रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
असली कोकशास्त्र ३४३
भी बाहर निकल आती है। खूनी में मनुष्य निर्बल बहुत हो जाता
है, परन्तु बादी की अपेक्षा इसमें पीड़ा कम होती है। दोनों तरह
के बवासीर होने के मूल कारण हैं, कब्ज रहना, अधिक बैठना,
तिक्त और गरिष्ठ चीजें खाना तथा खाने-पीने और मल-त्याग आदि
में व्यतिक्रम करना।
सूजे हुए मस्सौं के लिए अखरोट के तेल में रुई भिगोकर गुदा
में रखना लाभदायक है। इससे मस्से जल जाते हैं और इस रोग
से छुटकारा मिलता है।
गेंदे की पत्ती, काली मिर्च के साथ घोंटकर पीने से भी
बवासीर अच्छा हो जाता है।
थूहर-वृक्ष का दूध ६ छटाँक और हल्दी ३ छटाँक, इन दोनों
को बारीक पीसकर मरहम बना लेना चाहिए। अर्श रोगी मंगल
से शुक्रवार तक, यानी चारो दिन इसी का लेप करे तो नयी पुरानी
बवासीर नष्ट हो जाता है। बवासीर की यों तो सैकड़ों ओषधियाँ
वैद्यक ग्रन्थों में लिखा हैं, पर परीक्षित न होने के कारण व्यर्थ
उनका यहाँ उल्लेख करना हम उचित नहीं समझते।
अस्तु; खास रोगों की कुछ ओषधियाँ लिख दी गयीं। अब
इस प्रकरण को समाप्त करके आगे के प्रकरण में बच्चों के सम्बन्ध
में काम की बातें लिखी जायँगी।
─:०:─
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बालरोग चिकित्सा
माता की लापरवाही या मूर्खता के कारण बच्चे बहुधा रोग-
ग्रस्त हो जाते हैं और कभी-कभी मर भी जाते हैं। इस लिए इस
प्रकरण में साधारण घरेलू चिकित्सा की मोटा-मोटी बातें लिख
देना माताओं के लिए बहुत ही उपयोगी होना सम्भव है । यद्यपि
बालक के रोगों की चिकित्सा करना बड़ा ही असाधारण काम है
और वह हम लोगों के समान मनुष्यों का काम भी नहीं है तथापि
यह विषय इस पुस्तक का मुख्य अंग होने के कारण प्राचीन ग्रन्थों
के आधार पर कुछ बातें लिखी जा रही हैं ।
सबसे पहले बालक का रोग समझना आवश्यक होता है ।
आयुर्वेद शास्त्र में दो खण्ड हैं; एक निदान खण्ड है और दूसरे का
नाम चिकित्सा खण्ड है । निदान खण्ड में रोग पहचानने की
विधियाँ, रोगों के लक्षण आदि हैं और चिकित्सा खण्ड में रोगों
के प्रतिकार के उपाय बतलाये गये हैं । आयुर्वेद की इस प्रणाली
से मालूम होता है कि पहले निदान है और पीछे चिकित्सा । ऐसे
भी देखने से निदान ही पहली वस्तु मालूम होती है । यदि यही न
मालूम होगा कि रोग क्या चीज है, तो फिर इलाज क्या किया जा
सकता है ? इस लिए माताओं का कर्तव्य है कि पहले वे बच्चे का
रोग खूब सावधानी से जानने की चेष्टा करें। आजकल की मातायें
बहुधा बच्चों के बीमार पड़ते ही दवा देने की ओर ध्यान न देकर
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० १३
पहला महीना
चित्र नं १४
दूसरा महीना
(इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित अथवा सुपाठ्य पाठ उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है।)
असली कोकशास्त्र ३४५
टोना , नजर, ग्रह, भूत, प्रेत आदि के भ्रम में पड़ जाती हैं । परि-
