित्र के साथ जुड़ी हुई है। वह यह कि आठ वर्ष की आयु में
१. नव मास वरी म्या वाहिलासी ऊदरी ।
—गाथा पंचक, अ० १२६५ ।
२. शिंपियाचे कुली जन्म मज झाला ।
—अ० १२४३ ।
३. शिवण्या टिपण्या त्वां घातले पाणी ।
न पहासी परतोनि घराकडे ॥
—सकल संत गाथा, अ० १२६६ ।
४. मन मेरो गजु जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटऊ जम की फाँसी ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृ० १८ ।
५. कवि चरित्र, पृ० १५२ ।
६. हिंदुई साहित्य का इतिहास, पृ० १३१ ।
७. भक्त कथामृत (मराठी) नरहरि मालू
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८५
उन्होंने अपने हाथ से विट्ठल को दूध पिलाया था और नैवेद्य भी खिलाया था। उनका
मन गृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था।
क्या बाल भक्त नामदेव डाकू थे ?
नामदेव की सांप्रदायिक गाथा में कई अभंग प्रक्षिप्त हैं। इनमें से छप्पन चरणो
के एक अभंग 'नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी'१ के कारण नामदेव के विषय में
गलत-फहमी फैली हुई है।
इस अभंग को हम ती भागों में विभाजित कर सकते हैं—
(१) जन्म और बाल्य काल चरण १ से १६।
(२) युवावस्था चरण १७ से ३०।
दुर्भाग्य से नामदेव कुसंगति में पड़ गये और डकैती करने लगे।२
(३) उपरति चरण ३१ से ५६।
नामदेव को अपनी करतूत पर ग्लानि हुई और वे पंढरपुर चले गये।
नामदेव के जीवन की उपर्युक्त घटना के विषय में नामदेव-साहित्य के अध्येता
अपने मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
श्री भावे यथा श्री आजगांवकर के अनुसार यह अभंग प्रामाणिक है। श्री
भावे ने नामदेव की डकैती को पुष्टि देने वाले नामदेव की पत्नी राजाई के नाम से
प्रसिद्ध दो अभङ्ग उद्धृत किये है।३ श्री आजगांवकर ने नामदेव के डाकू बनने की
घटना का सविस्तार वर्णन किया है।४
डॉ० रानडे ने नामदेव के डाकू होने के बारे में संदेह प्रदर्शित किया है।५
श्री पाटस्कर के अनुसार छप्पन चरणों का यह अभङ्ग रचने वाला कोई अन्य
चरित्रकार है, नामदेव नही।६
श्री रं० कृ० भालुंकर७ तथा डॉ० शं० गो० तुलपुले८ के अनुसार यह अभङ्ग
१. नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी।
केशिराज रूपी मग्न असे। अ० १२४५
२. प्राक्तनाचे योगे भरलासे ओहटा। पाडितसे वाटा चौरा संगे। —वही
३. महाराष्ट्र सारस्वत (पुरवणी सह) शके १८७६, पृ० १६५-१६८।
४. श्री नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत, पृ० २१-२४।
५. संत वचनामृत (प्रस्तावना) पृ० १६।
६. बाल भक्त नामदेव दरोडेखोर होते काय ? पृ० २०।
७. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) प्रस्तावना, पृ० ५७।
८. पाँच संत कवी (१९६२ का संस्करण) पृ० १३६।
८६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव महाराज का नही है ।
मेकालिफ ने इस घटना का अनुमोदन किया है ।१
छप्पन चरणो के प्रस्तुत अभङ्ग में प्रामाणिक अंश कितना और प्रक्षिप्त
कितना इस विषय मे प्रा० वा० ब० पटवर्धन को संदेह है । उनका सूचित करना है
कि किसी ने चार पाँच अभङ्ग एकत्रित कर उसका कर्तृत्व नामदेव के नाम पर थपा
दिया ।२
गुरु
नामदेव ने किसको अपना गुरु माना था इस विषय में पर्याप्त मतभेद हैं । अपनी
आत्मकथा में नामदेव ने अपने पारमार्थिक जीवन की तीन घटनाओ का सविस्तार
वर्णन किया है—
(१) नामदेव की विट्ठल भक्ति का परिवार के लोगो द्वारा विरोध
(२) संत ज्ञानेश्वर से उनकी पहली भेंट
(३) विसोबा खेचर से प्राप्त गुरु उपदेश
ज्ञानेश्वर से नामदेव की पहली भेंट शके १२१३ के आस पास हुई हो । तब
नामदेव पढरपुर के पांडुरंग के सगुणोपासक भक्त थे । उनकी भक्ति अंध थी । इस भेंट
के अवसर पर संत गोरोबा ने मुक्ताबाई के कहने पर नामदेव की परीक्षा ली और
कहा कि 'निगुरा' होने के कारण यह घट कच्चा है ।
उपर्युक्त घटना का नामदेव के हृदय पर बड़ा आघात हुआ । पंढरपुर पहुँच कर
उन्होने विट्ठल के सामने अपनी आंतरिक व्यथा व्यक्त की । विट्ठल ने कहा—'तुम गुरु
की शरण में जाओ 'तुम्हारा भवपाश टूट जायगा ।'३
नामदेव गुरु की खोज में निकले और औंढ़ा नागनाथ पहुँचे । उन्होंने देखा कि
खेचर मंदिर के शिवलिंग पर पैर रखकर लेटे हैं । नामदेव जिधर उनके पैर उठाकर
१. दि सिख रिलीजन (छठा भाग) पृ० २० ।
2 'It is difficult to say how much of the abnormally long abhang
extending over fifty six lines is genuine history and how much
later addition'
-Prof .W. B Patwardhan's article in Fergusson College
Magazine Vol III, No 4 Jan 1913.
