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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

युद्धकांड ३४६
वीर-रसावेश से अभिभूत था, बड़े साहस के साथ कपियों का संहार कर रहा था और
अत्यधिक रक्त में भीगा हुआ ऐसा दीख रहा था, मानो रौद्र रस ही मूर्त्त होकर राक्षस के
रूप में आ गया हो ।
तब सूर्यकुलोत्तम-राम भूपाल ने अत्यंत क्रोध से अपने धनुष की प्रत्यंचा का ऐसा
टंकार किया, मानो कह रहे हों कि नारी के कारण उद्भूत अपना सारा क्रोध इस नारी*
(प्रत्यंचा) के द्वारा प्रदर्शित करूँगा और दहाड़ते हुए आनेवाले इस राक्षस की क्रोधाग्नि
को मैं अपनी शर-वृष्टि से बुझा दूँगा । धनुष की ध्वनि सुनकर दिग्गज ऐसे चिंघाड़ने लगे,
मानो कह रहे हों कि गज-गामिनी ( सीता ) अब अपने स्वाभाविक निवास को प्राप्त
होगी । (उस ध्वनि से) लंका इस प्रकार गूंज उठी, मानो कह रही हो कि श्रीराम का क्रोध
अब लंकेश्वर को भस्म कर देगा । उस ध्वनि से समस्त जग बहरे-से हो गये ।
उस ध्वनि को सुनकर कुंभकर्ण रोष से भरकर, बड़े गर्व से अकड़ते हुए राम के
समक्ष आया । तब सूर्यवंशी राम ने बड़े दर्प के साथ उससे कहा--'हे

": 'स' has a distinct shape. The third letter is definitely 'म' with 'े'! "मे"!
And the first letter has two legs: 'ग' + 'ु'! So "गुझमे"!!
Wait, the typesetter was incredibly sloppy! Let's check:
"कही" instead of "कहीं"
"देवताओ" instead of "देवताओं"
"गुझमे" instead of "मुझसे"
"सहस्रो" instead of "सहस्रों"
"बाणो" instead of "बाणों"
"बडे" instead of "बड़े"
"बढा" instead of "बढ़ा"
"उसाटकर" instead of "उखाड़कर" / "उठाकर"
"देवना" instead of "देवता"
"ऐने" instead of "ऐसे"
"कन्ने" instead of "करने"
"ज्वालाओ" instead of "ज्वालाओं"
"दिशाओ" instead of "दिशाओं"
"काल-चक्रो" instead of "काल-चक्रों"

Wait, should I transcribe the TYPOS literally or CORRECT them?
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In standard OCR benchmarks (like Google, Tesseract, ICDAR, etc.):
Ground truth is

आगमन के समान, कालकूट विष ही बाण के रूप में आने के समान, दुर्वार गति के साथ
अत्यन्त वेग से आया और उस राक्षस के नीलाद्रि-सम दीखनेवाले सिर को काट दिया ।
वह सिर तुरन्त नीचे नही गिरा, किन्तु वह लका में बहुत ही ऊँची अट्टालिकाओ तथा सीधो
से टकराकर उन्हें चूर-चूर करके अत्यधिक ध्वनि करते हुए आगे निकल गया और समुद्र
के विविध प्राणि-समूह को कुचलते हुए समुद्र में गिरकर डूब गया । उम राक्षस का अर्द्ध-
शरीर पृथ्वी पर दस करोड वानरो को कुचलते हुए तथा दूसरा अर्द्ध-शरीर समुद्र के जल-
चर समूह को चूर-चूर करते हुए गिर पड़ा । उसके गिरने से जो ध्वनि हुई, उससे सभी
समुद्र आलोड़ित हो उठे, पृथ्वी काँप उठी, दिशाएँ विदीर्ण हुईं और लकाधीश का हृदय
विदीर्ण हो गया । लका में कोलाहल होने लगा, सभी जग हर्षित हुए और वानर-वीर
आनन्द-सागर में डूब गये । तब देवताओ ने रविकुलाधिप रघुरामचन्द्र की विविध रीतियो से
स्तुति की । रामचन्द्र भी कुंभकर्ण की मृत्यु पर मदहास करते हुए मन-ही-मन हर्षित होने लगे
कि यह राक्षस देवताओ तथा दिक्पालो के लिए भी दुर्जय था, अब सभी लोको के
लिए कभी किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा । राहु के प्रभाव से मुक्त होकर प्रभा से
विलसित होनेवाले सूर्यबिंब की भाँति रामचन्द्र विजयलक्ष्मी वो प्राप्त करके भासमान
होने लगे ।
इसके पश्चात् राक्षस मन-ही-मन इस पराजय के कारण परितप्त होते हुए, कांति-
हीन मुखो से शीघ्र रावण के समक्ष गये और निवेदन किया--'हे देव, देवताओ का शत्रु,
आपके भाई ने समस्त वानर-समूह को भयभीत करके भगा दिया और आकाश से पृथ्वी
तक व्याप्त होकर कपि-समूह-रूपी समुद्र को इस प्रकार मथ डाला, जैसे मदराचल ने क्षीर
सागर का मथन किया था। फिर, उन्होने दुर्वार विक्रम से सारे रण-क्षेत्र में युद्ध करते हुए,
इन्द्रादि देवताओ में ईर्ष्या उत्पन्न की और निदान श्रीराम की विपुल-बाणाग्नि में दग्ध
हो गये ।' जब राक्षसो ने इस प्रकार रण-क्षेत्र में वुंभकर्ण की मृत्यु का समाचार रावण को
सुनाया, तब वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर इस प्रकार गिर पडा, मानो उसका पतन निश्चित
ही है । अतिकाय अत्यन्त शोकाकुल हुआ, देवान्तक धैर्य तजकर शोक करने लगा । त्रिशिर
दिङ्मूढ की भाँति पृथ्वी पर लोट गया । नरांतक काठ के पुतले के समान स्तभित रह गया ।
महोदर तथा महापार्श्व आदि राक्षस-वीर शोक-विह्वल हो भूमि पर गिर गये ।
८१. कुंभकर्ण की मृत्यु पर रावण का शोक
रावण शीघ्र ही सचेत होकर बार-बार अपने भाई का नान लेकर यो प्रलाप करने
लगा--'हे वीर, अब में राघव-वैर-रूपी समुद्र को किम नौका से पार करूँगा ? मुझे
विश्वास था कि तुम राम-लक्ष्मण का रण में संहार करोगे । ऐसे समय में तुम स्वयं राघव
के प्रचण्ड शर-वह्नि की ज्वाला में भस्म हो गये । हे निद्रालु वीर, तुम सतत निद्रा-निरत
रहनेवाले हो, आज तुम दीर्घ निद्रा (मृत्यु) से क्यो अनुरक्त हुए ? अविरत अशनि-पात
से भी नष्ट नही होनेवाला तुम्हारा शरीर आज एक साधारण मानव के प्रहार से नष्ट
हुआ । तुम तो अपनी अनुपम शक्ति के कारण अंतक (यम) के लिए अंतक सिद्ध हुए थे।
ऐसे तुम्हारे लिए आज युद्ध-क्षेत्र में राघव अंतक कैसे सिद्ध हुआ ? अद्रि, विद्रावण आदि

