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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

७४ असली कोकशास्त्र
न बहुत छोटा, और न लम्बा सामान्य कद वाला, ब्राह्मण
और गुरु-भक्त, परायी औरत को न चाहने वाला, परोपकारी,
स्वभाव वाला शशक पुरुष कहलाता है ।
साधू-i सङ्गमे चैव अनुगामी समुत्सुकः ।
लक्षणैर्लक्षितः श्रीमान् शशोऽयं देवपूजकः ॥
सत्पुरुषों की संगति करने वाला, सदाचारयुक्त, धनवान
देवताओं का पूजक शशक पुरुष कहाता है ।
गम्भीर वचनः शा तः न पापे विद्यते मनः ।
इतितॆ कथितं ब्रह्मन् शशकस्य च लक्षणम् ॥
गम्भीर वचन बोलने वाला, शान्ति-प्रिय, हमेशा पाप से दूर
रहने वाला शशक पुरुष कहाता है ।
---:४०:---
मृग पुरुष
वदति मधुरवाणीं दीर्घनेत्रोऽतिभीरु-
श्चपलमतिसुदेहः शीघ्रवेगो मृगोऽयम् ॥
विशाल नेत्र, मधुर भाषी, अत्यन्त डरपोक, बुद्धि-चपल,
सुन्दर शरीर वाला, तथा शीघ्र दौड़ने वाला पुरुष मृग संज्ञक
कहाता है ।
स्मितास्यः स्निग्धगात्रश्च बहाशी बलवान्सदा ।
नृत्यगीतप्रियो ब्रह्मन् मृगोऽयं पुरुषः स्मृतः ।

असली कोकशास्त्र ७५
चिकनी देह वाला, हँसमुख, बहुभक्षी, बलवान, नृत्य और
गान को चाहने वाला, मृग पुरुष कहाता है ।
भवति कमलनेत्रः पद्मगन्धः सवेषः ।
उपकृतिपरधीरो नित्यमोदी मृगोऽयम् ॥
कमल-नयन, कमल के समान गन्धवाला, सुन्दर वेष-भूषा
वाला, धीर, परोपकारी हमेशा आनन्द में रहने की इच्छा वाला
पुरुष मृग संज्ञक होता है ।
मृगस्येव महाभाग, दृष्टि स्यात् चपला सदा ।
बह्वाशी गुरुदेवेषु भक्तिमान् नियतं भवेत् ॥
जिसकी दृष्टि चञ्चल मृग के समान हो, बहुत भोजन करने
वाला, ईश्वर भक्त, गुरु भक्त, मृग पुरुष कहाता है ।
वृषभ पुरुष
खेलत्सिंहपदक्रमा मृदुगिरः
पीडासहास्त्यागिनो
निद्रासक्तिभृतस्त्रपा विरहिता
दीप्ताग्नयः श्लेष्मलाः
मध्यान्ते सुखिनोऽतिमज्जवपुषः
सञ्चार मेदोऽधिकाः
सर्वस्त्री सुभगा नवांगुलमितं
लिङ्गं वृषोविभ्रति ॥

७६ असली कोकशास्त्र
खेलते हुए शेर की तरह जिसकी सुन्दर चाल हो, मधुरभाषी,
त्यागी, अधिक सोने वाला, लज्जा विहीन, अग्नि समान तेजस्वी
कफ प्रकृतिक शरीर वाला, मध्यान्त अवस्था में सुखी, चर्बी से स्थूल
देह वाला, स्त्री मात्र को प्यारा, तथा जिसका नौ अंगुल लम्बा
गुप्त अंग हो वह वृषभ जाति पुरुष कहाता है ।
बहुगुणबहुबन्धुः शीघ्रकामो नताङ्गः ।
सकलरुचिरदेहः सत्यवादी वृषोऽयम् ॥
गुणी, बहुत कुटुम्ब वाला, अति कामी, कोमलांगी, सुडौल
शरीर वाला, सत्यवादी, वृषभ पुरुष कहलाता है ।
शरीरे पूगगन्धिः स्यात् जिह्वा दीर्घा तथा भवेत् ।
यस्य नरस्य हे ब्रह्मन् वृषः स परिकीर्त्तितः ॥
जिसके शरीर से सुपारी के समान गन्ध आती हो । लम्बी
जबान वाला मनुष्य, वृषभ कहलाता है ।
नारी दर्शनमात्रेण यस्योद्भूतफुल्लमानसः :
विभेति न च पापेभ्यो वृषः स परिकीर्त्तितः ॥
जिस मनुष्य का नारी को देखने मात्र से मन प्रफुल्लित हो
जाय, और जो पाप करने से न डरे, वह वृषभ पुरुष कहाता है ।
शोभनाङ्गो नताङ्गश्च तथा भूरि कुटुम्बकः ।
गुणवान् शीलवांश्चैव वृषोऽयमीदृशोमतः ॥
अधिक कुटुम्ब वाला, शोभनांग, गुणवान और शीलवान,
नाटा मनुष्य वृषभ संज्ञक होता है ।