३. जाई नाम्या जाई गुरुसी शरण । तुटे भव बंधन तुझे वेगी ॥
—अभङ्ग १३६७ ।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८७
रखते उधर शिवलिंग घूम जाता। नामदेव विसोबा खेचर के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए
और उन्होंने खेचरजी को गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया।१
खेचरजी ने नामदेव को ब्रह्म के लिए विवेक एवं संसार से विरक्ति का भाव
धारण करने को कहा।२
'खेचर ने नामदेव के सिर पर हाथ रखा और कान में 'तत्वमसि' महावाक्य
का उपदेश दिया, जिससे नामदेव को विदेहावस्था प्राप्त हुई। देखिये भाव-विभोर होकर
खेचर ने नामदेव को कैसा अद्भुत उपदेश दिया।'३
नामदेव ने खेचरजी के प्रति अपनी कृतज्ञता इन शब्दों में व्यक्त की—'सद्गुरु
ने मुझ पर कृपा की और आत्म-स्वरूप मुझे दिखाया। उन्होंने उसकी प्राप्ति का साधन
भी मुझे दिया। उन्होंने मेरा ज्ञान-चक्षु खोल दिया। उनकी कृपा से मुझे ईश्वर प्राप्ति
का मार्ग मिला। मैं उनसे उऋण नहीं हो सकता। अब मैं उनके चरण न छोड़ूँगा।'४
'गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। मेरा दुःख नष्ट हो
गया और मैं अपने अन्तर्तम में ब्रह्म-सुख की अनुभूति कर उठा हूँ। गुरु की कृपा से
ब्रह्म-ज्ञान रूपी अंजन प्राप्त हो गया है।'५
१. खेचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ।
—गुरु ग्रन्थ साहब, खालसा प्रति, पद ३१।
२. विवेक वैराग्य शोधूनिया पाहे। जेणे तुज होय ब्रह्म प्राप्ति।
—अभङ्ग १३७४।
३. श्रवणी सांगितली मात। मस्तकी ठेवियेला हात।
पदपिंड विवर्जित केला नामा ॥१॥
—नामदेवाचा गाथा, पृ० ३१३, अभङ्ग १३८।
४. सद्गुरु नायकें पूर्ण कृपा केली। निज वस्तु दाविली माझी मज।
माझें सुख मज दाखविले डोळा। दिधली प्रेम कळा नाम मुद्रा ॥
डोलियाचा डोळा उघडिला जेणे। लेवविले लेणें आनंदाचे।
नामा म्हणे निकी सापडली सोय। न बिसंवे पाय खेचराचे ॥१॥
—सकल संत गाथा, अभंग १३६०।
५. सफल जनमु मोकउ गुर कीना।
दुख बिसारी सुख अंतरि लीना ॥ १ ॥
गिआन अंजनु मोकउ गुरि दीना।
राम नाम बिनु जीवनु मन हीना ॥ २ : ।
—संत ना० हिं० प० पद २०४।
८८ नामदेव की हिन्दी कविता
इस घटना ने नामदेव के जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित किया। उनको
दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वे अब कहने लगे—'पाषाण की मूर्ति अपने भक्तों के साथ
वार्तालाप करती है, ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।' १
गुरु कृपा से नामदेव निर्गुणोपासक हो गये। जो नामदेव विठ्ठल की मूर्ति के
सामने नाचते गाते थकते न थे वे अब कहने लगे—'मे मंदिर की मूर्ति को फूल न
चढ़ाऊँगा क्योकि मंदिर में देवता नही है। परमात्मा की शरण में जाने से आवागौन के
फेर से मेरी मुक्ति हुई।' २
'मैं पत्तो तोड़कर मंदिर की मूर्ति की पूजा न करूँगा। वह पत्ते-पत्ते में है। वह
सर्वव्यापी है।' ३
इस अंतःसाक्ष्य के आधार पर प्रमाणित होता है कि नामदेव के दीक्षा-गुरु
विसोबा खेचर थे। इसमें संदेह नही।
कुछ विद्वान् संत ज्ञानेश्वर को नामदेव का गुरु मानते हैं क्योकि नामदेव ने उनका
नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है परन्तु ज्ञानेश्वर उनके दीक्षा-गुरु नही थे। यह निश्चित है
कि ज्ञानेश्वर के सहवास के कारण नामदेव में बड़ा भारी परिवर्तन हुआ। स्वयं नामदेव
ने कहा है—'सत्संग से मुझमें आमूल परिवर्तन हुआ।' ४