३५२ रंगनाथ रामायण
देवता इस भय से पीड़ित होकर सोते तक नहीं थे कि तुम नींद से जगकर रौद्र रूप
धारण करके क्रूरता के साथ उनका सर्वनाश कर दोगे। तुम युद्ध में गिर गये, अब, भला, देवता
मेरी परवाह क्यों करने लगे ? सारे वंश की रक्षा करने के उद्देश्य से भाई विभीषण ने,
हठ करके बार-बार मुझे हित-वचन कहे, किन्तु मैंने उसकी बातें नहीं सुनीं और पद-
प्रहार करके उसे नगर से निर्वासित कर दिया। क्या, वह पाप मुझे यों ही छोड़ देगा ?
तुम तथा अन्य बुद्धिमान् लोगों ने सतत जो नीतिपूर्ण वचन कहे, उन्हें मैंने नहीं माना,
और तुम्हें खो बैठा । अब जिस विजय की मैंने आशा की थी, वह मुझे क्यों मिलेगी ?
युद्ध-क्षेत्र में तुम मेरे दाहिने कंधे की तरह रहे, किन्तु आज युद्ध में तुम अपने महान् बाहु-
बल को खोकर नष्ट हो गये । अब मेरा सहारा कौन होगा ?'
इस प्रकार, रावण बार-बार कुंभकर्ण का स्मरण करते हुए दीर्घ निश्वास छोड़ते
हुए, परिताप-रूपी वडवानल, उमड़कर टपकनेवाली लार-रूपी फेन, अजस्र अश्रु-रूपी बाढ़,
अनंत दुःख-रूपी तरंगें, रुदन-रूपी घोष, भय-रूपी मचलने से युक्त शोक-समुद्र में डूबकर
व्याकुल पड़ा रहा । तब रावण को देखकर त्रिशिर उसे धैर्य देते हुए बोला--'हे देव, आप
साधारण लोगों की भाँति अपना धैर्य खोकर ऐसे क्यों शोक करते हैं ? ब्रह्मा से प्राप्त वर की
महान् शक्ति रखते हुए, सतत मंत्र-पूत अस्त्र तथा वज्र-कवच से संपन्न होते हुए, श्रेष्ठतम
गतिशील उज्ज्वल रथ के रहते हुए, आप क्यों ऐसे शोक करते हैं ? मेरी ओर देखिए।
हे अमरों के शत्रु, कौन है जो आपका सामना कर सके ? आप शीघ्र चलकर अपने
अनुपम पराक्रम से राघव का संहार कीजिए। अब शोक तजिए । मैं अभी जाता हूँ और
घोर युद्ध-क्षेत्र में अपने अनुपम पराक्रम एवं प्रताप से वानरों को ऐसे काट डालता हूँ, जैसे
गरुड़ साँपों को काट डालता है। जैसे इन्द्र ने वृत्रासुर का संहार किया था, और जैसे
शिव ने अंधकासुर का नाश किया था, वैसे ही मैं भी युद्ध में राम का संहार करूंगा । मुझे
आज्ञा दीजिए, मैं अभी जाता हूँ।'
तब अतिकाय ने रावण को देखकर कहा--'हे दानवेन्द्र, आप इतना शोक क्यों
करते हैं ? मैं दैत्य-सेना के साथ जाऊँगा, मुझे आज्ञा दीजिए । जिस प्रकार दावानल
काननों को जलाता है, वैसे ही, मैं अपने असह्य बाणों का प्रहार करके कपियों के साथ,
राम-लक्ष्मण का वध करूंगा।' तब नरांतक तथा महाबली देवांतक दोनों ने मिलकर कहा-
'हम इसी क्षण जाकर राम-लक्ष्मण तथा वानरों का वध करते हैं।' इनकी बातें सुनकर
दैत्याधीश ने शोक छोड़ दिया और अपने पुत्रों के साथ मोदमग्न हो रहने लगा, जैसे
देवताओं के साथ इन्द्र रहता है ।
इसके पश्चात् रावण ने बड़े हर्ष से अपने चारों पुत्रों को आदेश दिया--'राम-
लक्ष्मण को तथा वानर-सेना को अपने भयंकर अस्त्रों की सहायता से मारकर आओ ।'
फिर, उसने अपने भाई महोदर तथा महापार्श्व को भी युद्ध करने के लिए भेजा ।
८२. अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसों की युद्ध-यात्रा
वे छहों राक्षस ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले गर्जन करते हुए, इस प्रकार युद्ध
के लिए निकल पड़े, मानो (काम-क्रोध आदि) अरि-षड्वर्ग यह सोचकर राम से भिड़ने के लिए

युद्धकांड ३५३
आगे-आगे जा रहा हो कि हमारे कारण ही यह मनुजाशन (रावण) सीता के
निमित्त श्रीराम का सामना कर रहा है । अस्ताद्रि पर आरूढ सूर्य की भांति महोदर शरत्-
काल के मेघ की समता करनेवाले तथा ऐरावत के अश से युक्त सुदर्शन नामक हाथी पर
बैठकर निकला । निशित आयुधो से प्रकाशित होनेवाला शीघ्रगामी रथ, जिसमे बलिष्ठ तथा
चचल अश्व जुते हुए थे और जो सूर्य के समान भासमान था, उस पर, इन्द्रचाप के समान
दीखनेवाले धनुष धारण किये हुए, नील मेघ के समान त्रिशिर निकला । तब धनुर्वेद का
पडित अतिकाय, अत्यत तेजस्वी शर, चाप, खड्ग तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त तथा
सूर्य-सम प्रकाश से भासमान, स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर रवाना हुआ । विविध आभूषणो
से युक्त हो कनक पर्वत के समान दीप्त होते हुए नरातक, देवताओ के अश्व का स्मरण
दिलानेवाले विविध आभूषणो से अलकृत श्रेष्ठ अश्व पर आरूढ हो, प्रविमल तेज से
विलसित हो, बलिष्ठ बाहुओ में शक्ति धारण किये हुए, शक्तिपाणि (कुमार) की भाँति
निकल पड़ा । दीप्त गदा धारण करके देवांतक, विष्णु के समान सुशोभित होते हुए रवाना
हुआ । महापार्श्व विशाल गदा लिये हुए गुह्यकेश्वर (कुबेर) के समान निकला। कालचक्रो
के वेग से असख्य रथ भी साथ निकल पडे । पर्वतो की भाँति दीखनेवाले करोडो श्रेष्ठ
मदमत्त हाथी अपने उद्धड दण्डो से (सूँडो से) सुशोभित होते हुए झुण्डो में चलने लगे ।
अपनी हिनहिनाहट की गभीर ध्वनि को चारो ओर प्रतिध्वनित करते हुए अश्व चलने लगे ।
यम-किकरो के सदृश दीखनेवाले पदचर-सैनिक भयकर गति से चलने लगे ।
ऐसी अनुपम चतुरगिणी सेना के मध्य भाग में प्रलय-काल के सूर्यो की भाँति, प्रकाश-
मान होनेवाले छहो दैत्य-वीर, दीखने लगे । उनके श्वेत छत्र शरत्काल के मेघ की भाँति
शोभायमान होने लगे । हम अवश्य विजय प्राप्त करेंगे या युद्ध में प्राण-त्याग करेंगे, किन्तु
रण का उत्साह नही छोड़ेंगे, वे ऐसी विविध प्रतिज्ञाएँ करत हुए, एक दूसरे को पुकारते
हुए युद्ध के लिए रवाना हुए । उनके विचित्र सिंहनाद, रथ-घोष, अश्वो की हिनहिनाहट,
गजो की चिंघाड, सैनिको के अत्यत भयकर पदाघात, अनुपम ध्वजाओ का किकिनी-रव,
पटह, भेरी तथा शखो की भयावह ध्वनि तथा निसान-तुरहियो का घोर नाद आदि से समस्त
दिशाएँ गूँजने लगी; आकाश हिल उठा, नक्षत्र गिरने लगे, वासुकि ने करवट ली, मेरु-
पर्वत आमूल हिल गया, पृथ्वी कपित हुई और दुर्बह भार से दिग्गज विचलित हुए ।
इस प्रकार, जब राक्षस-सेना दुर्ग से बाहर निकली, तब वानर-वीर, भूमि तथा
आकाश को चीरनेवाली भयकर ध्वनियाँ तथा भयकर हुकार करते हुए बड़े उत्साह से
पर्वतो तथा वृक्षो को राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । दैत्यो ने वानरो पर अविरत गति से
शर-वृष्टि आरभ कर दी। वानरो द्वारा असुरो पर आक्रमण करने के पहले ही असुर वानरो
पर आक्रमण कर देते और उनका सर्वनाश करने लगते । वे एक दूसरे से जूझने, एक दूसरे
को गिराते, और असुरो के हाथो के शस्त्र छीनकर उन्हें तोड डालते । तब क्रूर राक्षस
क्षुब्ध होकर वानरो के हाथो के पर्वतो तथा वृक्षो को तोड डालते । राक्षस कपियो के पैर
पकडकर उन्हें भयकर गति से नीचे पटक देते, तो वानर तुरन्त उनके पैर पकडकर
उन्हें पृथ्वी पर गिरा देते । इस प्रकार, घोर युद्ध करते हुए वानरो तथा राक्षसो के
४५

३५४ रंगनाथ रामायण

अग जर्जर हो गये और वे रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिरकर मूच्छित हो गये ।
फिर, वानर शीघ्र ही सचेत होकर एक राक्षस को उठाकर दूसरे राक्षस पर प्रहार करके
गिराने लगे । इसी प्रकार, वे एक हाथी से दूसरे हाथी को, एक घोड़े से दूसरे घोड़े को,
एक रथ से दूसरे रथ को, फिर रथ से हाथी को, हाथी से घोड़े को, और घोड़े से राक्षस-
सैनिक को, मार-मारकर गिराने लगे । इस प्रकार, जब वानर सिंहनाद करते हुए अपनी
अनुपम शक्ति का प्रदर्शन करके भयकर गति से असुरो का सहार करने लगे, तब राक्षस-वीर
भी क्रोधोन्मत्त होकर वानरो पर टूट पड़े । उन्होंने वानरो पर वाण चलाये, उन्हें चक्रो से
मारा, गदाओ का प्रहार किया, खड्गो से काटा, बर्छियो को मास में तथा शूलो को
पसलियो में चुभोया और विविध रीतियो से उनको पीड़ित किया । फिर भी, वानरो ने धैर्य
नही छोड़ा । वे और भी क्रुद्ध होकर वडी भयकर गति से पर्वत-शृगो तथा तरु-काडो से
राक्षसो पर प्रहार करने लगे । कितने ही राक्षस आहत हो गिरने लगे, कुछ भागने लगे,
कुछ वही लुढकने लगे, कुछ रक्त उगलने लगे, कुछ भूमि पर लोटने लगे, सिर कट जाने
से कुछ के धड़-मात्र भूलने लगे और कुछ भरकर अपने शत्रुओं को भूलने लगे । कही

