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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

तृतीय प्रभाव ८७
शब्दार्थ—पय = जल । पावक = अग्नि, बाड़वाग्नि । पीक = पान की
हियें = हृदय में । नखचंद नए = नवीन नखक्षत । चित्र = लेप या चंदन से
बने चित्र । उजागर = प्रकट ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) सुंदरता ( कांति ) ही जल है,
महावर और पान की लगी पीक ही बाड़वाग्नि है, हृदय (छाती) में (ताजा)
लगे हुए नखक्षत ही नए चंद्र ( द्वितीया का चंद्रमा ) है, चित्रित चंदन ही
अमृत है, अंजन ही विष है, मणियों के टूटे हुए हार ( ही रत्न फैले हुए )
हैं, नेत्रों में भरी हुई नींद ही मदिरा है, जिसके नशे में बेहोश होकर वे इधर
उधर घूम रहे हैं । अतः नागरी ( प्रवीण नायिका ) और नागर ( प्रवीण
नायक ) कामक्रीड़ा करने के बाद प्रभात के समय प्रत्यक्ष सागर के वेश में
दिखाई पड़ रहे हैं।
अथ मध्याधीरादि-भेद—( दोहा )
[६१] सिगरी मध्या तीन बिधि, धीरा और अधीर ।
धीराधीरा तीसरी, बरनत हैं कबि धीर ।४५।
शब्दार्थ—सिगरी = सब ।
[६२] धीरा बोलै बक्र बिधि, बानी बिषम अधीर ।
पिय सों देइ उराहनो, सो धीरा न अधीर ।४६।
शब्दार्थ—वक्रविधि = व्यंग्य वाणी से । विषम = टेढ़ी, कड़ी, चुभती ।
अधीर = अधीरा । धीरा न अधीर = धीराधीरा ।
अथ मध्या धीरा, यथा—[ सवैया ]
[६३] ज्यों ज्यों हुलास सों केसवदास बिलास निवास हियें अवरेख्यो ।
त्यों त्यों बढ्यो डर कंप, कछू भ्रम भाँति भयो किधौं सीत बिसेख्यो ।
मुद्रित होत सखी बरहीं मेरे नैन-सरोजनि साँच कै लेख्यो ।
तैं जू कह्यो मुख मोहन को अरबिंद सो है सु तौ चंद सो देख्यो ।४७।
शब्दार्थ—हुलास = आनंद । विलास-निवास = रतिविलासों का निवास
( स्थल ) । हियें = हृदय ( वक्षस्थल ) में । अवरेख्यो = लक्षित किया ।
भ्रम = चक्कर । भाँति = समान, सा । बिसेख्यो = विशेष रूप में बढ़ गया ।
मुद्रित होत = बंद होते हुए । बरहीं = बलपूर्वक । लेख्यो = समझा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति सखी से ) हे सखी, उल्लासपूर्वक ज्यों-
ज्यों मैंने उनके वक्षःस्थल पर के रतिचिह्नों को ध्यान से देखा त्यों त्यों मेरे
हृदय में कंप होने लगा, कुछ चक्कर सा आने लगा, किंवा ठंडक की अधिकता
४५--हैं कबि० ∙ सुकबि अमीर । ४६—सों-को । ४७—बढ्यो-भयो ।
भाँति-भीत ।

८८ रसिकप्रिया
सी जान पड़ने लगी । मेरे नेत्रकमलों ने बलपूर्वक बंद होते हुए ( आज )
सचमुच इसे समझ लिया कि तू उनके मुख को जो कमल सा कहती थी वह
बात नहीं है, वह तो चंद्रमा की भाँति दिखाई पड़ रहा था ।
सूचना—'कमल' कहने से सखी का तात्पर्य नायिका ने उसे दोषरहित,
स्वस्थानसेवी और समशीलप्रदर्शक मान रखा था, पर आज उसने उसे
'चंद्रवत्' कहकर कलंकी, भ्रमणशील, न्यूनाधिक्य को प्राप्त होनेवाला बतलाया ।
अथ मध्या अधीरा यथा,―( कवित्त )
(६४) तात को सो गात सब बल बल बीर को सो,
मात को सो मुख महामोह मन भायो है ।
थल सो अचल सील, अनिल सो चल चित्त,
जल सो अमल, तेज तेज को सो गायो है ।
केसौदास बसत अकास के प्रकास घोष,
घटघट घरघर घैरु घनो छायो है ।
रति की सी रति, नाथ, रूप रतिनाथ को सो,
कहौ केसौराइ झूठ कौन यहु पायो है ॥४८॥
शब्दार्थ—तात = पिता ( नंद ) । गात = शरीर, देह । बल बीर = भाई
बलदाऊजी । मात = यशोदा । मोह = ममता । थल = ( स्थल ) पृथिवी ।
अचल = अचंचल, क्षमाशील । अनिल = वायु । सील = गुण । अमल =
निर्मल । तेज = प्रभा । तेज = अग्नि । प्रकास = भाँति, ढंग से । घोष = शब्द;
गांव ( ग्वालों का ) । घैरु = ( १ ) घेर, विराव; ( २ ) बदनामी । घनी =
अत्यधिक । रति = कामदेव की स्त्री । रति = प्रीति । रतिनाथ = कामदेव ।
केसौराइ = श्रीकृष्ण । यहु = इस कथन में ।
भावार्थ—(नायिका-वचन नायक से) पिता (नंद) जी की तरह आपका
शरीर है (जैसे वे वृद्धावस्था के कारण काँपते हैं आप भी वैसे ही काँप रहे हैं),
भाई बलदाऊजी का सा बल आपमें है ( वे मदिरा पीकर मतवाले होते हैं
और आप भी मतवाले हैं ) । माता ( यशोदा ) का सा आपका मुख है ( वे
मस्तक पर टीका लगाती हैं आपके मस्तक पर भी टिकुली चिपकी है ) जैसा
महामोह (ममत्व) उनमें है वैसा ही मोह ( मूर्च्छा, जागरण के कारण झपकी
लेना ) आपमें भी है, जो मन को रुचता है । ( पंच तत्त्वों के गुण भी आपमें
मौजूद हैं) । पृथ्वी की भाँति आप अचल गुण वाले हैं (पृथ्वी सर्वंसहा है, आप
भी सब कुछ कही सुनी सह लेते हैं) । पवन की तरह आप चंचल हैं । जल की
भाँति आपका चित्त निर्मल है (जल नीचे की ओर जाता है, आप भी नीचे की
ओर जा रहे हैं ) । अग्नि की सी ही आपकी प्रभा ( मुँह की सुर्खी ) है ।
४८—को सो-कैसो । मुख-मुंह । मोह-मोहूँ । अनिल-अनल ।

