सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१५
कबीर साहब कहते हैं कि मैं अनेक बार कह चुका हूँ। ब्रह्मा और महेश भी
कह चुके हैं कि यदि प्राणि के मोक्ष का कोई साधन है तो वह केवल तत्त्व-रूप राम का
नाम है। वही प्रत्येक मनुष्य के लिए उचित उपदेश है।¹
यदि संसार में ईश्वर भक्ति और भजन है तो वह केवल राम के नाम का स्मरण
करना ही है। इसके अतिरिक्त जो अन्य उपायों से भक्ति का प्रदर्शन करते हैं वह सब
दुःख का कारण है। कबीरदास कहते हैं कि इसीलिए मन, वचन और कर्म से तत्त्व-
स्वरूप ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए।²
संत रैदास नाम-महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'नाना प्रकार के
आख्यान, पुराण, वेद-विधि आदि वर्णमाला के चौंतीस अक्षरों के अन्तर्गत ही आते हैं।
व्यास ने ठीक ही कहा है कि ये सब राम-नाम की समता नहीं कर सकते।'³
संत दादू 'सुमिरण' के अनन्य महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
'निरंतर नाम-स्मरण करने से एक दिन परमात्मा का साक्षात्कार होगा। 'सुमिरण' का
यह सहज मार्ग सद्गुरु ने मुझे बता दिया।'⁴
गुरु नानक नाम-स्मरण पर अपना अविचल भाव व्यक्त करते हुए कहते हैं—
'मेरा आधे शरीर काट दीजिये अथवा सिर पर करवत चलाइये अथवा हिमालय में मेरे
शरीर को गला दीजिये तो भी मेरा मन तुम्हारा गुण-गान करता रहेगा। मैने यह
१. कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस।
राम नाँव तत सार है, सब कोहू उपदेस॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० ५।
२. भगति भजन हरि नांव है, दूजा दुक्ख अपार।
मनसा वाचा क्रमनां, कबीर सुमिरण सार॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ५।
३. नाना खिआन पुरान वेद विधि चउतीस अषर मांही।
विआस बिचारि कहिउ परमारथु राम नाम सरि नाही।
—संत काव्य, पृष्ठ १६५।
४—सासै सास सँभालता इक दिन मिलिहै आइ।
सुमिरण पँडा सहज का सतगुर दिया बताइ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ २७६।
३१६ नामदेव की हिन्दी कविता
अच्छी तरह जांच लिया कि रामनाम की समता अन्य कोई साधन नहीं कर सकता ।'१
(५) बाह्याडम्बर की व्यर्थता—नामदेव के अनुसार बाह्य कर्म काण्डों से कोई
लाभ नहीं होता । इनको अपना कर तो जीवन व्यर्थ ही नष्ट होता है । जब तक अंत -
करण शुद्ध नहीं है तब तक बाह्याचारों का प्रदर्शन केवल दिखावा है, ढोंग है ।
'यदि कोई शरीर में लगे कीचड़ को कीचड़ से धोना चाहता है तो वह स्वच्छ
न होगा और उसका यह प्रयास व्यर्थ ही होगा । जो भीतर से मैला और बाहर से
स्वच्छ है वह उस ढोंगी के समान है जो केवल पानी से धोता है । नामदेव कहते हैं कि
सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़कर कोई भवसागर कैसे पार कर सकता है ?'२
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । बिना विश्वास के,
बिना श्रद्धा के तीर्थ, व्रत आदि व्यर्थ हैं । नामदेव कहते हैं कि जब मैं अपने गन्तव्य
स्थान पर पहुँचा तब मैंने सीढ़ी छोड़ दी ।'३
मूर्ति पूजा और बलि का नामदेव ने बार-बार खण्डन किया है ।'४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है । 'मन स्थिर हो अथवा
न हो लोग दिखावा अवश्य करते हैं । अंतःकरण तो मलीन है फिर भवसागर कैसे पार
हो सकता है ? बिना उसका मर्म जाने रुद्राक्ष माला, छापा, तिलक आदि का प्रयोग
करने से क्या लाभ ? स्वयं अज्ञानी होकर दूसरों को मार्ग-दर्शन करने का दावा करते
१. अरध सरीरु कटाइऐ सिरि करवतु धराइ ।
तनु हेमंचलि गालोअै भी मन तेरो गुन गाइ ।
हरि नामै तुलि न पूजई सभ फिठो ठोकि बजाइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१८ ।
२. लागो पंक पंक से धोवै । निर्मल न होवै जनम विगोवै ।
भीतरि मैला बाहिरि धोया । पाणी पिंड पखाले धोया ।
नामदेव कहै सुरही परहरिये । भेड़ पूँछ कैसे भवजल तरिये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२ ।
३. तीरथ बरत जगत की बासा । फोकट सोजे बिन बिसवासा ।
एकादसी जगत को करनी । पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६ ।
४. पाहन लागे देव कटीला । वाको प्रान नही वाकी पूजा रचीला ॥
निरजीव आगे सरजीव मारे । दैवत जनम आपनौ हारे ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१७
हैं। ऐसे कपटाचरण से मुक्ति कैसे होगी ?'१
कबीर ने मूर्ति पूजा का खण्डन किया है। उनके अनुसार जो लोग पत्थर
का पुतला बनाकर उसे कर्तार समझ कर उसकी पूजा करते हैं वे पाप की धारा में डूब
जाते हैं।२
मूर्ति पूजा ही नहीं, भक्ति से रहित जप और तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर
विश्वास करना भी कबीर के अनुसार भ्रम है। ये सब सेंबर के फूल के समान हैं जो
देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन हैं।३
