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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 286 में से

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पृष्ठ 101

१०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—नेहु = तेल; प्रेम । दसा = अवस्था; बत्ती । सँजोय =
जला, बाल । ज्योति ही के = प्रकाश के ही । तम-तेज = अंधकार का
आधिक्य; मन का मालिन्य । अन्न = अन्न, भोजन । आँखिन० = सिर्फ अन्न
ही आँख से देखते रहने से । इंदुमुखी = चंद्रमुखी । इंदीवर० = कमल के से
नेत्रवाली । इंदिरा = लक्ष्मी । गँवारि = मूर्ख, पगली ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका से) तू स्नेह-दशा (प्रेम की अवस्था;
तेल और बत्ती ) से दीपक जला (प्रियतम से मिल) केवल ज्योति ( प्रिय के
शरीर की कांति ) का ध्यान करने से तम का तेज ( अंधकार की प्रचंडता,
उदासी की अधिकता ) कैसे नष्ट कर सकेगी । क्या आँखों में अन्न बाँध लेने
से ( आँखों से अन्न देखते रहने से) किसी की भूख मिटी है ( या तेरी ही भूख
मिट जायगी ) । सिर्फ पानी की कथा कहने से, मेरी रानी, प्यास कैसे
बुझेगी ? ऐ मेरी चंद्रमुखी कमलनयनी सखी क्या लक्ष्मी का चित्र ही लिख
देने से घर में संपत्ति भर जाएगी ? इन दिनों को (जब कि प्रियतम से मिलने
के अनेक अवसर प्राप्त हो सकते हैं) ऐ पगली इस प्रकार ( केवल चित्र देखने
में) तू बिताए दे रही है । क्या प्रिय का चित्र देखने से ही तुझे प्रिय से मिलने
का सुख प्राप्त हो जाएगा ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न चित्रदर्शन, यथा -- ( कवित्त )
(१३०) रूठिबे को तूठिबे को मृदु मुसक्याय कै,
बिलोकिबो को भेद कछू कह्यौ न परतु है ।
केसौदास बोले बिनु बोलनि के सुनें बिनु,
हिलनि मिलनि बिनु मोहि क्यों सरतु है ।
कौ लगि अलोनो रूप प्याय प्याय राखौं नैन,
नीर देखें मीन कैसे धीरज धरतु है ।
चित्रिनी बिचित्र चित्र नीकें ही चित्तैयै मन,
चित्र में चिताएँ चित्त चौगुनो जरतु है ।१।०।
शब्दार्थ—रूठिबे को = खीझने का । तूठिबे को = रीझने का । हिलनि =
निकट जाना । मिलनि=भेंटना, आलिंगन करना । मोहि = मुग्ध होकर ।
सरतु है = पूरा होता है । अलोनो रूप = सजीव लावण्य से रहित सौंदर्य
( चित्र में लिखा होने के कारण ) । नीके ही = सँभलकर । चिताएँ = सचेत
करने से, संतोष दिलाते रहने से; सुलगाने से ।
भावार्थ-(नायक की स्वगत उक्ति) उस (प्यारी) के खीझने-रीझने,कोमल
मुसकान के साथ देखने का रहस्य कुछ कहा नहीं जा सकता । बिना उससे
१०—कह्यौ-कहि । मोहि-मोह । देखें-बिना । चित्र०-किन नीकेई ।
में चिताएं-चित्तए तें, चिताए में ।