तृतीय प्रभाव ८६
आकाश की ही भाँति आपका शब्द और स्थिति घटघट में और घरघर में
भली भाँति व्याप्त है । (आकाश के ही कारण शब्द होता है और प्रत्येक घट
एवम् घर-मठ में उसकी व्याप्ति है—घटाकाश और मठाकाश रूप में । आपकी
बदनामी, गाँव में घटघट (सबके हृदय में) और घरघर व्याप्त है ) । काम की
पत्नी की भाँति आपका प्रेम है ( प्रिय के त्याग पर उसे रोना था आप भी
उस प्रिया के त्याग से दुखी हैं ) । हे नाथ आपका रूप कामदेव की तरह है
( कामदेव अरूप है । आप भी अरूप—बेडंगा रूप—धारण किए हुए हैं) ।
आप ही बतलाइए कि मेरी इन बातों में आपको कौन सी बात झूठ जान
पड़ती है ? ( मैं ठीक ही कह रही हूँ न ! ) ।
अलंकार—उपमाश्रित उल्लेख ।
अथ मध्या धीराधीरा, यथा—(सवैया)
(६५) कान्ह भले जु भले समुझाइहौं मोहसमुद्र कि ज्यौं उमह्यो हो ।
केसव आपनो मानिक सो मन हाथ पराए दै कोनें लह्यो हो ।
नैननिहीं मिलिबो करियै अब बैननि को मिलिबो तौ रह्यो हो ।
जाइ कह्यो तुम जैसे सखीनि सों एह्यो गुपाल मैं ऐसो कह्यो हो ।४६।
शब्दार्थ—उमह्यो हो = उमड़ा था । रह्यो हो = समाप्त हो गया ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक से) हे कान्ह, मैं आपको भली भाँति
समझाऊँगी कि मोहरूपी समुद्र का उमड़ना कैसा हुआ था । क्या किसी ने
माणिक सा अपना मन दूसरे के हाथ देकर (वापस) पाया है ? अब तो नेत्रों
का मिलन रह गया ( कभी कभी दर्शन भर कर लूँगी ) वचनों का मिलन
तो समाप्त हो गया ( आपसे बात न करना ही ठीक है ) । आपने जाकर
सखियों से जैसा ( उलटा सीधा ) कहा है, क्या गोपाल, मैंने ऐसा ही कहा
था ? ( आप इधर उधर की बातें बहुत किया करते हैं) ।
अथ प्रौढ़ा-भेद चतुर्विध—(दोहा)
(६६) सुनि समस्त रसकोबिदा, चित्तविभ्रमा जाति ।
अति आक्रामित नाइका, लब्धायति सुभ भाँति ।५०।
शब्दार्थ—सुनि = सुनो । जाति = भेद !
अथ समस्त रसकोविदा-लक्षण—(दोहा)
(६७) सो समस्तरसकोबिदा, कोबिद कहत बखानि ।
जो रस भावै प्रीतमहिं, तांही रस की दानि ।५१।
शब्दार्थ—कोबिदा=पंडित । रस = आनंद ।
४६—कि-को, की । उमह्यो-उमडघो, उमहो । हो-है । अब-सब ।
जैसें-जैसों, ऐसो । ५०—चित्र०-चित बिभ्रम या जाति, अक्रामितपति आन ।
लब्धायति०-लुब्धापति०, लब्धापतिहु बखान । ५१—दानि-ज्ञानि ।

६० रसिकप्रिया
यथा—( कबित्त )
(९८) देखी है गुपाल एक गोपिका मैं देवता सी,
सोने तें सलोनी बास साँधे तें सुहाई है।
सोभा ही सुभाउ अवतार लियो घनस्याम,
किधौं यह दामिनीयै कामिनी ह्वै आई है।
देवी कोउ मानवी न दानवी न होइ ऐसी,
भानवी न हावभाव भारती पढ़ाई है।
केसौदास सब सुख-साधन की सिद्धि यह,
मेरे जान मैनहीं सों मैनका की जाईं है।५२।
शब्दार्थ—सलोनी = सुंदर। बास = ( वास ) सुगंध। दामिनीयै =
बिजली ही। भानवी = भानु से उत्पन्न। मेरे = जान पड़ता है। भारती =
सरस्वती। मैन = ( मदन ) कामदेव। मैनका = एक अप्सरा।
भावार्थ—(दूती का वचन नायक से) हे गोपाल, मैंने एक अनुपम सौंदर्य
वाली गोपिका देखी है जो सोने से भी (अधिक) सलोनी है और जिसके
शरीर की सुगंध साक्षात् सुगंध से भी बढ़कर है। हे श्याम, या तो स्वयम् सुहा-
वनी शोभा ने ही उसके रूप में अवतार लिया है, या साक्षात् विद्युत ही स्त्री
बनकर चली आई है। कोई देवी, दानवी, सूर्यसमुद्भूता या मानवी ऐसी नहीं
दिखाई पड़ती। ऐसा जान पड़ता है कि स्वयम् सरस्वती ने ही उसे हावभाव की
शिक्षा दी है। वह सभी सुखों के साधन की सिद्धि रूप है, मुझे ऐसा जान
पड़ता है कि स्वयम् कामदेव ने उसे मेनका अप्सरा से उत्पन्न किया है।
अथ विचित्रविभ्रमा-प्रौढ़ा-लक्षण—(दोहा)
(९९) अति बिचित्रबिभ्रम सु बह, प्रौढ़ा कहत बखानि।
जाकी दीपति दूतिका, पियहि मिलावै आनि ।५३।
यथा—( सवैया )
(१००) है गति मंद मनोहर केसब आनंदकंद हियें उलहे हैं।
भौंह बिलासनि कोमल हासनि अंगसुबासनि गाढ़े गहे हैं।
बंक बिलोकनि कों अवलोकि सु मार ह्वै नंदकुमार रहे हैं।
एई तौ काम के बान कहावत फूलनि के बिधि भूलि कहे हैं। ५४।
शब्दार्थ—कंद=जड़। उलहे = उल्लसित। बिलास = भंगिमा, चलाना।
५२—मैं देवता सो-अनूप रूप। सुभाउ-सुहाई। लियो०--लियो स्याम
कीधौं, घनस्याम कीधौं। मानवी-दानवी। दानवी-मानवी। भानवी-मानवी।
हावभाव-होय भावै। पढ़ाई-पठाई। मैनका-मैनकी। ५३—सु वह-सदा।
कहत-प्रगट। ५४—उलहे-उमहे। एई तो-एक तो। कहे-गहे।

तृतीय प्रभाव ६१

सु = सो । मार = काम ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) उसकी गति मंद और मनोहारिणी
है, आनंदकंद ( श्रीकृष्ण ) जिसे देखकर हृदय से उल्लसित हो रहे हैं।
भ्रूभंगिमा, कोमल हँसी और शरीर की सुगंध ने उन्हें भली भाँति पकड़ लिया
है ( वश में कर लिया है )। उसकी टेढ़ी चितवन देखकर नंदकुमार कामदेव
हो रहे हैं ( और सोच रहे हैं कि ) असल में काम के बाण तो ये ही हैं ।
ब्रह्मा ने भूलकर काम के बाणों को फूलों के बाण कहा है ।
अलंकार—अपह्नति ।
अथ आक्रामितनायिका-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०१) सो आक्रामित नाइका, प्रौढ़ा कहि दै चित्त ।
मनसा बाचा कर्मना, जिनि बस कीनो मित्त ।५५।
शब्दार्थ—दै = देकर, लगाकर । मित्त = मित्र, प्रिय, पति ।
यथा—( सवैया )
(१०२) तो हित गाइ बजावत नाचत बार अनेक सिंगारु बनायो ।
जीहू में आन कौ आनिबो छोड़यो री तौऊ न तेरो भयो मनभायो ।
भावै सो तूँ करिबो करि भामिनि भाग बड़े बस तैं करि पायो ।
कान्ह त्यों सूधें जु चाहति नाहि सु चाहति है अब पाइ लगायो ।५६।
शब्दार्थ—हित = लिए । जीहू में = हृदय में भी । आन = अन्य
( दूसरी स्त्रियों को ) । पाइ लगायो = पैर पड़वाना ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) तेरी प्रसन्नता के लिए वे
( श्रीकृष्ण ) गाकर बाँसुरी बजाते हैं, नाचते हैं, और अनेक बार उन्होंने
अपना शृंगार ( वेशभूषा ) भी बनाया । अब वे हृदय में भी किसी दूसरी स्त्री
का ध्यान ले आना छोड़ चुके हैं । इतने पर भी तेरा मनचाहा नहीं हुआ ।
बड़े भाग्य से तूने उन्हें इस प्रकार वश में कर पाया है, अतः तुझे जो अच्छा
लगे वह कर । कान्ह ऐसे सीधे को तू ( प्रसन्नतापूर्वक ) प्यार तो करती नहीं,
अब चाहती यह है कि वे ( अपनी भूल के लिए ) तेरे पैरों पड़ें ।
अथ लब्धायति-प्रौढ़ा-लक्षण—( दोहा )
(१०३) सो लब्धायति जानियै, केसव प्रगट प्रमान ।
कानि करै पति कुल सबै, प्रभुता प्रभुहि समान ।५७।
५५ कहि दै-कहियै, करिबै । जिनि-जिहि । कीनो-कीन्यो । ५६-छाड्यो
री-छांडिबो । तोऊ०-तेरो तऊ न । करे-को । तैं करि-है करि, चोकड़ि ।
त्यों-ज्यों । नाहिं-नाहीं सो ।