णाम यह होता है कि ठीक उपचार न होने के कारण वे बच्चे से
हाथ धो बैठती हैं । भला भूख लगी हो और कै होने की दवा दी जाय,
यह कहाँ की बुद्धिमानी है ? हमारे देश में ऐसे ही अट-सट यत्न
किये जाते हैं । किन्तु यह बात उचित नहीं है । सुश्रुत आदि मह-
र्षियों ने स्पष्ट लिखा है कि किसी प्रकार के असुख का मूल कारण
जानकर उसकी दवा करनी चाहिए । सब रोग औषधियों से ही
शान्त होते हैं ।
सुश्रुत संहिता में लिखा है कि अधिकार अपवित्रता के कारण
ही बच्चे रोग के शिकार बनते हैं । कारण यह कि उसका स्वभाव
अत्यन्त सुकुमार होता है, अतएव मामूली गन्दगी भी उनके रोग
का कारण हो जाती है । इसीसे आचार्यों ने इस बात पर बारम्बार
जोर दिया है कि बच्चों की सफाई की ओर पूरा ध्यान रखना
चाहिए । सौर में नीचे लिखी बातों पर यदि ध्यान रक्खा जाय तो
बच्चे जल्द बीमार नहीं पड़ सकते ।
१—गन्दी हवा न जाने दे तथा सोर के घर में किसी प्रकार
की गन्दगी न करे । शुद्ध वायु को रोके भी न
२—बहुत ही सावधानी से नालोच्छेदन किया जाय, ताकि
उसमें कोई रोग उत्पन्न होने की सम्भावना न रहे ।
३—बालक पैदा होने के बाद ही उसको एक दस्त कराया
जाय और उसके अंग-प्रत्यङ्ग की सफाई बहुत ही सावधानी से
३४६ असली कोकशास्त्र
कर डाली जाय ।
४—सूतिका को भोजन पीछे के लिखे अनुसार दिया जाय
और बच्चे को बासी दूध कभी न पिलाया जाय ।
इन्हीं बातों पर ध्यान न देने के कारण बालकों को बहुधा ये
रोग हो जाते हैं:—
उनका शरीर शिथिल पड़ जाता है और नींद नहीं आती दस्त
पतले होने लगते है। बार-बार दूध डाल देते हैं; वे स्तन-पान नहीं
करते। हिचकी, खाँसी, अतिसार, उल्टी, ज्वर आदि रोग हो जाते
हैं। रंग पीला पड़ जाता है, कम्प होता है, गले में घरघराहट होता
है, शरीर में दुर्गन्ध पैदा हो जाती है। मूर्ख-स्त्री-पुरुष इनको भूत-प्रेत
का उपद्रव जानकर झाँड़-फूँक कराने लगते हैं।
बालक को स्वस्थ और निरोग रखने का सहज उपाय यही है
कि जन्मते ही उसकी हर प्रकार की सफाई पर पूरा-पूरा ध्यान
रक्खा जाय और नीचे लिखे काढ़ों से पाँचवें-सातवें दिन उसे
नहला दिया करे ।
गोरखमुण्डी और खस को पानी में पका डाले। बाद ठण्डा हो
जाने पर (विशेष जलने न लगे) छानकर उसी जल से स्नान
करावे। उसके अंगों को खूब हल्के हाथ से धो दे, जिसमें मैल न
लगी रह जाय ।
हल्दी, चन्दन, कूट उनको पीसकर उबटन की भाँति बालक के
शरीर पर लगाकर छुड़ा दे, फिर स्नान करावे ।
असली कोकशास्त्र ३४७
पीपल, पीपलामूल और कटेरी का क्वाथ बनाकर फिर उसे घी
में पकावे। जब सब पानी जल जाय और घी रह जाय, तब उसे
उतार कर किसी बर्तन में रख ले और वही घी बालक के शरीर में
मलकर उसे स्नान करावे।
यदि बालक रोने लगे, तब समझना चाहिए कि उसे किसी
प्रकार का कष्ट हो रहा है। बड़े लड़के तो अपना दुःख-सुख कुछ
कह सुनाते हें, पर छोटे लड़के न बोल सकने के कारण अपने दुःखों
को रोकर ही जाहिर करते हैं। बालक के दुःखों को जानने की