संत मलूकदास कहते हैं कि अंतःकरण में यदि दया-भाव नहीं तो मक्का, मदीना,
द्वारका, बद्री-केदार आदि तीर्थ स्थानों की यात्रा व्यर्थ है।४
स्वामी सुन्दरदास ने भी बाह्याचारों का विरोध किया है। जो मनुष्य-निर्मित
मूर्ति की पूजा करते हैं, तीर्थस्थानों को जाते हैं, गले में माला डालते हैं, माथे पर तिलक
लगाते हैं वे गुरु के बिना ईश्वर से मिलने का रास्ता कैसे पा सकते हैं ?५
१. मन थिर होइ वा रे न होइ । ऐसा चिन्ह करे संसार ।
भीतरि मैला धूतिग फिरै । क्यूँ उतरे भव पार ॥टेक॥
रुद्राष सपा जप माला भडै । ताको मरम न जाने कोई ॥
आप न देपै और दिवावै । कपट मुक्ति कयो होई ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे ते बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४३।
३. जप तप दीसै थोथरा तीरथ ब्रत वेसास ।
सूवै सेंवल सेविया, यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर, ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४।
४. मक्का मदिना द्वारका बद्री केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहै मलूक विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३६५।
५. तो भक्त न भावै दूरि बतावै तीरथ जावै फिरि आवै ।
जो कृत्रिम गावै पूजा लावै झूठ दिखावै बहिकावै ॥
अरु माला नांखै तिलक बनावै क्यों पावै गुरु बिन गेला ।
दादू का चेला, भरम पछेला, सुन्दर न्यारा ह्वै खेला ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३४८।
३१८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब के अनुसार दादू पंथ में बाह्याचारों का बिल्कुल महत्त्व नहीं है।
जो, बाह्याचारों के साधन-स्वरूप माला, तिलक, तीरथ, मूर्ति आदि का त्याग करता है
वह दादू पंथ में परम पुरुष के समान माना जाता है ।¹
(६) अनन्य प्रेम भावना—भक्त जब अपने इष्टदेव की आराधना करता है तब
उसमें अनन्यता का भाव ही प्रधान होता है । संत नामदेव कहते है—'राम की वंदना
कर मैं और किसी की वंदना न करूँगा । मेरा लौकिक जीवन भले ही नष्ट हो मैं अपना
पारलौकिक जीवन नष्ट न होने दूंगा । मैं अन्य देवताओं से याचना न करूँगा । केवल
राम रसायन का आस्वाद लूँगा ।'²
क्योकि उन्हें विश्वास है कि परमात्मा प्राणि-मात्र में समाया हुआ है ।'³
और यही कारण है कि जिसके लिए उन्होंने त्रिभुवन की खाक छानी वह अमो-
लिक 'वस्तु' उनको अपने हृदय में ही मिली । नामदेव कहते हैं कि अब मुझे कही
आने-जाने की आवश्यकता नहीं है । मैं घर बैठे अपने हृदयस्थ राम के गुण गाऊँगा ।⁴
कबीर ने भी इसी अनन्य प्रेमभावना को नामदेव के ढंग पर ही अपनाया है ।
वे अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते हैं—'हे मन ! तू अनस्थिरता या चंचलता
की वृत्ति को छोड़ दे । जब तूने आत्मोपलब्धि के व्रत का अंगीकार कर लिया तो तुझे
अब अपने को जला कर समाप्त कर देने में ही कुशल है ।'⁵
'अजी ओ गुसांईं ! मैं आपका गुलाम हूँ । मुझे बेच दो । यह सारा तन मन
१. माला तिलक न मानई, तीरथ मूरति त्याग ।
सो दिल दादू पंथ में परम पुरुष सूँ लाग ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ३१३ ।
२. राम जुहारि न और जुहारौं । जीवति जाइ जनम कत हारौं ।
आन देव सौं दीन न भाषौं । राम रसाइन रसना चाषौं ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
३. थावर जंगम कीट पतंगा सुरय राम सबहिन के संगा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ३० ।
४. जा कारन त्रिभुवन फिरि आये । सो निधान घटि भीतरि पाये ॥
नामदेव कहे कहूँ आइये न जाइये । अपने राम घर बैठे गाइये ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६ ।
५. डग मग छांड़ि दे मन बौरा ।
अब तो जरै बरै वनि आवै, लीन्हो हाथ सिंधौरा ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १६६ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३१६
धन आपका है।' १
'हरि मेरे प्रियतम हैं। मैं उनके बिना रह नहीं सकता । मैं उनकी बहुरिया हूँ।
वे बहुत बड़े हैं, मैं बहुत छोटी हूँ।' २
संत रैदास कहते हैं कि यह अनन्य भक्ति नहीं है। जब तक मन की प्रवृत्तियां
चंचल रहा करतो हैं तब तक वह उन्ही मे लीन रहता है। वही मन हरि से विलग
होकर कुमार्ग की ओर जाता है और काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर आदि षड्रिपुओ
को पलभर के लिए भी नहीं भूलता । ३
दादू अपनी एकान्त निष्ठा व्यक्त करते हुए कहते हैं—'हमें राम रस का यह
प्याला बहुत भाता है। रिद्धि-सिद्धि और मुक्ति आप जिसे चाहें उसे दें । मेरे मन तथा
शरीर पर तेरा अधिकार है। मेरा सब कुछ तेरा है और तू मेरा है।' ४
प्रत्येक पतिव्रता के लिए प्रियतम के रूप में कोई न कोई पुरुष अवश्य होता है ।
संत रज्जब कहते हैं कि में राम पर अनुरक्त हूँ। मेरे अन्तःकरण में और किसी के लिए
१. मै गुलाम मोहि बेचि गुसाईं ।