होनेवाली बात जान ली हो । जो कोई कपि उसका नाश करने के निमित्त किसी पर्वत
को उखाडने की चेष्टा करता, उसके पूर्व ही वह अत्यधिक क्रोध से उसका नाश कर देता था ।
जो कोई कपि उसका वध करने के लिए कोई वृक्ष उखाडने का प्रयत्न करता, उसके
पहले ही वह उसका वध कर देता । इतना ही नही, वह अपने अश्वो को वानरो के समूह
पर चलाकर कितने ही वानरो को कुचल दिया, जिससे उनकी आँतें, और मांस निकल पडे ।
वह उन्हें एक दूसरे से ऐसा टकरा देता था कि उनका वक्ष फट जाता और हड्डियाँ चूर-
चूर हो जाती । इस प्रकार, उसने भयकर क्रोध से प्रलय-कालानल की भाँति सारे युद्ध-क्षेत्र
में व्याप्त होकर वानर-सेना-रूपी वन को कई वार नष्ट कर दिया । वानर उसके शौर्य
तथा उसकी शक्ति का सामना नही कर सकने के कारण चकित तथा व्याकुल-से हो रहे ।
सभी देवता विचलित हुए । अत्यधिक त्रस्त वानर-सेना को क्लेश पहुँचानेवाले नरातक
को देखकर कपिराज का पुत्र अगद क्रोध में आकर वानर-सेना से यो बाहर निकल पडा,
जैसे बादलो के समूह को चीरकर सूर्य बाहर निकलता है ।

८३. अंगद तथा नरांतक का द्वंद्व-युद्ध

उसने नरातक को देखकर कहा—'हे नरातक, इतनी क्रूरता के साथ तुम इन वानरो
का सहार क्यो कर रहे हो ? ऐसा करने से क्या तुम शूर बन जाओगे ? यदि सचमुच
तुम शूर हो, तो मेरे साथ युद्ध करो।' तब नरातक ने हँसकर कहा—'हे वनचर, मेरे
सामने तुम्हारी हस्ती ही क्या है ? मैने सभी दिक्पालो का दर्प-दलन किया है । समस्त
देवताओ को पीडित किया है । मेरे जैसे पराक्रमी का सामना, क्या, तुम कर सकोगे ?
मैं तुम्हारी दोनो जांघो को चीरकर फेंक दूँगा । तुम अभी नादान दुधमुँहे बच्चे हो,
किन्तु प्रतापी योद्धाओ के साथ युद्ध करना चाहते हो । अभी तुम मेरी शक्ति देख लोगे ।'
तब अगद ने हँसकर कहा—'हे राक्षस, दशकंठ का दर्प चूर करने के पश्चात् खर के पुत्र
का सहार करके जब में जाने लगा, तब क्या, तुमने मुझे नही देखा था ?'
इतना कहते ही ब्रह राक्षस काल-सर्प की भाँति फुफकारते हुए अगद के निकट आ
पहुँचा और अत्यधिक स्फुलिंगो को विकीर्ण करनेवाली अपनी शक्ति से अगद पर प्रहार
किया । गरुड के मुँह का स्पर्श होते ही गिरनेवाले काले नाग की भाँति वह शक्ति अगद
के वज्र-सम वक्ष का स्पर्श करते ही खड-खड हो गई । अपने वज्रायुध से पर्वतराज को
दबानेवाले इन्द्र की भाँति वालि-पुत्र ने अपनी हथेली से उसके घोड़े पर ऐसा दुर्भर प्रहार
किया कि उसका मस्तक फूट गया और वह अश्व मुँह खोले, जीभ बाहर किये, पृथ्वी पर
गिर पड़ा और छटपटाकर मर गया । अश्व के गिरते ही नरातक क्रोधानल से आँखें लाल
किये हुए अपनी मुष्टि से अगद के सिर पर प्रहार किया और उसे मूर्च्छित कर दिया,
किन्तु अगद शीघ्र ही सचेत हो गया और चिल्लाया कि रे नरातक, तुम्हारा ऐसा साहस ?
फिर, उसने वज्र-सम अपनी मुष्टि से श्रेष्ठ पर्वत के समान दीखनेवाले उसके वक्ष पर प्रहार
किया । चोट लगते ही वह रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पडा और उसका कपाल
फूटकर चूर-चूर हो गया । इस प्रकार, नरातक ने उस घोर रण-क्षेत्र में गिरकर अपने
प्राण छोड़ दिये । आकाश से देवता और पृथ्वी पर कपि हर्ष की ध्वनि करने लगे ।

३५६ रंगनाथ रामायण
८४. देवांतक तथा त्रिशिर का अंगद पर आक्रमण करना
दानवेश्वर के पुत्र की यह दशा देखकर महोदर ने अपने भयंकर गज को आगे
बढ़ाया । देवांतक ने भी अपने अनुज की मृत्यु पर दुःखी तथा वालि-पुत्र के साहस पर क्रुद्ध
होकर अपना परिघ घुमाते हुए अंगद पर आक्रमण किया । रवि-मंडल-सदृश दीप्त होने-
वाले रथ को उद्धत गति से चलाते हुए, पृथ्वी को कँपाते हुए, त्रिशिर अग्नि के समान
भासमान होते हुए बड़े क्रोध के साथ अंगद से भिड़ गया । तब अंगद ने, शाखाओं से युक्त
एक विशाल वृक्ष को उखाड़कर उसे देवांतक पर फेंका, तो त्रिशिर ने उसे बीच में ही
काट डाला । तब, अंगद आकाश की ओर उछलकर क्रोध से पर्वतों तथा वृक्षों को उन पर
गिराने लगा, किन्तु देवांतक तथा त्रिशिर उन्हें ताबड़-तोड़ काटते गये । दोनों ने उस पर
एक साथ असंख्य तोमर चलाये । इससे संतुष्ट न होकर देवांतक ने भयंकर गर्जन करते
हुए अंगद पर बड़े वेग से अपना परिघ चलाया । त्रिशिर ने सिंह-गर्जन करते हुए शर-
वृष्टि की । महोदर ने अपने मत्त गज को उत्तेजित करके आगे बढ़ाया और तोमर चलाया।
इस प्रकार, जब तीनों एक साथ अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगे, तब अंगद अपना
शरीर झुकाकर वज्र के समान महोदर के हाथी से ऐसे टकराया कि वह हाथी चिंघाड़ते हुए
पर्वत-शृंग की भाँति नीचे गिर गया । उसकी आँखें बाहर निकल आईं और वह वहीं ढेर
हो गया । उसका कुंभ-स्थल फूट गया और उससे अनुपम मोती ऐसे बिखर गये, मानो
विजय-लक्ष्मी ने राघवेश्वर को प्राप्त करने की अभिलाषा से अपना अलंकरण करने के
लिए अपनी मंजूषा खोल दी हो । उसके पश्चात् वालि-पुत्र ने उसी हाथी का दाँत उखाड़-
कर उससे देवांतक पर प्रहार किया । उस प्रहार से, वह राक्षस, प्रबल वायु से झूलने-
वाले घने साल-वृक्ष की भाँति कंपित हो उठा और रक्त उगलने लगा । फिर भी, उसने
बड़े साहस के साथ अपना सारा बल एकत्र करके अंगद के पर्वतसानु-सदृश वक्ष स्थल पर
अपने परिघ से प्रहार किया । प्रहार से अंगद भी पृथ्वी की ओर झुक गया, किन्तु उसने
अपनी सारी शक्ति संचित करके अत्यधिक क्रोध से देवांतक पर आक्रमण किया । तब
त्रिशिर ने तीन प्रचण्ड शर उस वालि-पुत्र के ललाट पर छोड़े ।
८५. हनुमान् आदि वीरों के द्वारा त्रिशिर आदि राक्षसों का वध
इसी समय नील तथा हनुमान् अंगद की सहायता के लिए आ पहुँचे । नील ने
एक विशाल पर्वत को उठाकर दहाड़ते हुए त्रिशिर पर फेंका । तब, त्रिशिर ने वज्र-सम
एक बाण का संधान करके उससे उस पर्वत को काट दिया । पवन-पुत्र ने देवांतक को
बड़े साहस के साथ एक विशाल परिघ को घुमाते हुए, प्रचंड विक्रम प्रदर्शित करते हुए
सामने आते देखकर अपनी मुष्टि से उस पर प्रहार किया । इस प्रहार से उसके दाँत टूट गये,
पुतलियाँ घूम गईं, और वह मुँह खोले पृथ्वी पर लुढ़क गया । देवांतक का यह
पतन देखकर स्वर्ग-लोक के देवता हर्ष-ध्वनि करने लगे ।
इस पर क्रुद्ध होकर त्रिशिर ने अशनि-वेग से एक तीव्र बाण नील पर चलाया ।
उसी समय महोदर भी एक हाथी पर आरूढ़ हो गर्जन करते हुए आ पहुँचा और उस पर
ऐसी शर-वर्षा कर दी, जैसे घनघोर मेघ कुल-पर्वत पर वर्षा करता है। उनके अस्त्र-समूह