रीति यह है:—
यदि बालक रोता हो, मुख में झारा आती हो, तो जानना
चाहिए कि उसके कपड़ों में जूँ है और उसीक काटने से बच्चा रो
रहा है। फिर उसको ढूँढ़कर निकाल डालना चाहिए। और बच्चे
के शरीर में जहाँ-जहाँ उसने काट खाया हो, वहाँ-वहाँ जरा घी
मल देना चाहिए। तुरन्त बालक चुप हो जायगा।
यदि बालक बार-बार अपने पैरों को पेट की ओर समेटे और
पेट को दबाने से प्रसन्न न हो. रोता ही रहे तो समझना चाहिए
कि उसके पेट में दर्द है। पेट-दर्द दूर करने के लिए निम्न-लिखित
उपाय काम में लाना चाहिए:—
१—हाथ को आग पर सेंक-सेंक कर सहता हुआ बालक का
पेट सेंके। इस बात का ध्यान रहे कि बच्चे का शरीर बहुत ही
कोमल होता है। अधिक गरम हाथ पड़ने से कहीं जल न जाय।
३४८ असली कोकशास्त्र
२—गुलरोगन को जरा सा गरम करके पेट पर मल देने से भी
भी पेट की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
३—नमक को खूब महीन पीसकर गरम करे और उसे बालक
के पेट पर मले। खूब महीन नमक रहे, नहीं तो बालक के पेट का
चमड़ा छिल जायगा और उसे महान दुःख होगा ।
४—छोटो इलाइची को दो बीज, सौंफ के दो दाने, माँ के दूध में
पीसकर पिला देने से भी पेट का दर्द मिट जाता है ।
सो कर उठने पर यदि बालक रोने लगे, जीभ निकाले और
इधर-उधर दूध की खोज में माथा हिलावे तो समझना चाहिए कि
बच्चा भूखा है ।
अधिक देर तक एक ही करवट के बल सोने से या किसी वस्तु
के चुभने, चींटी अथवा मच्छर के काटने से भी बच्चा रोने लगता
है । इस लिए सबसे पहले इन बातों का निरीक्षण भली प्रकार कर
लेना आवश्यक है ।
यदि बालक बराबर रोता ही रहे, चुप न हो, तो जानना चाहिए
कि उसे कोई दुख हो रहा है । जहाँ या जिस अंग में पीड़ा होती
रहती है, बालक बार-बार उसी को छूता है ओर दूसरे का उस
स्थान पर हाथ लगने से रोता है ।
मस्तक में पीड़ा होने पर बच्चा अपनी आँखें मूँद लेता है ।
गुदा में दर्द होने पर बच्चे को प्यास अधिक लगती है । साथ ही
मूर्च्छा भी हो जाती है मलकोष्ठ में दर्द होने पर मल-मूत्र रुक
असली कोकशास्त्र ३४६
जाता है और मुख धुँधला पड़ जाता है; साँस अधिक चलती है
और आँतों से आवाज निकलती है।
बच्चों को खाने की दवा तीन प्रकार से दी जाती है। दूध पीने
वाले बच्चे को यदि दवा देनी होती है तो दूध पिलाने वाली को दवा
दी जाती है, जिससे उसका असर दूध में आ जाता है और स्तन-
पान करने वाला बच्चा निरोग हो जाता है। दूध और अन्न दोनों से
जो बच्चे निर्वाह करते हैं, उनकी यदि चिकित्सा करनी होती है तो
माँ बच्चे दोनों को दवा दी जाती है। बालकों को दवाएँ माता के
दूध या शहद में घिसकर दी जाती हैं, इसका सदा ध्यान
रखना चाहिए।
बच्चों को बहुधा नीचे लिखे रोग होते हैं:—
नाल पकना
यदि नाल खींचने के कारण पक जाय तो मोम का मरहम
कपड़े पर लगाकर या कपड़े को कड़वे तेल या नारियल के तेल में
भिगोकर लगा देना चाहिए। यदि नाल में सूजन हो तो पीली