असली कोकशास्त्र ७७
ह्रस्वौ च चरणौ यस्य हृष्ट-पुष्ट-कलेवरः ।
योऽसौ लज्जाविहीनश्च, वृषः स परिकीर्तितः ॥
हृष्ट-पुष्ट मजबूत शरीर वाला, तथा जिसके छोटे-छोटे पाँव हो
और लज्जा-विहीन पुरुष वृषभ के समान होता है ।
—:—
अश्व पुरुष
काष्ठतुल्यवपुर्धृष्टो मिथ्याचारश्च निर्भयः
कर्कशो दीर्घदेहश्च दरिद्रस्तु हयो मतः ॥
काठ के समान कठोर शरीर वाला, झूठा, मिथ्या व्यवहारी
निर्भय, धनहीन, लम्बा कहावर मनुष्य अश्व संज्ञक होता है ।
वक्रश्रोत्रशिरोधराधर रदै-
रत्यन्त दीर्घैः कृशैः,
घे स्युः पीवर कण्ठ मांसल भुजाः
स्थूलर्जु सान्द्रैः कचैः
प्रौढष्ये कुटिलाङ्गजानु सुनखाः
दीर्घांगुलि श्रणयोः
दोर्घास्फार विलोल लोचन भृतः
प्रौढाश्च निद्रालसाः ।
टेढ़े मुख वाला, जिसके कान, ओठ, तथा पतले दाँत हों, मोटी
बाँह, घने सीधे बाल, टेढ़ी जाँघ, सुन्दर नख, लम्बी उँगलियों वाला,

७८ असली कोकशास्त्र
मधुर भाषी, ईर्ष्यालु स्वभाव वाला जिसकी आँखें चञ्चल विशाल हों,
और अधिक सोना पसन्द करता हो, उसे अश्व संज्ञक पुरुष कहते हैं।
गम्भीरांमधुरां गिरं द्रुतिगतिं
पीनोरुकौ विश्रुतो,
दीप्ताग्निप्रमदारतः शुचिगिरो
रेतोऽस्थिधातूर्ज्ज्वला ।
तृष्णात्र्त्ता नवनीतशीत बहुल
च रस्मरांबुद्रवा,
लिङ्गै र्द्वादशकांगुलैर्निगदिता
अश्वाः समोरस्थलाः ॥
गम्भीर, मधुर बोलने वाला, शीघ्रगामी, मोटी जाँघों वाला
दीप्ताग्नि स्त्रियों में रत रहने वाला, सत्य प्रिय, जिसका वीर्य हड्डी
से अधिक सफेद हो, सम वक्षस्थल वाला, पुरुष अश्वसंज्ञक होता है ।
स्थूलाङ्गश्चोग्रभाषश्च निद्रां न भजते क्वचित् ।
दिवा-रात्रि सदा तिष्ठेत् नारी दर्शन-लालसः ॥
स्थूल शरीर और उग्र स्वभाव वाला, कम सोने वाला, दिन-
रात स्त्रियों की लालसा करने वाला अश्वसंज्ञक पुरुष कहाता है ।
कृष्ण वर्णो महापापी पर निन्दा-परायणः ।
तापितः स्मरबाणेन ह्येष धर्म विवर्जितः ॥
रंग का काला, महापापी, दूसरों की निन्दा करने वाला, काम
बाण से सताया हुआ, धर्म हीन, अश्व-संज्ञक पुरुष कहाता है ।