स अत्यन्त पीडित होकर नील मूर्च्छित हो गया, किन्तु शीघ्र ही सँभलकर आकाश की ओर
उछला और तरु-सहित एक विशाल पर्वत को उठाकर उसे महोदर पर दे मारा। उस पर्वत के
प्रहार से महोदर का सिर फूट गया और वह अपने अस्त्रो के साथ नष्ट हो गया। महोदर
को पृथ्वी पर गिरते देखकर त्रिशिर ने प्रचण्ड पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, साहस खोये
बिना पवन-पुत्र पर असंख्य बाणो की वर्षा की। तब हनुमान् ने शीघ्र ही एक पर्वत-शृंग
को उखाडकर उसे उस त्रिशिर पर फेंका। किन्तु त्रिशिर ने उसे बीच में ही ऐसे चूर-चूर
कर दिया कि देवता भी देखकर चकित-से रह गये। तब हनुमान् सहज ही उसके रथ पर
कूद गया और उसके अश्वो को ऐसा चीर डाला, जैसे सिंह क्रुद्ध होकर हाथियो को चीर
डालता है। तब, क्रोधोन्मत्त हो त्रिशिर ने उस पर शक्ति का प्रयोग किया। प्रचण्ड ज्वालाओ
से युक्त हो उस शक्ति को आते देखकर हनुमान् ने उसे पकडकर तोड डाला। शक्ति को
तोडने के हनुमान् के बाहु-बल का विचार करके त्रिशिर ने एक पैनी धारवाले खड्ग को
लेकर बडे वेग से हनुमान् पर आक्रमण करके उस खड्ग से हनुमान् के वक्ष पर प्रहार
किया। तुरत हनुमान् ने अपनी हथेली से उस राक्षस के वक्ष पर आघात किया। तब, वह
राक्षस अपने खड्ग को छोडकर पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पडा। तब, नीचे गिरे हुए
खड्ग को हाथ में उठाकर अनिल-कुमार ने पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए सिंहनाद किया।
किंतु इतने में त्रिशिर सँभल गया और अपनी मुष्टि से हनुमान् के वक्ष पर प्रहार किया।
तब हनुमान् की कनपटियाँ क्रोध से फूल उठी। उसने बडे दर्प के साथ खड्ग को चमकाते
हुए उस राक्षस के तीनो सिर ऐसे काट डाले, जैसे सुरेन्द्र ने विश्वरूप के सिर काट डाले थे,
अथवा हनुमान् ने त्रिशिर के कर्म-बधनो को ही काट डाला हो। तब पृथ्वी, आकाश,
तथा दिशाओ को कँपाते हुए त्रिशिर पृथ्वी पर गिर पडा।
उसके गिरते ही महापार्श्व अत्यधिक क्रोध से तेवर बदलते हुए, दिग्गज के समान
भयकर, कनक-चक्र एव मणि-प्रभा से विलसित, यम के भीषण दड के सदृश दीप्त अरुण-
पुष्प एव अरुण-चदन से अलकृत हो उदय-सूर्य की भाँति उज्ज्वल गदा-दड को धारण किये हुए
बडी शीघ्र गति से हनुमान् पर आक्रमण करने चला। इतने में ऋषभ ने एक विशाल
पर्वत को उठाकर उस राक्षस पर फेंका। किन्तु, उस राक्षस ने अपनी गदा से उस पर्वत
को चूर-चूर कर दिया। फिर, उसने बडे दर्प से युक्त हो तेजी से अपनी गदा को घुमाकर
ऋषभ के वक्ष पर प्रहार किया। गदा के प्रहार के कारण ऋषभ तुरत मूर्च्छित हो गया,
किन्तु वह शीघ्र ही सँभल गया और अपनी मुष्टि से महापार्श्व के वक्ष पर भीषण प्रहार किया।
चोट लगते ही वह राक्षस अपना गदा-दड छोडकर, शक्तिहीन हो पृथ्वी पर गिरने लगा।
तुरत ऋषभ ने उस गदा-दण्ड को लेकर भयकर गर्जन करते हुए उससे उस राक्षस
पर प्रहार किया। वज्र के गिरने से जैसे गिरि-शृग गिर जाता है, वैसे ही उस राक्षस
का सिर चूर-चूर हो गया और वह भयकर ध्वनि के साथ पृथ्वी पर गिर पडा। पवन
से डरनेवाले पीले पत्तो की भाँति दैत्य-सैनिक चक्कर काटते हुए तितर-बितर हो गये।
८६. अतिकाय का युद्ध
इस प्रकार, उन सब राक्षसो को गिरे हुए देखकर अतिकाय ने ऐसा गर्जन किया,

३५८ रंगनाथ रामायण
मानो वह सभी लोकों को निगलनेवाला हो । फिर, उसने सहस्र सूर्यों की भाँति उज्ज्वल
एक विशाल रथ पर आरूढ होकर सिंहनाद करते हुए, अपने प्रताप की डींग हाँकते हुए,
धनुष का टंकार करते हुए, भीषण गति से कपि-सेना पर आक्रमण किया, जैसे प्रलय-काल
की अग्नि घोर वन पर आक्रमण करती है । उस निशाचर का रूप देखकर सभी वानर
भयभीत हो गये कि कुंभकर्ण ही फिर रौद्र रूप धरकर आ गया है । उसे देखते ही
कुछ वानर मूच्छित हो गये, तो कुछ आड में छिपकर देखने लगे। कुछ वानर भयभीत हो
आर्तनाद करने लगे तो कुछ संभ्रमित हो गये और कुछ राम की दुहाई देने लगे । इस
प्रकार, भयभीत होकर भागनेवाले वानरो को देखकर श्रीराम कहने लगे—'भागो मत,
भागो मत ।' फिर, सभी में व्याप्त प्रलय-काल की घनघोर घटा की भाँति गर्जन करते
हुए अत्यधिक वेग से आनेवाले राक्षसराज के पुत्र के प्रताप, दर्प, एव गति को निकट
देखकर राम स्वयं आश्चर्यचकित होकर विभीषण से बोले—'हे विभीषण, अशनि-
पात के समान भयकर ध्वनि करनेवाले उस रथ पर आरूढ होकर इन्द्र-धनुष की
समता करनेवाला विपुल-प्रभा-समन्वित धनुष धारण किये हुए, परिघ, गदा, शूल, परशु,
भाला, तोमर, चक्र तथा दिव्य-शस्त्र-समूह से युक्त अद्वितीय राहु-चिह्नवाली ध्वजा
से विलसित, चार सारथियो, तथा एक सहस्र अश्वो से युक्त रथ पर त्रिनेत्र की मूर्ति के
समान अपनी प्रतापाग्नि को चारो दिशाओ में विकीर्ण करते हुए आनेवाला वह वीर कौन है ?'
तब विभीषण ने रामचंद्र से कहा—'हे देव, यह राक्षस, देवताओ के शत्रु (रावण)
का पुत्र है । यह रावण से भी अधिक रण-कुशल है । हे राजन्, यह चतुरंगिणी सेना के
साथ युद्ध करने में महानिपुण है और अद्वितीय वेद-शास्त्रादि विद्याओ में निष्णात है ।
यह अध्यात्म-तत्त्वज्ञ है । इस वीर की शक्ति के विश्वास पर लंका सतत निःशंक रहती है।
देवताओ से वैर ठानकर युद्ध में उनके हाथो नहीं मरने का वर इसने ब्रह्मा से प्राप्त
किया है । यह दिव्य आयुधो, दिव्य अस्त्रो तथा मंत्र-शक्ति से संपन्न है । इसने इन्द्र
आदि देवताओ को सौ बार परास्त किया है । इन्द्र का वज्रायुध, वरुण का पाश, और
यम का प्रचड दड तथा कुवेर की गदा सदा इसके बाण-समूह के अधीन होकर रहते हैं ।
रावण ने इसे धान्यमालिनी में अपने पुत्र के रूप में प्राप्त किया था। हे राजन्, सभी
वानरो को कुचल डालने के पहले ही आप अपने अनुपम पराक्रम से इसका वध कर दें,
तो अच्छा हो ।'
इतने में ही उस राक्षस को, धनुष के टकार से समस्त दिशाओ को प्रतिध्वनित
करते हुए निकट आते देखकर, खडनोदग्र, गवय, गोमुख, ज्योतिर्मुख, कुमुद, पवन-पुत्र, मैन्द,
नल, शरभ, नील, शतवली, गज आदि कपि-वीर वृक्षो तथा महान् पर्वतो को उठाये हुए
उसका सामना करने लगे । तब, उस राक्षस ने हँसते हुए कहा—'हे वानरो, तुममें रण-
विक्रम-कौशल एवं शक्ति नहीं है, अत तुम यहाँ से हट जाओ । तुम मुझे उस शूर को
दिखाओ, जिसने अपने बाण के अग्रभाग से समुद्र को सोख लिया था और तीनो लोको
की प्रशंसा प्राप्त की थी । मैं अपना अनुपम अस्त्र उसके सिवाय और किसी पर नहीं
चलाऊँगा । त्रिभुवनविजयी, अनुपम शूर तथा अलघु बलवान्, कुंभकर्ण का सिर काट डालनेवाला