नामदेव की समकालीन कवयित्री संत जनाबाई ने सोपानदेव को नामदेव का
गुरु का नाम बताया है। ५
सोपानदेव नामदेव के गुरु थे यह जनाबाई की श्रद्धा की वाणी है, उसमें तथ्य नही
है। नामदेव, ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव आदि को बड़े आदर की दृष्टि से
१. पाषाणचा देव बोलत भक्तांते सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत कवी, पृ० १४८।
२. पाती तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई॥
नामा कहै मैं हरि की सरना। मुनरपि जन्म न होई ॥१॥
सं० ना० हिं० प० पद ३५।
३. पाती तोड़ि न पाहन पूजौ। देवल देव न ध्याऊँगा।
पांति पांति परसोतम राता। ताकूँ मै न सताऊँगा ॥
सं० ना० हिं० प० पद ६६।
४. संत संगे माझी पालट झाली।
नामदेवाचा गाथा अभङ्ग ४५७, पृ० ३६६।
५. नामयाचा गुरु। तोहा सोपान सद्गुरु ॥
—श्री नामदेवाचा गाथा अ० २७५, पृ० ५६६
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८६
देखते थे । इन तीनों भाइयो पर नामदेव की अपार श्रद्धा को देखकर ही संभवतः जना-
बाई ने सोपानदेव को नामदेव की गुरु कहा होगा ।
नामदेव की यात्राएँ
एक भक्त के नाते नामदेव की कीर्ति दूर तक फैली हुई थी । उनकी कीर्ति सुन-
कर आलंदी के संत ज्ञानेश्वर उनके पास गये और यात्रा पर चलने का उनसे अनुरोध
किया । नामदेव पंढरपुर नहो छोड़ना चाहते थे परन्तु संत ज्ञानेश्वर के सहवास का
लाभ उठाने के लिए वे उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए । उन्होंने उनके साथ उत्तर
भारत के तीर्थ स्थानों की यात्रा की । यह उनकी पहली यात्रा थी । 'तीर्थावली' के
अभंगों में नामदेव ने अपनी इस यात्रा का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया है ।
श्री देवीसिंह चौहान १ के अनुसार नामदेव की यह प्रथम यात्रा शके १२१६ के
आसपास हुई हो । उन्होंने अपने 'ज्ञानोबाची काशी यात्रा शके १२१६' शीर्षक लेख में
बताया है कि काशी के दशाश्वमेध घाट पर ज्ञानेश्वर मठ है । उसमें काले पाषाण के
चबूतरे पर सात फुट की ऊँचाई का एक स्तंभ है जो ज्ञानेश्वर की काशी यात्रा की
स्मृति में खड़ा किया गया है । इस स्तंभ पर संवत् १३५१ और उसके चार पाँच इंच
नीचे 'ज्ञानोबा' ऐसे अक्षर कँधे हुए हैं । संवत् १३५१ के समानांतर शके १२१६ आता
है । ज्ञानेश्वर के साथ नामदेव जब काशी-यात्रा पर गये थे तब वे यही ठहरे थे ।
'तीर्थावली' के अभङ्ग नामदेव-कृत होने में डॉ० शं० दा० पेंडसे को
संदेह है ।२
यात्रा से लौटने पर संत ज्ञानेश्वर ने शके १२१८ (ई० स० १२९६) में आलंदी
में समाधि ले ली । अपने गुरु-तुल्य परम मित्र के वियोग का नामदेव को अपार दुःख
हुआ । उनका मन अब पढरपुर से उचट गया । वे अकेले ही पंढरपुर से निकले और
सीधे पंजाब पहुँचे । यह उनकी दूसरी यात्रा थी । यदि वे किसी प्रसिद्ध तीर्थस्थान में
रहते तो उनको आशंका थी कि तीर्थ-यात्रा के लिए आये हुए महाराष्ट्रीय संत जन
उनको घर चलने के लिए कहेगे । अतः उन्होंने उनको पूर्णतया अज्ञात घुमान जैसा दूरस्थ
स्थान पसंद किया । यही पर वे अपने जीवन के अंत तक रहे और यही रहते हुए
उन्होंने अपने हिन्दी पदों की रचना की ।
उत्तर के विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नामदेव का वास्तव्य प्रमुख रूप से
पंजाब में हुआ फिर भी उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ की—
१. इतिहास आणि संस्कृति ( त्रैमासिक जनवरी १९६६ )
२. ज्ञानदेव आणि नामदेव : डॉ० शं० दा० पेंडसे पृ० ३३५