रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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इसकी शोभा देखकर प्रणाम करतीं हैं। पातालवासियों की स्त्रियाँ अथवा
मूर्तिमती विद्युत् अथवा कामदेव की ही कामिनी रति भी क्या ऐसी सुंदर है ?
( नहीं)। यह चित्ररूप में ही चित्त चुराए ले रही है। यह तो रामपत्नी
सीता और लक्ष्मी सी सुंदर है।
अलंकार-प्रतीप और उपमा ( चतुर्थ चरण में )।
अथ स्वप्नदर्शन-लक्षण--( दोहा )
(१३२) केसव दरसन स्वप्न को, सदा दुरयोई होय ।
कबहू प्रगट न जानियै, यह जानै सब कोय ।१२।
शब्दार्थ-दुरघोई= छिपा हुआ अर्थात् केवल प्रच्छन्न ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- ( सवैया )
(१३३)आतुर ह्वै उठि दौरी अली, जन आतुर ज्यौं गहिये सु गही त्यौं ।
हो मेरी रानी कहा भयो तो कहुँ बूझति केसव बूझियै री ज्यौं ।
डीठि लगी, किधौं प्रेत लग्यो कि लग्यो उर प्रीतम जाहि डरो यौं ।
आनन सीकर सी कहियै धक सोवत तें अकुलाइ उठी क्यों ।१३।
शब्दार्थ-बूझत = पूछते हैं। डीठि = नजर । सीकर = पसीने की बूंदें ।
धक = एकाएक ।
भावार्थ - ( अंतरंग-सखी-वचन नायिका प्रति ) हे सखी. उतावलों की
तरह तू उठकर दौड़ी है और जैसे उतावला जन किसी को पकड़ता है उस
प्रकार तूने मुझे पकड़ रखा है। ऐ मेरी रानी, तुमको क्या हो गया है ? मैं
तुझसे वैसे ही पूछ रही हूँ जैसे (इस अवसर पर) पूछा जाता है। तुझे नजर
लग गई है या भूत-प्रेत लग गया है या प्रियतम ने हृदय से लगाया जिससे
तू इस प्रकार डर गई है। तेरे मुख पर पसीने की बूंदें छाई हैं, तू सी सी कर
रही है। एकाएक सोते से व्याकुल होकर आखिर क्यों उठ पड़ी ?
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न स्वप्नदर्शन, यथा- (कवित्त)
(१३४) नख-पद-पदवी को पावै पढु द्रौपदी न,
एको बिसौ उरबसी उर में न आनिबी ।
लोम सी पुलोमजा न तिल सी तिलोत्तमा न,
मैलहू समान मन मेनका न मानिबी ।
जानियै न कौन जाति अब ही जगाएँ जाति,
जीवन तौ जानिहौं जौ ताहि पहिचानिबी ।
१२-जानियै-देखियै । जानै-जानत । १३-ह्वै-ज्यों। जन-जनि ।
हो-है । बूझति बूझत । बूझिये ०-बूझि रही ह्यौँ ।