सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

चतुर्थ प्रभाव १०१
सूचना--मुद्रित प्रति में यह दोहा भी है--
प्रकट काम को कल्पतरु, कहि न सकति मति मूढ़ ।
चित्रहु में हरि-मित्र की, अति अद्भुत गति गूढ़ ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा-( सवैया )
(१२८) लोचन ऐंचि लिये इत कों मन की गति जद्यपि नेहनही है ।
आनन आइ गए श्रम-सीकर रोम उठे तन कंप लही है ।
तासों कहा कहियै कहि केसव लाज-समुद्र में बूड़ि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यौं सकुची जनु बाँह गही है । ८।
शब्दार्थ--नही=नधी, जुड़ी, युक्त । श्रम-सीकर = पसीने की बूंदें ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति सखी से ) यद्यपि नायिका ने चित्र पर से
अपनी दृष्टि इधर की ओर खींच ली है तथापि मन की गति अब भी स्नेहयुक्त
है। क्योंकि उसके मुख पर पसीने की बूँदें आ गई हैं। रोएँ खड़े हो गए हैं
और शरीर ने कंप ग्रहण कर लिया है। उससे कहा भी जाय तो क्या कहा
जाय जो स्वयम् लज्जा के समुद्र में डूब रहा हो। चित्र में भी अपने प्रिय
श्रीकृष्ण को देखकर वह इस प्रकार सकुच गई है मानो उन्होंने प्रत्यक्ष ही
उसकी बाँह पकड़ ली हो ।
अलंकार-द्वितीय विभावना ।
सूचना- इसके बाद यह सवैया भी मुद्रित प्रति में है, जिसे सरदार ने
केशव का नहीं माना है-
तैं जनु मोहन कों चितयो कछु ऐसें कही जनु मोसों कही है ।
लाज तजै नहिं खेलत ही मन की गति गूढ़ कहाँ लौं लही है ।
केसव चित्रित मंदिर आजु दिखावत ही मति रीझि रही है ।
चित्रहु में हरि-मित्रहि देखत यों सकुची जनु बाँह गही है ।
(१२६) श्रीराधिकाजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( कवित्त )
केसौदास नेहदसा दीपक सजोय कैसे,
ज्योति ही के ध्यान तम-तेजहि नसायहूँ ।
आँखिन सों बाँधे अन्न काहू की बुझानी भूख,
पानी की कहानी रानी प्यास क्यों बुझायहै ।
ए री मेरी इंदुमुखी इंदीवर-नंनी लखें,
इंदिरा के मंदिर में संपति सिधायहै।
ऐसे दिन ऐसं ही गंवावति गँवारि कहा,
चित्र देखें मित्र के मिले को सुख पायहै । ६।
८-गति-मति । तन-उर, श्रति, उठि। कंप०-कंप गही, कंपत ही । ६-
संजोय-संजोग । तम-तप । अन्न-अन्य । बुझानी-न भागी । रानी०-प्यास कंसे
के । इंदीवर०--इंदीबरनैन । में--क्यों । सिधायहे--समाइ है । देखें--बिना ।