६२ रसिकप्रिया
यथा—( सवैया )
(१०४) आज बिराजत हैं कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि कन्हाई ।
बानि बिरंचि बहिक्रम काम रची जु बची सु बधूनि बनाई ।
अंग बिलोकि त्रिलोक में ऐसी को नारि नहीं जिन नारि नवाई ।
मूरतिवंत सिंगार-समीप सिंगार कियें जनु सुंदरताई ।५८।
शब्दार्थ-- बानि = ( बाणी ) सरस्वती । बिरंचि = ब्रह्मा । बहिक्रम =
वयःक्रम, वयःसंधि । काम = कामना । नारि = स्त्री । नारि = गर्दन । नवाई =
झुकाई ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) आज श्रीवृषभानु की पुत्री
राधिका और श्रीकृष्ण अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं। ब्रह्मा ने वयःसंधि की
कामना से ( उसी वृषभानुकुमारी की सुंदरता से ही कुछ लेकर ) सरस्वती
की रचना की, जो बचा उससे संसार की अन्य सुंदर रमणियों का निर्माण
किया । इसी से उसका अंग देखने पर त्रिलोक में ऐसी कोई स्त्री नहीं दिखाई
देती जिसकी गर्दन न झुक जाए । ऐसा जान पड़ता है मानो साक्षात् शृंगार
( श्रीकृष्ण ) के समीप मूर्तिमयी सुंदरता ( राधिका) ही अपना रूप सँवारे
विराजमान हो ।
अलंकार - उत्प्रेक्षा ।
अथ प्रौढ-धीरा-लक्षणा—( दोहा )
(१०५) आदर माँझ अनादरै, प्रकट करै हित होइ ।
आकृति आप दुरावई, प्रौढ़ा धीरा दोइ ।५६।
शब्दार्थ—हित होइ = हितुआ बनकर ।
प्रौढ़ा सादरा धीरा, यथा- ( सवैया )
(१०६) आवत देखि लिये उठि आगैं ह्वै आपुहि केसव आसनु दीनो ।
आपुहि पाइ पखारि भलें जल, पानी को भाजन लाइ नवीनो ।
बीरी बनाइकै आगैं धरी जब बैहर कौं कर बीजना लीनो ।
बाँह गही हरि, ऐसे कह्यो हँसि मैं तौ इतौ अपराध न कीनो ।६०।
शब्दार्थ—बीरी = पान की गिलौरियाँ । बीजना = (व्यजन) पंखा ।
भावार्थ---(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण को (सपत्नी के यहाँ से)
आते देखकर ( नायिका ने ) आगे बढ़कर उन्हें लिया और स्वयम् ही ( बैठने
को ) आसन दिया । पानी का नवीन बर्तन लाकर स्वच्छ जल से स्वयम् ही
( परिचारिका द्वारा नहीं ) पैर भी धोए । स्वयम् पान के बीड़े भी बनाकर
५८-बहिक्रम-वही क्रम । बची-बरी । नहीं जिन०-निहारि नितारि
बनाई ।

(तश्तरी में) आगे रखे दिए । इसके अनंतर जब उसने (नायिका ने)
श्रीकृष्ण को झलने के लिए अपने हाथ में पंखा लिया तब उन्होंने हाथ पकड़
लिया और हंसकर कहने लगे कि मैंने तो इतना अपराध नहीं किया है (जिसका
मुझे यह दंड दिया जा रहा है) ।
सूचना—चौथे चरण के 'एतो अवराधन कीनों' पाठ से भी अच्छा
अर्थ लग सकता है—श्रीकृष्ण ने हाथ पकड़ लिया और हँसकर कहा कि बहुत
अधिक सेवा (आराधना) हो चुकी (अब बस करो) ।
अथ आकृतिगुप्ता प्रौढ़ा धीरा, यथा—(सवैया)
(१०७) चितवौ चितवाएँ हँसाएँ हँसौ हो बुलाएँ तें बोलौ रहौ नतु मौने ।
सौंह अनेकनि आवहु अंक, करौ रति कों प्रति रैन की रौने ।
ख्वाएँ तें खाहु बरयाइ बिरी जनु आई हौ केसव आज ही गौने ।
मोहन के मन मोहन कों सु कहौ यह धौं सिखई सिख कौने ।६१।
शब्दार्थ—रौने = रोदन ही । अथवा रौना = आगमन । ख्वाएँ = खिलाने
से । बरचाइ = मुश्किल से ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) देखने के लिए जब प्रेरित
किया जाता है तब तुम देखती हो, हँसाया जाता है तो हँसती हो, बुलाने से
बोलती हो नहीं तो चुपचाप ही रहती हो । अनेक कसमें खाने पर गोद में
आया (जाया) करती हो । प्रत्येक रात की प्रीति के लिए रोदन सा ठाने
रहती हो (अथवा) प्रीति को रौने के समान संकोचशील किए रहती हो) ।
खिलाने पर भी बड़ी कठिनाई से पान की बीरी खाती हो, मानो आज ही
गौने आई हो । मोहन (जो सबको मोह लेता है) के मन को मोहने के
लिए यह शिक्षा न जाने किसने तुम्हें दी है ।
सूचना—'रौने' का अर्थ 'रौना ही, आगमन ही' करने पर दूसरी पंक्ति
तीसरी के स्थान पर बदल दी जाए तो अच्छा हो । क्योंकि रौना गौने के
अनंतर होता है ।
पुनर्यथा—(सवैया)
(१०८) हित कै इत देखहु देख्यो सबै हित-बात सुनौ जु सुनी सब ही हैं ।
यह तौ कछु और बहै सब ही अरु सौंह करौ ब करी जु तही हैं ।
६०—आगें हूँ-आगेहि । बीरी-बीरा । धरो-धरो । जब-जबै । जब०-
सो जबै हरि । कर-बर । ऐसे-ऐसो । मैं तो-एतो । अपराध न-अवराधन ।
६१—हो-ओ । नतु-तित । ख्वाएँ०-कोइ खवाए तें खाओ बिरी । मोहन
कों-मोहिबे कों ।