तन मन धन मेरा रामजी कैं ताईं ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२४ ।
२. हरि मेरा पीव भाई हरि मेरा पीव ।
हरि बिन रहि न सकै मेरा जीव ॥टेक॥
हरि मेरा पीव मै हरि की बहुरिया ।
राम बड़े मैं छुटक लहुरिया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १२५ ।
३. संतो अनिन भगति यह नाही ।
जब लग सिरजत मन पांचो गुन ब्यापत है या माही ॥
सोई आन अंतर करि हरिसों अपमारग को आने ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की पल पल पूजा ठाने ॥
—संत काव्य, पृष्ठ १८७ ।
४. प्रेम पियासा राम रस हमको भावै येह ।
रिधि सिधि मांगें मुकति फल चाहैं तिनकों देह ॥
तन भी तेरा मन भी तेरा तेरा पिंड परान ।
सब कुछ तेरा तू है मेरा यहु दादू का ज्ञान ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २६१ ।
३२० नामदेव की हिन्दी कविता
स्थान नही ।१
(७) श्रम और अध्यात्म भावना का समन्वय — प्रत्येक भक्त को उत्पादक श्रम
करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास, सेना आदि भक्तो ने जीवन पर्यन्त अपना पेशे-
वर कार्य किया । नामदेव ने स्थान स्थान पर अपने को 'सिंपी' जाति का और तदनुसार
कपडे सीने और रंगने के व्यवसाय का उल्लेख किया है । नामदेव कहते है — 'मैं कपड़ा
रँगने और सिलने का काम करता हूँ । घड़ी भर के लिए भी भगवन्नाम को विस्मृत नही
करता हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं — मेरा चित
भगवान से लगा हुआ है ।'२
नामदेव की यह प्रवृत्ति कबीर में भी पाई जाती है । ज्ञान भक्ति की सतत्
साधना करते हुए भी कबीर ने अपना घरेलू व्यवसाय नही छोड़ा ।३ काढ़ा बुनते समय
भी उनकी लौ राम से ही लगी रहती थी ।४
कबीर के समान सन्त रैदास की वाणी में भी यही भावना पल्लवित है ।५
१. पतिव्रता के पीव बिन पुरुष न जन्म्या कोइ ।
त्यू रज्जब रामहि रचै, तिनके दिल नहि दोई ॥
— सत काव्य, पृष्ठ ३३७ ।
२ मन मरो गजु जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटउ जम की फाँसी ॥ १ ॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली पद, १८ ।
३. हम घर सूत तनहि नित ताना, कंठ जनेऊ तुम्हारे ।
तुम तो वेद पढ़हु गायत्री गोविंद रिदै हमारे ॥
तू बाह्मन मैं कासी का जुलाहा बूझहु मोर गियाना ।
तुम तो पाचे भूपति राजे हरि सो मोर धियाना ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३३० ।
४ तनना बुनना तज्या कबीर राम नाम लिखि लिया सरीर ।
जब लग भरौं नली का बेहु तब लग टूटे राम सनेह ॥
—गुरु ग्रंथ साहब, गूज, २ ।
५. मेरी संगति पोच सोच दिन रातो ।
मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभाँति ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, गउडी — १ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२१
(८) भेदभाव विहीनता--जिस भेदभाव विहीनता का बीजारोपण स्वामी
रामानुजाचार्य ने किया था तथा जो भागवत में भी यत्र तत्र प्रतिध्वनित मिलती है,
हीन जाति के होने के कारण सन्त नामदेव ने उसका निराकरण किया। उनकी वाणी
में अनेक स्थलों पर यह बात ध्वनित हुई है।
'हे यादवराय ! मेरी जाति हीन है। भला मैने छीपे के घर जन्म क्यों लिया ?
जिसके फलस्वरूप मैं भक्ति करने से वंचित रखा गया ?'१
'हिंदू अंधा है और मुसलमान काणा। इन दोनो में ज्ञानी चतुर है। मैं तो ऐसे
भगवान् को आराधना करता हूँ जो न मंदिर में है न मसजिद में।'२
नामदेव भक्ति के क्षेत्र में जाति-पाँति के झगड़े को निरर्थक समझते थे। उन्होंने
स्पष्ट रूप से कहा है-'मै जाति-पाँति को लेकर क्या करूं? मै तो दिन-रात राम नाम
का जप करता हूँ।'३
अपनी गुरु परम्परा से प्राप्त इस बात का अनुसरण कबीर ने भी किया है।
वे कहते हैं सभी मानवों को हरिजन होना है। उनको ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र,
ईसाई या मुसलमान नहीं होनी है। मानव के ये रूप भक्त रूप से तुच्छ हैं। भक्त के
समान ये नहीं है।४
जाके कुटुम्ब सब ढोर ढोवंत फिरहि अजहुँ बनारसी आसपासा ।
आचार सहित विप्र करहिं डडउति तिन तन रैदास दासानुदासा ॥
—गुरु ग्रन्थ साहब, रैदास रागु मलार २ ।
१. हौनडी जात मेरी जादिम राइआ ।
छीपे के जनमि काहे कउ आइआ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० १२६ ।
२. हिन्दू अन्ना तुरकू काणा दोहां ते गिआनो सिआणा ।
हिन्दू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीत ।
नामै सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २०८ ।
३. का करी जाती का करी पाती। राजाराम सेकौं दिन राती।
—सन्त नामदेव की पदावली, पद १८ ।
४. अवरन वरन न गनिय रंक धनि, विमल वास निज सोई।
बाह्मन छत्रिय वैस सूद्र सब भगत समान न कोई ॥
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृ० ५५ ।
२१
३२२ नामदेव की हिन्दी कविता