मिट्टी को आग में गरम करके दूध डालकर बाफ देना उचित है
अथवा साफ और नयी रुई से सेंक दे। अथवा बकरी की लेंड़ी
जलाकर उसकी राख को नाभि पर चिपका देना चाहिए। या हल्दी
लोध, मेहँदी, मुलहठी इनको तेल में पका कर नाभि पर लगाना
चाहिए।
—:०:—
३५० असली कोकशास्त्र
मूत्र रुकना
पीपल, कालीमिर्च, इलायची छोटी, और सेंधा नमक—इनका
चूर्ण शहद में मिलाकर चटाने से बालकों का रुका हुआ मूत्र
खुल जाता है ।
—-o-—
बहुत रोने पर
पीपल और त्रिफला के चूर्ण को घी और मधु में मिलाकर
चटाने से बालक का रुदन बन्द हो जाता है ।
—-o-—
दूध फटकना
अपने पेट के विकार से अथवा माता के दूध में दोष होने से
बालक दूध पीकर फटक देता है। चक्की पीसकर या रोटी बनाकर
अथवा और कोई परिश्रम का धन्धा करके तुरन्त-स्तन पान कराना
बड़ा ही हानिकारक है। माता को उचित है कि वह अपने शरीर
को अच्छी तरह से शान्त करने के बाद बच्चे को स्तन-पान करावे ।
यदि माता को अजीर्ण रहता हो तो उसे शीघ्र पचने वाला हल्का
भोजन करना चाहिए और किसी अच्छे पाचक चूर्ण का भी सेवन
करना चाहिए—ताकि जठराग्नि ठीक हो जाय। काकड़ासिंगी,
अतीस, मोथा और पीपल पीसकर शहद में चाटना उत्तम है ।
असली कोकशास्त्र ३५१
आम की गुठली, धान की खील और सेंधा नमक पीसकर शहद में
चाटना भी लाभदायक है । आम वा कटेरी के फूल का रस, पीपल,
पीपलामूल, चित्रक और सोंठ पीसकर घी और शहद के साथ
सेवन करना चाहिए ।
यदि बालक दूध न पीता हो तो पहले यह जानना चाहिए कि
इसे किसी प्रकार की पीड़ा तो नहीं हो रही है । कारण जानकर
फिर उसका इलाज करना चाहिए ।
—०—
आँख दुखना
जब बच्चे की आँखें दुखने लगें तब तीन दिन तक कोई दवा
नहीं करनी चाहिए । कारण यह कि दवा करने से उसका वेग रुक
जाता है इससे पीछे बच्चे को अधिक कष्ट भोगना पड़ता है । आँख
दुखने के बहुत से कारण हैं। गर्मी से, दाँत निकलते समय, माता
की आँखें दुखने से बालक की आँखों में दर्द होता है । इसके लिए
नीचे दवाएँ लिखी जाती हैं: —
२—बच्चे के कान में कड़वा तेल डाल दे और तलवे में भी
कड़वा तेल मल दे ।
२—रसोत का पानी आँखों में टपका देना चाहिए
३५२ असली कोकशास्त्र
क्योंकि इससे भी बालक को हानि पहुँचती है ।
४—यदि आँखें दाँत निकलने के कारण दुखती हों तो शान्ति
से काम लेना उचित है । ऐसे समय में उठने वाली आँख जरा
देर में अच्छी होती है । इस लिए घबड़ा कर अंट-संट दवा करना
उचित नहीं है ।
५—आँवले और लोध को गाय के घी में भून डाले, फिर
पानी में पीस कर लगावे ।
६—पोस्ते का फल (ढोंढ़) लेकर उसका दाना निकाल डाले ।
बाद छिलके को गुड़ के गरम पानी में भिगोकर सहता हुआ आँखों
पर बांध दे या बार-बार उससे आँखें तर करके योंही छोड़ दे ।
७—अमचूर को लोहे पर पीसकर आँख पर लेप कर दे ।
इससे भी आंख की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
८—बकरी के दूध का फाहा लगाना भी लाभदायक है ।
—:o:—
खाँसी
यह कई तरह की होती है । सूखी खाँसी, जुकाम की खाँसी,