६४ रसिकप्रिया
समुझाइ कहौं समुझी सब केसव झूठी सबै हमसौ जु कही हैं ।
मान कियो अपमान करौ तौ हँसौ अब कै हँसिबे कौ रही हैं ।६२।
शब्दार्थ—हितु कै = प्रेमपूर्वक । अरु = (अड़) हठ । अब कै = इस
बार (एक बार) ।
भावार्थ—(नायक-नायिका का संवाद) (नायक) 'प्रेमपूर्वक इधर
देखो'। (नायिका) 'सब देख चुकी'। (नायक) 'अच्छा प्रेम की बातें ही
सुनो'। (नायिका) 'हाँ, मैंने सब सुन लिया'। (नायक) 'यह तो कुछ
और ही बात है'। (नायिका) (अगर मेरा हठ समझते हो तो) कसम
खाओ (खाकर बतलाओ) कि वहाँ (सपत्नी के यहाँ) 'तुमने क्या
क्या कर्म किए हैं'? (नायक) 'मैंने तो समझाकर कह दिया'।
(नायिका) मैंने समझ लिया कि आपने मुझसे सब झूठी बातें कही हैं ।
(नायक) (मैं समझ गया) 'तुमने मान किया है'। (नायिका) (ऐसा
कहकर तो आप मेरा) 'अपमान कर रहे हैं'। (नायक) (अगर ऐसी बात नहीं
है) 'तो इस बार हँसो तो'। (नायिका) 'मैं तो हँस चुकी (मै नहीं हँसूंगी)' ।
अथ प्रौढ़ा-अधीरा-लक्षण— (दोहा)
(१०६) पति को अति अपराध गनि, हतन कहैं हित मानि ।
कहत अधीरा प्रौढ़ तिहि, केसवदास बखानि ।६३।
यथा— (सवैया)
(११०) हौं सुख पाइ सिखाइ रही सिख सीखे न ए सखितैं हूँ सिखाई ।
मैं बहुतै दुख पाइहू देख्यौ पै केसव क्यौंहूँ कुटेव न जाई ।
दंड दियैं बिनु साधुनिहूँ सँग छूटति क्यों खल की खलताई ।
देखहु दै मधु की पुट कोटि मिटै न घटै बिष की बिषमाई ।६४।
शब्दार्थ—मधु=शहद । बिषमाई=भयंकरता, कटुता ।
भावार्थ—(नायिका नायक की उपस्थिति में सखी से कह रही है) मैं
सुखपूर्वक (बिना अपनी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त किए) सिखाचुकी, पर इन्होंने
शिक्षा नहीं ग्रहण की (कहना नहीं माना), तूने भी तो सीख दी (क्या
परिणाम हुआ ! कुछ नहीं) । मैंने (इनकी टेव बदलने के लिए) बहुत कष्ट
उठाकर भी देख लिया, पर इनकी बुरी बान किसी प्रकार छूटती ही नहीं ।
साधुओं के संग में रहने पर भी खलों की दुष्टता बिना दंड दिए छूटती नहीं ।
विष में शहद का चाहे करोड़ों पुट दिया जाय पर विष की कटुता (शहद
की मिष्टता से) दूर नहीं हो सकती ।
६२—देखहु-देखो जू । सब हो-निबही । सब ही-सब है । अरु-अब ।
जु-जू । तही-तुही । कहो-कह्यो । समुझी ०-समुझाइ कै । सब-हम । कियौ-
किए । करौ तो-करै जो । ६३—हतन-हितन । कहै-करै । तिहि-तिय । ६४-
पाइ-खाइ । सखि-सिख । बहुत दुख पाइ-बहुतेहूँ सबाइ । दंड-देहु ।

तृतीय प्रभाव ६५
अलंकार - दृष्टान ।
सूचना - लीथोवाली और छपी प्रतियों में यह छंद नहीं है, पर हस्त-
लिखित प्रतियों में है ।
अथ प्रौढ़ा-धीराधीरा-लक्षण- ( दोहा )
(१११) मुख रूखी बातैं कहै, जिय मैं पिय की भूख ।
धीराधीरा जानिये, जैसी मीठी ऊख । ६५।
यथा-( सवैया )
(११२) हो मन मैलो न जौ लौं कछू अब छोड़हु बोलिबो बोल हँसौहैं ।
केसव औरनि सों रसरासि रसयो रसबाद सबै हम सौं हैं ।
देखहु धौं इक बार सँकोचनि आरस-लोचन आरसी सौंहैं ।
आए जू वैसेई-साज सौं आजु सु भूलि गई पिय काल्हि की सौंहैं ।
शब्दार्थ- मैलो = मलिन, उदासीन । रसरासि = आनंदपूर्णा बातें ।
रसयो=की । रसबाद = ( प्रेम के ) झगड़े । संकोच = लज्जा । सौंहै =
सामने । सौंहैं = शपथें ।
भावार्थ - (नायिका की उक्ति नायक से) हे प्रिय, (जान पड़ता है कि )
आपको कल की शपथें भूल गईं ? क्योंकि आप आज भी वैसे ही साज (वेष)
से यहाँ आए हैं ? मेरा मन आपके प्रति तब तक उदासीन ही रहेगा जब तक
आप अपने ये, हँसीवाले बोल बोलना नहीं छोड़ देते । आप औरों ( सौतों )
से तो आनंदपूर्णा बातें किया करते हैं, सारे झगड़े केवल मेरे ही साथ होते
हैं। एक बार जरा अपने संकोच और आलस्य से भरे नेत्रों को दर्पण के
सामने देख आइए ( फिर मुझसे बातें कीजिए ) । ( रात्रि के जागरण की
गवाही आपका चेहरा दे रहा है ) ।
इति स्वकीया ।
अथ परकीया-लक्षण- ( दोहा )
(११३) सब तें पर परसिद्ध जग, ताकी जु प्रिया होइ ।
परकीया तासों कहैं, परम पुराने लोइ । ६७।
शब्दार्थ - सब तें लोक और वेद दोनो से । पर=अन्य ( परपुरुष ) ।
परसिद्ध प्रसिद्ध, प्रख्यात । लोइ = लोग ।
अथ परकीया के भेद- ( दोहा ) •
(११४) परकीया द्वै भाँति पुनि, ऊढ़ा एक अनूढ़ ।
जिन्हें देखि सुनि होत बस, संतत मूढ़ अमूढ़ । ६८।
शब्दार्थ-ऊढ़ा=विवाहिता । अनूढ़ = अनूढ़ा, अविवाहिता । अमूढ़ पंडित ।
६५ - धीराधीरा-धीर अधीरा । ६६ - हो-हौं । मैलो-मैले । जो लौं-बोलौं ।
रसयो-रसो । ६७-जग-जो । ६८-जिन्हें जिनहीं । सुनि-सब । सब-हैं ।

६६ रसिकप्रिया
अथ ऊढ़ा-अनूढ़ा-लक्षण--(दोहा)
(११५) ऊढ़ा होइ बिबाहिता, अबिबाहिता अनूढ़।
तिनके कहौं बिलास अब, केसव गूढ़ अगूढ़। ६९।
शब्दार्थ—गूढ़ = गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
ऊढ़ा, यथा—(सवैया)
(११६) बैठौ सखीनि की सोभै सभा सब ही के सु नैननि माँझ बसै।
बूझै तें बात बरचाइ कहै मन ही मन केसवराइ हँसै।
खेलति है इत खेल उतै पिय चित्त खिलावति यों बिलसै।
काउ जानै नहीं दृग दौरि कबै कित ह्वै हरि आनन छूवै निकसै ७०
शब्दार्थ—सोभै = सुशोभित होती है। सु = सो, वह। सब ही० = सभी
ध्यान से उसे देख रहे हैं। बूझे तें = पूछने पर ही। बरचाइ = बड़ी कठिनाई
से। बिलसै = शोभा पाती है। कोउ...निकसै = न जाने कब उसके नेत्र दौड़-
कर किधर से श्रीकृष्ण के मुख को छूते हुए निकल जाते हैं। (बीच बीच में
वह नायक को बड़ी सफाई से देख लेती है)।
अनूढ़ा, यथा—(सवैया)
(११७) बैठी हुती ब्रजनारिन में बनि श्रीवृषभानुकुमारि सभागी।
खेलति ही सखी चौपर चारु भई तिहिं खेल खरी अनुरागी।
पीछे तें केसव बोलि उठे सुनिकै चित चातुरी आतुरी जागी।
जानी न काहू कबै हरि के सुर-मारगहीं सर सी दृग लागी। ७१।
शब्दार्थ—हुती = थी। बनि = श्रृंगार करके। सभागी = भाग्यवती।
ही = थी। खरी = अत्यंत। बोलि उठे = श्रीकृष्ण आकर बोले। चित =
चित्त में। चातुरी = चातुर्य। आतुरी = आतुरता। सुर-मारगहीं = स्वर के
मार्ग से, जिधर से उनकी वाणी आ रही थी।
भावार्थ—(सखी का वचन सखी से) श्रीवृषभानु की पुत्री भाग्यवती
राधिका ब्रजबालानों के बीच बैठी हुई थीं और हे सखी, सुन्दर चौपड़ खेल
रही थीं। उस खेल में जब वे अत्यंत अनुरक्त (लीन) हो गईं (तब) इसी
बीच में श्रीकृष्ण आए और वे पीछे की ओर से कुछ (बातें) बोल उठे,
जिन्हें सुनकर उन (राधिका) के मन में चतुरता और आतुरता दोनो जग
गईं। किसी को पता ही नहीं चला कि कब श्रीकृष्ण के स्वरमार्ग से (जिधर
से उनकी वाणी की ध्वनि आ रही थी उधर) उनके नेत्र श्रीकृष्ण के नेत्रों में
बाण की भाँति जा लगे।
६९-अविवाहिता-अनव्याहिता। अब-सब। ७०-सु-जु। तें-हि।
केसवराइ-केसवदास। ७१—चारु-चारि। मारगहीं-आर गही।