असली कोकशास्त्र ७६
देवादि पुरुष भेद
देवगन्धर्वयक्षाणां ये राक्षसपिशाचयाः ।
लक्षणैः संयुतास्ते स्युर्नरास्तैरेव नामभिः ॥
देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और पिशाच ये पाँच लक्षणों वाले
पुरुष इन्हीं नामों से पुकारे जाते हैं ।
—:०:—
देव पुरुष
सत्यप्रिय, बलवान् ज्ञानी, दानी और मधुर बोलने वाला,
पवित्र सुन्दर, कोमल अंग वाला, काम-क्रोध रहित, मधुर पदार्थ
चाहने वाला, कान्तियुक्त लम्बी भुजा वाला, कमल समान नेत्र
वाला, सतोगुणी पुरुष देव पुरुष कहाता है ।
—:०:—
गन्धर्व पुरुष
सुन्दर स्वरूप, गायन प्रिय, मीठे खट्टे पदार्थों में रुचि रखने
वाला मृग-नयन, गन्धर्व-विद्या परायण, सत, रज, गुण युक्त पुरुष
गन्धर्व कहलाता है ।
—०—

८० असली कोकशास्त्र
यक्ष पुरुष
दयालु, गुणों की खान, दीन रक्षक, स्थूलोदर, मजबूत शरीर
वाला, जिसके जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल वर्ण
नेत्र वाला, रज तम गुण से युक्त यक्ष पुरुष कहाता है ।
—०—
राक्षस पुरुष
भयङ्कर बड़ी-बड़ी आँखों वाला, लाल और श्याम वर्ण युक्त
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाला, दुष्ट बुद्धि बिल्ली की
सी आँखों वाला, शराबी, अच्छे पुरुषों से द्वेष करने वाला तमो-
गुणी पुरुष राक्षस कहाता है ।
—०—
पिशाच पुरुष
क्रोधी, दयाहीन, पापकर्म करने वाला, क्रूर स्वभाव, बहुभोजी,
बकरी की गन्ध वाला, अतिशय मैला, कडुआ खट्टा पदार्थ चाहने
वाला, कौवे के समान शब्द करने वाला, विश्वासघाती, मन-मलीन
पुरुष, पिशाच-पुरुष कहाता है ।
—०—

६ असली कोकशास्त्र ८१
स्त्री भेद
पद्मिनी चित्रिणी चैव शंखिनी हस्तिनी तथा ।
चतस्रो जातयो नार्या रतौ ज्ञेया विशेषतः ॥
पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी ये चार जाति की
स्त्रियाँ होती हैं ।
पद्मिनी स्त्री
तिलकुसुमसमानां विभ्रती नासिकांच ।
द्विज-गुरुसुर-पूजां श्रद्दधानां सदैव ॥
कुवलयदलकान्तिः कापि चाम्पेयगौरी ।
विकचकमलकोशाकारकामातपत्रा ॥
तिल के फूल सदृश्य सुडौल तथा सुन्दर जिसकी नाक हो,
ब्राह्मण, गुरु, और देवताओं में जो हमेशा श्रद्धा रखती हो, कमल
के समान जिसकी शरीर-कान्ति हो, तथा चम्पा के फूल के समान
जिसका शुभ्र-वर्ण हो, वह पद्मिनी कहाती है ।
व्रजति मृदु सलीलं राजहंसी वतन्वी ।
त्रिवलिवलितमध्या हंस-वाणी सुवेशा ॥

८२ असली कोकशास्त्र
मृदुशुचिलघु भुङ्क्ते मानिनी गाढ़-लज्जा ।
धवल-कुसुम-वासा वल्लभा पद्मिनीस्यात् ॥
राज हंस के समान गति वाली, पतली कमर वाली, त्रिवली
युक्त हंस के तुल्य जिसकी वाणी हो, मुलायम, पवित्र, और स्वतंत्र
भोजन करने वाली, सफेद पुष्प और वस्त्रों को प्यार करने वाली
पद्मिनी कहाती है ।
अमल मुकुल मृद्वी फुल्लराजीवगन्धः ।
सुरतपयसि यस्या सौरभं दिव्यमङ्गे ॥
चकित-मृगदृशाभे प्रान्तरक्ते च नेत्रे ।
स्तनयुगलमनर्घ्यं श्रीफल श्रीविडम्बि ॥
कमल के समान कोमल अन्तःकरण वाली, पद्म गन्ध सदृश
गन्ध वाली हिरणी के समान सचकित नेत्र वाली, और जिसकी
दोनों आँखों के कोने लाल हों, तथा जिसके कुच-द्वय विल्व फल के
समान गोल और कठोर हों, ऐसे लक्षण युक्त स्त्री पद्मिनी होती है ।
कमल-नयन-युक्ता क्षुद्ररन्ध्रा च नासा ।
कृशतनु मृदुवाणी दीर्घ-केशी सुभाङ्गी ॥
परहित-मतियुक्ता पद्मगन्धा सुवेषा ।
अविरल कुचयुग्मा कीर्त्तिता पद्मिनी सा ॥
कमल सदृश विशाल नेत्र वाली, जिसके नाक के छेद छोटे
हों, केश लम्बे लम्बे, पतला शरीर, कोमल मृदुवाणी, सुन्दर सुडौल