कुकुर खाँसी आदि । इसके लिए नीचे की दवाएँ काम में लानी
चाहिए:—
१—छोटी पीपल, पीपलामूल और सोंठ को पीस-कपड़छान
कर शहद में मिलाकर बालक को चटाने से कास-श्वास रोग बहुत
२३ असली कोकशास्त्र ३५३
शीघ्र दूर हो जाता है ।
२—बंसलोचन शहद में चटाने से भी खांसी नष्ट हो जाती है ।
३—पीपल, काकड़ासिंगी और मूली के बीज इन सब चीजों
को शहद के साथ चटाने से बालकों की खांसी अच्छी हो जाती
है। अथवा केवल काकड़ासिंगी ओर मूली के बीज ही घी या
शहद के साथ खांसी रोग में चटाना चाहिए ।
४—अनार का छिलका और नमक पीसकर चटाना भी बालक
की खांसी को दूर करता है ।
५—सुखी खांसी में मुलहठी का सत बालक के मुख में डाल
रखना बहुत ही लाभदायक है ।
६—काकड़ासिंगी और मिश्री बराबर-बराबर लेकर चूर्ण करे ।
सेवनविधि यह है—जितने मास का बालक हो उतनी ही रत्ती मधु
के साथ सायं-प्रातः दो बार दे । स्वास, खांसी और ज्वर छूटकर
बालक चंगा हो जायगा ।
७—पान के रस में एक रत्ती जायफल घिसकर देने से भी
खांसी अच्छी हो जाती है ।
—:०:—
३५४ असली कोकशास्त्र
हिचकी
सोना गेरू को पीसकर शहद के साथ चटाने से बालक की
हिचकी बन्द हो जाती है। या सोंठ, आँवला, पीपल, इनका चूर्ण
शहद में मिलाकर चटाना भी हिचकी के लिये बहुत ही लाभदायक
है। अथवा पीपल और रेणुका बीज के क्वाथ में भुनी हुई हींग
और शहद डालकर पिलाना चाहिए। इससे सब तरह की हिचकी
जाती रहती है, ऐसा धन्वन्तरि जी ने लिखा है।
—:१०:—
अतिसार
इसको ठेठ भाषा में 'पेट चलना' कहा जाता है। यह रोग
सर्दी-गर्मी लगने से, तथा दांत निकलते समय होता है। यदि दाँत
निकलते समय दस्त आते हों तो किसी प्रकार की भी दवा नहीं
करनी चाहिए। क्योंकि उस समय दवा से दस्त को रोकना बच्चे
के लिए बड़ा ही हानिकारक होता है। हाँ, यदि ओर कारणों से
दस्त अधिक आते हों तो फौरन इलाज करना चाहिए। इस रोग
की कुछ ओषधियां वैद्यक ग्रन्थों से नीचे उद्धृत की जाती हैं:—
लोध्र, मँजीठ, नेत्रवाला, और धाय के फूल सम मात्रा में
लेकर इनका क्वाथ बालक को पिलाना अतिसार के लिए अत्यन्त
लाभदायक है। इससे अतिसार शीघ्र नष्ट हो जाता है।
असली कोकशास्त्र ३५५
बेलगिरी, धाय के फूल, नेत्रवाला, लोध और गजपीपल के
क्वाथ में शहद डालकर पिलाने से भी अतिसार नष्ट हो जाता है ।
नागरमोथा, अतीस, इन्द्रजव, नेत्रवाला का क्वाथ बालक के
अतिसार को अच्छा कर देता है ।
आम की जड़ का स्वरस भी बच्चों के अतिसार को अच्छा
करने में एक ही चीज है ।
सोंठ, अतीस, नागरमोथा, कूड़े की छाल इनका काढ़ा पिलाने
से भी अतिसार से बालक का पिण्ड छूट जाता है और दस्त
नियमित रूप से आने लगते हैं ।
यदि अतिसार के साथ ज्वर भी हो तो नागरमोथा, पीपल,
अतीस, काकड़ासिंगी इनका चूर्ण शहद के साथ चटाना चाहिए ।
इस दवा से अतिसार और ज्वर का तो नाश हो ही जाता है-साथ
ही खांसी और दूध गिरना भी आन-फानन बन्द हो जाता है ।
अथवा हल्दी, दारुहल्दी, मुलहठी, कंटकारी की जड़ और इन्द्रजव