७ तृतीय प्रभाव ६७
(दोहा)
(११८) काहू सों न कहै कछू, बात अनूढ़ा गूढ़।
सखी सहेली सों कहै, ऊढ़ा गूढ़ अगूढ़।७२।
शब्दार्थ—सखी = अंतरंग सखी। सहेली = बहिरंग सखी। गूढ़ =
गुप्त। अगूढ़ = प्रकट।
सूचना—यह छंद पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
ऊढ़ा वचन, यथा—(सवैया)
(११६) केसवराइ की सौहैं कहै कछू एकनि आपु में होड़ परी।
एक चितै मुसकाइ इतै, उत बात कहैं बहु भाइ भरी।
चारु चकोर बिलोचन भा सो चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी।
सखि काल्हि गई हुती गोकुल हौं सबहीं मिलि द्वैज को चंद करी ७३
शब्दार्थ—सौहैं = शपथ, कसम। एकनि = कुछ लोगों में। आपु में =
आपस में। होड़ = लागडाँट, यहाँ वादविवाद। चहूँ दिसि तें अँगुरी पसरी =
चारो ओर से गोपिकाओं ने अंगुली दिखाकर संकेत किया।
भावार्थ—(ऊढ़ा का वचन बहिरंग सखी से) मैं आज गोकुल गई थी।
वहाँ मुझे देखकर कुछ स्त्रियाँ शपथ कर करके मेरे बारे में आपस में वाद-
विवाद करने लगीं (कोई कहती थी कि यही श्रीकृष्ण की प्रेमिका है और
कोई कहती थी नहीं)। कुछ स्त्रियाँ एक ओर तो मुझे देखकर मुसकाती थीं
और दूसरी ओर अपनी संगिनी स्त्रियों से अत्यंत भावभरी बातें करने लगती
थीं। चारो ओर से उनकी उँगलियाँ मुझे इंगित कर रही थीं। उन सबने
मिलकर तो मुझे द्वितीया का चंद्रमा ही बना डाला था। (जैसे द्वितीया के
चंद्रमा को देखकर दूसरों को दिखाने के लिए लोग उँगली से इंगित करते हैं
उसी प्रकार वे मुझ पर उँगली उठा रही थीं)।
सूचना—यह छंद भी पूर्ण हस्तलिखित प्रति में नहीं है।
(दोहा)
(१२०) जगनायक की नायिका, बरनी केसवदास।
तिनके दरसन रस कहौं, सुनौ प्रछन्न प्रकास।७४।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां स्वकीया-
परकीयादिभेदवर्णनं नाम तृतीयः प्रभावः।३।
७३—केसवराइ-केसवदास। काल्हि-आजु। ७४—सुनौ-सुनहु, सुनि।
प्रछन्न-प्रच्छन्न।

चतुर्थ प्रभाव

अथ दर्शन-लक्षण—(दोहा)

(१२१) ए दोऊ दरसैं दरसु, होहिं सकाम सरीर ।
दरसन चारि प्रकार को, बरनत हैं कबि धीर ।१।
शब्दार्थ—चारि प्रकार = साक्षात् या प्रत्यक्ष-दर्शन, चित्र-दर्शन, स्वप्न-
दर्शन और श्रवण-दर्शन ।
(१२२) एक जु नीके देखियै, दूजें दरसन चित्र ।
तीजें सपने देखियै, चौथैं श्रवननि मित्र ।२।
शब्दार्थ—नीकें देखियै = अर्थात् प्रत्यक्ष ।
सूचना—'सरदार' की टीका में एक दोहा इसके बाद यह भी दिया
गया है—
दरसन नीके दरसि यहि, दंपति प्रवि सुख मान ।
ताहि कहत साक्षात हैं, केसवदास सुजान ।
साक्षात् दर्शन--(दोहा)
(१२३) नींद भूख दुति देह की, गई सुनतहीं जाहि ।
को जानै ह्वै है कहा, केसव देखें नाहि ।३।
शब्दार्थ—देखें = देखने पर ।
सूचना--'सरदार' की टीका में इसके बाद भी एक दोहा और दिया
गया है और कहा गया है कि केशव का नहीं जान पड़ता—
देखन को प्रिय रूप दृग, तजे सकल जगकाज ।
कोटि जतनहूँ कै रही, रहे नैन गड़ि लाज ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा—(सवैया)
(१२४) कहि केसव श्रीबृषभानु-कुमारि सिँगार सिँगारि सबै सरसै।
सबिलास चितै हरिनायक त्यों रतिनायक-सायक से बरसें ।
कबहूँ मुख देखति दर्पन लै उपमा मुख की सुखमा सरसै ।
जनु आनँदकंद सँपूरन चंद दुरयो रबि-मंडल में दरसै ।४।
शब्दार्थ—सिँगार सिँगार सबै सरसै = सब प्रकार के शृंगार सजकर
सुशोभित होती है । सबिलास = भंगिमासहित, शृंगारी चेष्टाओं से युक्त ।


१--कबि-मति । २--नीकें-नीकेंहि, नीको । दूजें-दूजो । तीर्जे-
तीजों । सपने०-सपनो जानियें । चौथैं-चौथो । श्रवननि०-श्रवन सु मित्र ।
४-सिँगार०-सिँगारि सिंगार । लै-मैं । संपूरन-सुपूरन ।

