रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 390, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० रंगनाथ रामायण
अकलंक अयोध्या तुम्हें प्राप्त हुई। इनके गर्व में मत इठलाओ। तुम भले ही, मत्स्य का
रूप धरकर सभी समुद्रों में प्रवेश करो, कूर्म का रूप धारण कर पर्वत के नीचे चले जाओ,
पर मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं। अवश्य मैं तुम्हें ढूंढ लाऊँगा। तुम अपना वेश विकृत करके
भले ही कहीं भी छिप जाओ, मैं तुम्हें अवश्य पकड़ लाऊँगा, तुम्हें भूलूँगा नहीं। वामन
का रूप धरकर, याचक-वृत्ति अपनाये हुए भले ही तुम कहीं चले जाओ; मैं तुम्हें ढूँढ़कर
पकड़ लाऊँगा; तुम्हारा विचार नहीं भुलाऊँगा। भूसुर का वेश धरकर, परशु को लिये हुए
राजाओं के संहारक तुम भले ही बन जाओ, मैं अवश्य तुम्हारा अन्वेषण करके तुम्हें पकड़
लूँगा। मेरा बाण अत्यंत भीषण है। वह कोई वट-पत्र नहीं कि तुम्हें वहन किये हुए
अद्वितीय रण-समुद्र में तैरता रहे। अत्यधिक शक्ति के मद से झूमनेवाले मेरे सामने
युद्ध-क्षेत्र में ठहरना तुम्हारे लिए असंभव है।"
८७. लक्ष्मण तथा अतिकाय का द्वन्द्व-युद्ध
इस प्रकार, प्रलाप करनेवाले अतिकाय का दर्प देखकर लक्ष्मण हँसते हुए बोले—
'हे राक्षस, मेरे रहते, राघव के साथ युद्ध करने का प्रयत्न क्यों करते हो? सँभलकर
मेरी ओर बढ़ो; मैं तुम्हें अपने बाणों से टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा।' ऐसा कहकर वे अपने
धनुष के टंकार से दानवों के चित्त कंपित करते हुए उस राक्षस पर टूट पड़े। लक्ष्मण
के साहस को देख वह आश्चर्यचकित हुआ और एक क्रूर अस्त्र का संधान करके, दहाड़ते
हुए कहने लगा—'ठहरो, लक्ष्मण, ठहर जाओ। तुम अभी बालक हो; मेरे साथ मत
भिड़ो। मैं यम से भी अधिक क्रूर हूँ। मेरे तीव्र बाणों को सहने की क्षमता या तो इस
वसुंधरा में हैं, या हिमाचल में हैं, या रावण के उठाये कैलास पर्वत में हैं, या देवताओं
के निवासभूत पर्वत में हैं, या अवकरिपु शिवजी के धनुष को भंग करने के गर्व से फूलने-
वाले तुम्हारे भाई राघव में है। उसके अलावा दूसरे किसी में मेरे साथ युद्ध करने की
शक्ति नहीं है? मेरे समक्ष खड़े रहना, क्या तुम्हारे लिए संभव है? हे सौमित्र, यह श्रेष्ठ
बाण अभी तुम्हें लगकर तुम्हारा रक्तपान कर लेगा।'
ऐसे दुरहंकार से भरे वचन सुनकर लक्ष्मण ने कहा—'हे राक्षस, इस प्रकार व्यर्थ
गर्जन क्यों करते हो? युद्ध में तुम अपनी शक्ति दिखाओ। मेरे समक्ष व्यर्थ प्रलाप क्यों करते हो?
हे निशाचर, तुम भी बड़े वीर की भाँति, अपना औद्धत्य तजे बिना, शस्त्र-समूह से
सज्जित हो, तथा रथ पर आरूढ़ हो, मेरे समक्ष खड़े हो, यही एक महान् आश्चर्य है।'
यह सुनकर उस राक्षस ने बड़े क्रोध से अपने हाथ का बाण लक्ष्मण पर चलाकर गर्जन
किया। तब, लक्ष्मण ने उस बाण को अर्द्धचन्द्र बाण से काट डाला। फिर, उन्होंने
एक तेज बाण अपने धनुष पर चढ़ाकर उसे उस राक्षस के ललाट को लक्ष्य करके चलाया,
मानो यह संकेत कर रहे हों कि ब्रह्मा का लेख भी अब मिटनेवाला है। तब, उस शर
के प्रहार से अतिकाय ऐसे हिल उठा, जैसे रुद्र के प्रहार से बाणासुर का प्रासाद कंपित
हो गया था। 'मेरे साथ यह युद्ध करने का साहस रखता है'—यह विचार आते ही अति-
काय ने सिंहनाद किया और अपना रथ लक्ष्मण के निकट चलाकर, शीघ्र ही रामानुज पर
एक ऐसा पैना शर चलाया, मानो उसी से उनका संहार कर डालने का संकल्प कर लिया हो।