रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगमन के समान, कालकूट विष ही बाण के रूप में आने के समान, दुर्वार गति के साथ
अत्यन्त वेग से आया और उस राक्षस के नीलाद्रि-सम दीखनेवाले सिर को काट दिया ।
वह सिर तुरन्त नीचे नही गिरा, किन्तु वह लका में बहुत ही ऊँची अट्टालिकाओ तथा सीधो
से टकराकर उन्हें चूर-चूर करके अत्यधिक ध्वनि करते हुए आगे निकल गया और समुद्र
के विविध प्राणि-समूह को कुचलते हुए समुद्र में गिरकर डूब गया । उम राक्षस का अर्द्ध-
शरीर पृथ्वी पर दस करोड वानरो को कुचलते हुए तथा दूसरा अर्द्ध-शरीर समुद्र के जल-
चर समूह को चूर-चूर करते हुए गिर पड़ा । उसके गिरने से जो ध्वनि हुई, उससे सभी
समुद्र आलोड़ित हो उठे, पृथ्वी काँप उठी, दिशाएँ विदीर्ण हुईं और लकाधीश का हृदय
विदीर्ण हो गया । लका में कोलाहल होने लगा, सभी जग हर्षित हुए और वानर-वीर
आनन्द-सागर में डूब गये । तब देवताओ ने रविकुलाधिप रघुरामचन्द्र की विविध रीतियो से
स्तुति की । रामचन्द्र भी कुंभकर्ण की मृत्यु पर मदहास करते हुए मन-ही-मन हर्षित होने लगे
कि यह राक्षस देवताओ तथा दिक्पालो के लिए भी दुर्जय था, अब सभी लोको के
लिए कभी किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा । राहु के प्रभाव से मुक्त होकर प्रभा से
विलसित होनेवाले सूर्यबिंब की भाँति रामचन्द्र विजयलक्ष्मी वो प्राप्त करके भासमान
होने लगे ।
इसके पश्चात् राक्षस मन-ही-मन इस पराजय के कारण परितप्त होते हुए, कांति-
हीन मुखो से शीघ्र रावण के समक्ष गये और निवेदन किया--'हे देव, देवताओ का शत्रु,
आपके भाई ने समस्त वानर-समूह को भयभीत करके भगा दिया और आकाश से पृथ्वी
तक व्याप्त होकर कपि-समूह-रूपी समुद्र को इस प्रकार मथ डाला, जैसे मदराचल ने क्षीर
सागर का मथन किया था। फिर, उन्होने दुर्वार विक्रम से सारे रण-क्षेत्र में युद्ध करते हुए,
इन्द्रादि देवताओ में ईर्ष्या उत्पन्न की और निदान श्रीराम की विपुल-बाणाग्नि में दग्ध
हो गये ।' जब राक्षसो ने इस प्रकार रण-क्षेत्र में वुंभकर्ण की मृत्यु का समाचार रावण को
सुनाया, तब वह मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर इस प्रकार गिर पडा, मानो उसका पतन निश्चित
ही है । अतिकाय अत्यन्त शोकाकुल हुआ, देवान्तक धैर्य तजकर शोक करने लगा । त्रिशिर
दिङ्मूढ की भाँति पृथ्वी पर लोट गया । नरांतक काठ के पुतले के समान स्तभित रह गया ।
महोदर तथा महापार्श्व आदि राक्षस-वीर शोक-विह्वल हो भूमि पर गिर गये ।
८१. कुंभकर्ण की मृत्यु पर रावण का शोक
रावण शीघ्र ही सचेत होकर बार-बार अपने भाई का नान लेकर यो प्रलाप करने
लगा--'हे वीर, अब में राघव-वैर-रूपी समुद्र को किम नौका से पार करूँगा ? मुझे
विश्वास था कि तुम राम-लक्ष्मण का रण में संहार करोगे । ऐसे समय में तुम स्वयं राघव
के प्रचण्ड शर-वह्नि की ज्वाला में भस्म हो गये । हे निद्रालु वीर, तुम सतत निद्रा-निरत
रहनेवाले हो, आज तुम दीर्घ निद्रा (मृत्यु) से क्यो अनुरक्त हुए ? अविरत अशनि-पात
से भी नष्ट नही होनेवाला तुम्हारा शरीर आज एक साधारण मानव के प्रहार से नष्ट
हुआ । तुम तो अपनी अनुपम शक्ति के कारण अंतक (यम) के लिए अंतक सिद्ध हुए थे।
ऐसे तुम्हारे लिए आज युद्ध-क्षेत्र में राघव अंतक कैसे सिद्ध हुआ ? अद्रि, विद्रावण आदि