सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 318

३२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने भी नामदेव के समान कान्ता भाव से अपने ' राम की कामना की
है और विरह में बिना जल की मछली के समान तड़पने की व्यथा व्यक्त की है। १
दादू तो तालाबेली की कामना भी करते हैं क्योंकि उसी से "दरसन" के रस
में मिठास आती है। २
संत रज्जब की कसक भी उसी कोटि की है। जैसे कुमुदिनी चंद्र को देखे बिना
कुम्हला जाती है वही हाल भक्त रूपी विरहिणी का है। ३
धर्मदास अपना "दरद" बुझाते हैं—"हे प्रिय ! अपनी व्यथा तुझे कैसे सुनाऊँ ?
तन तड़पता है । दिल को कुछ नहीं सुहाता । तेरे बिना मुझसे रहा नहीं जाता ।" ४
गरीबदास भी अपनी "विपत" सुनाते हैं ।५
१. जैसे जल बिन मीन तलपै ।
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलपै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६४ ।
२. तालाबेली प्यास बिन क्यो रस पीया जाय ।
बिरहा दरसन दरद सो हमको देहु खुदाई ॥
कहा करौ कैसे मिले रे तलपै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी कारण अपने पीव ॥
—संत सुधासार ।
३. विरहिण व्याकुल बेसवा निसिदिन दुखो विहाय ।
जैसे चंद कुमोदिनी बिन देखे कुम्हलाइ ॥
खिन खिन दुखिया दगधिये, विरह विथा बन पीर ।
घरी पलक में बिनसिये ज्यू मछली बिन नीर ॥
—संत सुधासार, पृष्ठ ५१६ ।
४. कहाँ बुझाय दरद पिया तोसे ।
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मोस रहत न जाय ।
—संत सुधासार—दूसरा खण्ड, पृष्ठ ८ ।
५. जब जब सुरति आवती मन में तब सब विरह अनल परजारै ।
नैननि देखौ वैन सुनौ कब यह वेदन जिय मारै ॥
सुनि री सखी यहु बिपत हमारी बिन दरसन अति बिरहा बारै ।
गरीबदास सुख तबही लेखौं जबही ज्योतिहि ज्योति निहारै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ४१० ।