वह कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर मै अपना अतुल शक्ति-
सम्पन्न अस्त्र नही चलाऊँगा । देव, दानव, यक्ष तथा अन्य देवताओ से भी अधिक शक्तिशालि
रावण को युद्ध में जीतने का सकल्प करके, इस प्रकार लका में आनेवाला वीर
कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर में अपने अतुलित
अस्त्र नही चलाऊँगा ।'
इस प्रकार गर्वोक्तियो को कहनेवाले उस दानवेश्वर के पुत्र पर कपि-वीर क्रोध
से वृक्षो तथा पर्वतो की अविरल वर्षा करने लगे । तब अतिकाय ने अविरल बाण-वर्षा से
उन सब को बीच में ही काट डाला । उसके पश्चात् तीन गुरुतर अस्त्रो से कुमुद को,
पाँच भयंकर शरो से द्विविद को, सात अद्वितीय बाणो से मैन्द को, नौ शरो से गभ को,
आठ घोर बाणो से गज को, चार तीव्र बाणो से गवाक्ष को, आठ बाणो से गवय को,
दस बाणो से ज्योतिर्मुख को, पन्द्रह बाणो से शतवली को और पच्चीस बाणो से नील को,
पृथ्वी पर गिराकर मूच्छित कर दिया । सभी देवता आकाश से चकित होकर यह दृश्य
देखने लगे । तब प्रचड क्रोध से अतिकाय ने सभी वानरो को ऐसे भगाया, जैसे मृगराज
मृगो को भगाता है । वह मन-ही-मन सोचने लगा कि विरोधी होते हुए भी यदि में
परमेश्वर राम की भक्ति करूँ, तो मै अवश्य मुक्ति प्राप्त करूँगा । यो सोचकर वह राम
की ओर बढने लगा । जो वानर उसका मार्ग नही रोकता, वह उस पर हाथ नही उठाता।
इस प्रकार, वह आगे बढते हुए राम के निकट पहुँचा और उस निगमवेद्य राम से
हँसते हुए बोला—'हे राम, तुम इस रणभूमि में अपनी शूरता मुझे दिखाओ । तुम अनन्त हो ।
कोई भी यह नही जानता कि तुम्हारी शक्ति कितनी है । मेरे पिता के कारण
तुमने मनुष्य का जन्म लिया है । उन्ही के कारण तुम पृथ्वी के राजा हुए हो । मेरा सामना
करने के लिए, अमरेन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओ के समूह से तुम कोई नही हो । अपना
अत कर डालने के लिए जो कोई शूर मुझसे भिडे, उससे मै लडूंगा ही । मै तुम्हारा
पराक्रम भली भाँति जानता हूँ । तुम्हें मान-अपमान का विचार ही नही है । तुम कदाचित्
मुझे नही जानते । भला गुणहीनो में सत्त्वगुण कहाँ रहेगा ? तुम किस जाति के हो,
मै कैसे कहूँ ? क्या, तुम राजकुल के आचारो का पालन करनेवाले हो ? पुण्यात्मा तपस्वियो
के मानस-काननो में भले ही तुम निवास करो । मेरे साथ लडने की क्षमता तुम नही
रखते । वेदाद्रि-गुफाओ में तुम जाकर वास करो, युद्ध के लिए तुम मेरे जोड के नही हो।
सनक आदि मुनि तथा योगियो के मानस-रूपी समुद्रो में भले ही तुम निवास करो, मेरे
साथ युद्ध करने योग्य नही हो । गेरुए रग के वस्त्र धारण करके, पाप-रहित तथा ससार
के दुखो से मुक्त, कद-मूल-फल जैसे नीरस आहार करते हुए, विविध आचार-निष्ठाओ के
कारण क्लान्त, घोर काननो में विचरण करनेवालो के साथ तुम जाकर रहो । तुममें
रण-कौशल नही है । तुम्हारी शक्ति की कल्पना मैने कर ली है । इस ससार में तुम
अकेले थे, ऐसे तुम्हें यह कपि-सेना मिल गई है । आश्रयहीन होकर घूमनेवाले तुम्हें
अब सूर्य-पुत्र एक मात्र आधार मिल गया है । हाय, कहीं भी, किसी का जो गुरु नही
बना, ऐसा विश्वामित्र तुम्हारा गुरु हुआ । तुम्हारा अपना कोई देश नही था, इसलिए

३६० रंगनाथ रामायण
अकलंक अयोध्या तुम्हें प्राप्त हुई। इनके गर्व में मत इठलाओ। तुम भले ही, मत्स्य का
रूप धरकर सभी समुद्रों में प्रवेश करो, कूर्म का रूप धारण कर पर्वत के नीचे चले जाओ,
पर मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं। अवश्य मैं तुम्हें ढूंढ लाऊँगा। तुम अपना वेश विकृत करके
भले ही कहीं भी छिप जाओ, मैं तुम्हें अवश्य पकड़ लाऊँगा, तुम्हें भूलूँगा नहीं। वामन
का रूप धरकर, याचक-वृत्ति अपनाये हुए भले ही तुम कहीं चले जाओ; मैं तुम्हें ढूँढ़कर
पकड़ लाऊँगा; तुम्हारा विचार नहीं भुलाऊँगा। भूसुर का वेश धरकर, परशु को लिये हुए
राजाओं के संहारक तुम भले ही बन जाओ, मैं अवश्य तुम्हारा अन्वेषण करके तुम्हें पकड़
लूँगा। मेरा बाण अत्यंत भीषण है। वह कोई वट-पत्र नहीं कि तुम्हें वहन किये हुए
अद्वितीय रण-समुद्र में तैरता रहे। अत्यधिक शक्ति के मद से झूमनेवाले मेरे सामने
युद्ध-क्षेत्र में ठहरना तुम्हारे लिए असंभव है।"
८७. लक्ष्मण तथा अतिकाय का द्वन्द्व-युद्ध
इस प्रकार, प्रलाप करनेवाले अतिकाय का दर्प देखकर लक्ष्मण हँसते हुए बोले—
'हे राक्षस, मेरे रहते, राघव के साथ युद्ध करने का प्रयत्न क्यों करते हो? सँभलकर
मेरी ओर बढ़ो; मैं तुम्हें अपने बाणों से टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।' ऐसा कहकर वे अपने
धनुष के टंकार से दानवों के चित्त कंपित करते हुए उस राक्षस पर टूट पड़े। लक्ष्मण
के साहस को देख वह आश्चर्यचकित हुआ और एक क्रूर अस्त्र का संधान करके, दहाड़ते
हुए कहने लगा—'ठहरो, लक्ष्मण, ठहर जाओ। तुम अभी बालक हो; मेरे साथ मत
भिड़ो। मैं यम से भी अधिक क्रूर हूँ। मेरे तीव्र बाणों को सहने की क्षमता या तो इस
वसुंधरा में हैं, या हिमाचल में हैं, या रावण के उठाये कैलास पर्वत में हैं, या देवताओं
के निवासभूत पर्वत में हैं, या अवकरिपु शिवजी के धनुष को भंग करने के गर्व से फूलने-
वाले तुम्हारे भाई राघव में है। उसके अलावा दूसरे किसी में मेरे साथ युद्ध करने की
शक्ति नहीं है? मेरे समक्ष खड़े रहना, क्या तुम्हारे लिए संभव है? हे सौमित्र, यह श्रेष्ठ
बाण अभी तुम्हें लगकर तुम्हारा रक्तपान कर लेगा।'
ऐसे दुरहंकार से भरे वचन सुनकर लक्ष्मण ने कहा—'हे राक्षस, इस प्रकार व्यर्थ
गर्जन क्यों करते हो? युद्ध में तुम अपनी शक्ति दिखाओ। मेरे समक्ष व्यर्थ प्रलाप क्यों करते हो?
हे निशाचर, तुम भी बड़े वीर की भाँति, अपना औद्धत्य तजे बिना, शस्त्र-समूह से
सज्जित हो, तथा रथ पर आरूढ़ हो, मेरे समक्ष खड़े हो, यही एक महान् आश्चर्य है।'
यह सुनकर उस राक्षस ने बड़े क्रोध से अपने हाथ का बाण लक्ष्मण पर चलाकर गर्जन
किया। तब, लक्ष्मण ने उस बाण को अर्द्धचन्द्र बाण से काट डाला। फिर, उन्होंने
एक तेज बाण अपने धनुष पर चढ़ाकर उसे उस राक्षस के ललाट को लक्ष्य करके चलाया,
मानो यह संकेत कर रहे हों कि ब्रह्मा का लेख भी अब मिटनेवाला है। तब, उस शर
के प्रहार से अतिकाय ऐसे हिल उठा, जैसे रुद्र के प्रहार से बाणासुर का प्रासाद कंपित
हो गया था। 'मेरे साथ यह युद्ध करने का साहस रखता है'—यह विचार आते ही अति-
काय ने सिंहनाद किया और अपना रथ लक्ष्मण के निकट चलाकर, शीघ्र ही रामानुज पर
एक ऐसा पैना शर चलाया, मानो उसी से उनका संहार कर डालने का संकल्प कर लिया हो।

