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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 286 में से

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पृष्ठ 105

१०६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - सौहैं दिवाय० = शपथें दिला दिलाकर । इक बारक = सिर्फ
एक बार । काननि ० = कानों में ला बसाया । नैननि = नेत्रों ने । हरैं हरैँ =
धीरे धीरे ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(११६) कौ लौं पीहौ कानरस, रूप की बुझैहै प्यास,
केसौदास कैसैं न नयन भरि पीजिये ।
बीर की सौं मेरी बीर बारी है जु वारौं आनि,
नेक ,किन हसहि बलाय तेरी लीजिये ।
बरसक माँहि यह बैस अलबेली बीतैं,
दैहौ सुख सखिन क्यों अबहीं न दीजिये ।
एरी लड़बावरी अहीरी ऐसी बूझै तोहि,
नाह सों सनेह कीजै नाह सों न कीजिये ।१६।
शब्दार्थ- कौ लौं = कब तक । रस = आनंद; पानी । बीर = सखी ।
बीर = संबोधन । बारी = बालिका, छोटी । वारी आनि = आकर निछावर
होती हूँ । नेक = जरा । लड़बावरी = प्रेम में पागल, अनाड़ी । बूझै = समझ
में आता है, मन में बात उठती है । नाह = नाथ, पति । नाह = नहीं ।
भावार्थ-(बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से) तू कब तक कान से रस
(प्रियगुणश्रवण) का पान करती रहेगी, क्या इसी से रूपदर्शन की प्यास बुझ
जाएगी ? यदि नेत्र भर पिया न गया तो पीने ही से क्या ? तेरी शपथ मेरी
प्यारी, क्या तू छोटी है (जो इस तरह की बातें कह रही है ) ? मैं आकर
तुझ पर निछावर हो रही हूँ, जरा हँस तो दे मैं तेरी बला लेती हूँ। हाँ तो
कर दे । कोई वर्ष भर में यह अवस्था निकल जायगी तब सखियों को क्या
सुख दे सकेगी ? इसलिए ऐ अलबेली, अभी यह सुख क्यों नहीं देती ? (प्रिय
से मिल, जिससे सखियों को पुरस्कार आदि की प्राप्ति हो ) हे प्रेमपगली
अहीरी, तेरे बारे में यह बात ( शिक्षा ) मन में आती है कि तू प्रिय से प्रेम
कर, 'नहीं' से प्रेम मत कर ।
अलंकार - विरोधाभास ( अंत में ) ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न श्रवणदर्शन, यथा- (कबित्त )
(१३७) लंघतु है लोक, लोकलीक न उल्लंघी जात,
सबही तूँ समझावै तोहि समझावै को ।
१६- कैंसैं-कैसो । न नयन-जो न नैन, नयननि । पीजिये-पीजई,
लीनजई आदि । है-हौ । वारौं-वारी । किन हसहि-हँसि कहिहौ, हँसि हाँ
करि । माँहि-मांझ । बूझै-बूझौं ।