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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 332 में से

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पृष्ठ 320

उपसंहार
निखिल ब्रह्माण्ड मानो एक बृहत् सगठन है। इस सगठन को देखकर उसके
संचालक के विषय में मन म विचार आता है। इस विश्व का सचालन अपने आप हो
रहा है अथवा उसके पीछे कोई शक्ति काम कर रही है ? इस सृष्टि में जो विधान पाया
जाता है वह नियम-नियन्त्रणविहीन नहीं है, उसमें एक क्रम है, सूत्रता है। इसके मूल
में एक चेतन सत्ता का हाथ दिखाई देता है। इस सर्वोपरि चेतन सत्ता अथवा नियामक
तत्त्व को ही ब्रह्म कहते है ।
महर्षि व्यास ने 'ब्रह्म सूत्र के प्रारम्भ में ही 'जन्माद्यस्य यतः' कहते हुए ब्रह्म
विषयक जिज्ञासा व्यक्त की है। आचार्य ने ब्रह्म के वास्तव स्वरूप के निर्णय के लिए
उसके 'स्वरूप' तथा 'तटस्थ' लक्षणो की कल्पना की है।
ब्रह्म के दो रूप माने गये हैं—एक सगुण तथा दूसरा निर्गुण। दोनो एक ही हैं
परन्तु दृष्टिकोण की भिन्नता से दो रूपों में गृहीत किये जाते हैं। सगुण ब्रह्म की कल्पना
उपासना के निमित्त व्यावहारिक दृष्टि से की गई है। पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म निर्गुण
है। ब्रह्म के सम्बन्ध में सभी सत कवियो ने प्राय एक सा विचार प्रकट किया है।
सत, सूफी तथा भक्त आदि सभी कवियों ने ब्रह्म को निर्गुण, निराकार, अगम तथा
अगोचर कहा है ।
हिन्दी निर्गुण काव्य धारा का प्रारम्भ रूढिवादी अधविश्वास-प्रधान धार्मिक
सम्प्रदायो की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। निर्गुनिया संत निर्गुणोपासक थे। उनमें
निर्गुण शब्द का प्रयोग अधिकतर द्वैताद्वैत विलक्षण हृदयस्थ यौगिक ब्रह्म के लिए हुआ
है। बुद्धिवादिता, सदाचरणप्रियता, सामाजिक और आध्यात्मिक साम्यवाद, विचा-
रात्मकता आदि उनकी प्रमुख उल्लेखनीय प्रवृत्तियां हैं। उनकी इन्ही विशेषताओ ने
उन्हें एक सूत्र में बांध रखा है। इसीलिए उनकी परम्परा अन्य भक्ति-परम्पराओ से
विलक्षण दिखाई देती है।
इस परम्परा के सर्वप्रथम हिन्दी कवि सत नामदेव हैं। नामदेव का जन्मकाल
भी एक विवादपूर्ण समस्या है। प्राप्त प्रमाणों के आधार पर २६ अक्तूवर १२७० ई०