का काढ़ा पिलाने से भी ज्वरातिसार नष्ट हो जाता है । या धाय के
फूल, बेल, धनियाँ, लोध, इन्द्रजव का चूर्ण शहद में चटावे ।
यदि इनके साथ प्यास भी लगती हो तो मोथा, सोंठ, अतीस
इन्द्रजव और खस का काढ़ा पिलाना चाहिए । और यदि केवल
प्यास हो, अतिसार या ज्वर न हो-तो पीपल, मुलहठी, जामुन के
पत्ते और आम के पत्ते का चूर्ण शहद के साथ चटाने से बालक की
प्यास मिट जाती है । अथवा अनारदाना, सफेद जीरा और नाग-
३५६ असली कोकशास्त्र
केशर के चूर्ण में उतनी ही मिश्री मिलाकर शहद के साथ चटाने से
भी प्यास लगना बन्द हो जाता है। या घी में भुनी हुई हींग,
सेंधा नमक और पलासपापड़ा का चूर्ण शहद के साथ चटाना
चाहिए इससे भी बालक की बढ़ी हुई तृषा नष्ट हो जाती है मुनक्का
और दाख को धो-पोंछकर बीज निकाल डाले। बाद सेंधा नमक
के साथ पीसकर प्रातःकाल बालक को चटा दिया करे। इससे भी
प्यास मिट जाती है।
—०—
ज्वर
नागरमोथा, हड़की छाल, नीम की छाल, परवल और गिलोय
इन औषधियों का क्वाथ पिलाने से बालक का ज्वर नष्ट हो जाता
है। इसी प्रकार गिलोय का चूर्ण या स्वरस शहद में चटाने से भी
ज्वर का नाश हो जाता है।
कुटकी के चूर्ण में शहद और मिश्री मिलाकर चटाने से ज्वर
छूट जाता है। कुटकी के कल्क का लेप भी बालक के ज्वर को दूर
कर देता है और वह नीरोग हो जाता है।
—०—
असली कोकशास्त्र १५७
त्रिदोष ज्वर
पद्म काष्ठ, नीम की छाल, गिलोय और लाल चन्दन इन द्रव्यों
का क्वाथ बालक और उसकी माता को पिलाने से त्रिदोष के ज्वर
का शमन होकर खूब अच्छी भूख लगता है ।
गिलोय को आठ पहर तक भिगो रक्खे, बाद उसे पीसकर
पिलाने से बालक के सब तरह के ज्वर का बहुत जल्द नाश हो
जाता है ।
—०—
वात ज्वर
शालपर्णी, गोखरू, सोंठ, नेत्रवाला, छोटी बड़ी कटेरी की जड़
और चिरायता का क्वाथ पिलाने से बालक का वात ज्वर बहुत
शीघ्र दूर हो जाता है । यह काढ़ा बालक और उसकी माँ दोनों को
पिलाना चाहिए । लघुपंचमूल के क्वाथ का सेवन करने से भी
वात ज्वर नष्ट होता है । (लघुपंचमूल में पांच चीजें हैं—शाल-
पर्णी, पृष्ठपर्णी, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी और गोखरू ।)
मुनक्का, गिलोय, सिरयाई, खरेंटी का क्वाथ भी वात ज्वर को
नष्ट कर देता है ।
खस, लाल चन्दन, सिरयाई, गिलोय, नीलोफर, पद्म काष्ठ,
फालसा, मुलहठी, गम्भारी और धनियां का क्वाथ पीने से भी वात
ज्वर जड़ से साफ हो जाता है ।
३५८ असली कोकशास्त्र
पित्त ज्वर
सिरयाई, नीलोफर, गम्भारी, गिलोय, पद्मकाष्ठ और पित्त-
पापड़ा का क्वाथ बालकों के पित्त-ज्वर को दूर भगाता है। नागर-
मोथा, पित्तपापड़ा, खस, नेत्रवाला, पद्मकाष्ठ का क्वाथ ठण्ढा
करके पिलाने से प्यास, दाह, वमन और ज्वर का शीघ्र नाश हो
जाता है।
बाँसा, पित्तपापड़ा, खस, नीम की छाल, चिरायता इनके क्वाथ
का सेवन कराने से वमन, श्वास-कास और पित्त ज्वर दूर होता है।
—:०:—
अन्य ज्वर
हरड़ की छाल, आँवला, पीपल छोटी, चीता इनके सेवन से