असली कोकशास्त्र ८१
अंग वाली, परहित बुद्धि रखने वाली, पद्म गन्धा स्त्री पद्मिनी
कहाती है।
———❖———
चित्रिणी स्त्री
यस्या मनो न चलति कर्हिचित्त प्रलोभनैः ।
सत्यं प्रियञ्च वदति सर्वदा मिष्टभाषिणी ॥
दया क्षमावती या हि देवपूजा परायणा ।
पत्यौ परायणा या हि नेक्षते परपूरुषम् ॥
विप्रभक्ता च या नारी प्रीतास्यात् स्वल्प-मैथुने ।
सदा धर्मे मतिः यस्याश्चित्रिणी सा प्रकीर्त्तिता ॥
जिसका मन कभी प्रलोभनों में न फँसने वाला हो, जो हमेशा
प्रिय, मधुर, सत्य बोलने वाली हो, दया ओर क्षमा की साक्षात्
मूर्ति हो, देव और पति पूजा में तत्पर रहने वाली, परपुरुष को न
देखने वाली थोड़े मैथुन में तृप्त हो जाने वाली, हमेशा धर्म में मति
रखने वाली स्त्री चित्रिणी कहलाती है ।
मदनसदनमस्या वर्तूं लोच्छूनमन्त-
मृदुमदनजलाढ्यं रोमभिर्नातिसान्द्रैः ॥
प्रकृति चपलदृष्टिर्वाह्य सम्भोगरक्ता ।
रसयतिमधुराल्पं चित्रिणी चित्ररक्ता ॥

८४ असली कोकशास्त्र
दृष्टि चपला, आलिंगन, चुम्बनादि बाह्य सम्भोग रत, रंगीन
चित्र विचित्र वस्त्रों को धारण करने वाली, पुष्पमाला, आभूषणादि
विशेष चाहने वाली स्त्री चित्रणी कहलाती है ।
सुगतिरनतिदीर्घा नातिखर्वा कृशाङ्गी ।
स्तनजघन-विशाला काकजङ्घोन्नतोष्ठी ॥
मधु सुरभिरताम्बुः कम्बु-कण्ठी चकोर-
स्वरवचन विभागा नृत्यगीतादि विज्ञा ॥
समान कद वाली, जिसके कुच बड़े और जंघाएँ बड़ी होती हैं,
कौए के समान लम्बी जाँघ वाली, ऊँचे ओठ, कम्बु ग्रीवा, गायन
कलाओं के जानने वाली, सुन्दरी चित्रणी कहलाती है ।
कठिन घन कुचाढया नातिदीर्घा मनोज्ञा ।
रतिरस-गुणयुक्ता सुन्दरी नातिखर्वा ॥
कमलनयन युग्मा लोभहीना सुशीला ।
तिलकुसुम समानां नासिका चित्रिणी सा ॥
जिसके स्तन द्वय कठिन और मिले हुए हों, शरीर की लम्बाई
सामान्य हो, कमल सदृश नेत्र, लोभ रहित, तिल पुष्प के समान
नासिका, सुशील, रति गुण युक्त, नारी चित्रणी कहाती है ।

