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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 332 में से

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पृष्ठ 322

३३० नामदेव की हिन्दी कविता

उसको ओर आकर्षित हुआ। शंकराचार्य की अद्वैत भावना का भी संतों पर बहुत प्रभाव
पड़ा है।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता से संत बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने वैष्णव
धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ ठहराया। प्रेम-भक्ति
और भाव-भक्ति का उपदेश तो संतों ने अपनी रचनाओं में सर्वत्र दिया है। व्यक्तिगत
ईश्वर की भावना तथा इष्टदेव के प्रति रति की भावना इन दो वैष्णव भावनाओं का
प्रभाव संतों पर दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार निर्गुण विचारधारा अपने पूर्व प्रचलित
कई मतमतांतरों, दर्शनों और धार्मिक परंपराओं का सार रूप है।
निर्गुण भावना, गुरु-महिमा, मूर्तिपूजा तथा बाह्याडम्बर का खंडन, एकेश्वरवाद
का प्रतिपादन, कथनी तथा करनी में एकरूपता, भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता,
सत्संग की प्रधानता, हठयोग आदि निर्गुण मत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। ये पहले नामदेव
की रचनाओं में प्राप्त होती हैं और बाद में कबीर आदि परवर्ती संतों की रचनाओं में।
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नामदेव के पश्चात् हिंदी संत काव्य की जो प्रवृत्तियाँ
हैं वे सब नामदेव की हिन्दी रचनाओं में पहले से ही मिलती हैं।
सभी भारतीय दर्शनों ने यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म का साक्षात्कार करने
का सबसे बड़ा उपाय आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार करना है। अतः
आत्मा का ज्ञान कराना हर एक दर्शन का लक्ष्य है।
विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांतों तथा अन्य दार्शनिक
विचारधाराओं का नामदेव पर प्रभाव है। संत नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय
के प्रभावशाली प्रचारकों में से थे। अतः उनके द्वारा वारकरी संप्रदाय के दार्शनिक
सिद्धांतों का प्रतिपादन स्वाभाविक ही है।
नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं। उनके अनुसार सभी जीवों की
उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। वह सब जीवों में समाया हुआ है। मोहिनी माया अज्ञानी जीव
को भुला-भुलाकर अपने पाश में जकड़ लेती है। माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के
नाम से प्रसिद्ध है। हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नहीं
पाते। माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया। अविद्या माया
के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है; विद्या माया जीव को
संसार के मोहजाल से छुड़ाकर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है।
व्यक्ति अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो
विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा।
भौतिक जीवन का केवल सुखोपभोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं है। संसार की
विभीषिका से आतंकित होकर नामदेव ने कहीं भी ऐसा उपदेश नहीं दिया कि इस दुख