चतुर्थ प्रभाव ६६
स्यें = ओर। रतिनायक-सायक = कामदेव के बाण। उपमा० = मुख की
उपमा इस शोभा को स्पर्श करती है, मुख की शोभा ऐसी जान पड़ती है।
दुरचो = छिपा हुआ। जनु......दरसै = मानो आनंददायक पूर्ण चंद्र रविमंडल
में छिपा हुआ दिखाई पड़ रहा है (दर्पण रविमंडल है, मुख पूर्ण चंद्र है)।
अलंकार - उक्तविषया वस्तूतप्रेक्षा।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा - ( सवैया )
(१२५) पहिले तजि आरस आरसी देखि घरीकु घसे घनसारहि लै।
पुनि पोंछि गुलाब तिलौँछि फुलेल अँगौछे में आछे अँगौछनि कै।
कहि केसव मेद जुबाद सों माँजि इते पर आँजे मैं अंजन दै।
बहुरयो दुरि देखौं तौ देखौं कहा सखि लाज तौ लोचन लागियै हैं।५।
शब्दार्थ-घरीकु = घड़ी भर। घनसार = कपूर। फुलेल = फूलों में वास
कर निकाला गया सुगंधित तेल। तिलौँछि = तेल से (लगाकर) साफ
करके। अँगौछे = (अँगौछे से) पोंछा। आछे = भली भाँति। अँगौछनि
कै = अँगौछों से, रूमाल से। मेद = कस्तूरी। जुबाद = (फारसी) बिलाव
के अंडकोश से निकली हुई एक प्रकार की कस्तूरी।
भावार्थ- (नायिका की उक्ति सखी से) हे सखी, पहले मैंने आलस्य
छोड़कर नेत्रों को दर्पण में देखा और घड़ी भर कपूर लेकर उनमें मला।
इसके बाद भली भाँति गुलाब से उन्हें पोंछा। फुलेल लगाकर उन्हें साफ
किया। भली भाँति अँगौछों से उन्हें पोंछा। इतना ही नहीं प्रत्युत कस्तूरी
और जुबाद से भली भाँति माँजकर (रगड़कर) उनमें अंजन लगाया। इसके
बाद मैंने छिपकर नायक को देखा, पर इतने पर भी नेत्रों में लज्जा लगी ही
(निकली नहीं)।
अलंकार-विशेषोक्ति (पूर्ण कारण के होते हुए भी कार्य न होने से)।
सूचना- 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में गुरु वस्तुओं के वर्णन में यह
सवैया लज्जा का गुरुत्व दिखाने के लिए उदाहरण में दिया गया है।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न साक्षात् दर्शन, यथा- (सवैया)
(१२६) भाल गुही गुन लाज लटैं लपटी लर मोतिन की सुखदंनी।
ताहि बिलोकति आरसी लै कर आरस सों इक सारसनैनी।
केसव कान्ह दुरैं दरसी परसी उपमा मति की अति पैनी
सूरज-मंडल में ससि-मंडल मध्य धँसी जनु जाइ त्रिवैनी।६।
५-घरीकु-कछुक। घसे-घसै, घस्यौ। जुबाद-जिबाद, जब्बाद, जबानि।
बहुरयो-बहुरों, बहुरे। तौ-जो। देखौ०-तौ देखि रो। लागियै है-लागेइ
है, लागि अहै। ६-श्रीकृष्णजू-नायक। सवैया-विजै छंद। मति की-मति कों
मति त। जनु-मनु। जाइ-ताहि, जाहि।

१०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—गुन लाल = लाल डोरा । सारस = कमल । दुरे = छिपे हुए ।
दरसी = दिखाई पड़ी । परसी = स्पर्श की । पैनी=तीखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, उस ( नायिका ) ने
अपने मस्तक पर की उन लटों को लाल डोरे से गुहा जिनमें मोतियों की
सुखदायिनी लड़ियाँ लिपटी हुई थीं। (गुहने के बाद ) वह कमलनैत्रवाली
हाथ में दर्पण लेकर उसे (उसकी शोभा को ) आलस्यपूर्वक (देर लगाकर)
देखने लगी। (उसकी इस क्रिया को) श्रीकृष्ण छिपे हुए देख रहे थे ।
वह उस समय उन्हें ऐसी दिखाई पड़ी और उनकी मति को ऐसी अत्यंत
तीखी (उत्कृष्ट, अनोखी ) उपमा ने स्पर्श किया, मानो सूर्य-मंडल (लाल
मणि के दर्पण ) में चंद्रमंडल ( मुख ) हो और त्रिवेणी धँसी हो (जा
पहुँची हो) (केशकलाप श्यामवर्ण होने से यमुना, लाल डोरे सरस्वती और
मोती उज्ज्वल वर्ण होने से गंगा की शोभा दे रहे थे ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा—( सवैया )
(१२७) इक तौ उर और उरोज अनूपम तैसे मनोहर हार महा री ।
सखि चित्त चलै तरुनीनिहूँ को तरुनैन की केसव बात कहा री ।
हितु सों हित की कहि आवति है पर कौ लगि होउँ री कौतुकहारी
अब अंचल दै नँदलाल बिलोकत री दधि नोखी बिलोवनहारी।७।
शब्दार्थ—चित्त चलै तरुनीनिहूँ को = स्त्रियों का भी मन आकृष्ट हो
जाता है । तरुनैन की = तरुण युवकों ( पुरुषों) की । हितु = मित्र, संगिनी ।
अंचल दै = अंचल से ढक । नोखी = अनोखी, विचित्र । बिलोवनहारी =
मथनेवाली ।
भावार्थ---( सखी की उक्ति नायिका से ) एक तो तेरे उर (वक्षःस्थल)
और स्तन यों ही अनुपम हैं और इतने पर ( इन उरोजों पर ) हार भी तद-
नुरूप अत्यंत मनोहर पड़े हुए हैं । तेरी यह शोभा देखकर युवती स्त्रियों का
मन भी चलायमान हो जाता है ( तेरी शोभा पर आकृष्ट हो जाता है ),
फिर तरुण पुरुषों की तो बात ही क्या ! अपनी संगिनी से भलाई की बात
कहनी ही पड़ती है । (आखिर ) मैं कब तक तमाशबीन ( तेरा यह तमाशा
देखनेवाली ) बनी रहूँ ? अब तो ( इन स्तनों को ) अंचल से ढक, नंदलाल
( श्रीकृष्ण खड़े खड़े ) उसकी छटा देख रहे हैं (और तू दही मथने का बहाना
करके उन्हें देखने का मौका दे रही है) तू तो अनोखी दही मथनेवाली निकलो!
अलंकार--काव्यार्थापत्ति और अनुगुण ।
७—उर-तरु । आवति०-है बनि आवति, है परि आवति, ही परि
आवति । होउं०-होहुँ रो, होंव री ।

चतुर्थ प्रभाव १०१
सूचना--मुद्रित प्रति में यह दोहा भी है--
प्रकट काम को कल्पतरु, कहि न सकति मति मूढ़ ।
चित्रहु में हरि-मित्र की, अति अद्भुत गति गूढ़ ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१२८) लोचन ऐंचि लिये इत कों मन की गति जद्यपि नेहनही है ।
आनन आइ गए श्रम-सीकर रोम उठे तन कंप लही है ।
तासों कहा कहियै कहि केसव लाज-समुद्र में बूड़ि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यौं सकुची जनु बाँह गही है । ८।
शब्दार्थ--नही=नधी, जुड़ी, युक्त । श्रम-सीकर = पसीने की बूंदें ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति सखी से ) यद्यपि नायिका ने चित्र पर से
अपनी दृष्टि इधर की ओर खींच ली है तथापि मन की गति अब भी स्नेहयुक्त
है। क्योंकि उसके मुख पर पसीने की बूँदें आ गई हैं। रोएँ खड़े हो गए हैं
और शरीर ने कंप ग्रहण कर लिया है। उससे कहा भी जाय तो क्या कहा
जाय जो स्वयम् लज्जा के समुद्र में डूब रहा हो। चित्र में भी अपने प्रिय
श्रीकृष्ण को देखकर वह इस प्रकार सकुच गई है मानो उन्होंने प्रत्यक्ष ही
उसकी बाँह पकड़ ली हो ।
अलंकार-द्वितीय विभावना ।
सूचना- इसके बाद यह सवैया भी मुद्रित प्रति में है, जिसे सरदार ने
केशव का नहीं माना है-
तैं जनु मोहन कों चितयो कछु ऐसें कही जनु मोसों कही है ।
लाज तजै नहिं खेलत ही मन की गति गूढ़ कहाँ लौं लही है ।
केसव चित्रित मंदिर आजु दिखावत ही मति रीझि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यों सकुची जनु बाँह गही है ।
(१२६) श्रीराधिकाजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( कवित्त )
केसौदास नेहदसा दीपक सजोय कैसे,
ज्योति ही के ध्यान तम-तेजहि नसायहूँ ।
आँखिन सों बाँधे अन्न काहू की बुझानी भूख,
पानी की कहानी रानी प्यास क्यों बुझायहै ।
ए री मेरी इंदुमुखी इंदीवर-नंनी लखें,
इंदिरा के मंदिर में संपति सिधायहै।
ऐसे दिन ऐसं ही गंवावति गँवारि कहा,
चित्र देखें मित्र के मिले को सुख पायहै । ६।
८-गति-मति । तन-उर, श्रति, उठि। कंप०-कंप गही, कंपत ही । ६-
संजोय-संजोग । तम-तप । अन्न-अन्य । बुझानी-न भागी । रानी०-प्यास कंसे
के । इंदीवर०--इंदीबरनैन । में--क्यों । सिधायहे--समाइ है । देखें--बिना ।

