सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने भी नामदेव के समान कान्ता भाव से अपने ' राम की कामना की
है और विरह में बिना जल की मछली के समान तड़पने की व्यथा व्यक्त की है। १
दादू तो तालाबेली की कामना भी करते हैं क्योंकि उसी से "दरसन" के रस
में मिठास आती है। २
संत रज्जब की कसक भी उसी कोटि की है। जैसे कुमुदिनी चंद्र को देखे बिना
कुम्हला जाती है वही हाल भक्त रूपी विरहिणी का है। ३
धर्मदास अपना "दरद" बुझाते हैं—"हे प्रिय ! अपनी व्यथा तुझे कैसे सुनाऊँ ?
तन तड़पता है । दिल को कुछ नहीं सुहाता । तेरे बिना मुझसे रहा नहीं जाता ।" ४
गरीबदास भी अपनी "विपत" सुनाते हैं ।५
१. जैसे जल बिन मीन तलपै ।
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलपै ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६४ ।
२. तालाबेली प्यास बिन क्यो रस पीया जाय ।
बिरहा दरसन दरद सो हमको देहु खुदाई ॥
कहा करौ कैसे मिले रे तलपै मेरा जीव ।
दादू आतुर विरहनी कारण अपने पीव ॥
—संत सुधासार ।
३. विरहिण व्याकुल बेसवा निसिदिन दुखो विहाय ।
जैसे चंद कुमोदिनी बिन देखे कुम्हलाइ ॥
खिन खिन दुखिया दगधिये, विरह विथा बन पीर ।
घरी पलक में बिनसिये ज्यू मछली बिन नीर ॥
—संत सुधासार, पृष्ठ ५१६ ।
४. कहाँ बुझाय दरद पिया तोसे ।
तन तलफै हिय कछु न सुहाय ।
तोहि बिन पिय मोस रहत न जाय ।
—संत सुधासार—दूसरा खण्ड, पृष्ठ ८ ।
५. जब जब सुरति आवती मन में तब सब विरह अनल परजारै ।
नैननि देखौ वैन सुनौ कब यह वेदन जिय मारै ॥
सुनि री सखी यहु बिपत हमारी बिन दरसन अति बिरहा बारै ।
गरीबदास सुख तबही लेखौं जबही ज्योतिहि ज्योति निहारै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ४१० ।