यदि सिरजनहार चार वर्णों के भेद का विचार करता तो वह जन्म से ही एक
समान सबके साथ भौतिक, दैहिक और दैविक ये तीन दण्ड क्यों लगा देता ? कोई
हल्का ( छोटा ) नही है। जिसके मुख में राम नाम नहीं है वह छोटा है ।१
सन्तो की जाति नही पूछनी चाहिए। उनकी जाति नही होती । सभी जातियों
में सन्त हुए हैं। सभी लोगो को सन्तों के चरित्र से शिक्षा लेनी है ।२
कबीर ने हिन्दुओं के तीर्थ व्रत और पूजा की निंदा की तो मुसलमानों के रोजा
नमाज की भी खूब खबर ली । इस प्रकार उन्होंने दोनों की बुराइयों का दिग्दर्शन
किया ।३
(६) ब्रह्म की निर्गुणता—प्रसिद्ध है कि नामदेव पहले मूर्तिपूजक और सगुणो-
पासक थे किन्तु बाद में कट्टर निर्गुणोपासक हो गये । वे ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप में
विश्वास करते थे । ब्रह्म के इस निर्गुण रूप का वर्णन उन्होने अनेक प्रकार से अनेक
स्थलो पर किया है ।
'वह निर्गुण ब्रह्म अनेक ओर एक सब कुछ है । सर्वत्र उसी का प्रकाश दिखाई
पड़ता है ।'४
'हे बैकुंठनाथ ! तेरी लीला अगाध है । मैं तुझे प्रणाम करता हूँ । मैं प्राणि-
मात्र में तुझे देखता हूँ। जल, थल, काष्ट, पाषाण सबमें तू है । निगमागम तथा पुराण
१. जौ पै करता वरण विचारे ।
तो जनमत तीनि डाँडि किन सारे ॥ टेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद ४१, पृ० १०१ ।
२. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंदू तुर्क दुइ दीन बने हैं कछु नहीं पहचनियां ।
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ४८ ।
३. अरे इन दोउन राह न पाई ।
हिंदुन की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो कौन राह ह्वै जाई ॥
—संक्षिप्त सन्त सुधा-सार, पृ० ५४ ।
१. एक अनेक बिआपक रज जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई ।
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहिं कोई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५० ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२५
तेरा गुण गाते है ।'१
'हे परमात्मा ! तेरी गति तू ही जानता है, अल्प मति जीव उसका क्या वर्णन
कर सकेंगे ? लोग जैसा तुझे बताते हैं वैसा तू नही है। तू जैसा है, वैसा है ।'२
नामदेव कहते है कि उस निगुंण ब्रह्म का हम वर्णन नही कर सकते । वैसा
उसका वर्णन करने लगे तो कागज बिगड़ जाता है । ऐसे सकल भुवन पति मुझे सहज
ही मिले है ।३
निगुंण ब्रह्म का वर्णन करते हुए कबीर कहते हैं कि उसके किसी प्रकार का
रूप तथा आकार नही है । उसके रूप अरूप भी नही है । वह पुष्प की सुगन्ध से सूक्ष्म
अनुपम तत्त्व है ।४
'वह गुणरहित है उसका नाम नही रखा जा सकता । वह 'गुन विहूँन' है ।'५
सन्त रैदास उस परम तत्त्व का परिचय इस प्रकार देते है—'वह निगुंण ब्रह्म
अगम, अगोचर, अविनाशी तथा अतर्क्य है । वह सदा अज्ञेय है । वह जीव-मुक्त महा-
पुरुषों के लिए काशी सदृश आधार स्थल है ।'६
१. तूं अगाध बैकुंठनाथा । तेरे चरनौ मेरा माथा ॥
सबै भूत नाना पेषूं । जत्र जाऊँ तत्र तू ही देखूं ॥
जल थल मही थल काष्ट पषाना । आगम निगम सब वेद पुराना ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२ ।
२. तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बखाने ॥ टेक ॥
जैसा तूं कहिये तैसा तू नाही । जैसा तू है तैसा आधि गुसाईं ॥ १ ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद १४ ।
३. अकथ कथ्यौ न जाइ । कागद लिख्यौ न माइ ।
सकल भुवनपति मिल्यौ है सहज भाई ॥
—सन्त नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६ ।
४. जाके मुंह माथा नही नाहिं रूप अरूप ।
पुहुप वास से पातस, ऐसा तत्व अनूप ॥ —कबीर वचनावली, पृ० १ ।
५. अवगति की गति क्या कहूँ जसकार गाँव न नाँव ।
गुन विहूं का पेखिये, काकर धरिये नांव ॥ —कबीर ग्रन्थावली, पृ० २२६ ।
६. निश्चल निराकार अज अनुपम निरभय गति गोविंदा ।
अगम अगोचर अच्छर अतरक निरगुन अंत अनदा ॥
सदा अतीत ज्ञानघन बर्जित निरविकार अविनासी ।
कहै रैदास सहज सुन्न सत, जीवन मुक्त निधि कासी ॥
—सन्त काव्य, पृ० १८६ ।
३२४ नामदेव की हिन्दी कविता
सन््त रज्जब के अनुसार—'वह सब में समान रूप से विद्यमान है। वह सदा
एक रस है। वह किसी से लिप्त नहीं है। रज्जब कहते हैं कि ऐसे जगपति की लीला
कोई विरला ही जानता है।’१
(१) करनी तथा कथनी में एकता—संतों ने व्यवहार और आदर्श के साथ
विचार और आचरण में सामंजस्य लाने पर बल दिया है। उन्होंने जो कुछ लिखा है
अपने अनुभव के आधार पर लिखा है। उन्होंने जैसा उपदेश दिया वैसा आचरण भी
किया। उनकी उक्ति तथा वृत्ति में कदाचित् ही कोई विरोध मिले। निर्गुण मत के
सभी सन्तों में इस ढंग की बात मिलती है। नामदेव ने भी करनी बिना कथनी की
आलोचना की।
'जब तक अंत करण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप, तप आदि से क्या लाभ ?
