सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ नामदेव की हिन्दी कविता
कुमार वर्मा, डॉ० बड़थ्वाल आदि विद्वानों ने कबीर को सत मत का प्रवर्तक मानते हुए
भी उसका प्रारम्भ नामदेव से स्वीकार किया है। आचार्य शुक्ल, डॉ० मोहनसिंह,
आचार्य विनयमोहन शर्मा, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, डा० बड़थ्वाल, डॉ० सरनामसिंह
आदि विद्वानों की रचनाओं में इस बात का संकेत मिलता है कि नामदेव कबीर से पहले
हो गये थे और उनकी रचना निर्गुण पंथ जैसी है।
सत नामदेव के सत मत के प्रवर्तक न माने जाने के दो कारण हो सकते हैं-
(१) नामदेव की रचनाओं का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना (२) कबीर
का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव। पर्याप्त काल तक बहुतों को यह
विदित न था कि नामदेव ने हिंदी में भी रचना की है। जिनको उनकी हिंदी रचनाओं
का ज्ञान था वे 'गुरु ग्रन्थ साहब' में संगृहीत ६१ पदों तक ही उनको सीमित समझते
थे। परन्तु अब नई खोज से कुल मिलाकर ऐसे २५० पद प्राप्त हो चुके हैं। हिंदी जगत्
में इन पदों का प्रचार पर्याप्त मात्रा में नहीं था।
कबीर के व्यक्तित्व, उनके धार्मिक आदर्शों, समाज के प्रति उनका पक्षपात-रहित
दृष्टिकोण तथा उनकी कथन शैली पर नाभादास के प्रसिद्ध छप्पय में सम्यक् प्रकाश
डाला गया है। कबीर स्वाधीन-चिंता के पुरुष थे। उन्होंने समय का प्रवाह देखकर धर्म
और देश के लिए जो बातें उचित और उपयोगी समझीं उनको निर्भीक चित्त से कहा।
उनके इन उपदेशों से लोग प्रभावित हुए बिना न रह सके। इन तथ्यों पर विचार करने
पर स्पष्ट होता है कि नामदेव को वह प्रधानता क्यों न मिल सकी जो कबीर को मिली।
फिर भी नामदेव और कबीर के कालक्रम को कोई इनकार नहीं सकता। नामदेव का
जन्मकाल स० १२७० ई० तथा मृत्युकाल स० १३५० ई० है। कबीर का जन्मकाल स०
१३९८ ई० तथा उनका मृत्युकाल स० १५१८ ई० है। इस प्रकार नामदेव का जन्म
कबीर से १२८ वर्ष पूर्व हुआ था। इतना ही नहीं नामदेव के मृत्यु काल और कबीर के
जन्मकाल में भी ४८ वर्षों का अंतर है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि नाम-
देव का काल कबीर के काल से एक शताब्दी पूर्व था। परवर्ती सतों ने भी सथ्रद्ध
नामदेव का स्मरण किया है। उनके कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सत मत का
बीजारोपण नामदेव के द्वारा हुआ। सत नामदेव की लगाई इस बेली को कबीर ने
सींचा, विकसित और पुष्ट किया।
वास्तव में नामदेव ही मध्ययुगीन नवजागरण के प्रणेता हैं। उन्होंने सत ज्ञाने-
श्वर के साथ उत्तर भारत की यात्रा में मुसलमानों द्वारा महानाश का जो ताण्डव नृत्य
देखा उसकी प्रतिक्रिया उनके अभंगों में स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित हुई है। अतः नामदेव
को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने हिंदुओं की धार्मिक त्रुटियों को ध्यान
में रखते हुए नये युग धर्म के अनुरूप एक अत्यंत सहिष्णु, उदार तथा क्राँतिकारी समा-