सन्निपात ज्वर और कफ ज्वर नष्ट हो जाता है। इन चारों चीजों
का योग बड़ा ही पाचक और दस्तावर है।
काली मिर्च, कायफल, काकड़ासिंगी, पोखरमूल, छोटी पीपल
इन चीजों में से एक या दो को अथवा सबको लेकर चूर्ण बनावे।
बाद उस चूर्ण को अदरक के रस और शहद के साथ चटाने से
बालक का कफ ज्वर, अरुचि, श्वास और शूल नष्ट हो जाता है।
फालसा, कमलनाल, धान की खील और मिश्री को रात में
भिगो दे। सबेरे कपड़े से छानकर शहद मिलाकर पिलाने से बालक
का वात-पित्त-ज्वर, दाह, प्यास, मूर्च्छा, अरुचि, भ्रम रक्त-पित्त
असली कोकशास्त्र ३५६
आदि का शमन होता है ।
नागरमोथा, गिलोय, पित्तपापड़ा, पोहकरमूल, परवल, धनियाँ,
चिरायता, लाल चन्दन, खस, खरेटी, नेत्रवाला का क्वाथ पिलाने
से पित्त-कफ ज्वर नष्ट हो जाता है ।
बाँसा, कटहली की जड़ और पीपल का अवलेह शीत ज्वर को
नष्ट कर देता है । या कटहली की जड़, गिलोय, जवासा, कुटकी,
चिरायता का क्वाथ भी शीघ्र शीत ज्वर का संहार करता है ।
इस बात का ध्यान रहे कि चढ़े ज्वर में किसी प्रकार की भी
दवा नहीं देनी चाहिए। यदि दवा देने से एक-दो दिन पहले रेंडी
का तेल देकर दस्त करा दिया जाय तो बहुत उत्तम हो। दस्त हो
जाने से लाद की गर्मी शान्त हो जाती है, ज्वर का वेग भी कम
हो जाता है और दवा अधिक तेजी से रोग का नाश करने में
समर्थ होती है ।
कंजे की पिसी हुई भींगी एक माशा और काली मिर्च दो रत्ती
पीसकर अथवा अतीस डेढ़ माशा और काली मिर्च दो रत्ती ये
एक बार की मात्रायें हैं । यदि शरीर ठण्ढा हो और बुखार न हो
तो ठण्ढे पानी के साथ फँका देना चाहिए। सुबह और शाम दो में
से एक दवा सेवन कराने से बालक का बुखार छूट जाता है। यदि
शाम के वक्त बालक का शरीर गरम हो आता हो तो छटाँक भर
पानी में चार रत्ती सोरा और एक माशा पक्की चीनी घोलकर पिला
दे । बाद कम्बल से शरीर ढँक दे, ताकि पसीना हो जाय । यदि
३६० असली कोकशास्त्र
बुखार के साथ आँव के दस्त भी आते हों तो हींग एक रत्ती,
अफीम चौथाई रत्ती और काली मिर्च आधी रत्ती की एक-एक
गोली बनाकर सुबह-शाम एक गोली खिलावे । आँव पड़ते समय
तक रोटी आदि न खिलाकर चावल और दही खिलाना चाहिए ।
ऊपर की मात्रा युवक मनुष्य की है । बालक की मात्रा इससे कम
होनी चाहिए ।
—०—
लार गिरना
बहुत से बच्चों के मुख से लार गिरा करता है, यहाँ तक कि
कितने ही बालकों की छाती पर रूईदार टुकड़ा बँधा रहता है ओर
वह थोड़ी ही देर में भीग जाता है। ऐसे लड़कों के लिए दो तोले
मस्तगी, दो तोले बड़ी इलाइची के दाने कूट कर पावभर चीनी की
चाशनी में जमाकर रख दे और प्रतिदिन एक या दो माशे खिलाना
चाहिए । इससे लार का गिरना बन्द हो जाता है ।
—:०:—
कर्ण रोग
कमेरा, बिजौरा का अर्क, अदरक का अर्क इन सब चीजों को
गरम करके कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
आक के पीले पत्ते पर तेल पोतकर उसे तप्त तवे के ऊपर गरम
करना चाहिए । बाद उसका अर्क कान में निचोड़ देना चाहिए ।