सांप केंचुली छोड़ता है परन्तु विष नहीं छोड़ता। पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते,
रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'२
'व्यक्ति बातें तो बहुत बढ़ा चढ़ाकर करता है किन्तु विरला ही कोई उनको
कार्यान्वित करता है।'३
'पाखंडपूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही।'४
कबीर ने भी "करनी बिना कथनी" की निंदा की है। उनके अनुसार जब
तक मनुष्य के वचन और कर्म में मेल नहीं होगा तब उसका सारा परिश्रम व्यर्थ है।
जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे नरक
१. सरवगो समसरि सब ठाहर काहू लिपित न होई ।
उन रज्जब जगपति की लीला, बूझै विरला कोई ॥
—संत काव्य, पृ० ३३२।
२. काहे कूं कीजै ध्यान जपना जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छोड़ै विष नहीं छाडै । उदिक में बग ध्यान माझै ॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
३. कथनी वदनी सब कोई कहै।
करनी जन कोई विरला रहै।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७७।
४. पाखंड भगति राम नहीं रीझै।
बाहरि आधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव १२५
को प्राप्त होते हैं ।¹
कबीर साहब कहते हैं कि कथनी खाँड के समान मीठी है परन्तु करनी प्रत्यक्ष
जहर का घूट है। मनुष्य यदि लम्बी चौड़ी बातें करना छोड़ दे और कृति को महत्त्व
दे तो विष का अमृत बन जाय ।²
सहजावस्था की उपलब्धि होने पर अपनी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णतः अपने कहने
में आ जाती हैं और ऐसा प्रतीत होने लगता है कि हमें स्वयं परमात्मा का ही स्पर्श
अथवा प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है।³ अब कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रह
जाता। जैसा मुख से निकलता है वैसा ही अपना दैनिक व्यवहार भी चलता है।
संत रज्जब भी करनी तथा कथनी की एकता पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि
औषधि बिना पथ्य की तथा पथ्य बिना औषधि किस काम की ? यदि नामस्मरण
और कृति में मेल न हो तो दोनों की प्रशंसा नहीं होती ।⁴
(१) भक्त की भगवान के प्रति मिलन-उत्कंठा—नामदेव के पदों में भक्त की
भगवान के प्रति मिलन की उत्कंठा की मधुर अभिव्यक्ति है। इसे वे "तालावेली"
शब्द से परिचित कराते हैं, जिसका अर्थ व्याकुलता है, ऐसी व्याकुलता जिसमें तीव्रता
है—आतुरता है। यह तालावेली उस प्रकार की है, जिस प्रकार की गाय की बछड़े के
बिना होती है और मछली की पानी के बिना होती है।⁵
१. जैसी मुखतैं नीकसै तैसी चालै नाहि।
मानिष नाहिं ते श्वान गति बाध्या जमपुर जाहिं॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३८।
२. कथनी मीठी खांडसी करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै विष तैं अमृत होय॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ २४।
३. जैसी मुखतैं नीकसै तैसी चालै चाल।
पारब्रह्म नेड़ा रहे पलमें करै निहाल॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३८।
४. औषध बिन पथ्य का करे, पथ्य बिन औषधि वादि।
यूं सुमिरन सुकृत अमिल, उभे न पावहिं दादि॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३४०।
५. मोहि लागति तालावेली॥
बछरे बिनु गाइ अकेली॥
पानीआ बिनु मीनु तलफे॥
ऐसे रामनामा बिनु बापुरो नामा॥ —पंजाबातील नामदेव, पृष्ठ १०७।
३२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने भी नामदेव के समान कान्ता भाव से अपने ' राम की कामना की
है और विरह में बिना जल की मछली के समान तड़पने की व्यथा व्यक्त की है। १
दादू तो तालाबेली की कामना भी करते हैं क्योंकि उसी से "दरसन" के रस
में मिठास आती है। २
संत रज्जब की कसक भी उसी कोटि की है। जैसे कुमुदिनी चंद्र को देखे बिना
कुम्हला जाती है वही हाल भक्त रूपी विरहिणी का है। ३
धर्मदास अपना "दरद" बुझाते हैं—"हे प्रिय ! अपनी व्यथा तुझे कैसे सुनाऊँ ?
तन तड़पता है । दिल को कुछ नहीं सुहाता । तेरे बिना मुझसे रहा नहीं जाता ।" ४
गरीबदास भी अपनी "विपत" सुनाते हैं ।५
१. जैसे जल बिन मीन तलपै ।
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलपै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६४ ।
२. तालाबेली प्यास बिन क्यो रस पीया जाय ।
बिरहा दरसन दरद सो हमको देहु खुदाई ॥
कहा करौ कैसे मिले रे तलपै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी कारण अपने पीव ॥
—संत सुधासार ।
३. विरहिण व्याकुल बेसवा निसिदिन दुखो विहाय ।
जैसे चंद कुमोदिनी बिन देखे कुम्हलाइ ॥
खिन खिन दुखिया दगधिये, विरह विथा बन पीर ।
घरी पलक में बिनसिये ज्यू मछली बिन नीर ॥
—संत सुधासार, पृष्ठ ५१६ ।
४. कहाँ बुझाय दरद पिया तोसे ।
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मोस रहत न जाय ।
—संत सुधासार—दूसरा खण्ड, पृष्ठ ८ ।
५. जब जब सुरति आवती मन में तब सब विरह अनल परजारै ।
नैननि देखौ वैन सुनौ कब यह वेदन जिय मारै ॥
सुनि री सखी यहु बिपत हमारी बिन दरसन अति बिरहा बारै ।
गरीबदास सुख तबही लेखौं जबही ज्योतिहि ज्योति निहारै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ४१० ।
नामदेव का साहित्य पर प्रभाव ३२७
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि नामदेव ने कबीर आदि अपने परवर्ती
संतो को किस तरह प्रभावित किया। क्योकि नामदेव की विचार-धारा और इन संतो
की विचारधारा में बहुत साम्य है। नामदेव कबीर आदि संतों से पूर्व हुए हैं। उन्होंने