असली कोकशास्त्र ८५
शंखिनी स्त्री
दीर्घा सुदीर्घनयना वरसुन्दरी या कामोप-
भोगरसिका गुणशीलयुक्ता ।
रेखात्रयेण च विभूषितकण्ठदेशा सम्भोग-
केलिचतुरा किल शंखिनी सा ॥
विशाल नेत्रा, शारीरिक सब अंगों से सुन्दर, काम और उप-
भोग की महिमा को जानने वाली, शील गुण युक्त कण्ठ में तीन
रेखा वाली, लम्बी, सम्भोग में चतुरा स्त्री शंखिनी कहलाती है।
भवति कमलनेत्रा शीलयुक्ता च दीर्घा ।
कठिन घन कुचाढ्या शांखिनी क्षारगन्धा ॥
मधुर वचनयुक्ता कण्ठदेशे त्रिरेखाम्-
कथितमिदमशेषं लक्षणं शास्त्रयुक्तम् ॥
कमल के समान दोनों नेत्र वाली, लम्बी देह वाली, कठोर स्तन
वाली, मधुर भाषिणी, शील स्वभाव युक्ता, जिसकी देह से क्षार
गन्ध आती हो, तथा जिसके कण्ठ देश में तीन रेखायें पड़ी हों,
वह शंखिनी कहाती है।
तनुरतनुरपि स्याद्दीर्घ देहाऽङ्घ्रिमध्या ।
ह्यरुण कुसुमवासः काङ्क्षिणीकोपशीला ॥
अनिभृत शिरमंगे, दीर्घ निम्नंवहन्ती ।
स्मरगृहमतिलोम क्षारगन्धि स्मराम्बु ॥

८६ असली कोकशास्त्र
जिसके हाथ, पैर और शरीर के प्रत्येक अंग लम्बे मोटे और
पतले भी हों, लाल रंग के पुष्प और वस्त्र चाहती हो। क्रोधी स्वभाव
वाली, तथा असमान अंग वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
सृजति बहुनखांकं संप्रयोगे लघीयः ।
स्मरसलिलपृषत्का किंचिदुत्तप्तगात्री ॥
न लघु न बहु भोक्त्री प्रायशः पित्तलास्यात् ।
पिशुन मलिन चित्ता शङ्खिनी रासभोक्तिः ॥
जिसका शरीर कुछ गर्म हो, सामान्य खाने वाली, चुगलखोर
गर्दभ स्वर वाली, रति के समय बहुत नख गड़ाने वाली, स्वल्प
रज त्यागिनी, पित्त प्रकृति वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
—:*:—
हस्तिनी स्त्री
भवति मदन-दग्धा हस्तिनी स्थूल देहा ।
नयन-दहन-रक्ता मद्य गन्धाल्पकेशी ॥
कठिनन-कुचाढ्या नासिका स्थूल रन्ध्रा ।
पुलकित सकलांगी सर्वदा काम दग्धा ॥
हाथी के समान स्थूल देह वाली, मदमती, अग्नि सदृश रक्त
नेत्र वाली स्वल्प केशा, घन सदृश कठिन स्तन द्वय वाली, नाक
के स्थूल छिद्र वाली हमेशा मद गन्ध वाली, सदैव काम ताप से
पुलकित अंग वाली स्त्री हस्तिनी कहलाती है ।

ऽ)
Wait, Vasantatilaka begins with ऽ ऽ । ऽ.
Here:
"गलदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे"
ग-ल-द-ति (। । । ।) -> Aparavaktra?
No, it's:
न न र र?
Wait, whatever the meter, we are transcribing the exact printed text, not reconstructing the original meter!

Let's read line 17-21 carefully again:
Line 17:
"द्विगुण-कटुकषायप्रायभुग् वीतलज्जा ।"
Wait, notice the space between भुग् and वीतलज्जा: yes, there is a space.
Notice the hyphen after द्विगुण: "द्विगुण-".
Wait, look at भुग्: 'भु' followed by 'ग्' with halant/virama.

Line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे ॥"
Wait, is it "दुःखसाध्या" or "दुःख साध्या"?
There is a space: "दुःख साध्या" or "दुःखसाध्या"?
Look at 'दुःख' and 'साध्या': they are joined or spaced?
There is a small gap, let's look: "दुःख साध्या" - wait, there is a space between 'दुःख' and 'साध्या'. Look at line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःख

८८ असली कोकशास्त्र
सम्भोग में अत्यन्त कठिनता से सन्तुष्ट होने वाली, जिसकी सम्पूर्ण
देह रोमों से भरी हो। गद्गद् सम्भाषिणी स्त्री हस्तिनी कहलाती है।
नारी गन्ध विचार
पद्मिनी पद्मगन्धा च मधुगन्धा च चित्रिणी ।
शङ्खिनी क्षारगन्धा स्यान्मद्यगन्धा च हस्तिनी ॥
पद्मिनी कमल की गन्ध वाली, चित्रणी शहद की गन्ध वाली
शंखिनी क्षार गन्ध वाली तथा मदिरा के समान गन्ध वाली स्त्री
हस्तिनी होती है ।
देव्यादि स्त्री भेद
देवीमप्सरसो यक्षकान्तां राक्षसकामिनीम् ।
कृत्यामिति जगुर्ना रीं युक्तां तैरेव नामभिः ॥
देवी, अप्सरा, यक्षिणी, राक्षसी और कृत्या आदि नारियें
अपने अपने लक्षणों वाली अपने अपने नाम को प्राप्त होती हैं ।
देवी स्त्री
सत्य प्रिय, ज्ञानी, दानी, सत्य और मधुर बोलने वाली, पवित्र
सुन्दर, कोमल अंग वाली, काम-क्रोध रहित, मधुर पदार्थ चाहने