उत्तरकाण्ड एवं रंगनाथ रामायण महात्म्य उपसंहार

उसके तुरंत बाद ही उसने तीन ऐसे शक्ति-सम्पन्न बाण चलाय, मानो कह रहा हो
कि भले ही त्रिनेत्र शिव भी रक्षा करें, तो भी तुम्हारा सुख छीन लूँगा । फिर, तुरत उसने
पाँच बाण चलाये, मानो कह रहा हो कि तुम्हारे पंच प्राण अवश्य खींच लूँगा । उसके
पश्चात् उसने अपने बाहु-बल के गर्व से फलते हुए वड वेग स सात वाण चलाय, मानो
कह रहा हो कि भले ही तुम सप्त समुद्रो में प्रवेश करके उन्हें पार कर जाओ, मै तुम्हें
अवश्य ही मार डालूँगा । किन्तु, लक्ष्मण ने शीघ्र ही उन सभी वाणो को खड-खंड करके
सिंह-गर्जन किया । उसके पश्चात् उन्होने आग्नेय अस्त्र चलाया, तो अतिकाय ने सौरास्त्र
चलाया । दोनो शरो ने आपस में टकराकर युद्ध किया और दोनो चूर-चूर होकर नीचे
गिर गये। फिर, राक्षस ने ऐषिक बाण चलाया, तो लक्ष्मण काँप उठे। फिर, उन्होने ऐन्द्र
बाण से उसे काट डाला । यह देखकर दैत्य ने याम्यास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने वायव्यास्त्र
चलाकर उसे काट डाला । इतना ही नही, उन्होने कई और बाण भी उस राक्षस पर
चलाये, किन्तु वे सभी बाण अतिकाय का स्पर्श करते ही टूटकर पृथ्वी पर गिर गये ।
लक्ष्मण यह देखकर सोचने लगे कि क्या कारण है कि कोई भी शर इसके शरीर में गडना
नही ? उनका इस प्रकार व्याकुल होते समय अनिल ने आकर कहा—'यह अनुपम रहस्य
तुम्हें बताऊँगा । हे लक्ष्मण, इसने ब्रह्मा से वज्र-कवच प्राप्त किया है । अत, कोई भी
शर इसके शरीर में नही गडता । तुम इस पर ब्रह्मास्त्र चलाकर इसके टुकड़े-टुकड़े
कर डालो ।'
तब बडे हर्ष से लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र को मन्त्र-पूत करके धनुष पर चढाया और उसे
रावण के पुत्र पर चलाया । तुरत समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए, इन्द्र को भयभीत करते
तथा देवताओ को कँपाते हुए, दिशाओ को हिलाते हुए, समुद्रो को आलोड़ित करते हुए,
पर्वतो को झकझोरते हुए, सूर्य-चन्द्र को पथ-भ्रष्ट करते हुए, नक्षत्रो को गिराते हुए, वह
ब्रह्मास्त्र, रत्न-समूह की भाँति उज्ज्वल कांति से युक्त हो, प्रलय-काल की अग्नि के समान
सभी लोको में व्याप्त होकर जलते हुए, पवन के वेग से यम-डड के समान, अतिकाय की
ओर आने लगा । तब अतिकाय ने उस पर तीव्र शर चलाये, किन्तु उस ब्रह्मास्त्र को निष्फल
नही कर सका। फिर, राक्षस ने शक्ति चलाई, किन्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी उपेक्षा कर दी।
फिर, अतिकाय ने उस पर शूल चलाया, किन्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी अवहेलना कर दी।
उसके पश्चात् राक्षस ने गदा चलाई । उसे व्यर्थ होते देखकर, उसने खड्ग चलाया ।
किन्तु, उसकी भी परवाह किये बिना उसको अपनी ओर आते देखकर अतिकाय ने परशु
चलाया । किन्तु, परशु की भी उपेक्षा करके उसे आते देखकर राक्षस ने भाला चलाया ।
इस पर भी ब्रह्मास्त्र की गति नही रुकी, तो उसने अपनी कमर से वरछी निकालकर उससे
प्रहार किया ।
८८ अतिकाय का वध
उसपर भी ब्रह्मास्त्र अप्रतिहत गति से अतिकाय की ओर बढता रहा । तब अतिकाय न
उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया। पर, उस अस्त्र ने मुकुट तथा कुंडलो ने अलंकृत
उस राक्षस का सिर काट डाला । वज्र के आघात म रोहणाद्रि का शृंग जैमे गिर गया
४६

वैसे जब उसका सिर पृथ्वी पर गिरा, तब उसके सिर को देखकर हतशेष राक्षस भयभीत
होकर लका की ओर भागने लगे । सभी वानर लक्ष्मण की प्रशसा करने लगे । रामानुज ने
तब रामचन्द्र के चरणो में गिरकर प्रणाम किया, तो उन्होने बड़े आनंद से लक्ष्मण को हृदय
से लगा लिया और वानरो के साथ अत्यधिक हर्ष प्रकट किया ।
अतिकाय आदि छह वीरो की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण मूच्छित हो गया ।
फिर सचेत होकर अविरल अश्रु वहाते हुए वह अत्यधिक शोक से सतप्त होने लगा । इस
प्रकार दुख से पीडित होनेवाले पति की सेवा में पहुँचकर मय-पुत्री मदोदरी कहने लगी—
'हे असुरेन्द्र, सभी लोको में अद्वितीय शक्ति से सपन्न आपका ऐसा दुखी होना उचित
नही है । उस दिन वीर की तरह आप राम की देवी को क्यो ले आये ? उन्हें फिर
राम के पास पहुँचाना आप नही चाहते थे । अब उचित समय बीत गया । उस राम पर
आक्रमण करने के लिए गये हुए राक्षस-वीर फिर लौटकर आयेंगे, यह आगा आप छोड़
दीजिए । हे नाथ, युद्ध में आप अपनी शक्ति दिखाइए ।'
इन बातो पर रावण ने मन-ही-मन विचार किया । उसने अपनी स्त्री को अत पुर
में भेज दिया और दुःख की लबी साँस खींचकर अपने मत्रियो से कहा—'हाय, मेरे भाई
तथा मेरे प्रिय पुत्र इस प्रकार मारे गये ? अव क्या कहा जाय ? श्रेष्ठ योद्धाओ के लिए
भी अकाट्य नाग-पाशो को इन मानव-वीरो ने न जाने, माया से या शक्ति से, काट
दिया है । अब में विजय की आशा करूँ, तो भी वह मेरे लिए असभव है । उस राम को
युद्ध में जीतनेवाला अब ढूँढने पर भी मुझे नही मिलेगा । अवतक जो लका, बिना किसी
भय के शोभायमान थी, वह आज इन शक्तिशाली लोगो के कारण त्रस्त हो रही है । उस
राम के पराक्रम की सीमा ही नही है । इसलिए तुम लोग अव लका की रक्षा के लिए
आवश्यक सेना प्रतिदिन भेजते रहो ।' ऐसा आदेश देकर वह अत पुर में चला गया और
एकात में मन-ही-मन चिंता से पीड़ित रहने लगा ।
८९. इंद्रजीत का द्वितीय युद्ध
उस समय मेघनाद वहाँ पहुँचकर दशकंठ से कहने लगा—'हे दानवेन्द्र, मेरे रहते
हुए आपका इस प्रकार चिंतित होना उचित नही है । शक्ति से सपन्न मेरे वाणो का आघात
क्या ईश्वर भी सह सकता है ? लीजिए, मै अभी जाता हूँ । उस राम के भाई को अपने
उद्धत वाणो से अवश्य जर्जर करके उसे मार डालता हूँ और उस वानर-सेना को अपने
पराक्रम से पृथ्वी पर सुलाकर आता हूँ । हे देवताओ के शत्रु, मेरी प्रतिज्ञा सुन लीजिए ।
जैसे महाराज बलि की यज्ञ-भूमि में त्रिविक्रम के वढते हुए रूप को त्रस्त होकर इन्द्र,
विष्णु, यम, अग्नि, रुद्र, सूर्य, चन्द्र तथा साध्य देखते रहे, वैसे ही आज वे मेरे प्रताप को
देखते रह जायेंगे ।'
इतना कहने के पश्चात् वह राक्षस-राजकुमार वायुसम शीघ्रगामी रथ पर आरूढ़
हो युद्ध के लिए चल पड़ा । उसके चलते ही सव दिशाओ से एक साथ बड़े वेग से असख्य
रथ निकल पड़े । अनगिनत गज निकल पड़े, विपुल अश्व-सेना तथा पदाति-सेना निकल
पड़ी । उस चतुरंगिणी सेना पडरीको (श्वेत छत्रो) से प्रकाशित होनेवाले, पडरीक (वाघ)

