सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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पूर्ण संसार से विमुख होकर संन्यास लिया जाय । उन्होंने ऐहिक तथा पारमार्थिक जीवन
में संतुलन बनाये रखने का परामर्श दिया है । विट्ठल के सगुण रूप की भक्ति करते हुए
उसके मूल निर्गुण स्वरूप को उनका मन यत्किंचित नहीं भूला । पंढरपुर के पांडुरंग की
मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की प्रतीक है, किसी एक
साम्प्रदायिक देवता की नही ।
संतों ने काव्य के महत्त्व को वही तक स्वीकार किया है जहाँ तक वह ब्रह्म के
स्मरण मे सहायक हो सके, अन्यथा उसकी कोई उपयोगिता नही । उन्होंने आध्यात्मिक
जीवन की प्रगति एवं विकास के लिए काव्य के महत्त्व को स्वीकार किया है । प्रतिभा,
व्युत्पन्नता तथा परिश्रम की अपेक्षा कविता के लिए महत्वपूर्ण प्रेरक भावात्मकता है ।
नामदेव की कविता में स्थान-स्थान पर विरह वेदना, व्याकुलता, भावुकता तथा
भावोत्कटता के दर्शन होते हैं। उन्होंने निर्गुण निराकार के साक्षात्कार के लिए साकार
प्रतिमा का ध्यान करते हुए भावोत्कट मनःस्थिति में काव्यरचना की । नामदेव परम
भावुक थे । उनके आत्मीयता से ओतप्रोत अभंगों में अनुभूति की घनता पाई जाती है ।
नामदेव की प्रेमाभक्ति तथा समाज की अभिवृत्ति में एक प्रकार का भावात्मक संतुलन
है । अनुभूति से रंगे हुए नामदेव के अभंग 'पारमार्थिक भावगीत' है ।
संतो के लिए काव्य रचना एक साधन था, साध्य नही । फिर भी नामदेव के
काव्य का कला पक्ष पुष्ट है । उनके काव्य मे अनुप्रास का बाहुल्य है। उन्होंने अपनी
आध्यात्मिक अनुभूतियों को बोधगम्य बनाने के लिए दृष्टांतों का प्रचुर उपयोग किया
है । उनकी उपमाओ की भाँति उनके दृष्टांत भी जन-जीवन से संगृहीत है। नामदेव
का दूसरा प्रिय अलंकार रूपक है। विभावना के भी सुन्दर तथा प्रभावशाली उदाहरण
उनके यहाँ मिलते है । नामदेव की कविता में भक्ति तथा शांत रस प्रधान है ।
विद्वानो ने ब्रजभाषा का निर्माण काल ११ वीं शताब्दी माना है । किन्तु यह
तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने १४ वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही ब्रजभाषा
में पदों की रचना की है । नामदेव की भाषा मे संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग बहुत अधिक
संख्या मे हुआ है । उनकी हिंदी में कुछ प्रयोग ऐसे हैं जो रूप और अर्थ दोनों में विशिष्ट
है । कुछ विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग भी मिलता है । कई मूल हिंदी शब्दो में
मराठी का प्रत्यय जोड़ा गया है । नामदेव की भाषा में तत्सम शब्द कम हैं, तद्भव
अधिक । उनकी हिंदी में अरबी, फारसी, राजस्थानी और पजाबी के शब्द पाये जाते
हैं जो उनकी घुमक्कड़ी वृत्ति का ही परिणाम है ।
संत साहित्य से सम्बन्धित अधिकतर ग्रंथ कबीर को निर्गुण काव्य का प्रवर्तक
मानकर लिखे गये है किन्तु उनके अन्तर्गत निर्गुण साहित्य के विकास का पूरा विवेचन
मिलता है । डॉ० श्यामसुंदरदास, आचार्य शुक्ल, डॉ० गोविंद त्रिगुणायत, डॉ० राम-