सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

उपसंहार ३३३

धान हिंदुओं के सामने रखा ।
नामदेव के समकालीन तथा परवर्ती महाराष्ट्रीय तथा उत्तर भारत के उनके
परवर्ती संतो ने बड़ी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण किया है । इससे प्रतीत होता है कि
एक संत के नाते नामदेव कितने महान् थे । नामदेव का व्यक्तित्व वास्तव में महान् था ।
उन्होने उत्तर भारत में युगानुरूप अपने क्रांतिकारी विचारो से जहाँ युगान्तर उपस्थित
किया वही हिंदी साहित्य की दृष्टि से खड़ी बोली के पद्य को विभिन्न राग-रागिनियो की
पदशैली भी प्रदान की । सचमुच नामदेव युग प्रवर्त्तक थे । भागवत धर्म के प्रचार तथा
प्रसार को ही अपना जीवित कार्य मानकर नामदेव अपने जीवन के अंत तक पंजाब में
रहे और संत ज्ञानेश्वर का लोकोद्धार का कार्य उन्होने अखण्ड रूप से जारी रखा ।
अपने विचार उत्तर भारत की जनता को समझाने के लिए उन्होने हिन्दी को अपनाया ।
नामदेव अपने पूर्ववर्ती नाथ सिद्धो की बानियो से प्रभावित है । उन्होने उसी
प्रकार की बातें कही है जिस प्रकार की इन नाथो तथा सिद्धो ने कही है । यह बड़े खेद
की बात है कि नामदेव का समकालीन संत साहित्य प्राप्त नही होता । जो थोड़ी बहुत
फुटकर रचनाएँ प्राप्त होती हैं उनमें निर्गुण विचारधारा के बहुत से तत्त्व उपलब्ध होते
हैं । कालान्तर में ये ही प्रवृत्तियाँ निर्गुण विचारधारा के संतों और उनके काव्य का
प्रेरणा-स्रोत बनी और उसका अभिन्न अंग बन गईं ।
हिंदी निर्गुण काव्य का अध्ययन और मनन करने के पश्चात् नामदेव के संबंध
में प्रमुख रूप से तीन बातें कही जा सकती है । सर्वप्रथम यह कि नामदेव का व्यक्तित्व
एक क्रांतिकारी चिंतक का व्यक्तित्व था जिसने समाज को परिस्थितियो के अनुसार
अपने को बदल कर समाज को जाग्रत किया । महाराष्ट्र को छोड़कर पंजाब में जाना,
हिंदी भाषा में काव्य रचना करना, सगुण की भावना-विह्वल भक्ति को छोडकर निर्गुण
भक्ति को अपनाना आदि उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व के लक्षण है । दूसरी बात यह कि
अन्य भाषा-भाषी होते हुए भी नामदेव ने जिस हिंदी भाषा में काव्य रचना की वह
तत्कालीन संतो या साहित्यकारो में बहु-प्रचलित नही थी । लेकिन नामदेव में भाषा की
शक्ति और उसके विकास के लक्षण को पहचानने की सामर्थ्य थी जिसके कारण उन्होने
ऐसी भाषा अपनायी जिसमें आगे तीन चार सौ वर्षों तक संत काव्य लिखा जाता रहा ।
तीसरी बात हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तन से संबंधित है । इसका उल्लेख किया जा
चुका है और इसमें कोई संदेह नहीं कि संत नामदेव ही हिंदी निर्गुण काव्य के प्रवर्तक
है । निर्गुण काव्य के संदर्भ में संत नामदेव संबंधी यही मेरे निष्कर्ष हैं ।