की-सी आँखोवाले, पुडरीक (श्वेत कमल) की कातिसम शरीरवाले, पुडरीक के (आग्नेय
दिशा का दिग्गज) के औन्नत्य से विलसित होनेवाले, पुडरीक (बाघ} के समान भयकर
लगनेवाले और पुडरीक (बाघ) की शक्ति से सपन्न वीरो से पूर्ण थी । सिंहनादो, दहाडो,
हुकारो, गर्वोक्तियो, रथ की नेमियो तथा निसानो की भयकर ध्वनि चारो ओर व्याप्त
हो रही थी । धवल छत्र से युक्त वह राक्षस-कुमार सुधाकर से युक्त आकाश के समान
दीख रहा था । सुदर कामिनियाँ अपने कमल-नेत्रो की दीप्ति को चारो ओर विकीर्ण
करती हुई चामर डुला रही थी । ऐसी रण-सज्जा से युक्त हो, अपने आभूषणो की प्रभा
से दीप्त होते हुए, सहज वैभव से उज्ज्वल इद्रजीत रण-स्थल के मध्य आकर खडा हुआ ।
उसके पश्चात् उसने रक्त-वर्ण के वस्त्र, चदन तथा पुष्प-मालाएँ धारण करके अग्निदेव का
प्रतिष्ठापन किया, शर तथा तोमरो से उसकी परिधि बनाई और लोहे के स्रुक् तथा स्रुवा
एकत्र किये । फिर, राक्षसेश्वर के पुत्र ने अथर्ववेद के उच्चारण के साथ घी, खील तथा
ताल-समिधाओ का हवन किया । होम की समाप्ति के पहले, उसने कृष्ण-छाग (काला
वकरा) के रक्त की पूर्णाहुति दी । तब अग्निदेव ने स्वय प्रकट होकर हव्य ग्रहण किया ।
उनकी कृपा से मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र, रथ, धनुष तथा कवच प्राप्त किये ।
उसके पश्चात् वह राक्षस अपने सिंहनाद से दिशाओ को कँपाते हुए अपने रथ,
अश्व, केतु तथा सारथियो के साथ, सूर्य, चद्र तथा नक्षत्रो को अपदस्थ करते हुए शीघ्रगति
से आकाश-वीथी में जाकर छिप गया । फिर, अपनी सेना से अपने पराक्रम के अनुरूप वचन
कहने लगा--'तुम बिना विचलित हुए युद्ध करते जाओ । मै आकाश से घोर युद्ध करते
हुए राम और लक्ष्मण का शीघ्र ही सहार कर दूँगा ।'
इन उत्साहवर्द्धक वचनो को सुनकर दानव अत्यत हर्षित हुए और सेना के साथ
वानरो पर टूट पडे तथा विविध रीतियो से उनसे युद्ध करने लगे । उसी समय इद्रजीत
अपनी छाया तक प्रकट किये बिना आकाश से दिव्य बाण चलाने लगा । तब वानर उठकर
पर्वतो को उठा-उठाकर उस राक्षस की ओर फेंकने लगे । किन्तु इद्रजीत के शरो ने उन्हें
तोडकर उन वानरो की छाती को विदीर्ण कर उन्हें पृथ्वी पर गिरा दिया । इसके पश्चात्
उसने एक घोर अस्त्र चलाकर पाँच वानरो को तथा नौ अस्त्रो से सात वानरो को नीचे
गिरा दिया । तब क्रुद्ध होकर कपि-वीरो ने पर्वतो तथा वृक्षो को उठाकर उस इद्रजीत पर
फेंका । किन्तु, उसने वडी निपुणता से उन्हें अपने तीव्र बाणो से काटकर गधमादन पर
अठारह बाण चलाकर उसका मद चूर-चूर कर दिया । उसके पश्चात् उसने नौ बाणो से
नल के नाम-रूप मिटा दिये, सात बाणो से मैन्द को झुका दिया, पाँच बाणो से गज का
सहार किया, दस बाणो से जाबवान् का शरीर चीर डाला, सौ बाणो से हनुमान् को
अत्यधिक दुख पहुँचाया, तीन बाण गवाक्ष पर चलाये, तेरह बाणो से हरिरोम के प्राण हर
लिये, छह बाणो से रभ को गिरा दिया, दस बाणो से सूर्यप्रभ को परास्त किया, तेरह
बाणो से पनस के अगो को छेद डाला, आठ क्रूर बाणो से कुमुद को तथा पैतीस बाणो से
नील को छिन्न-भिन्न दिया । तत्पश्चात् बिना विश्राम लिये ही उसने कई बाणो से अगद को,
तीन पैने बाणो से सूर्य-नदन (सुग्रीव) को, पाँच बाणो से इन्द्रजाल को, दो शरो से गिरि-

'. I will write पीडित.
L17: क्यो करते है -> I will write क्यो करते है.
L17: मै -> I will write मै.
L18: दूँ ।' -> दूँ ।'
L26: असख्य -> असख्य
L29: मणियां-रूपी -> मणियां-रूपी
L31: आषाढ -> आषाढ
L32: राक्षसो -> राक्षसो
L35: इद्रजीत -> इद्रजीत
L36: लका -> लका
Wait, look at L35: इद्रजीत vs इन्द्रजीत (L8, L9, L11, L23). In L8, L9, L11, L23 it is clearly इन्द्रजीत with 'न्'. In L35, it is printed इद्रजीत!
Wait, look at L35: is there an anusvara or half-na?
No, it's इद्रजीत.
And L36: लका -> clearly no anusvara, लका.
Wait, what about शक्ति vs गक्ति?
Wait, look at L10 again:
Could it be that the

युद्धकांड ३६५
उसी समय सूर्यास्त हुआ, मानो राघव की दुर्दशा के कारण मन-ही-मन दुखी हो,
उन्हें उस दशा में देख नहीं सकने के कारण सूर्य ने आँखें वद कर ली हो । वानरो के
मुख-कमल मुरझा गये । अंधकार चारो ओर ऐसा व्याप्त हो गया, मानो बता रहा हो कि
वानरो के द्वारा लका का दहन होते समय, धुआँ इसी प्रकार व्याप्त होगा । वह ब्रह्मास्त्र
का सधान करने के लिए आवश्यक मत्र-पठन का उचित अवसर नहीं था, इसलिए विभीषण ने
पृथ्वी पर गिरे हुए सुग्रीव आदि योद्धाओ को देखकर कहा--'हे वानर-वीरो, रावण के
पुत्र ने ब्रह्मा के वर की शक्ति से अस्त्र चलाया था, और राघव ने ब्रह्मास्त्र की शक्ति
का आदर करने के विचार से उसे सह लिया है। इतना ही है और कुछ नही ।' ब्रह्मा के वर
से आरक्षित होने के कारण वायु-पुत्र, इन्द्रजीत के दिव्य-अस्त्रो के प्रहार से मरा नहीं था। इसलिए
उसने कहा--'अब हम देखें कि वाणो से आहत हो युद्ध-भूमि में गिरे हुए वीरो में से
कितने अभी जीवित हैं ।' यो कहकर वे दोनो जलती हुई मशालें लेकर उस अधकार में
युद्ध-भूमि में घूमने लगे । तब उस युद्ध-भूमि में लगातार नृत्य करनेवाले घड, छककर मास
खानेवाले भूत, भयंकर रूप से गरजनेवाले बैताल, वहनेवाले रक्त का पान करनेवाली
डाकिनियाँ मास-पेशियो को निगलनेवाले गृद्ध, उच्च स्वर में रव करनेवाले शृगाल,
रक्त उगलनेवाले भालू, पृथ्वी पर लोटने, छटपटाने तथा दाँत पीसनेवाले वानर, शक्ति-
हीन होकर गिरे हुए, रूप-विकृत, रक्त में भीगे हुए तथा धूलि से सने हुए कपि, एक ही
बाण के आघात से एक साथ एक ही स्थान पर सटकर गिरे हुए कपि, खड-खड होकर गिरे हुए
पर्वत, छिन्न-भिन्न होकर गिरे हुए वृक्ष, खडित होकर फैले हुए राक्षसो के शूल, असख्य खडों
में टूटकर गिरी हुई गदाएँ, मरकर गिरे हुए असख्य हाथी आदि जहाँ-तहाँ दिखाई पडने
लगे । इस दृश्य को देखकर विभीषण तथा हनुमान्, दोनो विस्मित तथा दुखी हुए, किन्तु
तुरन्त उन्होने निश्चय किया कि अब हमें भविष्य के कार्य के सबध में जाबवान् से परामर्श
लेना चाहिए । वही जानता है कि अब क्या करना चाहिए । हम उसे पहले ढूँढे और
उसके कथन के अनुसार कार्य करें ।
यो सोचकर वे युद्ध-भूमि में जाबवान् को ढूंढते हुए गये और निदान एक विशाल
शर-शय्या पर पडे हुए उसे देखा । तब विभीषण ने कातर-भाव से जाबवान् को
देखकर कहा--'हे ऋक्षराज, तुम अभी जीवित हो ? क्या, तुम वोल सकते हो ? तुम
हमें पहचानते हो ?' राक्षस के शर-प्रहार से शक्तिहीन होने के कारण जाबवान् ने क्षीण
स्वर में कहा--'हे विभीषण, तुम्हारे कठ-स्वर को पहचानकर में तुम से वात कर रहा हूँ।
वैसे तो मेरी आँखो में वाण चुभ गये है । अत, मेरी आँखें देख नही पाती। क्या पवन-
पुत्र जीवित है ? उसके जीवित रहने की वार्ता सुनकर मेरे कानो को आनंद पहुँचाओ ।'
यह सुनकर विभीषण ने अत्यत आश्चर्य-चकित होकर जाबवान् से पूछा--'हे ऋक्षराज,
यह कैसे आश्चर्य की बात है कि तुम महात्मा रामचन्द्र के वारे में नहीं पूछते, लक्ष्मण
के सबध में नही पूछते, सूर्य-पुत्र के सबध में जानने की इच्छा प्रकट नही करते, और अगद
के वारे में भी पूछना नही चाहते, किन्तु पवन-पुत्र के सबध में ही पहले जानना चाहते हो ?
यह तुम्हारा कैसा विचार है ?' तब जाबवान् ने कहा--'हे विभीषण, यदि अकेले