असली कोकशास्त्र
चित्र नं० १
अश्व पुरुष

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असली कोकशास्त्र ८६
वाली, कान्तियुक्त लम्बी भुजा वाली, कमल समान नेत्र वाली,
सतोगुणी देवी स्त्री कहलाती है ।
—:❊:—
अप्सरा स्त्री
सुन्दर रूप, गायन प्रिय, मीठे खट्टे पदार्थों में रुचि रखनेवाली,
मृगनयनी, गन्धर्व-विद्यापरायणा, सत, रज, गुणयुक्ता स्त्री अप्सरा
कहलाती है ।
—:❊:—
यक्षिणी स्त्री
दयालु, गुणों की खान, दीन-रक्षिका, स्थूलोदरा, मजबूत शरीर
वाली, जिसकी जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल
आँख वाली, रज, तम गुणों से युक्त स्त्री यक्षिणी कहलाती है ।
—:❊:—
राक्षसी स्त्री
भयंकर बड़ी बड़ी आँखों वाली, लाल और श्याम-वर्ण युक्त,
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाली, दुष्ट बुद्धि, बिल्ली
की-सी आँखों वाली, शराबी, अच्छे मनुष्यों से द्वेष करने वाली
तमोगुणी स्त्री राक्षसी कहाती है ।

६० असली कोकशास्त्र

कृत्या स्त्री
क्रोधिनी, दयाहीना, पाप-कर्म करने वाली, क्रूर स्वभावा, बहु-
भोजी, बकरी की गन्ध वाली, अतिशय मैली, कडुवा, खट्टा पदार्थ
चाहने वाली, कौवे के समान शब्द करने वाली, विश्वासघातिनी
मन-मलीन स्त्री कृत्या कहाती है ।
—:०:—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक लक्षण
गूढास्थिग्रन्थिगुल्फा मृदुमधुरवचाः
श्लेष्मला पद्मभङ्गी,
व्यक्तास्थिग्रन्थिगुल्फा युवतिरशिशिरै
रङ्गकैः पित्तला स्यात् ।
रूक्षा शीतोष्णगात्री वदति बहुतरं
वातला श्लेष्मलापि,
स्यादुष्णा नव्यसूता शिशिरतरतनु
र्गर्भिणी पित्तलापि ॥
१—जिसके हड्डी में ही ग्रन्थी तथा गुल्मा छिपे हुए हों, सरल
मीठा बोलने वाली, कमल सदृश्य को

असली कोकशास्त्र ६१
२—जिसकी ग्रन्थी, गुल्म, हड्डी से बाहर दिखायी देते हों,
गरम अंग वाली, पित्त प्रकृतिका स्त्री कहलाती है ।
३—रूखे, उष्ण, शीतल, शरीर वाली, बहुभाषिणी स्त्री वात
प्रकृतिका कहाती है ।
—०—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक भेद से
तृप्ति लक्षण
अचिरलघुचिरोच्चैः कालभावावसानाः,
प्रमददहनगाढद्वारगुह्या क्रमेण ।
सततशिशिरकालोपेतहेमन्त वर्षा-
मधुषु निधुवनेच्छा संप्रदागे प्रदिष्टा ॥
१—कफ प्रकृति वाली नारी जल्दी तृप्त होनेवाली तथा बहुत
रज गिराने वाली होती है ।
२—पित्त प्रकृति वाली स्त्री कफ प्रकृति वाली से अधिक काल
में छूटने वाली तथा उसकी योनि गर्म होती है ।
३—वात प्रकृति वाली स्त्री सिकुड़ी हुई योनि वाली, तथा
बहुत देर में बहने वाली होती है ।
कफ प्रकृति वाली शिशिर और वसन्त में, पित्त प्रकृति वाली
वर्षा और शरद में वात प्रकृति वाली वसन्त और ग्रीष्म में सम्भोग
में हितकर होती हैं ।