उत्तर भारत में निर्गुण भक्ति का वर्षों प्रचार किया। अतः उन्हें निर्गुण मत का आद्य
प्रवर्तक मानने में विद्वानों को झिझक नही होनी चाहिए।
उपसंहार
निखिल ब्रह्माण्ड मानो एक बृहत् सगठन है। इस सगठन को देखकर उसके
संचालक के विषय में मन म विचार आता है। इस विश्व का सचालन अपने आप हो
रहा है अथवा उसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है ? इस सृष्टि में जो विधान पाया
जाता है वह नियम-नियन्त्रणविहीन नहीं है, उसमें एक क्रम है, सूत्रता है। इसके मूल
में एक चेतन सत्ता का हाथ दिखाई देता है। इस सर्वोपरि चेतन सत्ता अथवा नियामक
तत्त्व को ही ब्रह्म कहते है ।
महर्षि व्यास ने 'ब्रह्म सूत्र के प्रारम्भ में ही 'जन्माद्यस्य यतः' कहते हुए ब्रह्म
विषयक जिज्ञासा व्यक्त की है। आचार्य ने ब्रह्म के वास्तव स्वरूप के निर्णय के लिए
उसके 'स्वरूप' तथा 'तटस्थ' लक्षणो की कल्पना की है।
ब्रह्म के दो रूप माने गये हैं—एक सगुण तथा दूसरा निर्गुण। दोनो एक ही हैं
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं। सगुण ब्रह्म की कल्पना
उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से की गई है। पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण
है। ब्रह्म के सम्बन्ध में सभी सत कवियो ने प्राय एक सा विचार प्रकट किया है।
सत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार, अगम तथा
अगोचर कहा है ।
हिन्दी निर्गुण काव्य धारा का प्रारम्भ रूढिवादी अधविश्वास-प्रधान धार्मिक
सम्प्रदायो की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। निर्गुनिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमें
निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ
है। बुद्धिवादिता, सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचा-
रात्मकता आदि उनकी प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियां हैं। उनकी इन्ही विशेषताओ ने
उन्हें एक सूत्र में बांध रखा है। इसीलिए उनकी परम्परा अन्य भक्ति-परम्पराओ से
विलक्षण दिखाई देती है।
इस परम्परा के सर्वप्रथम हिन्दी कवि सत नामदेव हैं। नामदेव का जन्मकाल
भी एक विवादपूर्ण समस्या है। प्राप्त प्रमाणों के आधार पर २६ अक्तूवर १२७० ई०
उपसंहार ३२६
ही नामदेव की प्रामाणिक जन्मतिथि ठहरती है । नामदेव के जन्मस्थान के विषय में
भी अभी तक कोई एक धारणा नहीं बनाई जा सकी है । अधिकांश विद्वानों का रुझान
मराठवाड़ा के परभणी जिले की नरसी को नामदेव का जन्मस्थान मानने के पक्ष में
है । नामदेव के अयोनिज होने तथा उनके डाकू होने की बात का भी निराकरण किया
गया है । नाथपंथी संत विसोबा खेचर से उपदेश ग्रहण करने पर उनमें जो महान्
परिवर्तन हुआ उस पर भी प्रकाश डाला गया है । सगुणोपासक नामदेव अब निर्गुणो-
पासक हो गये ।
नामदेव के समाधि स्थान के बारे में भी विद्वान् सहमत नही है । उनकी दो
समाधियाँ बताई जाती है । एक पंढरपुर के विठ्ठल मंदिर के महाद्वार पर तथा दूसरी
घोमान में । ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में डॉ० भगीरथ मिश्र का यह निष्कर्ष समी-
चीन जान पड़ता है कि उन्होंने घोमान में ही समाधि ली । नामदेव ने प्रचुर मात्रा में
मराठी में अभंगों की रचना की । उनके अभंगों की जो चार गाथाएँ मिलती है उनमें
ढाई हजार के लगभग अभंग मिलते हैं उनमेंसे छः सात
३३० नामदेव की हिन्दी कविता
उसको ओर आकर्षित हुआ। शंकराचार्य की अद्वैत भावना का भी संतों पर बहुत प्रभाव
पड़ा है।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता से संत बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने वैष्णव
धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ ठहराया। प्रेम-भक्ति
और भाव-भक्ति का उपदेश तो संतों ने अपनी रचनाओं में सर्वत्र दिया है। व्यक्तिगत
ईश्वर की भावना तथा इष्टदेव के प्रति रति की भावना इन दो वैष्णव भावनाओं का
प्रभाव संतों पर दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार निर्गुण विचारधारा अपने पूर्व प्रचलित
कई मतमतांतरों, दर्शनों और धार्मिक परंपराओं का सार रूप है।
निर्गुण भावना, गुरु-महिमा, मूर्तिपूजा तथा बाह्याडम्बर का खंडन, एकेश्वरवाद
का प्रतिपादन, कथनी तथा करनी में एकरूपता, भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता,
सत्संग की प्रधानता, हठयोग आदि निर्गुण मत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। ये पहले नामदेव
की रचनाओं में प्राप्त होती हैं और बाद में कबीर आदि परवर्ती संतों की रचनाओं में।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नामदेव के पश्चात् हिंदी संत काव्य की जो प्रवृत्तियाँ
हैं वे सब नामदेव की हिन्दी रचनाओं में पहले से ही मिलती हैं।
सभी भारतीय दर्शनों ने यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म का साक्षात्कार करने
का सबसे बड़ा उपाय आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार करना है। अतः
आत्मा का ज्ञान कराना हर एक दर्शन का लक्ष्य है।
विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांतों तथा अन्य दार्शनिक
विचारधाराओं का नामदेव पर प्रभाव है। संत नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय
के प्रभावशाली प्रचारकों में से थे। अतः उनके द्वारा वारकरी संप्रदाय के दार्शनिक
सिद्धांतों का प्रतिपादन स्वाभाविक ही है।
नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं। उनके अनुसार सभी जीवों की
उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। वह सब जीवों में समाया हुआ है। मोहिनी माया अज्ञानी जीव
को भुला-भुलाकर अपने पाश में जकड़ लेती है। माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के
नाम से प्रसिद्ध है। हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नहीं
पाते। माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया। अविद्या माया
के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है; विद्या माया जीव को
संसार के मोहजाल से छुड़ाकर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है।
व्यक्ति अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो
विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा।
भौतिक जीवन का केवल सुखोपभोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं है। संसार की
विभीषिका से आतंकित होकर नामदेव ने कहीं भी ऐसा उपदेश नहीं दिया कि इस दुख
उपसंहार ३३१
पूर्ण संसार से विमुख होकर संन्यास लिया जाय । उन्होंने ऐहिक तथा पारमार्थिक जीवन
में संतुलन बनाये रखने का परामर्श दिया है । विट्ठल के सगुण रूप की भक्ति करते हुए
उसके मूल निर्गुण स्वरूप को उनका मन यत्किंचित नहीं भूला । पंढरपुर के पांडुरंग की
मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की प्रतीक है, किसी एक
साम्प्रदायिक देवता की नही ।
संतों ने काव्य के महत्त्व को वही तक स्वीकार किया है जहाँ तक वह ब्रह्म के
स्मरण मे सहायक हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नही । उन्होंने आध्यात्मिक
जीवन की प्रगति एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । प्रतिभा,
व्युत्पन्नता तथा परिश्रम की अपेक्षा कविता के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक भावात्मकता है ।
नामदेव की कविता में स्थान-स्थान पर विरह वेदना, व्याकुलता, भावुकता तथा
भावोत्कटता के दर्शन होते हैं। उन्होंने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार
प्रतिमा का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनःस्थिति में काव्यरचना की । नामदेव परम
भावुक थे । उनके आत्मीयता से ओतप्रोत अभंगों में अनुभूति की घनता पाई जाती है ।
नामदेव की प्रेमाभक्ति तथा समाज की अभिवृत्ति में एक प्रकार का भावात्मक संतुलन
है । अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के अभंग 'पारमार्थिक भावगीत' है ।
संतो के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नही । फिर भी नामदेव के
काव्य का कला पक्ष पुष्ट है । उनके काव्य मे अनुप्रास का बाहुल्य है। उन्होंने अपनी
आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर उपयोग किया
है । उनकी उपमाओ की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत है। नामदेव
का दूसरा प्रिय अलंकार रूपक है। विभावना के भी सुन्दर तथा प्रभावशाली उदाहरण
उनके यहाँ मिलते है । नामदेव की कविता में भक्ति तथा शांत रस प्रधान है ।
विद्वानो ने ब्रजभाषा का निर्माण काल ११ वीं शताब्दी माना है । किन्तु यह
तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने १४ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही ब्रजभाषा
में पदों की रचना की है । नामदेव की भाषा मे संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग बहुत अधिक
संख्या मे हुआ है । उनकी हिंदी में कुछ प्रयोग ऐसे हैं जो रूप और अर्थ दोनों में विशिष्ट
है । कुछ विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग भी मिलता है । कई मूल हिंदी शब्दो में
मराठी का प्रत्यय जोड़ा गया है । नामदेव की भाषा में तत्सम शब्द कम हैं, तद्भव
अधिक । उनकी हिंदी में अरबी, फारसी, राजस्थानी और पजाबी के शब्द पाये जाते
हैं जो उनकी घुमक्कड़ी वृत्ति का ही परिणाम है ।
संत साहित्य से सम्बन्धित अधिकतर ग्रंथ कबीर को निर्गुण काव्य का प्रवर्तक
मानकर लिखे गये है किन्तु उनके अन्तर्गत निर्गुण साहित्य के विकास का पूरा विवेचन
मिलता है । डॉ० श्यामसुंदरदास, आचार्य शुक्ल, डॉ० गोविंद त्रिगुणायत, डॉ० राम-
३३२ नामदेव की हिन्दी कविता
कुमार वर्मा, डॉ० बड़थ्वाल आदि विद्वानों ने कबीर को सत मत का प्रवर्तक मानते हुए
भी उसका प्रारम्भ नामदेव से स्वीकार किया है। आचार्य शुक्ल, डॉ० मोहनसिंह,
आचार्य विनयमोहन शर्मा, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, डा० बड़थ्वाल, डॉ० सरनामसिंह
आदि विद्वानों की रचनाओं में इस बात का संकेत मिलता है कि नामदेव कबीर से पहले
हो गये थे और उनकी रचना निर्गुण पंथ जैसी है।
सत नामदेव के सत मत के प्रवर्तक न माने जाने के दो कारण हो सकते हैं-
(१) नामदेव की रचनाओं का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना (२) कबीर
का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव। पर्याप्त काल तक बहुतों को यह
विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना की है। जिनको उनकी हिंदी रचनाओं
का ज्ञान था वे 'गुरु ग्रन्थ साहब' में संगृहीत ६१ पदों तक ही उनको सीमित समझते
थे। परन्तु अब नई खोज से कुल मिलाकर ऐसे २५० पद प्राप्त हो चुके हैं। हिंदी जगत्
में इन पदों का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात-रहित
दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के प्रसिद्ध छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है। कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म
और देश के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको निर्भीक चित्त से कहा।
उनके इन उपदेशों से लोग प्रभावित हुए बिना न रह सके। इन तथ्यों पर विचार करने
पर स्पष्ट होता है कि नामदेव को वह प्रधानता क्यों न मिल सकी जो कबीर को मिली।
फिर भी नामदेव और कबीर के कालक्रम को कोई इनकार नहीं सकता। नामदेव का
जन्मकाल स० १२७० ई० तथा मृत्युकाल स० १३५० ई० है। कबीर का जन्मकाल स०
१३९८ ई० तथा उनका मृत्युकाल स० १५१८ ई० है। इस प्रकार नामदेव का जन्म
कबीर से १२८ वर्ष पूर्व हुआ था। इतना ही नहीं नामदेव के मृत्यु काल और कबीर के
जन्मकाल में भी ४८ वर्षों का अंतर है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि नाम-
देव का काल कबीर के काल से एक शताब्दी पूर्व था। परवर्ती सतों ने भी सथ्रद्ध
नामदेव का स्मरण किया है। उनके कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सत मत का
बीजारोपण नामदेव के द्वारा हुआ। सत नामदेव की लगाई इस बेली को कबीर ने
सींचा, विकसित और पुष्ट किया।
वास्तव में नामदेव ही मध्ययुगीन नवजागरण के प्रणेता हैं। उन्होंने सत ज्ञाने-
श्वर के साथ उत्तर भारत की यात्रा में मुसलमानों द्वारा महानाश का जो ताण्डव नृत्य
देखा उसकी प्रतिक्रिया उनके अभंगों में स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित हुई है। अतः नामदेव
को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने हिंदुओं की धार्मिक त्रुटियों को ध्यान
में रखते हुए नये युग धर्म के अनुरूप एक अत्यंत सहिष्णु, उदार तथा क्राँतिकारी समा-
उपसंहार ३३३
धान हिंदुओं के सामने रखा ।
नामदेव के समकालीन तथा परवर्ती महाराष्ट्रीय तथा उत्तर भारत के उनके
परवर्ती संतो ने बड़ी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण किया है । इससे प्रतीत होता है कि
एक संत के नाते नामदेव कितने महान् थे । नामदेव का व्यक्तित्व वास्तव में महान् था ।
उन्होने उत्तर भारत में युगानुरूप अपने क्रांतिकारी विचारो से जहाँ युगान्तर उपस्थित
किया वही हिंदी साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली के पद्य को विभिन्न राग-रागिनियो की
पदशैली भी प्रदान की । सचमुच नामदेव युग प्रवर्त्तक थे । भागवत धर्म के प्रचार तथा
प्रसार को ही अपना जीवित कार्य मानकर नामदेव अपने जीवन के अंत तक पंजाब में
रहे और संत ज्ञानेश्वर का लोकोद्धार का कार्य उन्होने अखण्ड रूप से जारी रखा ।
अपने विचार उत्तर भारत की जनता को समझाने के लिए उन्होने हिन्दी को अपनाया ।
नामदेव अपने पूर्ववर्ती नाथ सिद्धो की बानियो से प्रभावित है । उन्होने उसी
प्रकार की बातें कही है जिस प्रकार की इन नाथो तथा सिद्धो ने कही है । यह बड़े खेद
की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नही होता । जो थोड़ी बहुत
फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते
हैं । कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का
प्रेरणा-स्रोत बनी और उसका अभिन्न अंग बन गईं ।
हिंदी निर्गुण काव्य का अध्ययन और मनन करने के पश्चात् नामदेव के संबंध
में प्रमुख रूप से तीन बातें कही जा सकती है । सर्वप्रथम यह कि नामदेव का व्यक्तित्व
एक क्रांतिकारी चिंतक का व्यक्तित्व था जिसने समाज को परिस्थितियो के अनुसार
अपने को बदल कर समाज को जाग्रत किया । महाराष्ट्र को छोड़कर पंजाब में जाना,
हिंदी भाषा में काव्य रचना करना, सगुण की भावना-विह्वल भक्ति को छोडकर निर्गुण
भक्ति को अपनाना आदि उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व के लक्षण है । दूसरी बात यह कि
अन्य भाषा-भाषी होते हुए भी नामदेव ने जिस हिंदी भाषा में काव्य रचना की वह
तत्कालीन संतो या साहित्यकारो में बहु-प्रचलित नही थी । लेकिन नामदेव में भाषा की
शक्ति और उसके विकास के लक्षण को पहचानने की सामर्थ्य थी जिसके कारण उन्होने
ऐसी भाषा अपनायी जिसमें आगे तीन चार सौ वर्षों तक संत काव्य लिखा जाता रहा ।
तीसरी बात हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तन से संबंधित है । इसका उल्लेख किया जा
चुका है और इसमें कोई संदेह नहीं कि संत नामदेव ही हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तक
है । निर्गुण काव्य के संदर्भ में संत नामदेव संबंधी यही मेरे निष्कर्ष हैं ।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
हिन्दी
अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय—डॉ० दीनदयाल गुप्त
हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग।
उत्तरी भारत की संत परम्परा—पं० परशुराम चतुर्वेदी
भारती भंडार, लीडर प्रेस, सं० २००८।
ऊँच ते ऊँच नामदेव समदर्शी—बाबा बलवंतराय
कबीर ग्रन्थावली—(संपादक डॉ० श्यामसुंदरदास)
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी। सं० २०११।
कबीर वचनावली—संपादक अयोध्यासिंह उपाध्याय
नागरी प्रचारिणी सभा, काशी। स० १९६६
कबीर की विचार-धारा—डॉ० गोविंद त्रिगुणायत
साहित्य निकेतन कानपुर। सं० २०१४।
कबीर दर्शन—ले० डॉ० रामखेलाल 'सहायक'
हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, स० १९६२
कबीर एक विवेचन—डॉ० सरनामसिंह
कबीर साहित्य का अध्ययन—पुरुषोत्तमलाल श्रीवास्तव
कबीर—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी
हिंदी ग्रंथ रत्नाकर प्रा० लि० बंबई। स० १९