१०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—नेहु = तेल; प्रेम । दसा = अवस्था; बत्ती । सँजोय =
जला, बाल । ज्योति ही के = प्रकाश के ही । तम-तेज = अंधकार का
आधिक्य; मन का मालिन्य । अन्न = अन्न, भोजन । आँखिन० = सिर्फ अन्न
ही आँख से देखते रहने से । इंदुमुखी = चंद्रमुखी । इंदीवर० = कमल के से
नेत्रवाली । इंदिरा = लक्ष्मी । गँवारि = मूर्ख, पगली ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) तू स्नेह-दशा (प्रेम की अवस्था;
तेल और बत्ती ) से दीपक जला (प्रियतम से मिल) केवल ज्योति ( प्रिय के
शरीर की कांति ) का ध्यान करने से तम का तेज ( अंधकार की प्रचंडता,
उदासी की अधिकता ) कैसे नष्ट कर सकेगी । क्या आँखों में अन्न बाँध लेने
से ( आँखों से अन्न देखते रहने से) किसी की भूख मिटी है ( या तेरी ही भूख
मिट जायगी ) । सिर्फ पानी की कथा कहने से, मेरी रानी, प्यास कैसे
बुझेगी ? ऐ मेरी चंद्रमुखी कमलनयनी सखी क्या लक्ष्मी का चित्र ही लिख
देने से घर में संपत्ति भर जाएगी ? इन दिनों को (जब कि प्रियतम से मिलने
के अनेक अवसर प्राप्त हो सकते हैं) ऐ पगली इस प्रकार ( केवल चित्र देखने
में) तू बिताए दे रही है । क्या प्रिय का चित्र देखने से ही तुझे प्रिय से मिलने
का सुख प्राप्त हो जाएगा ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा -- ( कवित्त )
(१३०) रूठिबे को तूठिबे को मृदु मुसक्याय कै,
बिलोकिबो को भेद कछू कह्यौ न परतु है ।
केसौदास बोले बिनु बोलनि के सुनें बिनु,
हिलनि मिलनि बिनु मोहि क्यों सरतु है ।
कौ लगि अलोनो रूप प्याय प्याय राखौं नैन,
नीर देखें मीन कैसे धीरज धरतु है ।
चित्रिनी बिचित्र चित्र नीकें ही चित्तैयै मन,
चित्र में चिताएँ चित्त चौगुनो जरतु है ।१।०।
शब्दार्थ—रूठिबे को = खीझने का । तूठिबे को = रीझने का । हिलनि =
निकट जाना । मिलनि=भेंटना, आलिंगन करना । मोहि = मुग्ध होकर ।
सरतु है = पूरा होता है । अलोनो रूप = सजीव लावण्य से रहित सौंदर्य
( चित्र में लिखा होने के कारण ) । नीके ही = सँभलकर । चिताएँ = सचेत
करने से, संतोष दिलाते रहने से; सुलगाने से ।
भावार्थ-(नायक की स्वगत उक्ति) उस (प्यारी) के खीझने-रीझने,कोमल
मुसकान के साथ देखने का रहस्य कुछ कहा नहीं जा सकता । बिना उससे
१०—कह्यौ-कहि । मोहि-मोह । देखें-बिना । चित्र०-किन नीकेई ।
में चिताएं-चित्तए तें, चिताए में ।

चतुर्थ प्रभाव १०३
बोले तथा बिना उसकी बोली सुने एवम् बिना उससे हिले मिले केवल मुग्ध
होकर रह जाने से ही तो काम चल नहीं सकता। अपने नेत्रों को कब तक
अलोना रूप (चित्र के दर्शन से) पिला पिलाकर शांत रक्खूँ। (केवल चित्र
में उसकी छाया देख लेने से नेत्रों की तृप्ति नहीं होती)। क्या जल (पानिप,
शोभा) देख लेने पर मछली (आँख) धैर्य धारण कर सकती है? (चित्र
देखने पर उसको प्रत्यक्ष देखने की उत्कट इच्छा होना नेत्रों के लिए स्वाभा-
विक है)। ऐ मन, उस चित्रिणी का विचित्र चित्र सँभलकर देख, चित्र देख
देखकर संतोष करते रहने से तो चित्त चौगुना जलता है (अभिलाष उत्कट
होता जाता है)।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१३१) अंतरिच्छ-गच्छनीनि यच्छनि सुलच्छनीनि,
अच्छी अच्छी अच्छनीनि छबि छमनीय है।
किंनरी नरी सुनारि पन्नगी नगी कुमारि,
आसुरी सुरीनिहूँ निहारि नमनीय है।
भोगिन की भामिनी कि देह धरे दामिनी कि,
काम ही की कामिनी कि ऐसी कमनीय है।
चित्रहू में चित्तहि चुरावति है केसौदास,
राम की सी रमनी रमा सी रमनीय है।११।
शब्दार्थ- अंतरिच्छ-गच्छनी = आकाशचारिणी। यच्छनी = यक्षिणी ।
सुलच्छनी = शुभलक्षणसंयुक्ता । अच्छनीनि = नेत्रोंवाली । छमनीय है =
क्षमा करने योग्य है, क्षमा करने की योग्यता रखती है। किंनरी = किंनरों
की स्त्रियां । नरी = मानवी । सुनारि = सुंदर स्त्रियाँ । पन्नगी = नागकुमारी ।
नगी = पर्वतकन्याएँ । निहारि = देखकर, देखने पर । भोगिन की भामिनी =
पातालवासियों की स्त्री । कि = अथवा । नमनीय = नमस्कार 'करने योग्य ।
देह धरे = मूर्तिमती । दामिनी = बिजली । काम कामिनी = कामदेव की स्त्री
रति । कमनीय = सुंदर । राम कैसी रमनी = सीता सी । रमा = लक्ष्मी ।
रमनीय = मन को लुभानेवाली ।
भावार्थ- (नायक-वचन सखी प्रति ) आकाशचारिणी, सुलक्षणा
यक्षिणी सुनयनाओं की शोभा को भी यह क्षमा करनेवाली है (इसकी शोभा
ऐसी है कि वे ईर्ष्या करती हैं और यह उन्हें अपने सौंदर्याधिक्य के कारण
क्षमा कर देती है-अर्थात् इसकी शोभा उनसे बहुत बढ़ी चढ़ी है) किंनरियां,
सुंदर मानवी स्त्रियाँ, नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ, असुरपत्नियां और सुरपत्नियां
११-कि-धौ। काम०-कामनीयौ कहा। चुरावति०-चुराए लेति कोऊ यह ।

