सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 286 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

१०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—गुन लाल = लाल डोरा । सारस = कमल । दुरे = छिपे हुए ।
दरसी = दिखाई पड़ी । परसी = स्पर्श की । पैनी=तीखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, उस ( नायिका ) ने
अपने मस्तक पर की उन लटों को लाल डोरे से गुहा जिनमें मोतियों की
सुखदायिनी लड़ियाँ लिपटी हुई थीं। (गुहने के बाद ) वह कमलनैत्रवाली
हाथ में दर्पण लेकर उसे (उसकी शोभा को ) आलस्यपूर्वक (देर लगाकर)
देखने लगी। (उसकी इस क्रिया को) श्रीकृष्ण छिपे हुए देख रहे थे ।
वह उस समय उन्हें ऐसी दिखाई पड़ी और उनकी मति को ऐसी अत्यंत
तीखी (उत्कृष्ट, अनोखी ) उपमा ने स्पर्श किया, मानो सूर्य-मंडल (लाल
मणि के दर्पण ) में चंद्रमंडल ( मुख ) हो और त्रिवेणी धँसी हो (जा
पहुँची हो) (केशकलाप श्यामवर्ण होने से यमुना, लाल डोरे सरस्वती और
मोती उज्ज्वल वर्ण होने से गंगा की शोभा दे रहे थे ) ।
अलंकार—उक्तविषया वस्तूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश साक्षात् दर्शन, यथा—( सवैया )
(१२७) इक तौ उर और उरोज अनूपम तैसे मनोहर हार महा री ।
सखि चित्त चलै तरुनीनिहूँ को तरुनैन की केसव बात कहा री ।
हितु सों हित की कहि आवति है पर कौ लगि होउँ री कौतुकहारी
अब अंचल दै नँदलाल बिलोकत री दधि नोखी बिलोवनहारी।७।
शब्दार्थ—चित्त चलै तरुनीनिहूँ को = स्त्रियों का भी मन आकृष्ट हो
जाता है । तरुनैन की = तरुण युवकों ( पुरुषों) की । हितु = मित्र, संगिनी ।
अंचल दै = अंचल से ढक । नोखी = अनोखी, विचित्र । बिलोवनहारी =
मथनेवाली ।
भावार्थ---( सखी की उक्ति नायिका से ) एक तो तेरे उर (वक्षःस्थल)
और स्तन यों ही अनुपम हैं और इतने पर ( इन उरोजों पर ) हार भी तद-
नुरूप अत्यंत मनोहर पड़े हुए हैं । तेरी यह शोभा देखकर युवती स्त्रियों का
मन भी चलायमान हो जाता है ( तेरी शोभा पर आकृष्ट हो जाता है ),
फिर तरुण पुरुषों की तो बात ही क्या ! अपनी संगिनी से भलाई की बात
कहनी ही पड़ती है । (आखिर ) मैं कब तक तमाशबीन ( तेरा यह तमाशा
देखनेवाली ) बनी रहूँ ? अब तो ( इन स्तनों को ) अंचल से ढक, नंदलाल
( श्रीकृष्ण खड़े खड़े ) उसकी छटा देख रहे हैं (और तू दही मथने का बहाना
करके उन्हें देखने का मौका दे रही है) तू तो अनोखी दही मथनेवाली निकलो!
अलंकार--काव्यार्थापत्ति और अनुगुण ।
७—उर-तरु । आवति०-है बनि आवति, है परि आवति, ही परि
आवति । होउं०-होहुँ रो, होंव री ।