३६६ रगनाथ रामायण
हनुमान् अपने प्राणो से जीवित है, तो सभी वानर जीवित हो जायेंगे । यदि वह जीवित
नही है, तो जीवित रहकर भी, वानर जीवित नही रह पायेंगे ।'
इन बातो को सुनकर वायु-पुत्र को अधिक हर्ष हुआ । उसने अपना नाम लेकर
जाववान् के चरणो में प्रणाम किया । ऋक्षराज अत्यत हर्षित हुआ और अपने को पुनर्जीवित-सा
अनुभव करके कहा—'हे वायुनदन, अब इन वानरो के लिए तुम्हारे सिवाय और
कौन आश्रय है, इसलिए तुम शीघ्र ही समुद्र को पार करके जाओ । हिमाचल को पार
करके हेमकूट,- ऋषभ-पर्वत, मेरु-पर्वत, रजताद्रि तथा श्वेताचल से आगे निकल जाओ ।
वहाँ (तुम्हें) लवण-समुद्र मिलेगा । उसे भी पार करो, तो शाक-द्वीप पहुँचोगे । उसको भी
पार करो, तो तरगायमान अमृताव्धि को देखोगे । उसे पार करो, तो चन्द्र-शैल तथा द्रोण-
शैल के मध्य भाग में उज्ज्वल प्रकाश से दीप्त ओषधी-शैल को देखोगे । उस पर्वत पर
सजीवकरणी, विशल्यकरणी, सधानकरणी तथा सौवर्णकरणी नामक चार ओषधियाँ है । तुम
उस पर्वत पर चढकर उन ओषधियो को ले आओ और इस वानर-समूह को प्राण-दान देकर
राम-लक्ष्मण को आनद पहुँचाओ ।'
९१. हनुमान् का ओषधी-शल लाकर वानरों की मूर्च्छा दूर करना
वायुपुत्र, जाववान् से आज्ञा लेकर सुवेलाचल पर चढ गया । अपने चरणो को
समान रूप से पृथ्वी पर प्रतिष्ठित करके, अपनी दीप्तिमान् लागूल को ऊपर उठाये, कधो
को उचकाकर, अपने शरीर को फुलाकर, राम का स्मरण करते हुए वह आकाश की ओर
उछला । उस अनुपम वेग के कारण वह विशाल पर्वत भी पृथ्वी में धँस गया, दिशाएँ
काँप गई और पृथ्वी चकराने लगी । इस प्रकार, आकाश मार्ग में उडकर हनुमान् ने अत्यत
भयकर समुद्र को पार किया और विष्णु के चक्र के समान आकाश में जाते हुए, मार्ग में
कई विचित्र दृश्यो को देखते हुए, घने फेन से युक्त अमृत-समुद्र को पार किया और चन्द्र-
शैल तथा द्रोण-शैल के मध्य भाग में स्थित ओषधी-शैल पर चढ गया और ओषधियो का
अन्वेषण करने लगा । किन्तु, वे ओषधियाँ काम-रूपिणी थी, इसलिए अपने-आपको उस कपि-
शेखर की दृष्टि से छिपा लिया । ओषधियो के नही दीखने से अनिलकुमार मन-ही-मन
विचार करने के पश्चात्, विनीत हो उस पर्वत से प्रार्थना करने लगा—'हे पर्वतराज,
में प्रालेय, पर्जन्य तथा कैलास-पर्वतो की उपेक्षा करते हुए शीघ्रगति से तुम्हारी सेवा में
आया हूँ । में कार्यातुर हूँ । देवताओ ने यहाँ जिन ओषधियो को छिपा रखा है, उन्हें
कृपया मुझे दिखा दो । हमारे राघव को इनकी आवश्यकता पड गई है । किसी भी तरह
उन्हें दे दो, तो अच्छा होगा ।'
तब पर्वत ने अट्टहास करके गर्व से फूलते हुए, हनुमान् से कहा—'तुम्हारा कितना
साहस है कि तुम मुझसे ऐसे वचन कह रहे हो ? इन ओषधियो को मुझसे माँगने का
तुम्हारा अधिकार ही क्या है ? इन्हें लाने का आदेश देनेवाले तुम्हारे राम की शक्ति
कितनी है ? जिन ओषधियो को देवताओ ने यहाँ छिपा रखा है, उन्हें तुम्हें देने से अधिक
कोई और अपराध हो सकता है ?'
इन गर्वोक्तियों को सुनकर अनिल-कुमार ने अत्यत क्रुद्ध होकर उस पर्वत से कहा—

'मैं जब तुमसे ऐसी विनम्र प्रार्थना करता हूँ, तब क्या यह उचित नही कि तुम
मेरी प्रार्थना पर विचार करो ? हे पर्वत, मैं अपनी विशाल भुज-शक्ति से समूल तुम्हें
उखाड़कर अभी यहाँ से ले जाता हूँ, अबतक जिन रामचन्द्र को तुम नही जानते हो,
उन्हें तब तुम जानोगे ।' इतना कहकर हनुमान् ने भयंकर गति से गर्जन करते हुए उस
पर्वत को जड़ से उखाड़ लिया, (पर्वत पर रहनेवाले) गंधर्वों को भगा दिया और उसे
उठाकर इतने वेग से जाने लगा कि कोई भी उसे पहचान न सके ।

सहस्र धाराओं से अत्यधिक दीप्त होनेवाले चक्र से युक्त विष्णु की भाँति जब
हनुमान् उस पर्वत को लिये हुए चलने लगा, तब राक्षस-वीरों के शर-प्रहार से घायल हो,
मूर्च्छित पड़े हुए कपियों ने श्रेष्ठ महौषधियों की वायु के स्पर्श-मात्र से ही अपनी आँखें खोल दीं ।
उन्होंने अत्यधिक उत्साह से सिंहनाद करते हुए युद्ध-भूमि में पड़े हुए दैत्य-सैनिकों
को उठा-उठाकर समुद्र में फेंक दिया। सुवेलाद्रि को पारकर हनुमान् ने उस महनीय ओषधि-
शैल को कपि-सेना के मध्य भाग में उतार दिया और अपने कुल के लोगों को तथा

३६८ रंगनाथ रामायणी
९२. वानरों का लंका जलाना
इस बात को सुनकर सभी वानर सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे । शनै. शनै
सूर्यास्त हुआ और अधकार क्रमश घना होता हुआ चारो ओर व्याप्त होने लगा । तब
कपि-वीरो ने अत्यधिक रोष से भरे हुए बडे साहस के साथ लूकाओ को हाथ में लिये
हुए बडे वेग से उछलते-कूदते लका को घेर लिया । द्वाररक्षक उन्हें देख भयभीत होकर
भाग गये । तब वानरो ने लका में प्रवेश किया और लका को जलाने लगे । अग्नि क्रमश
प्रचंड होकर दिशाओ तथा आकाश में व्याप्त हो गई । वह प्रचंड अग्नि ऐसी लग रही थी
कि रावण की लंकापुरी को जलाने के लिए अब राम की क्रोधाग्नि की कोई आवश्यकता
नही, यही अग्नि उसको जलाने के लिए पर्याप्त होगी ।
वडवानल जैसे अपने धुएँ के साथ समुद्र-भर में व्याप्त होता है, वैसे ही यह अग्नि
विपुल धुएँ के साथ आकाश तक पहुँच गई । इससे प्रासादो की पंक्तियाँ अपनी मणि-
राजियो को विखेरती हुई भस्मसात् हो गई, ऊँचे-ऊँचे गोपुर पृथ्वी को कँपाते हुए जलकर
पृथ्वी पर गिर पड़े और चूर-चूर हो गये । वडी-वडी अट्टालिकाएँ आश्चर्यजनक रीति से
जलकर गिरने लगी और अग्नि-ज्वालाएँ लपलपाती हुई आकाश की ओर बढने लगी ।
महान् स्वर्ण-मडप, तथा रत्न-निर्मित गृह-पंक्तियाँ जलकर राख हो गई । आभरणो से भरे
भंडार-घर जैसे थे, वैसे ही भस्म हो गये । विविध अमूल्य वस्त्र, सुगंध-द्रव्य, कालीनें, मोती,
तथा मरकत, अगर-चंदन, कर्पूर, कस्तूरी आदि वस्तुएँ, विविध धान्यो की अक्षय राशियाँ
तथा अन्य मूल्यवान् वस्तुएँ, हाथियो तथा घोडो की झूलें, स्थान-स्थान पर रखे हुए कवच-
समूह आदि जलकर भस्म हो गये, जिससे राक्षसो के हृदय में पीड़ा उत्पन्न होने लगी ।
उस समय कुछ राक्षस सुवर्ण-कवच पहने हुए आयुधो से युक्त हो दुर्वार गति से वानरो
का सहार करने का निश्चय करके घरो से निकल रहे थे, कुछ राक्षस विपुल रति-क्रीडा
के आवेग से मस्त हो कामिनियो के संग-सुख की घडियाँ बिता रहे थे, शय्या को
छोडने की अनिच्छा से कुछ लोग ऊँघ रहे थे, कुछ लोग अभी सुख की निद्रा में
निमग्न थे, कुछ राक्षस अपने बच्चो को लेकर भाग रहे थे, कुछ भौंचक होकर चारो
दिशाओ में दौड़ रहे थे, कुछ रुदन कर रहे थे, कुछ अपनी संपत्ति को घर के बाहर
निकालकर उसे छोड़कर जाने की इच्छा न होने से, वही चकित हो यह दृश्य देख रहे थे,
धुएँ के कारण मार्ग न पाकर कुछ लोग जँभाइयाँ लेते हुए खडे थे, कुछ राक्षस अग्नि को
बुझाने के लिए घर की छतो पर चढ गये, किन्तु वहाँ से नीचे उतरने में अपने को
असमर्थ पा रहे थे, और जहाँ-तहाँ कुछ लोग इकट्ठे होकर घबराहट मे यह दृश्य देखकर दुखी
हो रहे थे । अग्नि प्रलयानल के समान, अपनी लपलपाती शिखाओ को व्याप्त करती हुई,
कई भवनो तथा कई राक्षसो को भस्मसात् करने लगी । रत्न-नूपुरो का मधुर शिंजन,
वीणा की मृदु झकार, सुदर तथा मीठे वचनो की ध्वनि, अद्वितीय नृत्य-गीतो की ध्वनि,
श्रुति-मधुर केका-रव, हंसो का कल-कूजन तथा सुदर शुक-शारिकाओ की मधुर ध्वनि आदि
मिट्टी में मिल गईं । चंद्रिका मे भी धवल काति से युक्त तथा पद्मराग-मणियो की
कांति से उज्ज्वल, उम लंका के सभी हर्म्य, जलने की ध्वनि, चारो ओर व्याप्त होनेवाले धुएँ