१०४ रसिकप्रिया
इसकी शोभा देखकर प्रणाम करतीं हैं। पातालवासियों की स्त्रियाँ अथवा
मूर्तिमती विद्युत् अथवा कामदेव की ही कामिनी रति भी क्या ऐसी सुंदर है ?
( नहीं)। यह चित्ररूप में ही चित्त चुराए ले रही है। यह तो रामपत्नी
सीता और लक्ष्मी सी सुंदर है।
अलंकार-प्रतीप और उपमा ( चतुर्थ चरण में )।
अथ स्वप्नदर्शन-लक्षण--( दोहा )
(१३२) केसव दरसन स्वप्न को, सदा दुरयोई होय ।
कबहू प्रगट न जानियै, यह जानै सब कोय ।१२।
शब्दार्थ-दुरघोई= छिपा हुआ अर्थात् केवल प्रच्छन्न ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- ( सवैया )
(१३३)आतुर ह्वै उठि दौरी अली, जन आतुर ज्यौं गहिये सु गही त्यौं ।
हो मेरी रानी कहा भयो तो कहुँ बूझति केसव बूझियै री ज्यौं ।
डीठि लगी, किधौं प्रेत लग्यो कि लग्यो उर प्रीतम जाहि डरो यौं ।
आनन सीकर सी कहियै धक सोवत तें अकुलाइ उठी क्यों ।१३।
शब्दार्थ-बूझत = पूछते हैं। डीठि = नजर । सीकर = पसीने की बूंदें ।
धक = एकाएक ।
भावार्थ - ( अंतरंग-सखी-वचन नायिका प्रति ) हे सखी. उतावलों की
तरह तू उठकर दौड़ी है और जैसे उतावला जन किसी को पकड़ता है उस
प्रकार तूने मुझे पकड़ रखा है। ऐ मेरी रानी, तुमको क्या हो गया है ? मैं
तुझसे वैसे ही पूछ रही हूँ जैसे (इस अवसर पर) पूछा जाता है। तुझे नजर
लग गई है या भूत-प्रेत लग गया है या प्रियतम ने हृदय से लगाया जिससे
तू इस प्रकार डर गई है। तेरे मुख पर पसीने की बूंदें छाई हैं, तू सी सी कर
रही है। एकाएक सोते से व्याकुल होकर आखिर क्यों उठ पड़ी ?
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- (कवित्त)
(१३४) नख-पद-पदवी को पावै पढु द्रौपदी न,
एको बिसौ उरबसी उर में न आनिबी ।
लोम सी पुलोमजा न तिल सी तिलोत्तमा न,
मैलहू समान मन मेनका न मानिबी ।
जानियै न कौन जाति अब ही जगाएँ जाति,
जीवन तौ जानिहौं जौ ताहि पहिचानिबी ।
१२-जानियै-देखियै । जानै-जानत । १३-ह्वै-ज्यों। जन-जनि ।
हो-है । बूझति बूझत । बूझिये ०-बूझि रही ह्यौँ ।

चतुर्थ प्रभाव १०५
बातक सी बानी माँह, भाव सी भवानी माँह,
केसौदास रति में रतीक ज्योति जानिबी ।१४।
शब्दार्थ—पदवी = उच्चता । एकौ बिसौ = थोडा भी । उरवसी = स्वर्ग
की एक अप्सरा । उर में न आनिबी = उसके उर की बराबरी के ध्यान में
नहीं चढ़ती । पुलोमजा = इंद्राणी । तिलोत्तमा = एक अप्सरा । जानू......
पहिचानिबी = यदि उसे पहचान लूँगा तो अपने जीवन को बचा समझूँगा
(तभी जान में जान आएगी । बातक = बात ही बात । भाव = भावना,कल्पना।
भावार्थ—( नायक उक्ति सखी से ) नख और पद की उच्चता का पद
द्रौपदी नहीं प्राप्त कर सकती, उर की समता के लिए उर्वशी मन में नहीं
लाई जा सकती । उसके रोएँ की समता पुलोमजा ( इंद्राणी ) से नहीं हो
सकती, उसके तिल की समता में तिलोत्तमा कुछ नहीं है । उसके मैल के
• समान भी मेनका अप्सरा नहीं मानी जा सकती । न जाने वह किस जाति की
( सुर नर आदि में से ) है । अभी वह मुझे सोते से जगाकर चली जा रही
है । अगर उसे पहचान सका ( वह मिल गई ) तभी मैं अपने प्राणों को बचा
समझूँगा । यही नहीं फिर तो मैं यही समझूँगा कि सरस्वती में छटा की
बात ही बात है, पार्वती में शोभा की कल्पना ही कल्पना है और रति में भी
रत्ती भर ही ज्योति है ।
अलंकार—प्रतीप ।
सूचना—( १ ) यहाँ केवल वर्णमैत्री के लिए उर्वशी, तिलोत्तमा आदि
उपमानों का नाम लिया गया है, किसी विशेष प्रसिद्धि के कारण नहीं ।
( २ ) इसके बाद मुद्रित प्रतियों में निम्नलिखित दो दोहे भी
मिलते हैं जो 'केसवदास' के नहीं माने गए हैं—
भूल होइ जिहि बात की, बिन देखत ही पीव ।
सखी सुनावै गुन सवन, अंग अंग सब जीव ।१।
सील रूप गुन समुझि कै, सखी सुनावै आन ।
केसव ताको कहत हैं, दर्सन स्रवन बखानि ।२।
श्रीराधािकाजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा—( सवैया )
(१३५) सौंहैं दिवाइ दिवाइ सखी इक बारक काननि आनि बसाए ।
जानै को केसव कानन तें कित ह्वै कब नैननि माँझ सिधाए ।
लाज के साज धरेई रहे सब नैननि लै मनहीं सों मिलाए ।
कैसी करौं अब क्यों निकसैं री हरैंई हरैं हिय में हरि आए ।१५।
१४—द्रोपदी-पद्मिनी । जीवन०-जान जानिहौं जौ जाहि केहूँ । बातक
सी-बात कैसी । भाव सी--भाव सो । १५--कब--हरि । सब--तब ।

१०६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - सौहैं दिवाय० = शपथें दिला दिलाकर । इक बारक = सिर्फ
एक बार । काननि ० = कानों में ला बसाया । नैननि = नेत्रों ने । हरैं हरैँ =
धीरे धीरे ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(११६) कौ लौं पीहौ कानरस, रूप की बुझैहै प्यास,
केसौदास कैसैं न नयन भरि पीजिये ।
बीर की सौं मेरी बीर बारी है जु वारौं आनि,
नेक ,किन हसहि बलाय तेरी लीजिये ।
बरसक माँहि यह बैस अलबेली बीतैं,
दैहौ सुख सखिन क्यों अबहीं न दीजिये ।
एरी लड़बावरी अहीरी ऐसी बूझै तोहि,
नाह सों सनेह कीजै नाह सों न कीजिये ।१६।
शब्दार्थ- कौ लौं = कब तक । रस = आनंद; पानी । बीर = सखी ।
बीर = संबोधन । बारी = बालिका, छोटी । वारी आनि = आकर निछावर
होती हूँ । नेक = जरा । लड़बावरी = प्रेम में पागल, अनाड़ी । बूझै = समझ
में आता है, मन में बात उठती है । नाह = नाथ, पति । नाह = नहीं ।
भावार्थ-(बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू कब तक कान से रस
(प्रियगुणश्रवण) का पान करती रहेगी, क्या इसी से रूपदर्शन की प्यास बुझ
जाएगी ? यदि नेत्र भर पिया न गया तो पीने ही से क्या ? तेरी शपथ मेरी
प्यारी, क्या तू छोटी है (जो इस तरह की बातें कह रही है ) ? मैं आकर
तुझ पर निछावर हो रही हूँ, जरा हँस तो दे मैं तेरी बला लेती हूँ। हाँ तो
कर दे । कोई वर्ष भर में यह अवस्था निकल जायगी तब सखियों को क्या
सुख दे सकेगी ? इसलिए ऐ अलबेली, अभी यह सुख क्यों नहीं देती ? (प्रिय
से मिल, जिससे सखियों को पुरस्कार आदि की प्राप्ति हो ) हे प्रेमपगली
अहीरी, तेरे बारे में यह बात ( शिक्षा ) मन में आती है कि तू प्रिय से प्रेम
कर, 'नहीं' से प्रेम मत कर ।
अलंकार - विरोधाभास ( अंत में ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(१३७) लंघतु है लोक, लोकलीक न उल्लंघी जात,
सबही तूँ समझावै तोहि समझावै को ।
१६- कैंसैं-कैसो । न नयन-जो न नैन, नयननि । पीजिये-पीजई,
लीनजई आदि । है-हौ । वारौं-वारी । किन हसहि-हँसि कहिहौ, हँसि हाँ
करि । माँहि-मांझ । बूझै-बूझौं ।